कर्नाटक विधानसभा ने विपक्ष के हंगामे के बीच धर्मांतरण विरोधी विधेयक को मंज़ूरी दी

कर्नाटक विधानसभा में पारित  इस विधेयक में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा और बलपूर्वक, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, प्रलोभन या किसी भी कपटपूर्ण तरीके से एक धर्म से दूसरे धर्म में गै़रक़ानूनी अंतरण पर रोक लगाने का प्रावधान है. कांग्रेस ने इस विधेयक को जनविरोधी, संविधान विरोधी, ग़रीब विरोधी बताते हुए पुरज़ोर विरोध किया.

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कर्नाटक विधानसभा में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और विधायक. (फोटो: पीटीआई)

कर्नाटक विधानसभा में पारित  इस विधेयक में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा और बलपूर्वक, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, प्रलोभन या किसी भी कपटपूर्ण तरीके से एक धर्म से दूसरे धर्म में गै़रक़ानूनी अंतरण पर रोक लगाने का प्रावधान है. कांग्रेस ने इस विधेयक को जनविरोधी, संविधान विरोधी, ग़रीब विरोधी बताते हुए पुरज़ोर विरोध किया.

कर्नाटक विधानसभा में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और विधायक. (फोटो: पीटीआई)

बेलगावी: कर्नाटक विधानसभा ने बृहस्पतिवार को हंगामे के बीच विवादास्पद धर्मांतरण विरोधी विधेयक को मंजूरी दे दी. मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा कि विधेयक संवैधानिक और कानूनी दोनों है और इसका मकसद धर्मांतरण की समस्या से छुटकारा पाना है.

वहीं कांग्रेस ने विधेयक का भारी विरोध करते हुए कहा कि यह ‘जनविरोधी, अमानवीय, संविधान विरोधी, गरीब विरोधी और कठोर’ है. कांग्रेस ने आग्रह किया कि इसे किसी भी वजह से पारित नहीं किया जाना चाहिए और सरकार द्वारा इसे वापस ले लेना चाहिए.

जनता दल (एस) ने भी विधेयक का विरोध किया. यह विधेयक बीते 21 दिसंबर को विधानसभा में पेश किया गया था.

इस विधेयक में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा और बलपूर्वक, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, प्रलोभन या किसी भी कपटपूर्ण तरीके से एक धर्म से दूसरे धर्म में गैरकानूनी अंतरण पर रोक लगाने का प्रावधान है.

कानून के मुताबिक, धर्मांतरण की शिकायत किसी ऐसे व्यक्ति के परिवार के सदस्यों द्वारा की जा सकती है जो धर्म परिवर्तन कर रहा है या कोई अन्य व्यक्ति जो धर्मांतरित होने वाले व्यक्ति से संबंधित है.

सामान्य वर्ग के लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के मामले में कानून का उल्लंघन करने पर तीन साल से पांच साल की जेल और 25,000 रुपये के जुर्माने का प्रस्ताव किया गया है, जबकि नाबालिगों, महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति के संदर्भ में प्रावधानों के उल्लंघन पर अपराधियों को तीन से दस साल की कैद और कम से कम 50,000 रुपये का जुर्माने का प्रावधान है.

विधेयक में धर्मांतरण का प्रयास करने वाले व्यक्तियों द्वारा धर्मांतरण के पीड़ितों को पांच लाख रुपये (अदालत के आदेश पर) के मुआवजे के भुगतान और इस अपराध को दोहराने पर दोगुनी राशि का मुआवजा देने का प्रावधान किया गया है.

वहीं सामूहिक धर्मांतरण के मामलों के संबंध में तीन से 10 साल तक की जेल और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव है. कहा गया है कि धर्मांतरण के इरादे से की जाने वाली शादियों को फैमिली कोर्ट या न्यायिक अदालत द्वारा अमान्य घोषित किया जा सकता है.

इस विधेयक के तहत अपराध गैर-जमानती और संज्ञेय है.

सदन ने हंगामे के बीच विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया. कांग्रेस के सदस्य आसन के निकट आकर विधेयक का विरोध कर रहे थे. वे विधेयक पर चर्चा जारी रखने की मांग कर रहे थे, जो आज (बृहस्पतिवार) सुबह शुरू हुई थी. वे चर्चा में हस्तक्षेप के दौरान मंत्री केएस ईश्वरप्पा द्वारा की गईं कुछ टिप्पणियों पर भी आपत्ति जता रहे थे.

सदन में ‘कर्नाटक धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण विधेयक, 2021’ पर हुई चर्चा में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आरोप लगाया कि इस विधेयक के लिए सिद्धारमैया नीत पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार जिम्मेदार है. अपने दावे के समर्थन में भाजपा ने कुछ दस्तावेज सदन के पटल पर रखे.

हालांकि नेता प्रतिपक्ष सिद्धारमैया ने सत्तापक्ष के दावे का खंडन किया. बाद में विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय में रिकॉर्ड देखने के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने सिर्फ मसौदा विधेयक को कैबिनेट के सामने रखने के लिए कहा था लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया गया था.

उन्होंने कहा कि इस प्रकार इसे उनकी सरकार की मंशा के रूप में नहीं देखा जा सकता है.

सिद्धारमैया ने आरोप लगाया कि इस विधेयक के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का हाथ है.

इस पर मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा, ‘आरएसएस धर्मांतरण के खिलाफ है, यह कोई छिपी बात नहीं है, यह जगजाहिर है. 2016 में कांग्रेस सरकार ने आरएसएस की नीति का अनुकरण करने के लिए अपने कार्यकाल के दौरान विधेयक की पहल क्यों की? ऐसा इसलिए है क्योंकि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह इसी प्रकार का कानून लाए थे. आप इस विधेयक के एक पक्ष हैं.’

बोम्मई ने कहा कि विधेयक संवैधानिक और कानूनी दोनों है और इसका मकसद धर्मांतरण की समस्या से छुटकारा पाना है. उन्होंने कहा, ‘यह एक स्वस्थ समाज के लिए है. कांग्रेस अब इसका विरोध करके वोट बैंक की राजनीति कर रही है, उनका दोहरा मापदंड अब स्पष्ट है.’

ईसाई समुदाय के नेताओं ने भी विधेयक का विरोध किया है. विधेयक में दंडात्मक प्रावधानों के अलावा इस बात पर जोर दिया गया है कि जो लोग कोई अन्य धर्म अपनाना चाहते हैं, उन्हें कम से कम 30 दिन पहले निर्धारित प्रारूप में जिलाधिकारी या अतिरिक्त जिलाधिकारी के समक्ष घोषणा-पत्र जमा करना होगा.

कर्नाटक के गृहमंत्री अरग ज्ञानेंद्र ने यह विधेयक पेश किया. उन्होंने कहा कि आठ राज्य इस तरह का कानून पारित कर चुके हैं या लागू कर रहे हैं, और कर्नाटक नौवां ऐसा राज्य बन जाएगा.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, विधेयक में यह भी कहा गया है कि जो कोई भी धर्मांतरण करना चाहता है, उसे जिला कलेक्टर को एक आवेदन जमा करना होगा, जो आवेदन की जांच करेगा, आवेदक का साक्षात्कार करेगा कि यह पता लगाने के लिए क्या धर्मांतरण बल या प्रलोभन से तो नहीं है.

यदि आवेदन वास्तविक पाया जाता है, तो अन्य विभागों को यह सुनिश्चित करने के लिए सूचित किया जाएगा कि धर्मांतरित व्यक्ति अपनी मौजूदा जाति या धर्म से लाभ खो देता है और उस श्रेणी में शामिल किया जाता है, जिसमें उक्त व्यक्ति परिवर्तित हो रहा है.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में लाए गए समान कानूनों के आधार पर धर्मांतरण विरोधी विधेयक ऐसे समय में पारित किया गया है, जब राज्य में ईसाई समुदाय के सदस्यों पर हमलों में वृद्धि हुई है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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