हैदरपोरा मुठभेड़ को लेकर लगाए गए आरोपों से आहतः जम्मू एवं कश्मीर डीजीपी

बीते 15 नवंबर को श्रीनगर के हैदरपोरा इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान तीन व्यक्तियों- व्यापारी मोहम्मद अल्ताफ़ भट, दंत चिकित्सक डॉ. मुदसिर गुल और आमिर मागरे की मौत हो गई थी. राजनीतिक दलों ने पुलिस द्वारा की गई वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल उठाए थे, जिसमें इस मुठभेड़ में शामिल अधिकारियों को एक तरह से ‘क्लीनचिट’ दी गई थी. 

डीजीपी दिलबाग सिंह (बीच में) कश्मीर जोन के आईजीपी विजय कुमार (बाएं) और एसआईटी प्रमुख सुजीत के. सिंह हैदरपोरा मुठभेड़ के संबंध में 28 दिसंबर 2021 को श्रीनगर में एक प्रेस वार्ता की थी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

बीते 15 नवंबर को श्रीनगर के हैदरपोरा इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान तीन व्यक्तियों- व्यापारी मोहम्मद अल्ताफ़ भट, दंत चिकित्सक डॉ. मुदसिर गुल और आमिर मागरे की मौत हो गई थी. राजनीतिक दलों ने पुलिस द्वारा की गई वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल उठाए थे, जिसमें इस मुठभेड़ में शामिल अधिकारियों को एक तरह से ‘क्लीनचिट’ दी गई थी.

डीजीपी दिलबाग सिंह (बीच में) कश्मीर जोन के आईजीपी विजय कुमार (बाएं) और एसआईटी प्रमुख सुजीत के. सिंह हैदरपोरा मुठभेड़ के संबंध में 28 दिसंबर 2021 को श्रीनगर में एक प्रेस वार्ता की. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: जम्मू कश्मीर के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिलबाग सिंह ने शुक्रवार को कहा कि कुछ लोग आतंकवाद का चतुराई से समर्थन करके ‘नरम अलगाववाद’ में लिप्त हैं.

सिंह ने हैदरपोरा अभियान को ‘साफ-सुथरा’ करार दिया और सुरक्षा बलों को दी गई ‘क्लीनचिट’ पर सवाल उठाने वाले नेताओं को जांच दल के समक्ष सबूत पेश करने के लिए कहा.

सिंह ने कहा कि वह कश्मीर में नेताओं के एक वर्ग के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से आहत हैं.

बता दें कि कश्मीर के राजनीतिक दलों ने पुलिस द्वारा की गई वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल उठाए थे, जिसमें इस मुठभेड़ में शामिल अधिकारियों को ‘क्लीनचिट’ दी गई थी.

राजनीतिक दलों द्वारा की गई आलोचना के बाद मुठभेड़ की जांच कर रही एसआईटी ने उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की धमकी दी थी.

डीजीपी ने एक संवाददाता सम्मेलन कहा, ‘इस तरह के बयानों से हमें निश्चित रूप से दुख हुआ है. यह कुछ लोगों की ओर से गैर-जिम्मेदाराना है, जो जांच का हिस्सा नहीं हैं और वे जमीन पर जांच के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं.’

वह हैदरपोरा मुठभेड़ के संबंध में स्थानीय पुलिस की जांच के खिलाफ राजनीतिक नेताओं के बयानों पर सवालों का जवाब दे रहे थे.

बीते 15 नवंबर की शाम श्रीनगर के हैदरपोरा इलाके में गोलीबारी हुई थी. इस दौरान पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बलों की एक संयुक्त टीम ने आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना मिलने पर एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की घेराबंदी की थी.

इस मुठभेड़ में एक पाकिस्तानी आतंकवादी और तीन अन्य व्यक्ति मारे गए थे और पुलिस ने दावा किया था कि मारे गए सभी लोगों के आतंकवाद से संबंध थे. तीनों के परिवारों ने उनके निर्दोष होने का दावा किया था, जिसके बाद पुलिस को जांच के आदेश देने पड़े थे.

मुठभेड़ के दौरान तीन व्यक्तियों- व्यापारी मोहम्मद अल्ताफ़ भट, दंत चिकित्सक डॉ. मुदसिर गुल और आमिर मागरे की मौत हो गई थी.

इसके बाद उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 18 नवंबर को इस मामले में मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए थे. यह शहर की सीमा के भीतर सेना और जम्मू कश्मीर पुलिस द्वारा संयुक्त रूप से किए गए दुर्लभ अभियानों में से एक था.

इस बीच मध्य कश्मीर के पुलिस उप-महानिरीक्षक सुजीत कुमार के नेतृत्व वाले विशेष जांच दल (एसआईटी) ने जांच के बारे में ‘अटकले लगाने वाले’ बयान देने के लिए बीते 29 दिसंबर को जम्मू कश्मीर में नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी थी.

जम्मू कश्मीर के डीजीपी ने स्पष्ट किया कि अभियान ‘साफ-सुथरा’ था और पेशेवर तरीके से किया गया था. उन्होंने कहा, ‘हमने यह स्पष्ट कर दिया है कि अभियान साफ-सुथरा था. यह पारदर्शी था.’

शीर्ष पुलिस अधिकारी ने यह भी कहा कि नेताओं द्वारा की गई बयानबाजी कानून का उल्लंघन है.

उन्होंने कहा, ‘हमने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे बयान एक तरह से कानून का उल्लंघन हैं. हो सकता है कि अगर लोग अपने तरीके नहीं बदलते हैं, तो किसी स्तर पर कानून अपना काम करेगा.’

उन्होंने इस मुद्दे को उठाने वालों से जांच दल के सामने सबूत पेश करने को भी कहा.

उन्होंने कहा, ‘अगर किसी के पास कोई सबूत है, तो वह इसे मजिस्ट्रेट जांच और एसआईटी के सामने पेश कर सकता है.’

यह पूछे जाने पर कि क्या ऐसे लोगों पर कार्रवाई की जानी चाहिए, सिंह ने कहा कि अगर कोई गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामलों को देखता है, तो उनमें से कुछ के बारे में विचार किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ‘हम निश्चित रूप से उन लोगों के खिलाफ और सबूत तलाशेंगे, जिन्होंने किसी भी तरह से आतंकवाद का समर्थन किया है.’

डीजीपी ने कहा, ‘ये लोग नरम अलगाववाद में लिप्त हैं. हमने उनमें से कुछ के खिलाफ कार्रवाई की है. हम और सबूतों की तलाश करेंगे. कोई भी कानून से ऊपर नहीं है.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, डीजीपी सिंह ने किसी का नाम लिए बगैर कहा, ‘ऐसे लोग हैं जिन्होंने कई सालों तक इस तरह का परिदृश्य देखा है और वे जमीनी हकीकत जानते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि लाशों पर वोटों की गिनती करना ही शायद उनका मिशन है. हम यकीनन इन आक्षेपों से आहत हुए हैं. ये कुछ लोगों की ओर से बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना हैं और ये लोग जांच का हिस्सा भी नहीं हैं और न ही कुछ जानते हैं.’

सिंह ने कहा कि इस तरह के लोगों को उनके इरादों में सफल नहीं होने दिया जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘हमने यह भी स्पष्ट किया है कि ये बयान किसी तरह कानून का उल्लंघन है. शायद किसी स्तर पर अगर लोग नहीं सुधरते तो शायद कानून अपना काम करेगा.’

श्रीनगर में कश्मीर के आईजीपी विजय कुमार ने कहा कि पीड़ितों के परिवार वालों को जांच पर सवाल उठाने से बचना चाहिए. वहीं, मुख्यधारा के नेताओं को लोगों को उकसाने से बचना चाहिए.

आईजीपी कुमार ने कहा, ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेताओं और परिवार के सदस्यों के पास जांच से संतुष्ट नहीं होने का अधिकार है. वे उच्च स्तर पर एनआईए, सीबीआई और अदालत से जांच का आह्वान कर सकते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन यह कहना कि जांच में त्रुटि है, इसका फैसला केवल अदालत ही कर सकती है. नेता इसका फैसला नहीं करेंगे, न ही परिवार और ही मीडियाकर्मी इस पर फैसला कर सकते हैं.’

यह कहते हुए कि वह किसी को क्लीनचिट नहीं दे रहे हैं, कुमार ने कहा, ‘हर केस पर अदालत द्वारा फैसला किया जाएगा इसलिए मैं नेताओं से अनुरोध करता हूं कि वे जनता को उकसाए नहीं. अदालत को फैसला करने दें. अगर उन्हें लगता है कि जांच में कमी है तो फिर से जांच के आदेश दिए जाएंगे.’

बता दें कि गुरुवार को पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने पुलिस जांच खारिज कर दी थी और कहा था कि मुठभेड़ की न्यायिक जांच होनी चाहिए.

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