लद्दाख: राजस्व विभाग की नौकरियों से उर्दू जानने की अनिवार्यता ख़त्म करने के निर्णय पर विवाद

लद्दाख के राजस्व विभाग की नौकरियों के लिए उर्दू जानने की अर्हता ख़त्म करने के फ़ैसले पर स्थानीय नेताओं का कहना है कि यह लेह ज़िले और मुस्लिम बहुल कारगिल के बीच वैचारिक मतभेद खड़ा करने के उद्देश्य से लिया गया सांप्रदायिक क़दम है, लेकिन इससे राजनीतिक फायदा नहीं होगा, बस प्रशासन के स्तर पर समस्याएं खड़ी हो जाएंगी.

//
Bunting at Leh. Original public domain image from Wikimedia Commons

लद्दाख के राजस्व विभाग की नौकरियों के लिए उर्दू जानने की अर्हता ख़त्म करने के फ़ैसले पर स्थानीय नेताओं का कहना है कि यह लेह ज़िले और मुस्लिम बहुल कारगिल के बीच वैचारिक मतभेद खड़ा करने के उद्देश्य से लिया गया सांप्रदायिक क़दम है, लेकिन इससे राजनीतिक फायदा नहीं होगा, बस प्रशासन के स्तर पर समस्याएं खड़ी हो जाएंगी.

लेह. (फोटो साभार: Wikimedia Commons)

श्रीनगर: केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले प्रशासन ने राजस्व विभाग की सरकारी नौकरी में नियुक्ति के नियम में एक ऐसा संशोधन किया है, जिसने विवाद को जन्म दे दिया है.

उपराज्यपाल आरके माथुर ने एक महत्वपूर्ण संशोधन करके लद्दाख के राजस्व विभाग में नौकरी पाने के लिए उर्दू जानने की आवश्यकता के नियम को हटा दिया है, जिससे कई लद्दाखियों के मन में यह डर घर कर गया है कि उनके सांस्कृतिक इतिहास को नुकसान पहुंचाया जा रहा है.

7 जनवरी को जारी अधिसूचना में उप-राज्यपाल माथुर ने लद्दाख राजस्व सेवा भर्ती नियम, 2021 में संशोधन कर दिया, जिसके माध्यम से राजस्व विभाग में नायब तहसीलदार और पटवारी की नौकरी पाने के लिए उर्दू जानने की अहर्ता को समाप्त कर दिया गया.

पहले ऐसा नियम था कि पटवारी और नायब तहसीलदार की नौकरी के लिए ‘उर्दू के ज्ञान के साथ स्नातक’ होना जरूरी था, जिसे अब केवल ‘स्नातक’ कर दिया गया है.

इससे पहले पिछले साल 8 सितंबर को लद्दाख के राजस्व, पुलिस और चिकित्सा व स्वास्थ्य शिक्षा विभाग में नियुक्ति संबंधी नियम अधिसूचित किए गए थे, जिनका व्यापक विरोध होने के चलते तीन महीने बाद उन्हें बदलना पड़ा.

कारगिल के पूर्व उपायुक्त हसन खान ने बताया कि कश्मीर और लद्दाख का राजस्व रिकॉर्ड एक सदी से ज्यादा पुराना है जो उर्दू में है, जबकि जम्मू क्षेत्र में राजस्व रिकॉर्ड हिंदी में है.

उन्होंने कहा, ‘प्रशासन उर्दू के साथ ऐसा व्यवहार कर रहा है कि मानो वह किसी और ग्रह के लोगों की भाषा  हो. लद्दाख में 70 फीसदी आबादी उर्दू समझती है, जो हमारी समृद्ध संस्कृति और विरासत है.’

2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने कारगिल के सज्जाद कारगिल का कहना है कि लद्दाख के ज्यादातर लोग उर्दू पढ़े हैं. हिंदी और अंग्रेजी के अलावा उर्दू लद्दाख और जम्मू-कश्मीर की भी की एक आधिकारिक भाषा है. कारगिल में रहने वाले बौद्ध और उनके बच्चे भी उर्दू पढ़ और लिख सकते हैं क्योंकि यह स्कूलों में पढ़ाई जाती है.

यह पहली बार नहीं है कि लद्दाख प्रशासन, जो केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा चलाया जाता है, की आंखों में उर्दू खटक रही हो.

पिछले साल जून में लद्दाख प्रशासन ने स्कूली शिक्षा संबंधी यूंटैब (YounTab) योजना लागू की थी, जिसके तहत कक्षा 6 से 12 तक के बच्चों को टैबलेट बांटे गए थे. उन टैबलेट में कुछ सामग्री पहले से लोड थी, जैसे कि किताबें और वीडियो लेक्चर आदि. सज्जाद बताते हैं कि टैबलेट में उर्दू को छोड़कर बाकी सभी किताबें मौजूद थीं.

बहरहाल, वे कहते हैं कि हालिया फैसला लद्दाख के अनोखे सांस्कृतिक इतिहास पर सुनियोजित हमला है.

खान कहते हैं कि यह फैसला लेह जिले और मुस्लिम बहुल कारगिल के बीच वैचारिक मतभेद खड़ा करने के उद्देश्य से लिया गया है. यह एक सांप्रदायिक कदम है, लेकिन इससे उन्हें राजनीतिक फायदा नहीं होगा, बस प्रशासन के स्तर पर समस्याएं खड़ी हो जाएंगी.

लद्दाख प्रदेश कांग्रेस समिति के कार्यकारी अध्यक्ष असगर अली कर्बलानी भी मानते हैं कि यह फैसला लद्दाख में बौद्ध और मुस्लिम के बीच खाई खड़ी करने के उद्देश्य से लिया गया है.

असगर कहते हैं, ‘उन्हें लगता है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है. यह मुसलमानों के प्रति उनकी नफरत दिखाता है. यह फैसला हमारी धार्मिक पहचान पर हमला है और लद्दाख के सांस्कृतिक इतिहास को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है.’

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भाजपा पर लद्दाख के युवाओं को रोजगार से वंचित करने का आरोप लगाया है और उपराज्यपाल से फैसला वापस लेने को कहा है. साथ ही भाजपा सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल पर उर्दू का अपमान करने का आरोप लगाया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

slot depo 5k slot ovo slot77 slot depo 5k mpo bocoran slot jarwo