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बम होने की झूठी सूचना देने वाले के ख़िलाफ़ राजद्रोह लगाना क़ानून का दुरुपयोगः अदालत

मामला एक 22 वर्षीय युवक से जुड़ा है जिस पर ट्रेन में बम होने की फ़र्ज़ी सूचना देने का आरोप है. आरोपी के ख़िलाफ़ राजद्रोह से संबंधित धारा 124 ए भी लगाई गई है. इसे लेकर फरीदाबाद की एक अदालत ने पुलिस को फटकारते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा किए गए अपराध को बढ़ाने के लिए इसे ग़लत तरीके से जोड़ा गया है.

(फोटोः पीटीआई)

नई दिल्लीः फरीदाबाद की अदालत ने यह कहते हुए एक आरोपी शख्स को जमानत दे दी कि रेलवे स्टेशन से ट्रेन को जाने से रोकने के लिए बम की झूठी सूचना देने वाले आरोपी व्यक्ति के खिलाफ राजद्रोह की धारा लगाना कानून का दुरुपयोग है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, फरीदाबाद के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नरेंद्र सुरा ने कहा कि आईपीसी की धारा 124ए याचिकाकर्ता द्वारा किए गए अपराध को और बढ़ाने के लिए गलत तरीके से जोड़ी गई है.

अदालत ने कहा, ‘पब्लिक प्रॉसिक्यूटर पक्ष अदालत को यह बताने में असफल रहा है कि आईपीसी की धारा 124 ए इस मामले में आखिर क्यों जोड़ी गई क्योंकि याचिकाकर्ता की सरकार के प्रति घृणा फैलाने या उसकी अवमानना करने की न तो कोई मंशा थी और न ही किसी तरह की कोशिश की गई.’

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के हटवार के रहने वाले अंशुल अग्निहोत्री (22) ने 29 दिसंबर 2020 को दोपहर लगभग 2.40 बजे रेलवे स्टेशन को फोन कर बताया था कि निजामुद्दीन से जबलपुर के लिए निकलने वाली श्रीधाम एक्सप्रेस में लाल रंग के एक बैग के अंदर विस्फोटक रखा है.

यह सूचना मिलने पर पुलिस हरकत में आई लेकिन बाद में पता चला कि यह सूचना झूठी थी. जांच में अग्निहोत्री को गिरफ्तार किया गया.

पुलिस का कहना है कि आरोपी ने ट्रेन में चढ़ने के लिए यह फर्जी कॉल की थी. उसे तीन जनवरी 2021 को हिरासत में ले लिया गया. वह तभी से जेल में है.

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, जज सुरा ने सार्वजनिक अभियोजक को निर्देश दिए हैं कि वे आईपीसी की धारा 124ए का दुरुपयोग करने से अवगत कराने के लिए आदेश की एक प्रति को उच्च पुलिस अधिकारियों को मुहैया कराएं.

रिपोर्ट के मुताबिक, अग्निहोत्री के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को मामले में फंसाया गया है. वकील ने कहा, ‘यदि फर्जी कॉल करने का आरोप सही भी है तो आईपीसी की धारा 124 ए को जोड़ना कल्पना से परे है.’

अभियोजन पक्ष ने यह कहते हुए जमानत याचिका का विरोध किया कि याचिकाकर्ता ने अपराध किया है, जो रेलवे अधिनियम की धारा 174 और अन्य के तहत दंडनीय है. इन अपराधों को मामले में जोड़ा जाएगा. जांच फिलहाल लंबित है.

अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति जताते हुए कुछ शर्तों के साथ जमानत दे दी.