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दिल्ली दंगा: हाईकोर्ट ने कहा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुनिश्चित करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य

2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े हत्या के एक मामले में छह आरोपियों को ज़मानत देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ज़मानत नियम है और जेल अपवाद. यह सुनिश्चित करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य है कि सरकार द्वारा अतिरिक्त शक्तियों का इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से किसी को मनमाने तरीके से वंचित नहीं किया जाए.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि यह सुनिश्चित करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य है कि राज्य द्वारा अतिरिक्त शक्तियों का इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से किसी को मनमाने तरीके से वंचित नहीं किया जाए.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 2020 के दंगों से जुड़े हत्या के एक मामले में आरोपी छह लोगों को जमानत देते हुए अदालत ने यह बात कही.

अदालत ने कहा कि वह छह आरोपियों- मोहम्मद ताहिर, शाहरुख, मोहम्मद फैजल, मोहम्मद शोएब, राशिद और परवेज- में से प्रत्येक द्वारा 35,000 रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही रकम की जमानत राशि जमा करने पर उन्हें जमानत देने को इच्छुक है.

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि यह सुनिश्चित करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य है कि राज्य की शक्ति के अतिरिक्त इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाए.

उन्होंने कहा, ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद है तथा अदालतों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांत को कायम रखने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का अवश्य इस्तेमाल करना चाहिए.’

यह आदेश बीते 18 जनवरी को जारी किया गया था और इसे बीते बुधवार को उपलब्ध कराया गया.

एनडीटीवी के मुताबिक, अदालत ने हिंसा के दौरान गोकुलपुरी में एक व्यक्ति की हत्या के मामले में छह आरोपियों को जमानत दे दी, जिसका शव मिठाई की दुकान में क्षत-विक्षत अवस्था में मिला था.

अदालत ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता 22 महीने से हिरासत में हैं. रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के अवलोकन से अदालत को पता चला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ सबूत जो उपलब्ध हैं- वे ​सीसीटीवी फुटेज, हिमांशु के बयान और सीडीआर ​हैं, जो याचिकाकर्ता को अपराध स्थल होने का इशारा करता है.

अदालत ने कहा कि हालांकि, इन सभी सामग्रियों की प्रामाणिकता का परीक्षण किया जाना है और यह याचिकाकर्ता को लंबे समय तक कारावास में रखने आधार नहीं बन सकता है.

अदालत ने जमानत याचिकाओं पर फैसला करते हुए यह भी कहा कि आरोप-पत्र और पूरक आरोप-पत्र पहले ही दायर किया जा चुका है. आरोप-पत्र ने संकेत दिया कि वर्तमान में 72 गवाह हैं, जिनसे पूछताछ की आवश्यकता है. इसलिए इस मामले में सुनवाई में लंबा समय लगने की संभावना है.

अदालत की राय है कि इस स्तर पर याचिकाकर्ता को अपरिभाषित अवधि के लिए सलाखों के पीछे रखना समझदारी नहीं होगी. याचिकाकर्ता की जड़ें समाज में हैं और इसलिए उसके फरार होने और भागने का कोई खतरा नहीं है.

दिल्ली पुलिस के अनुसार, आरोपियों के खिलाफ मिठाई की दुकान तोड़फोड़ और उसमें आग लगाने से संबंधित मामले में एक केस दर्ज किया गया था, जिससे 22 वर्षीय एक व्यक्ति की जलने से मौत हो गई थी. पीड़ित की पहचान दिलबर नेगी के रूप में हुई थी. दंगाइयों की भीड़ ने कथित तौर पर उनका हाथ-पैर काटकर जिंदा जला दिया था.

गौरतलब है कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून सीएए के समर्थकों और उसका विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी. इस दंगे में कम से कम 53 लोग मारे गए थे, जबकि 700 से अधिक घायल हो गए थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)