राजनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी कहां है

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव प्रचार में जहां भाजपा, सपा-रालोद और कांग्रेस लगातार मैदान में दिखाई दे रहे हैं, वहीं बसपा सुर्ख़ियों से ग़ायब-सी है.

3 फरवरी 2022 को गाजियाबाद में हुई एक जनसभा में बसपा प्रमुख मायावती. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: ‘हमारी पार्टी गरीबों और मजलूमों की पार्टी है, दूसरी पार्टियों की तरह धन्ना सेठों और पूंजीपतियों की पार्टी नहीं है. इसलिए मेरे लोग जनसभाओं और रैलियों के लिए ज्यादा आर्थिक बोझ नहीं उठा पाएंगे. बसपा की कार्यशैली और चुनाव को लेकर तौर-तरीके अलग हैं और हम किसी दूसरी पार्टी की नकल नहीं करते. यदि हम दूसरों की नकल करेंगे तो इससे फिर पार्टी को धन के अभाव में चुनाव में काफी कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है.’

उक्त शब्द बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती के हैं, जो उन्होंने कुछ हफ्तों पहले तब कहे जब उन पर और उनकी पार्टी पर उत्तर प्रदेश (यूपी) के आगामी विधानसभा चुनावों में असक्रिय रहने संबंधी आरोप लगे.

अपनी सफाई में मायावती ने साथ ही कहा, ‘कांग्रेस-भाजपा जैसे दल सत्ता में होने पर चुनाव घोषित होने से पहले खूब ताबड़तोड़ घोषणाएं, शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण आदि करते हैं जिनकी आड़ में  आम जनता के सरकारी पैसे से खूब जनसभाएं होती हैं, पार्टी के पैसे से नहीं.’

इन शब्दों या घटना की पृष्ठभूमि में जाते हुए यदि यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों को देखें तो फिलहाल सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) को मुकाबले में माना जा रहा है.

भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा कोरोना की तीसरी लहर के चलते रैलियों और जनसभाओं पर लगाई गई पाबंदियों के पहले तक इन दोनों ही दलों ने बड़ी-बड़ी जनसभाएं और रैलियां करके लाखों की भीड़ जुटाई थी. कांग्रेस को भले ही मुकाबले में न माना जा रहा हो, लेकिन रैलियों व जनसभाओं में भीड़ जुटाने और चुनाव प्रचार में ताकत झोंकने में कमी उसने भी नहीं छोड़ी.

देखा जाए तो पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने, ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं…’ जैसा नारा देकर, चुनावों में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं. यहां तक कि अन्य छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल, जैसे- अपना दल, निषाद पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) आदि भी समय-समय पर किसी न किसी कारणवश सुर्खियों में रहे हैं.

लेकिन, बसपा और मायावती की कहानी जुदा नज़र आई. जब अन्य दल चुनाव में ताकत झोंक रहे थे तब बसपा के ज़मीन पर कोई आयोजन नहीं दिख रहे थे. इस दौरान मायावती केवल ट्विटर पर सक्रिय थीं.

नवंबर-दिसंबर माह से वह अमूमन हर हफ्ते पत्रकार वार्ता करने लगीं, लेकिन ज़मीन पर जाकर मतदाताओं से रूबरू होने का कोई उदाहरण नहीं दिखा. केवल 9 अक्टूबर को लखनऊ में बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर एक आयोजन हुआ था.

इस दौरान बसपा सुर्खियों में आई भी तो ज्यादातर नकारात्मक कारणों से, जैसे कि 2017 के विधानसभा चुनावों में जीते उसके 19 विधायकों में से 14 या तो पार्टी छोड़ गए या फिर पार्टी से निकाल दिए गए.

बसपा ने तब भी सुर्खियां बटोरीं, जब पार्टी ने अयोध्या से ब्राह्मण सम्मेलनों का आयोजन शुरू किया और इतिहास में पहली बार पार्टी मंच से  ‘जय श्री राम’ के नारे लगे व राम मंदिर का अधूरा निर्माण पूरा कराने की घोषणा हुई.

बहरहाल, बाद में ईसीआई ने कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए चुनावी पाबंदियां लगा दीं, जिनका मूल मकसद था कि लोगों की भीड़ न जुट सके. यहां से सभी दलों की चुनावी कैंपेन सोशल मीडिया तक सिमट गई, जहां तक मायावती पहले से ही सिमटी हुई थीं.

लेकिन, तब तक इन कयासों को बल मिल गया कि वर्तमान चुनाव मायावती गंभीरता से नहीं लड़ रही हैं, वहीं कुछ लोग यह  कहते दिखे कि वे भाजपा को फायदा पहुंचाने के मकसद से काम कर रही हैं.

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, ‘जिस तरह मायावती चुनाव में अंडरग्राउंड हुई हैं, उसका केवल एक कारण हो सकता है कि उन्हें ईडी और सीबीआई का डर है, क्योंकि यह जगजाहिर है कि वर्तमान केंद्र सरकार अपने विरोधियों को डराने में कोई कसर नहीं छोड़ती. इसलिए मायावती ने तय कर लिया है कि वह तिहाड़ जेल जाने के बजाय अपनी दौलत का लुत्फ उठाएं.’

वे आगे कहते हैं, ‘उनकी असक्रियता का बस यही कारण है, जिसे छिपाने के लिए वे ऐसे तर्क दे रही हैं कि उनकी पार्टी मतदाताओं के घर-घर जाकर चुनावी कैंपेन चला रही है. उन्हें पता है कि घर-घर जाकर कोई नहीं देखेगा कि बसपा वहां पहुंची या नहीं. सारे काम वे भाजपा के इशारे पर कर रही हैं, बस पार्टी का वजूद बना रहे इसलिए दिखावे के लिए उन सतीश चंद्र मिश्रा और अपने भतीजे आकाश आनंद को मैदान में छोड़ दिया है, जिनके नाम पर दो वोट भी न मिलें.’

यह बात सिर्फ शरत प्रधान नहीं कह रहे, राज्य की राजनीति में दखल रखने वाले हर वर्ग में ऐसी चर्चाएं हैं.

वरिष्ठ पत्रकार मुदित माथुर कहते हैं, ‘बसपा द्वारा घोषित उम्मीदवारों की पहली दो सूचियों में करीब 38 फीसदी, यानी 109 में से 41, टिकट मुसलमानों को दिए गए. स्पष्ट है कि उसका मकसद भाजपा की सत्ता को चुनौती दे रही सपा को नुकसान पहुंचाना है.’

इसलिए सवाल उठते हैं कि क्या मायावती और बसपा वास्तव में भाजपा के इशारों पर काम कर रहे हैं? क्या उनका मकसद विपक्ष के वोट काटकर भाजपा को मजबूत करना है? क्या राज्य में चार बार सरकार बनाने वाली पार्टी, जिसका पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन रहा, मतदाता के बीच अपना जनाधार खो चुकी है और जीत की उम्मीद छोड़कर महज औपचारिकता निभाने के लिए चुनाव लड़ रही है?

या फिर मायावती के उन दावों में सच्चाई है कि बसपा की कार्यशैली व काम करने के तौर-तरीके अलग हैं और पार्टी रैलियों व जनसभाओं का आर्थिक बोझ उठाने में सक्षम नहीं है?

सवाल यह भी है कि वर्तमान चुनावों में बसपा ज़मीन पर जितनी कमजोर नज़र आ रही है, हकीकत में भी क्या वह उतनी ही कमजोर है?

बसपा, उसकी चुनावी संभावनाएं और पार्टी प्रमुख मायावती से जुड़े ऐसे और भी कई सवाल हैं जिनके जवाब जानने की द वायर  ने कोशिश की.

रायबरेली के फिरोज गांधी कॉलेज के भूतपूर्व प्रिंसिपल डॉ. रामबहादुर वर्मा बताते हैं, ‘कांशीराम के समय से ही बसपा का मतदाता आर्थिक कमजोर वर्ग है, इसलिए वह मुखर नहीं होता. मायावती के काम करने का भी तरीका कभी मुखर नहीं रहा, वे अपने संगठन और कैडर के माध्यम से काम करती हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘बसपा की ताकत दलित, मुसलमान और अतिपिछड़े थे. पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यक इनसे छिटकने लगे. इस चुनाव में अतिपिछड़ी जातियां भी सपा से जुड़ गईं. राजभर और मौर्य समाज के नेता सपा पहुंच गए. बसपा के पास अब बस दलित बचे हैं. इसलिए कोई दो राय नहीं कि बसपा कमजोर तो हुई है लेकिन जितना कमजोर दिख रही है, उतना है नहीं. उसका मत प्रतिशत हमेशा अच्छा रहा है. इस बार भी रहेगा, भले ही ज़मीन पर कुछ भी दिखे.’

बसपा के कमजोर होने से जुड़ा यह पहलू स्थानीय पत्रकार मनोज सिंह विस्तार से समझाते हैं. वे बताते हैं, ‘सबसे बड़ा संकट यह है कि बसपा मायावती केंद्रित पार्टी है. उनके कहे बिना वहां पत्ता भी नहीं हिलता. नेता और कार्यकर्ता कुछ भी बोलने तक से डरते हैं, किसी मुद्दे पर सक्रियता दिखाना तो दूर की बात है. इन परिस्थितियों के बावजूद भी वे पार्टी से जुड़े रहे तो सिर्फ इसलिए क्योंकि पार्टी का एक निश्चित वोट बैंक रहा है.’

मनोज आगे बताते हैं, ‘लेकिन अब वह वोट भी खिसकता प्रतीत होने लगा, क्योंकि मायावती पार्टी के अन्य नेताओं को कुछ करने नहीं देती और स्वयं ट्विटर तक सीमित रहती हैं. पुराने दौर में उनकी इस राजनीतिक कार्यशैली से सफलता मिल जाती होगी, लेकिन बदलता दौर जमीनी आंदोलन का है. यूपी में दलितों पर अत्याचार की घटना हुईं, लेकिन बसपा अपने ही कोर वोट बैंक के लिए ज़मीन पर नहीं दिखी, नतीजतन धीरे-धीरे उसकी प्रासंगिकता घटती गई. नतीजतन, पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं ने अपनी-अपनी अलग राह पकड़ ली.’

वे आगे बताते हैं, ‘ऊपर से चुनावों में टिकट बाहर से आए जिताऊ उम्मीदवारों को दे दिए जाते, जिसे लेकर यह धारणा स्थापित है कि पार्टी में टिकट बेचे जाते हैं. इससे भी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा कि काम हम करें, टिकट कोई बाहरी ले जाए.’

मनोज के मुताबिक, इन्हीं कारणों के चलते बसपा, नेता और कार्यकर्ताविहीन हो गई. जिस दल के पास नेता और कार्यकर्ता ही न हों, उसकी तैयारी ज़मीन पर दिखने का सवाल ही नहीं. जो हैं भी वो मायावती के इशारे बिना कुछ कर नहीं सकते या फिर ऐसे माहौल में स्वयं ही असक्रिय हो जाते हैं.

मनोज कहते हैं, ‘जो आज बसपा से निकले नेता हैं वही तो दूसरे दलों में जाकर या खुद का दल बनाकर यूपी की राजनीति में प्रभावी हो गए हैं. अपना दल, निषाद पार्टी, सुहेलदेव पार्टी, जनवादी सोशलिस्ट पार्टी, बाबू सिंह कुशवाह की जन अधिकार पार्टी, ये सब लोग पहले बसपा में ही तो थे. बसपा जब बनी थी, उस दौर के सारे नेता पार्टी छोड़ गए, अब कोई बड़ा नेता बचा नहीं है.’

ज़मीन पर बसपा की चुनावी कैंपेन देखें तो केवल सतीश चंद्र मिश्रा की अगुवाई में अयोध्या से शुरू हुए वे ब्राह्मण सम्मेलन याद आते हैं, जिन्हें देखकर पहली बारगी लगा कि बसपा 2007 दोहराने के प्रयास में हैं, जहां उसका सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला खूब चर्चित हुआ था. जिसमें दलित-ब्राह्मण गठजोड़ था. जानकार भी इससे सहमत हैं.

इसके पीछे एक मजबूत आधार यह है कि पिछले लंबे समय से यूपी में कहा जा रहा है कि ब्राह्मण वर्ग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व भाजपा से खफा है और नए ठिकाने की तलाश में है.

इस संबंध में लखनऊ विश्वविद्यालय में सहायक अध्यापक रविकांत कहते हैं, ‘जहां तक मेरी जानकारी है, 2007 में बसपा को एक चौथाई ब्राह्मण वोट भी नहीं मिला था, लेकिन ब्राह्मणों ने हमेशा की तरह ऐसी आभा बनाई कि उनके बूते सरकार बनी है. सिर्फ ब्राह्मण बूते सत्ता में आना संभव नहीं था. दलितों समेत अन्य अगड़ी जातियों और पिछड़ी जातियों, सबका वोट बसपा को मिला था.’

हालांकि इस बार बसपा के लिए परिस्थितियां 2007 की तुलना में बहुत भिन्न हैं. तब बसपा की सत्ता की राह तय करने में नसीमुद्दीन सिद्दीकी, रामअचल राजभर, स्वामीप्रसाद मौर्य, रंगनाथ मिश्रा, बाबूराम कुशवाहा, धर्म सिंह सैनी, सुखदेव राजभर जैसे ढेरों नेता भागीदार थे, जो भिन्न-भिन्न जाति और समुदायों से ताल्लुक रखते थे. उनमें से कई कांशीराम दौर से पार्टी से जुड़े थे, लेकिन अब वे या तो पार्टी छोड़ चुके हैं या बसपा सुप्रीमो द्वारा निकाल दिए गए हैं.

जानकार मानते हैं कि बसपा को ब्राह्मण वोट न मिलने का अंदेशा हो गया था, इसी लिए उसने ब्राह्मण सम्मेलन रोक दिए. मनोज कहते हैं, ‘पार्टी ब्राह्मण वोट पर नज़र गढ़ाए है, जबकि ब्राह्मण नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं.’

गौरतलब है कि कुछ दिनों के भीतर ही विधायक रामवीर उपाध्याय और पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा बसपा छोड़कर भाजपा मे चले गए हैं.

मनोज कहते हैं, ‘विनय शंकर तिवारी, कुशल तिवारी, राकेश पांडे सभी पहले बसपा में थे. जब ब्राह्मण नेता ही नहीं होगा तो ब्राह्मण वोट मिलेगा कैसे? पहले अपने ब्राह्मण नेता रोक लें, तब तो संभावना दिखेगी.’ ऐसा ही मुदित माथुर सोचते हैं. वे पार्टी छोड़ने वाला एक और ब्राह्मण नाम हरिशंकर तिवारी गिनाते हैं.

बसपा से किनारा केवल ब्राह्मण नेताओं ने नहीं किया, फेहरिस्त लंबी है जिनमें से कुछ नाम ऊपर भी गिनाए गए. उनके अलावा बसपा के 19 में से 14 विधायक पार्टी छोड़कर अन्य दलों में  गए हैं.

अमूमन देखा जाता है कि नेता हवा का रुख भांपते हैं. इस लिहाज से देखें तो हवा बसपा के पक्ष में नहीं दिखती लेकिन पार्टी नेता सुधींद्र भदौरिया द वायर  से बातचीत मे कहते हैं, ‘जाने वालों को मालूम था कि खराब प्रदर्शन के चलते उन्हें चुनाव में टिकट नहीं मिलता. हमारी पार्टी में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. हमारे तो 30-30, 35-35 विधायक भाजपा और सपा ने तोड़े हैं. तब भी हमने सरकार बनाई है.’

साल 2021 में इलाहाबाद में हुए एक ‘प्रबुद्ध सम्मलेन’ में बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा. (फोटो साभार:  फेसबुक/@satishchandramisra.official)

बसपा के मंच से ‘जय श्री राम’ के नारों का मक़सद क्या था

अयोध्या में ब्राह्मण सम्मेलन के मंच से ‘जय श्री राम’ के नारे और सरकार आने पर ‘राम मंदिर’ का अधूरा निर्माण पूरा कराने संबंधी घोषणा अधिकांश लोगों के लिए चौंकाने वाले थे. वहां से ऐसी धारणाओं को भी बल मिला कि मायावती वक्त की नजाकत को समझते हुए हिंदुत्व की राह पकड़ रही हैं. लेकिन, बसपा के मंच से हिंदू धर्म संबंधी नारे पहली बार लगे हों, ऐसा नहीं है. 2007 की बसपा की चुनावी कैंपेन याद करें तो एक नारा तब बड़ा प्रचलित हुआ था, ‘हाथी नहीं, गणेश हैं… ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं.’

राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह कहते हैं, ‘हिंदुत्व और जातियों का समीकरण अलग-अलग चीजें हैं. यूपी में सभी दल जातीय समीकरण बैठा रहे हैं, यहां तक कि भाजपा भी. हिंदुत्व चल नहीं रहा है, अगर चलता तो भाजपा 2014, 2017 और 2019 जैसे आश्वस्त होकर बैठती. बसपा भी राम के नारे और मंदिर निर्माण की बात करके ब्राह्मणों पर ही डोरे डाल रही थी.’

मनोज भी इससे सहमत हैं, उन्होंने कहा, ‘बसपा को लगा कि ऐसा करके वे सवर्ण, खासकर ब्राह्मण, को अपने पाले में कर लेंगे. सतीशचंद्र मिश्रा ने भी कहा था कि ब्राह्मण धार्मिक रुझान वाले हैं, राम मंदिर की बात करने पर हमारी ओर आकृष्ट होंगे.’

बहरहाल, वो बात अलग है कि इसका लाभ बसपा को मिलते नहीं दिखा और उसने ब्राह्मण सम्मेलनों से किनारा कर लिया.

जानकारों के मुताबिक, बसपा की यह रणनीति उसके लिए आत्मघाती साबित हुई क्योंकि इसने अल्पसंख्यकों को नाराज कर दिया.

मनोज बताते हैं, ‘अल्पसंख्यक सपा के साथ बसपा को प्राथमिकता में रखता था. पिछले चुनावों में बसपा को ठीक-ठाक अल्पसंख्यक वोट मिला था, वरना उसकी हालत और खराब होती. लेकिन, बीते कुछ समय से उनको शक था कि बसपा, भाजपा के साथ गुपचुप गठबंधन में है. बसपा के इस कदम ने शक को यकीन में बदल दिया और अल्पसंख्यकों का उससे पूरी तरह मोह भंग हो गया. सवर्ण आए नहीं, अल्पसंख्यक भी खिसक गए, दोहरा नुकसान हो गया.’

हालांकि भदौरिया कहते हैं, ‘पहले कभी हमने ‘जय श्री राम’ के नारे नहीं लगाए या मंदिर निर्माण की बात नहीं की, तो मुझे बताइए कि क्या पहले कभी सुप्रीम कोर्ट का ऐसा आदेश आया था? कौन-सी पार्टी है जो इसका विरोध कर रही है? जिन्होंने (कांग्रेस) मंदिर के दरवाजे खोले, जिन्होंने (सपा) मस्जिद पर हथौड़ा चलाने वालों (साक्षी महाराज) को अपनी पार्टी में सम्मान दिया, वे लोग हम पर आरोप लगाकर हो-हल्ला मचा रहे हैं.’

अल्पसंख्यकों की तरह ही विपक्षी दल, राजनीतिक पंडित, मीडिया और अन्य मतदाताओं के बीच ऐसी चर्चाएं गर्म हैं कि बसपा, भाजपा के साथ गुपचुप गठबंधन के चलते चुनावों को गंभीरता से नहीं लड़ रही है और चुनावों के बाद वह जरूरत पड़ने पर भाजपा को समर्थन दे देगी. वह भाजपा की ‘बी’ टीम की भूमिका में है.

रामबहादुर वर्मा कहते हैं, ‘एक शंका यह पनप रही है कि अगर किसी को भी बहुमत नहीं मिला तो मायावती भाजपा को समर्थन दे देंगी या ले लेंगी. और यह शंका नहीं, सत्य है. अगर मायावती को अखिलेश या योगी में से कोई चुनना पड़े तो वे योगी होंगे.’

ऐसी आशंकाएं निराधार नहीं है. उनके पीछे बीते दो सालों में घटित वे घटनाएं हैं जहां मायावती प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की नीतियों का समर्थन और सराहना करते देखी गईं. उदाहरण के तौर पर- जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, सवर्ण आरक्षण, जम्मू कश्मीर के गुपकार समूह के साथ मोदी की बैठक, मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़ना आदि.

सात सितंबर 2021 को लखनऊ में हुए एक ‘प्रबुद्ध सम्मलेन’ में बसपा सुप्रीमो मायावती. (फोटो: पीटीआई)

हालांकि, रविकांत कहते हैं, ‘ऐसी आशंकाओं को इसलिए भी बल मिला क्योंकि मायावती योगी सरकार में दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर सिर्फ ट्वीट करती रहीं, जबकि प्रियंका की सक्रियता को राजनीतिक बता दिया. सरकार को घेरती हैं तो नरम भाषा रखती हैं, लेकिन कांग्रेस और सपा की कड़ी आलोचना करती हैं.’

कृष्ण प्रताप सिंह कहते हैं, ‘इससे इनकार नहीं कर सकते कि बसपा का अतीत भाजपा से मिलीभगत की गवाही देता है, लेकिन वर्तमान में इसे साबित करने के लिए किसी के पास कोई तथ्य नहीं है.’

वे आगे कहते हैं, ‘मायावती की महत्वाकांक्षा योगी से कम नहीं है, वे भाजपा के साथ जाएंगी तो योगी की अधीनस्थ होकर जाएंगी. इसलिए वे भाजपा के सामने शरणागत नहीं होगीं, वे बस यही कर सकती हैं कि ईडी-सीबीआई के डर से मुखर न हों. उन्हें बस ये उम्मीद है कि अगर त्रिशंकु विधानसभा हो तो वे दोनों तरफ से किंगमेकर बन सकती हैं.’

मनोज कहते हैं, ‘यूपी में ऐसे आरोप तो सारे विपक्ष पर ही लगते हैं. सपा भी पांच साल बतौर विपक्ष गायब रही, चुनावों से पहले सक्रिय दिखी है. ओवैसी पर भी ऐसे ही आरोप हैं. बात सिर्फ इतनी है कि सपा-बसपा, दोनों ने खूब पैसा बनाया है, इसलिए केंद्रीय एजेंसियों के डर से दोनों बतौर विपक्ष मुखर नहीं रहे. अखिलेश को अपनी संभावना बनती दिखी तो वे ऐन चुनावों से पहले सक्रिय हो गए.’

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के महासचिव और राजनीतिक विश्लेषक संदीप पांडे कहते हैं, ‘नंबर तीन की पार्टी बसपा ही रहेगी क्योंकि उसका एक निश्चित वोट बैंक है जो कांग्रेस से अधिक है. हां, अगर भाजपा दूसरे नंबर पर आती है तो संभावना है कि वह मायावती की सरकार बनवा दे. इसमें कुछ नया नहीं है. यह पहले भी हो चुका है. कांशीराम तो खुद कहते थे कि हम अवसरवादी हैं. विचारधारा को लेकर हमें किसी से कोई दिक्कत नहीं.’

वहीं, पार्टी पर लग रहे आरोपों का बचाव का करते हुए सुधींद्र कहते हैं, ‘जो विपक्ष और मीडिया हम पर आरोप लगा रहा है कि हम ठीक से चुनाव नहीं लड़ रहे, वो क्या ये चाहता है कि हम भी कोविड काल में यूपी को पश्चिम बंगाल बना दें? बड़ी-बड़ी रैलियां करके जनता को मौत के मुंह में धकेलें? जिस तरह गंगा में लाशें बह रही थीं, अस्पताल और श्मशान घाटों में जगह नहीं थी, वो हालात फिर बना दें?’

वे बसपा की जमीनी तैयारियों के बारे में बताते हैं, ‘कोविड नियमों के दायरे में रोज लखनऊ में बैठकें हो रही हैं. कांशीराम जी की पुण्यतिथि पर हमने जरूर एक बड़ा आयोजन किया था, जिसमें चार-पांच लाख लोग जुटे थे लेकिन मीडिया ने उसे कवरेज तक नहीं दिया, क्योंकि मीडिया के लिए हमारा अस्तित्व नहीं है, इसलिए हम ज़मीन पर नहीं हैं. ऐसा हमेशा से है. कभी किसी राजनीतिक सर्वे या पोल में बसपा और मायावती को सरकार बनाते नहीं दिखाया गया है, फिर भी मायावती चार बार मुख्यमंत्री रही हैं.’

वे बसपा और भाजपा की मिलीभगत संबंधी आरोपों पर कहते हैं, ‘भाजपा की ‘बी’ टीम हम हैं या वो लोग हैं जो बंगाल में ममता को हरा रहे थे, जो कल्याण सिंह को लाल टोपी पहनाकर समाजवाद का सबसे बड़ा चेहरा बता रहे थे, जिन्होंने बाबरी मस्जिद पर हथौड़ा चलाने वाले साक्षी महाराज को राज्यसभा भेजा? इसी तरह आधी कांग्रेस, भाजपा में चली जाती है लेकिन सवाल हम पर उठाते हैं.’

वहीं, बसपा द्वारा मुसलमानों को अधिक टिकट देकर सपा का वोट काटकर भाजपा को फायदा पहुंचाने संबंधी आरोपों पर भदौरिया का कहना है, ‘पिछले विधानसभा चुनाव की लिस्ट देख लें, हमने पहले भी सौ-सौ मुसलमानों को उम्मीदवार बनाया है. 22 फीसदी आबादी को वे (सपा) स्वयं प्रतिनिधित्व देना नहीं चाहते हैं, हम दें तो सवाल उठाते हैं. मुजफ्फरनगर में इतने सारे मुसलमान रहते हैं, क्या वहां सपा ने कभी किसी मुसलमान को टिकट दिया?’

बसपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मवीर चौधरी कहते हैं, ‘यह आरोप बेबुनियाद हैं कि हम ज़मीन पर सक्रिय नहीं हैं. दूसरों के प्रत्याशी दस दिन पहले तय हुए हैं. हमारे 300 प्रत्याशी एक साल से मैदान में डटे हुए हैं. हम एक कैडर आधारित पार्टी हैं. हमने 75 जनपदों में प्रबुद्ध वर्ग के सम्मेलन किए और प्रदेश भर में मंडल स्तरीय कार्यक्रम किए.’

वे आगे उलटा सपा और भाजपा की सांठ-गांठ के दावे करने लगते हैं. वे कहते हैं, ‘2003 में भाजपा ने हमारी सरकार गिराकर सपा की सरकार बनाई, हमारे विधायक तोड़े गए. फिर लोकसभा चुनावों मे मुलायम सिंह ने मोदी जी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद दिया, अब अपनी पुत्रवधु को भाजपा में भेज दिया. यह इशारा करता है कि सपा-भाजपा एक सिक्के के दो पहलू हैं. तभी तो भाजपा ने उनके खिलाफ सारी जांचें बंद करा दीं. कांग्रेस भी यूपी में वोटकटवा पार्टी है, वह विपक्ष के वोट काटेगी तो भाजपा को ही लाभ होगा, फिर भी आरोप हमारे ऊपर लगाए जा रहे हैं.’

एक पूर्व बसपा नेता धर्मेंद्र जाटव बताते हैं, ‘ऐसी बातें वामपंथी और कांग्रेसी सर्वाधिक फैलाते हैं और इसलिए ताकि पार्टी के दलित वोट में और वोट न जुड़ें, जैसे मुसलमानों के. अब देखिए कि चंद्रशेखर आजाद सीएए और एनआरसी व किसान आंदोलन के वक्त सक्रिय थे लेकिन किसी मुस्लिम या किसान नेता ने नहीं कहा कि अखिलेश उन्हें साथ ले लें, जब भीड़ की जरूरत होगी तो दलित याद आएंगे, लेकिन जब बात राजनीतिक सत्ता की होगी, तो काम जब भाजपा की ‘बी’ टीम बताकर चल जाता है तो सत्ता में भागीदारी क्यों दें? ये महज राजनीतिक शिगूफे हैं कि मायावती ‘बी’ टीम हैं, वरना वर्तमान में भाजपा के कुल सांसदों में से सैकड़ाभर तो पूर्व कांग्रेसी हैं.’

गाजियाबाद में बसपा की एक जनसभा. (फोटो: पीटीआई)

क्या हैं बसपा की संभावनाएं

संदीप कहते हैं, ‘ मायावती सीधे भाजपा की मदद कर रही हों, ऐसा नहीं लगता. उनकी भी अपनी महात्वाकांक्षाएं हैं और वे अपना और पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए काम करेंगी ही. वे दौड़ से बाहर नहीं हैं. ऐसी परिस्थितियां बन सकती हैं कि वे किसी गठबंधन की मुख्यमंत्री बन जाएं.’

वे आगे वही बात दोहराते हैं जो कमोबेश मायावती ने कही थी. वे कहते हैं, ‘हकीकत यह है कि मायावती बड़ी रैलियां इसलिए नहीं कर रही हैं क्योंकि उनके पास पैसा नहीं है. उन्हें कोई बड़ा पूंजीपति पैसा नहीं देता, छोटा-छोटा चंदा मिलता है.’

भदौरिया के मीडिया द्वारा बसपा से भेदभाव किए जाने के दावे से संदीप भी सहमत हैं और कहते हैं, ‘मीडिया बसपा को अधिक हाईलाइट नहीं करता, सत्ता में होने पर भी उसकी नकारात्मक छवि ही दिखाई जाती है. जैसे कि उन्होंने दलितों के प्रतीक चिह्न बनवाए तो आलोचना हुई, लेकिन योगी सरकार दीवाली जैसे आयोजन में पैसा उड़ाती है और खुलकर कहती है कि जो पहले कब्रिस्तान पर खर्च होता था, हम मंदिर पर कर रहे हैं, उसकी कोई आलोचना नहीं होती कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र मे ऐसा क्यों?

वे आगे जोड़ते हैं, ‘इसकी वजह है कि मीडिया में ज्यादातर लोग सवर्ण हैं. भाजपा की झूठी खबरों को भी बढ़ा-चढ़ाकर छापा जाता है, लेकिन बसपा की खबरों को जगह नहीं दी जाती है.’

रविकांत भी इससे सहमत हैं और कहते है, ‘हाल ही में सुप्रीम कोर्ट और निर्भया कांड की वकील सीमा समृद्धि पार्टी मे शामिल हुईं, लेकिन मीडिया में जगह नहीं मिली.’

सवाल उठता है कि क्या सीमा के अलावा और भी नेता बसपा का रुख कर रहे हैं, लेकिन यह सुर्खियां नहीं बन पा रहा है?

इस संदर्भ में मनोज कहते हैं, ‘पहले यूपी की राजनीति मे लोग बसपा को पहले पायदान पर रखते थे क्योंकि उसका एक खास वोट बैंक है 20-22 प्रतिशत. नेता बसपा में यह सोचकर जाते थे कि इस वोट बैंक में अपना जोड़कर चुनाव जीत सकते हैं, ऊपर से बसपा सत्ता में आती-जाती रहती थी, लेकिन लगातार बुरी तरह चार हारों के बाद ये धारणाएं कमजोर हुई हैं. इसलिए जिसे भाजपा-सपा से टिकट नहीं मिलेगा. वही बसपा और कांग्रेस में जाएगा. कांग्रेस को वह ज्यादा तरजीह इसलिए दे सकता है क्योंकि वहां टिकट के लिए पैसा नहीं देना पड़ेगा.’

बहरहाल, बसपा की संभावनाओं पर रविकांत कहते हैं, ‘मसला ये  भी है कि वर्तमान दौर की राजनीति में जो हिंदुत्व की कैंपेन है उसका दवाब उन पर है, इसलिए वे योगी या भाजपा के खिलाफ चुप रहकर अगड़ी जातियों में एक सॉफ्ट कॉर्नर बनाए रखना चाहती हैं, सीधा भाजपा पर हमलावर होना शायद ठीक नहीं होगा.’

धर्मेंद्र जाटव कहते हैं कि अगर मायावती मजबूती से चुनाव लड़तीं तो उन पर आरोप लगते कि वे सपा को कमजोर कर रही हैं, लेकिन अगर वे हारती हैं तो तय है कि भाजपा मजबूत होगी, क्योंकि बसपा का वोटर ज्यादातर मौकों पर लठैत समुदाय से पीड़ित है और सपा इसी समुदाय की पार्टी है. इसलिए दलित बसपा को छोड़ेगा तो भाजपा को पकड़ेगा क्योंकि सपा के आने पर लठैत मजबूत होते हैं, जिनसे दलित सहमे रहते हैं.

वे कहते हैं, ‘दोनों ही परिस्थिति में बसपा पर आरोप तो लगने ही हैं.’

हालांकि, रामबहादुर वर्मा का कहना है कि अखिलेश इस बार सबको साथ लेकर चल रहे हैं, उन्होंने अपनी रणनीति बदली है और यादवों को आगे नहीं किया है.

यही बात मुदित माथुर दोहराते हैं और कहते हैं, ‘जो काम मुलायम और कांशीराम ने मिलकर किया था, उसी रास्ते पर अखिलेश हैं और सबको साथ लेकर चल रहे हैं.’

अंत में मनोज कहते हैं, ‘इन चुनावों में बहुत पाबंदियां हैं. मायावती उनका हवाला देकर अपनी असक्रियता छिपा सकती हैं और मतदाताओं के बीच इसका लाभ उठा सकती हैं. बहरहाल, बसपा का पूरा संघर्ष अपना कोर वोट बैंक ‘जाटव’ बचाना है. दलितों में केवल जाटव उनसे जुड़ा रह गया है, बाकी अन्य जातियां दूर चली गईं हैं. सभी दलों की नजर अब बसपा के 20-22 फीसदी मतों पर है. उसके लिए अस्तित्व की लड़ाई है.’