यूपी: क्या आज़म ख़ान की ज़मानत प्रक्रिया में देरी राजनीतिक इशारों पर हो रही है

समाजवादी पार्टी के नेता और रामपुर से लोकसभा सांसद आज़म ख़ान पिछले दो सालों से जेल में हैं. उन पर दर्ज 87 मामलों में से 84 में उन्हें ज़मानत मिल चुकी है. शेष जिन तीन मामलों वे हिरासत में हैं, उनमें ज़मानती प्रक्रिया ऐसी अंतहीन बाधाओं का शिकार है जहां कभी सुनवाई का आवेदन रहस्यमय ढंग से ग़लत कोर्ट में पहुंच जाता है, तो कभी सुनवाई के रोज़ केस की फाइल ही खो जाती है.

Azam Khan and Adityanath. In the background is the Allahabad HC. Photos: PTI and file.

समाजवादी पार्टी के नेता और रामपुर से लोकसभा सांसद आज़म ख़ान पिछले दो सालों से जेल में हैं. उन पर दर्ज 87 मामलों में से 84 में उन्हें ज़मानत मिल चुकी है. शेष जिन तीन मामलों वे हिरासत में हैं, उनमें ज़मानती प्रक्रिया ऐसी अंतहीन बाधाओं का शिकार है जहां कभी सुनवाई का आवेदन रहस्यमय ढंग से ग़लत कोर्ट में पहुंच जाता है, तो कभी सुनवाई के रोज़ केस की फाइल ही खो जाती है.

आज़म ख़ान और योगी आदित्यनाथ. बैकग्राउंड में इलाहाबाद हाईकोर्ट. (फोटो: पीटीआई और फाइल)

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहले चरण का मतदान हो गया है. सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता इस दौरान चुनावी रैलियों में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकते नजर आए, लेकिन एक दिग्गज चुनावी परिदृश्य से गायब हैं.

समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान, जो रामुपर से सांसद हैं और पिछले दो साल से जेल में बंद हैं.

खान को अपनी पार्टी के लिए प्रचार करने से रोकने के लिए आदित्यनाथ सरकार की कोशिशें इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष दायर एक चुनावी याचिका के साथ शुरू हुईं, जिसमें 2017 के विधानसभा चुनाव मे उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान के चुनाव को इस आधार पर चुनौती दी गई कि चुनाव के वक्त उनकी उम्र 25 वर्ष नहीं थी.

हालांकि, लखनऊ के क्वीन मैरी अस्पताल में अब्दुल्ला आजम खान को जन्म देने वाली डॉक्टर ने खुद प्रसव की तारीख के बारे में गवाही दी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसकी गवाही को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्होंने जिस बच्चे को जन्म दिया था, वह कोर्ट में अपने सामने खड़े व्यक्ति के रूप में संभवत: उसकी पहचान नहीं कर सकती हैं.

इसलिए हाईकोर्ट ने अब्दुल्ला आजम के चुनाव को रद्द कर दिया. इस मामले का इस्तेमाल करके आजम खान, उनके बेटे अब्दुल्ला और पत्नी तज़ीन फातिमा के खिलाफ अब्दुल्ला की पहचान से संबंधित विभिन्न जाली दस्तावेज बनवाने के आरोप में कई एफआईआर दर्ज की गईं.

आजम खान के खिलाफ कुल 87 आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 84 एफआईआर 2017 में भाजपा की सरकार बनने के अगले दो सालों में दर्ज की गई थीं. 84 में 81 मामले 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले और बाद में दर्ज किए गए.

खान के समर्थकों का मानना है कि ये एफआईआर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से प्राप्त शिकायतों के आधार पर दर्ज की गई हैं, जिनका मकसद खान को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना है.

इनमें से अधिकांश एफआईआर अत्यधिक और अकारण देरी से दर्ज की गई हैं.

एक एफआईआर तो शिकायत मिलने के 16 वर्षों बाद दर्ज की गई. 22 एफआईआर कथित अपराध घटित होने के 13 सालों बाद दर्ज की गईं. इन 22 एफआईआर में आरोप है कि आजम खान का मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय किसानों से जबरन कब्जाई और हथियाई गई ज़मीन पर बनाया गया था.

विश्वविद्यालय की स्थापना 2006 में हुई थी और 2019 तक इसके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी. रामपुर के अज़ीम नगर थाने में 12 से 20 जुलाई 2019 के बीच 22 एफआईआर दर्ज की गई थीं. सभी एफआईआर के दर्ज होने का समय सुबह या आधी रात का था.

पहली एफआईआर 12 जुलाई को रात 2.19 पर दर्ज हुई. 16 जुलाई को रात 10.30 से 11.30 बजे के बीच 8 एफआईआर आर दर्ज की गईं. 18 जुलाई की रात 10.30 से 19 जुलाई की सुबह 6 बजे के बीच 10 एफआईआर दर्ज की गईं.

आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि उनकी जमीन कथित रूप से हड़पने के 13 साल बाद किसान आधी रात को जाग गए और 8-10 के समूहों में पुलिस से संपर्क किया.’

अन्य एफआईआर में, आजम खान पर बकरी चोरी करने, भैंस चोरी करने, एक वृद्ध महिला से उसके गहने लूटने और एक व्यक्ति की जेब से 16,500 रुपये लूटने की साजिश में शामिल होने के आरोप हैं.

कुछ एफआईआर काफी हद तक ऐसे ही आरोपों से संबंधित हैं, लेकिन लगता है कि वे इसलिए दर्ज कराई गई हैं ताकि आजम खान अधिक मामलों में उलझे रहें. कई मामलों में एक ही व्यक्ति ने कई एफआईआर दर्ज कराई हैं. व्यक्ति भी ऐसा है जो भाजपा का वफादार हुआ करता है.

आजम खान के परिवार का दावा है कि ज्यादातर एफआईआर में आरोप इतने बेतुके हैं कि उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता है. अब्दुल्ला कहते हैं, ‘सारे मामले सरकार के इशारे पर दर्ज किए गए हैं.’

वे कहते हैं, ‘मेरे पिता रामपुर से नौ विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. आपको लगता है कि अगर चोर होते या लोगों की जमीनें हड़पते तो लोग उन्हें वोट करते? बिल्कुल नहीं.’

अब्दुल्ला का कहना है कि भाजपा जानती थी कि उन्हें चुनाव में हरा नहीं सकते हैं, इसलिए उन्होंने हमारे परिवार को बर्बाद करने का ये तरीका अपनाया.

आज़म खान अपने खिलाफ लंबित कुल 87 आपराधिक मामलों में से 84 मामलों में जमानत प्राप्त करने में सफल रहे हैं, जिनमें वे तीन मामले भी शामिल हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी थी. इसके बावजूद भी वह 26 फरवरी 2020 से न्यायिक हिरासत में हैं.

शेष तीन मामले जिनमें खान अभी भी हिरासत में हैं, अनावश्यक अंतहीन बाधाओं के साथ लंबे खिंच रहे हैं.

मानहानि के एक मामले में खान पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और सैय्यद कल्बे जव्वाद नकवी को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है. इस मामले में खान की जमानत याचिका को दो महीने तक न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा लंबित रखा गया था.

इसके बाद, इसे एमपी/एमएलए कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसने 27 जनवरी को जमानत याचिका खारिज कर दी. खान की कानूनी टीम ने अब सत्र अदालत के समक्ष अपील दायर की है.

दूसरा मामला जमीन हथियाने के लिए जालसाजी और कमीशन से संबंधित है. यह वह मामला है जिसमें अपराध घटित होने के 16 साल बाद एफआईआर दर्ज की गई. यहां सह-आरोपी वह व्यक्ति है जिस पर वास्तव में जालसाजी करने का आरोप है. उसे सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है.

खान की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई थी और 4 दिसंबर 2021 को हाईकोर्ट द्वारा फैसला सुरक्षित रखा लिया गया था. यह पिछले दो महीनों में नहीं दिया गया है.

तीसरा मामला उत्तर प्रदेश जल निगम में इंजीनियरों और स्टेनोग्राफरों की भर्ती में कथित अनियमितता से संबंधित है. यह आरोप खान पर तब लगे थे जब वे कैबिनेट मंत्री के तौर पर जल निगम के पदेन अध्यक्ष थे. इसलिए उन्हें भी मामले में आरोपी बनाया गया. आरोप-पत्र में नामजद 14 अन्य आरोपी जमानत पर हैं.

खान की जमानत याचिका 30 सितंबर 2021 को दायर की गई थी, लेकिन मामला बार-बार स्थगित सुनवाई स्थगित होने और अकारण देरी के चलते लंबित है.

हाईकोर्ट द्वारा मामले को आठ बार स्थगित किया गया है, जिससे खान के वकीलों को जल्द सुनवाई के लिए आवेदन करने के लिए मजबूर होना पड़ा. आवेदन रहस्यमय तरीके से गलत अदालत में पहुंच गया.

इसके बाद आवेदन को सांसदों और विधायकों से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाले जज के समक्ष सूचीबद्ध किया गया और आने वाले सप्ताह में सूचीबद्ध करने निर्देशित किया. अगली तारीख पर मामला उसी जज के पास पहुंचा लेकिन इस दौरान रोस्टर बदल गया था और वे जज अब विधायक और सांसदों के मामले सुनने वाले जज नहीं रहे. मामला फिर से अगले रोस्टर के तहत आने वाले अगले जज के पास सूचीबद्ध हुआ.

मामले में आखिरी सुनवाई 31 जनवरी 2022 को हुई और सही जज के समक्ष मामला पहुंचा, लेकिन तब केस की फाइल ही गुम हो गई. अदालत ने अपने स्टाफ से फाइल खोजने कहा और लंच के बाद सुनवाई तय की, लेकिन लंच के बाद अदालत बैठी ही नहीं.

एक जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी दायर की गई थी, जिसमें चुनावों को देखते हुए तीनों मामलों में अंतरिम जमानत की मांग की थी. 8 फरवरी को याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संबंधित अदालतों के समक्ष फिर से पेश करने के लिए कहा. कोर्ट ने आशा व्यक्त की कि अदालतें जमानत याचिकाओं का शीघ्र निपटान करेंगी.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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