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उत्तर प्रदेश: भाजपा के साथ उतरी निषाद पार्टी कितनी कामयाब होगी

बीते कुछ चुनावों में अपनी जीत से सबको चौंका चुकी निषाद पार्टी को भाजपा ने पिछले चुनाव में हारी हुई नौ सीटों को जिताने की ज़िम्मेदारी दी है. गठबंधन में निषाद पार्टी को मिली 16 सीटों में से छह पर प्रत्याशी भाजपा के चुनाव चिह्न पर जबकि 10 प्रत्याशी निषाद पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ रहे हैं.

एक चुनावी रैली में निषाद पार्टी प्रमुख डॉ. संजय निषाद. (फोटो साभार: फेसबुक/@nishadparty4u)

लखनऊ: छह वर्ष में धूमकेतु की उभरने वाली निषाद पार्टी (निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल) इस चुनाव में तीनतरफा घिरी है. सहयोगी भाजपा ने उसे चुनाव लड़ने के लिए कड़ी जमीन दे दी है, तो दूसरी तरफ सपा, बसपा, कांग्रेस ने अधिक संख्या में निषाद उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारकर निषाद वोटों को अपनी ओर खींचने की कोशिश की है.

तीसरी तरफ उत्तर प्रदेश (यूपी) की राजनीति में निषाद पार्टी की दावेदारी कर रही विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), प्रगतिशील मानव समाज पार्टी और सर्वहारा विकास पार्टी अपने-अपने तरीके से निषाद पार्टी की फसल को काटने की कोशिश कर रहे हैं. देखना है कि निषाद पार्टी की थाली (चुनाव चिह्न भोजन भरी थाली) कितनी भरती है और कितनी खाली रहती है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने सहयोगी निषाद पार्टी को पिछले चुनाव में हारी हुई नौ सीटों को जिताने की जिम्मेदारी डाल दी है. गठबंधन में निषाद पार्टी को मिली 16 सीटों में से छह पर प्रत्याशी भाजपा के चुनाव चिह्न पर कमल का फूल पर लड़ रहे हैं जबकि 10 सीटों के प्रत्याशी निषाद पार्टी के चुनाव भोजन भरी थाली पर चुनाव लड़ रहे हैं.

निषाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डाॅ. संजय कुमार निषाद के बेटे श्रवण कुमार निषाद गोरखपुर के चौरीचौरा सीट पर भाजपा के चुनाव चिह्न से ही लड़ रहे हैं.

निषाद पार्टी कुल 16 सीटों- काल्पी (जालौन) हंडिया और करछना (इलाहाबाद), कटहरी (अम्बेडकर नगर), चौरीचौरा (गोरखपुर), मेंहदावल (संतकबीरनगर), नौतनवा (महराजगंज), खड्डा और तमकुहीराज (कुशीनगर), ज्ञानपुर (भदोही), अतरौलिया (आजमगढ़), बांसडीह (बलिया), शाहगंज (जौनपुर), मझवा (मिर्जापुर), सैदपुर (गाजीपुर) और सदर (सुल्तानपुर) पर चुनाव लड़ रही है.

इनमें से एक काल्पी विधानसभा क्षेत्र में 20 फरवरी को चुनाव हो गया. शेष सभी सीटों पर चौथे, पांचवे, छठे और सातवें चरण में चुनाव होने हैं.

पिछले चुनाव में इनमें से अतरौलिया, नौतनवा, तमकुही, ज्ञानपुर, कटहरी, बांसडीह, शाहगंज, करछना और सैदपुर सीट भाजपा हार गई थी. इन सीटों में अधिकतर पर विपक्ष के दिग्गज नेता चुनाव जीते थे.

तमकुही से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू, बांसडीह से विधानसभा में विपक्ष के नेता और वरिष्ठ समाजवादी नेता राम गोविंद चौधरी, कटहरी से बसपा के वरिष्ठ नेता रहे लालजी वर्मा चुनाव जीते थे. लालजी वर्मा इस चुनाव के पहले बसपा छोड़ सपा में आ गए और सपा से कटहरी से चुनाव लड़ रहे हैं.

करछना से सपा के वरिष्ठ नेता रेवती रमण सिंह के बेटे उज्ज्वल रमण सिंह चुनाव जीते थे. नौतनवा से कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या में आजीवन कारावास की सजा काट रहे पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमन मणि त्रिपाठी उनकी पत्नी की हत्या के मामले में जेल में रहते हुए चुनाव जीते थे.

निषाद पार्टी के 16 उम्मीदवारों में से तीन निषाद, एक दलित, एक भूमिहार, एक नोनिया और पांच-पांच ब्राह्मण और क्षत्रिय उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं.

निषाद पार्टी से निषाद समुदाय से कम उम्मीदवार दिए जाने पर विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं. कांग्रेस, सपा, भाजपा ने भी इस चुनाव में निषाद वोटरों पर अपनी निगाह रखते हुए निषाद समुदाय के प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है.

यही नहीं, बिहार के निषाद नेता एवं मंत्री मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी और डॉ. प्रेमचंद बिंद की प्रगतिशील मानव समाज पार्टी ने भी निषाद बहुल सीटों पर निषाद प्रत्याशी उतारकर निषाद पार्टी की घेरेबंदी कर दी है.

मुकेश साहनी. (फोटो साभार: ट्विटर)

विकासशील इंसान पार्टी ने प्रदेश में 100 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन 50 प्रत्याशियों के नामांकन खारिज हो गए. अब उसके 60 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश साहनी का आरोप है कि साजिश के तहत उनके उम्मीदवारों के टिकट काटे गए हैं.

पिछले चुनाव में पीस पार्टी से गठबंधन कर निषाद पार्टी ने 72 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 5,40,539 वोट मिले थे. उसके एक प्रत्याशी बाहुबली नेता विजय मिश्रा ज्ञानपुर से चुनाव जीत गए थे.

पिछले चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद निषाद पार्टी की अहमियत बढ़ गई और सभी प्रमुख दल उसे अपनी ओर खींचने में लग गए. एक वर्ष बाद 2018 में गोरखपुर के लोकसभा उपचुनाव में निषाद पार्टी ने सपा से गठबंधन कर भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ा और यह सीट जीतकर सभी को चौंका दिया.

इस सीट पर निषाद पार्टी के अध्यक्ष डाॅ. संजय कुमार निषाद के बड़े बेटे प्रवीण कुमार निषाद चुनाव जीते थे. सपा के साथ निषाद पार्टी का गठबंधन एक वर्ष बाद ही टूट गया और 2019 के लोकसभा चुनाव में डाॅ. संजय कुमार निषाद भाजपा के साथ हो लिए.

भाजपा ने उनके बेटे प्रवीण कुमार निषाद को संतकबीरनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया और वे जीत गए. भाजपा से गठबंधन के वक्त चर्चा थी कि निषाद पार्टी के अध्यक्ष डाॅ. संजय को चुनाव बाद राज्यसभा में भेजा जाएगा लेकिन उनके बजाय गोरखपुर के ही एक निषाद नेता जय प्रकाश निषाद को भाजपा ने राज्यसभा में भेज दिया.

करीब दो वर्ष तक भाजपा ने निषाद पार्टी को बहुत अहमियत नहीं दी लेकिन चुनाव आते-आते पिछड़े वर्ग के नेताओं के भाजपा से पलायन ने उसे निषाद पार्टी और अपना दल से न सिर्फ गठबंधन बरकरार रखने बल्कि उन्हें अधिक सीटें देने पर मजबूर कर दिया. भाजपा ने डाॅ. संजय निषाद को न सिर्फ एमएलसी बनाया बल्कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए 16 सीट भी दी.

अधिक सीट देने के बावजजूद भाजपा ने निषाद पार्टी को अपने कंट्रोल में रखने की पूरी कोशिश की है. भाजपा ने निषाद पार्टी को दी गई 16 सीटों में से छह प्रत्याशी को अपने चुनाव चिह्न पर लड़वाया है. बाकी सीटों पर में से अधिकतर पर भाजपा नेता ही निषाद पार्टी का सिंबल लेकर चुनाव लड़ रहे हैं. यही नहीं, पिछले चुनाव में हारी हुई नौ सीटें भी निषाद पार्टी को देकर उसे इन्हें जीतकर दिखाने की चुनौती दे दी है.

निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार निषाद कहते हैं, ‘पिछले चुनाव में हारी हुई नौ सीटों को इस बार जीतने में कोई मुश्किल नहीं होगी क्योंकि वहां भाजपा के साथ निषाद मतदाता साथ आ गए हैं.’ उनका यह भी कहना है कि हर सीट पर उन्हें भाजपा से बहुत अच्छा सहयोग मिल रहा है. चुनाव प्रचार के लिए उन्हें हेलीकॉप्टर मिला है और वे अपनी पार्टी के 16 सीटों के अलावा निषाद बहुल सीटों पर प्रचार के लिए जा रहे हैं.

निषाद पार्टी ने पिछले चुनाव में पूर्वांचल तक सीमित रही थी. इस बार उसने बुंदेलखंड और अवध के क्षेत्र में चुनाव लड़ कर अपने को विस्तारित करने की कोशिश की है.

डॉ. संजय कुमार निषाद का दावा है कि वे 16 सीटों में से 12 या 13 सीट जीत जाएंगे. इन सभी सीटों पर पिछले चुनाव में निषाद पार्टी को अच्छे-खासे मत मिले थे और भाजपा का सहयोग मिलने के बाद उन्हें ज्यादा कठिनाई नहीं होगी.

सपा द्वारा अधिक संख्या में निषाद उम्मीदवार उतारे जाने के सवाल पर उनका कहना था कि सपा ने निषाद नेताओं की राजनीति को खत्म करने का प्रयास किया है. उन्होंने निषाद नेताओं को उन सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए भेज दिया है जहां उनका जीतना मुश्किल है. रामभुआल निषाद को गोरखपुर से देवरिया की रूद्रपुर और शंखलाल मांझी को संतकबीर जिले से दूर महराजगंज के फरेंदा सीट पर चुनाव लड़ने के लिए भेजना इसी साजिश का हिस्सा है.

प्रवीण निषाद. (फोटो साभार: फेसबुक/@nishadparty4u)

वह कहते हैं, ‘जहां खेती ही नहीं की गई वहां फसल कैसे काट लेंगे? हमने वही सीट ली है जहां खेती के लिए खाद, पानी की अच्छी व्यवस्था है.’

मुकेश सहनी और डाॅ. प्रेमचंद बिंद द्वारा निषाद पार्टी की घेराबंदी के सवाल पर उनका कहना है, ‘इनके लड़ने से हमें नुकसान नहीं है. हर विधानसभा क्षेत्र में कुछ अंसतुष्ट वोट होेते ही हैं. वे वोट इनको मिल जाएंगे.’

डाॅ. संजय निषाद भले ही भरपूर आत्मविश्वास दिखा रहे हों लेकिन हर सीट पर उनके लिए बड़ी चुनौती खड़ी है. चौरीचौरा में उनके बेटे श्रवण निषाद के खिलाफ सपा ने पासी बिरादरी के एक पायलट को चुनाव मैदान में उतार दिया है.

भाजपा से टिकट न मिलने पर अजय कुमार सिंह टप्पू बगावत कर चुनाव लड़ गए हैं. उनको भाजपा खेमे से अच्छी-खासी मदद मिल रही है. इसी तरह निषाद पार्टी से चुनाव लड़ रहे नेता इस बात से परेशान है कि उन्हें भोजन भरी थाली चुनाव चिह्न से लड़ना पड़ रहा है जिसे निषाद वोटर तो पहचानते हैं लेकिन भाजपा समर्थक मतदाता इससे अपरिचित हैं.

निषाद पार्टी के सिंबल से चुनाव लड़ रहे भाजपा नेताओं को भोजन भरी थाली के बारे में मतदाताओं को बताने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही है.

इसके साथ-साथ मुकेश सहनी यूपी के चुनाव में धुंआधार प्रचार कर उनकी मुसीबत बढ़ा रहे हैं. वे अपनी सभाओं में निषाद पार्टी पर जमकर निशाना साध रहे हैं. वे डॉ. संजय निषाद पर आरोप लगाते हुए कह रहे हैं कि वे पार्टी नहीं दुकान चला रहे हैं. वह विधानसभा चुनाव में अपनी नहीं भाजपा को चुनाव लड़ा रहे हैं.

वे यह भी आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने निषाद समाज के उम्मीदवारों को चुनाव में उतारने के बजाय उंची जाति के उम्मीदवारों को टिकट देकर निषाद वोटों को बेचने का काम किया है. निषाद समाज ने डाॅ. संजय कुमार निषाद को ताकत देकर नेता बनाया लेकिन वह पीठ दिखाकर भाग गए. उन्हें बड़े दलों को झुकाना चाहिए था लेकिन वह उनके आगे झुक गए.

वह कहते हैं कि यह चुनाव वह जीतने के लिए लड़ तो रहे ही हैं, कुछ लोगों को हराने के लिए भी लड़ रहे हैं.

इलाहाबाद, मिर्जापुर, भदोही, सोनभद्र सहित कई अन्य जिलों में बिंद समाज पर पकड़ रखने वाली प्रगतिशील मानव समाज पार्टी भी तीन सीटों- हंडिया, ज्ञानपुर, मझवा पर निषाद पार्टी को घेर रही है. निषाद पार्टी ने ज्ञानपुर में बाहुबली नेता विजय मिश्रा को टिकट न देकर विपुल दुबे को टिकट दे दिया तो प्रगतिशील मानव समाज पार्टी ने तुरंत विजय मिश्रा को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया.

इस क्षेत्र में बिंद जाति के मतदाता अच्छी-खासी संख्या में हैं. डॉ. प्रेमचंद बिंद खुद यहां से चुनाव लड़ चुके हैं. प्रगतिशील मानव समाज पार्टी ने हंडिया और करछना में भी उम्मीदवार खड़ा किया है.

डॉ. प्रेमचंद बिंद जाति के लोगों को निषाद समाज का हिस्सा नहीं मानते जबकि डाॅ. संजय निषाद का कहना है कि बिंद निषादवंशीय जाति है. प्रगतिशील मानव समाज पार्टी कुल पांच सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

चुनाव के पहले बनी सर्वहारा विकास पार्टी ने 25 निषाद बहुल सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी लेकिन अब सीधे चुनाव मैदान में न उतरकर भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार में उतर गए हैं. यह पार्टी निषाद पार्टी के अलावा अन्य दलों से चुनाव लड़ रहे निषाद उम्मीदवारों की मदद कर रही है.

इस पार्टी के एक नेता शिव साहनी ने बताया, ‘निषाद पार्टी ने निषादों के हकदारी के साथ धोखा दिया है. इसलिए हम उन्हें सबक सिखाने के लिए उनके खिलाफ प्रचार कर रहे हैं.’ यह पार्टी चौरीचौरा में डाॅ. संजय निषाद के बेटे श्रवण निषाद के खिलाफ प्रचार में खासी दिलचस्पी ले रही है.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)