राजनीति

उत्तर प्रदेश चुनाव: क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस को नई पहचान देने में कामयाब हो सकेंगी

2019 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश से सक्रिय राजनीति में क़दम रखा था, तब भले ही वे कोई कमाल नहीं दिखा सकीं, पर उसके बाद से राज्य में उनकी सक्रियता चर्चा में रही. विपक्ष के तौर पर एकमात्र प्रियंका ही थीं जो प्रदेश में हुई लगभग हर अवांछित घटना को लेकर योगी सरकार को घेरती नज़र आईं.

एक चुनावी रैली में प्रियंका गांधी. (फोटो साभार: फेसबुक/@/priyankagandhivadra)

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के लिहाज से वर्ष 2014 अप्रत्याशित परिणाम लेकर आया. दस साल से केंद्र की सत्ता में काबिज कांग्रेस लोकसभा चुनावों में इतनी भी सीटें नहीं जीत सकी कि सदन में वह विपक्ष का नेता बना सके. कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) चौंकाते हुए पूर्ण बहुमत प्राप्त करने में कामयाब रही, जो किसी ने सोचा भी नहीं था.

भाजपा की सफलता में सबसे बड़ा योगदान 80 लोकसभा सीटों वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश (यूपी) का था, जहां 71 सीटें जीतकर उसने इस विश्वास को बुलंद किया कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता यूपी से होकर जाता है. 2019 में उसने फिर इस विश्वास को मजबूती दी.

कह सकते हैं कि भाजपा ने यूपी में विपक्षी दलों के पैरों तले ज़मीन नहीं छोड़ी. सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ क्योंकि ढाई दशक पहले उसने यूपी में अपना जो जनाधार खोया था, 2009 के लोकसभा चुनावों से वह उसे वापस पाने की राह पर थी. तब वह 21 सीट जीतकर समाजवादी पार्टी (सपा) (23) के बाद दूसरे पायदान पर रही.

2012 के विधानसभा चुनावों में भी उसके मत प्रतिशत और सीटों में इजाफा हुआ. लेकिन 2014 की मोदी-भाजपा लहर में उसका वापस बनता जनाधार फिर ढह गया. पार्टी दो सीट पर सिमट गई. सिर्फ रायबरेली और अमेठी से सोनिया और राहुल गांधी जीते.

2017 के विधानसभा चुनावों में सपा संग गठबंधन करके कांग्रेस 403 में से केवल 114 सीटों पर चुनाव लड़ी. इतनी कम सीटों पर वह पहले कभी नहीं लड़ी थी. दुर्गति का यह सिलसिला 2019 लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा और पार्टी सिर्फ एक सीट (रायबरेली) जीती, स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी से हार गए.

लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए इस मायने में खास रहा कि प्रियंका गांधी ने यूपी से ही सक्रिय राजनीति में कदम रखा. उन्हें महासचिव बनाकर पूर्वी यूपी की 41 सीटों की कमान सौंपी गई. तब वे भले ही कोई कमाल नहीं दिखा सकीं, लेकिन उसके बाद यूपी में उनकी सक्रियता सर्वाधिक चर्चा का विषय बनी.

यूपी में विपक्ष के तौर पर एकमात्र प्रियंका ही थीं जो राज्य में घटित लगभग हर अवांछित घटना के खिलाफ भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार को घेरती नज़र आईं.

शुरुआत 2019 के बहुचर्चित सोनभद्र कांड से हुई, जहां ज़मीन विवाद में 11 आदिवासियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई. प्रियंका के पीड़ितों से मिलने के लिए पहुंचने पर स्थानीय प्रशासन ने उन्हें हिरासत में ले लिया तो वे धरने पर बैठ गईं और अंतत: मृतकों के परिजनों से मिलकर ही लौटीं और उन्हें 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता भी दी.

जुलाई 2019 में सोनभद्र से शुरू हुआ प्रियंका का यह संघर्ष उन्नाव, हाथरस, लखीमपुर खीरी, आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी और यूपी में हर उस जगह दिखा जहां भी योगी सरकार में आमजन के साथ कुछ अवांछित घटित हुआ.

हाथरस में रेप पीड़िता के घर पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी. (फोटो साभार: ट्विटर)

वे पीड़ितों से मिलने जहां भी गईं, अक्सर स्थानीय प्रशासन द्वारा उन्हें मिलने से रोका गया, हिरासत में लिया गया, यहां तक कि कुछ मौकों पर उनके साथ हाथापाई भी की गई. लेकिन, वे रुकी नहीं और पीड़ितों से मिलकर ही दम लिया. इस दौरान पीड़ितों के साथ उनकी मार्मिक तस्वीरों को वर्तमान भारतीय राजनीति के लिहाज से दुर्लभ बताने वालों की भी कमी नहीं थी.

इसी तरह, कभी वे सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किए गए पूर्व पुलिस अधिकारी एसआर दारापुरी से मिलने स्कूटर पर ही बैठकर निकल गईं, तो कभी लखीमपुर खीरी में प्रशासन द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद गेस्ट हाउस में झाड़ू लगाती देखी गईं.

कुल मिलाकर जब से उन्होंने यूपी से सक्रिय राजनीति में कदम रखा, तब से (खासकर कि 2019 लोकसभा चुनाव के बाद) राज्य में विपक्ष के तौर पर सर्वाधिक सक्रिय वे और कांग्रेस पार्टी ही दिखी, न कि सपा और बहुजन समाज पार्टी (बसपा).

यूपी के पत्रकार मनोज सिंह कहते हैं, ‘विधानसभा में विपक्ष की संख्या बहुत कम थी, कांग्रेस के तो नाममात्र के सात विधायक थे, उस स्थिति में भी प्रियंका के नेतृत्व में कांग्रेस ने विपक्ष की भूमिका निभाने की पूरी कोशिश की कि सड़क पर संघर्ष दिखे. जितनी ताकत थी, उन्होंने उससे ज्यादा झोंक दी. जबकि, जिन सपा-बसपा के पास विधानसभा में ठीक संख्या में सदस्य थे, वे ज़मीन पर उतना नज़र नहीं आए जितना कि कांग्रेस.

वरिष्ठ पत्रकार और विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में सहायक प्रोफेसर अभय कुमार दुबे भी कहते हैं, ‘प्रियंका की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने यूपी में कांग्रेस को चर्चा में ला दिया. इससे पहले कांग्रेस चुनावी होड़ में शामिल होने की बात तो दूर, चर्चा में भी नहीं थी. माना जा रहा था कि कांग्रेस जितनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाह रही है, उसके पास उन सीटों पर खड़े करने के लिए उम्मीदवार तक नहीं होंगे क्योंकि उनका संगठन बहुत कमजोर है.’

चर्चा की बात करें तो वर्तमान विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक सुर्खियां कांग्रेस की चुनावी कैंपेन ने ही बटोरीं.

अभय कुमार कहते हैं, ‘प्रियंका के दो कदमों ने कांग्रेस को चर्चा का केंद्र बना दिया, पहला, चुनाव में महिलाओं को टिकट देने में 40 फीसदी आरक्षण. दूसरा, उनके द्वारा दिया गया लड़की हूं, लड़ सकती हूं का नारा.’

प्रियंका के संघर्ष में सबसे मजबूत साथी प्रदेशाध्यक्ष अजय कुमार लल्लू रहे. प्रियंका के करीबी तमकुहीराज विधायक लल्लू सोनभद्र कांड में प्रियंका के उदय के कुछ समय बाद ही अक्टूबर 2019 में प्रदेशाध्यक्ष बनाए गए थे. वे भी काफी चर्चित रहे और सड़कों पर योगी सरकार के खिलाफ खूब प्रदर्शन किए, जिनके चलते में उन पर अनेकों मामले भी दर्ज हुए.

इसके विपरीत दोनों मुख्य विपक्षी दलों, सपा और बसपा, के प्रदेशाध्यक्ष सड़क पर संघर्ष करते दिखना तो दूर, उनका नाम तक लोगों को नहीं पता. लेकिन, मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में आकर करीब ढाई सालों तक संघर्ष करने के बावजूद भी मतदान करीब आते-आते चुनाव ‘भाजपा बनाम सपा गठबंधन’ में तब्दील हो गया.

इसलिए सवाल लाजमी हैं कि क्या चुनाव परिणामों में कांग्रेस को उसकी मेहनत का फल मिलेगा? क्या उसके प्रदर्शन में सुधार होगा? क्या प्रियंका द्वारा चुनाव को स्त्री केंद्रित करने का प्रयास कांग्रेस को लाभ पहुंचाएगा और वह देश में स्त्री केंद्रित नई राजनीति की अगुवा बन पाएगी?

मनोज कहते हैं, ‘चुनाव पूरी तरह दो पक्षों- भाजपा और सपा, के बीच ध्रुवीकृत हो गया है. इसलिए कांग्रेस के लिए अपने मत प्रतिशत या सीटों में इजाफा करना चुनौतीपूर्ण होगा. दूसरी बात कि प्रियंका ने यूपी में संगठन निर्माण का कार्य तो किया है, लेकिन वह उतना मजबूत नहीं है कि चुनाव में पार्टी अपनी छाप छोड़ सके.’

वे आगे कहते हैं, ‘सबसे अहम बात कि यूपी का चुनाव जाति केंद्रित होता है. कांग्रेस को छोड़कर हर पार्टी के पास किसी न किसी जाति या वर्ग का जनाधार है. कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष लल्लू पिछड़े वर्ग से भले ही आते हों, लेकिन उसमें भी भाजपा की गहरी पैठ है. इसलिए जाति आधारित समाज में जबतक आपकी पैठ नहीं बनेगी, तब तक मुश्किल है कि आप बड़ी लकीर खींच सकें.’

मनोज के मुताबिक, जब प्रियंका इस कमी को दूर नहीं कर सकीं तो उन्होंने मतदाताओं के उस वर्ग (महिला) को पकड़ा जो किसी के एजेंडा में नहीं था और ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ व महिलाओं को टिकट वितरण में 40 फीसदी आरक्षण की घोषणा करके चुनावों को महिला केंद्रित बनाने का प्रयास किया.

वे कहते हैं, ‘लेकिन, यह फैसला देर से लिया गया. भारतीय राजनीति में रातों-रात या चुनाव से दो-तीन महीने पहले महिलाओं का वोट बैंक तैयार करना संभव नहीं. नारा तो आकर्षक था, इसलिए सुर्खियां बना लेकिन जब प्रत्याशी चयन की बात आई तो इतनी बड़ी संख्या में मजबूत महिला प्रत्याशी नहीं मिलीं. नतीजतन, नेताओं की पत्नियों और उनके घर की महिलाओं को लड़ा दिया. अगर यह नीति 2019 में ही बनाई होती और महिला नेतृत्व को विकसित किया जाता तो फायदा मिल सकता था.’

लखीमपुर हिंसा में मारे गए किसान लवप्रीत के परिजनों के साथ राहुल और प्रियंका गांधी. (फोटो साभार: फेसबुक/@/priyankagandhivadra)

वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह भी द्विपक्षीय ध्रुवीकरण की बात स्वीकारते हुए कहते हैं कि इसका नुकसान तो कांग्रेस को उठाना होगा. हालांकि, वे मानते हैं कि कांग्रेस की प्राथमिकता 2022 का विधानसभा चुनाव है ही नहीं, वह तो 2024 लोकसभा चुनाव के लिए रिहर्सल कर रही है.

वे कहते हैं, ‘लड़कों को तो भाजपा ने कारसेवक बना दिया, इसलिए कांग्रेस ने लड़कियों में उम्मीद की किरण देखी और दूरदर्शी सोच रखते हुए महिलाओं को तवज्जो देकर लंबी लड़ाई लड़ने की तैयारी है. इसके नतीजे इस चुनाव में तो मुश्किल हैं, लेकिन भविष्य में दिख सकते हैं.’

रायबरेली के फिरोज गांधी कॉलेज के भूतपूर्व प्रिंसिपल डॉ. रामबहादुर वर्मा भी इससे इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ‘प्रियंका सही बात कहने, चुनावी मुद्दों पर लड़ने और सक्रियता के मामले में नंबर एक पर रही हैं. इसका फायदा कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ने में तो दिखेगा लेकिन कोई चमत्कार नहीं होगा, सीटें खास नहीं बढ़ेंगी. सारी कवायद 2024 लोकसभा चुनावों को लेकर है और प्रियंका लंबी लड़ाई के लिए तैयार हैं.’

हालांकि, अभय दुबे इससे इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं, ‘भविष्य की तैयारी तब दिखती, जब वे जिलों-जिलों में जाकर संगठन मजबूत करतीं. जहां पार्टी का संगठन नहीं है, वहां लोगों को तैनात करतीं और पूरा ढांचा खड़ा करतीं. लेकिन, प्रियंका गांधी की ये शैली नहीं है. यह काम आम आदमी पार्टी (आप) की ओर से संजय सिंह उत्तर प्रदेश में कर रहे हैं. वे साफ कह रहे हैं कि हम ये चुनाव भविष्य के लिए लड़ रहे हैं.’

अभय दुबे की इन बातों को कृष्ण प्रताप सिंह के इस कथन से भी बल मिलता है, जब वे अपने क्षेत्र फैजाबाद के आसपास के चुनावी समीकरणों को लेकर कहते हैं, ‘कांग्रेस केवल उन्हीं सीटों पर जोर लगा रही है जिन पर पिछले चुनाव में वह जीती थी या दूसरे-तीसरे नंबर पर रही थी. फैजाबाद, अंबेडकर नगर और आस-पास के इलाकों में सिर्फ अमेठी और रायबरेली में ही वह सक्रिय है. बाकी क्षेत्रों में न प्रियंका और न कांग्रेस पहुंची. कांग्रेस उम्मीदवार केवल प्रतीकात्मक लड़ाई में हैं.’

मनोज भी कहते हैं, ‘कांग्रेस की संभावनाएं सिर्फ उन सीटों पर ही हैं जहां पहले से उसका या उसके उम्मीदवार का जनाधार रहा है. उसके प्रति मतदाताओं में सॉफ्ट कॉर्नर तो है लेकिन जब चुनाव दो ध्रुवीय हो तो अच्छी छवि होने के बावजूद भी तीसरे को वोट नहीं मिलता.’

प्रियंका गांधी की महिला केंद्रित जिस राजनीति को भविष्य की तैयारी माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि वे दूसरे दलों के सामने राजनीति के नये मानक खड़े कर रही हैं, उससे भी अभय दुबे इत्तेफाक नहीं रखते और वे मानते हैं कि वर्तमान चुनावों पर भी इसका जनमानस पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

इसके पीछे का कारण समझाते हुए वे कहते हैं, ‘यह पहल तब प्रभावी और भविष्य के लिए दूरगामी लगती जब कांग्रेस पंजाब या अन्य राज्यों, जहां वह मजबूती के साथ होड़ में हैं, में भी महिला आरक्षण देकर ‘जेंडर पॉलिटिक्स’ का उदाहरण पेश करती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. इसलिए भी प्रियंका की यूपी में महिला केंद्रित राजनीति की पहल को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है.’

वे आगे कहते हैं, ‘जब आप कोई चुनावी नारा देते हैं या किसी खास लिंग, जाति और वर्ग को प्राथमिकता देते हैं तो वहां भी उसे लागू करके दिखाना चाहिए, जहां आप मजबूत हों. कांग्रेस और प्रियंका के मामले में ऐसा नहीं दिखा.’

मनोज भी यही मानते हैं. उनका कहना है, ‘आपके पास अपने द्वारा शासित अन्य राज्यों का मॉडल पेश करने के लिए होना चाहिए, जैसे- केजरीवाल दिल्ली मॉडल पंजाब और गोवा में दिखाते हैं. भाजपा ने गुजरात मॉडल दिखाया था. लेकिन, कांग्रेस का देखें तो राजस्थान में महिलाओं पर अत्याचार बहुत ज्यादा है. प्रियंका नौकरी की बात कर रही थीं, लेकिन राजस्थान के लोग उनके खिलाफ यहां प्रदर्शन कर रहे थे.’

वे आगे कहते हैं, ‘हां, यह सही है कि कांग्रेस की नज़र आगामी लोकसभा चुनावों पर है, इसलिए वह आलोचना के बावजूद सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन केवल दो महीने के चुनावी कैंपेन से बात नहीं बनेगी. उन्हें महिलाओं के मुद्दे पर टिके रहकर अन्य राज्यों में भी इसे लागू करना होगा और महिलाओं को आगे रखकर तैयारी करनी होगी.’

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापकों में से एक जगदीप एस. छोकर भी प्रियंका और कांग्रेस की महिला केंद्रित राजनीति को लेकर कुछ हद तक ऐसा ही सोचते हैं.

जगदीप कहते हैं, ‘यह अच्छी पहल है, लेकिन देखना होगा कि इसे कैसे लागू किया जाता है. महिलाओं का इस तरह का सशक्तिकरण एकदम नहीं होता, थोड़ा समय लगता है. समाज को बदलने वाली बात है और बदलाव एक चुनाव में नहीं आता. अगर कांग्रेस सिर्फ यूपी नहीं, हर राज्य और लोकसभा चुनाव में लगातार करीब 5-10 सालों तक इसका अनुसरण करे तब लगेगा कि वह गंभीर है. वरना तो यह चुनावी जुमला ही माना जाएगा.’

लखनऊ में पार्टी का घोषणापत्र जारी करतीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, प्रदेशाध्यक्ष अजय कुमार लल्लू व अन्य नेता. (फोटो: पीटीआई)

हालांकि, राज्य के वरिष्ठ पत्रकार और लंबे समय तक बीबीसी में सेवाएं दे चुके रामदत्त त्रिपाठी को नहीं लगता कि प्रियंका और कांग्रेस पूरी कवायद को आगे ले जा पाएंगे.

वे कहते हैं, ‘उनकी लड़ाई में निरंतरता नहीं रही है. हर मुद्दे को सिर्फ छूकर निकल जाती हैं. सोनभद्र गईं, हाथरस गईं, खीरी गईं, और भी जगह गईं लेकिन किसी भी मुद्दे को निर्णायक मोड़ पर ले जाने का धैर्य नहीं दिखाया. वे अगर भविष्य के लिए भी सक्रियता दिखा रही हैं तो उसमें निरंतरता होनी चाहिए, लेकिन राहुल-प्रियंका बस दस जनपथ के प्रतिनिधि बनकर आते हैं.’

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के महासचिव और राजनीतिक विश्लेषक संदीप पांडे भी यही मानते हैं और कहते हैं, ‘सोनभद्र, लखीमपुर और जहां भी अन्याय हुआ, प्रियंका पहुंचीं. उन्होंने कोविड के समय में भी अच्छा काम किया, सरकार पर सवाल खड़े किए, बसों का इंतजाम कराया. लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या ये है कि जाति-धर्म पर केंद्रित यूपी की राजनीति में उसका जो जनाधार हुआ करता था, ब्राह्मण, दलित और मुसलमान, वह अलग-अलग पार्टियों में चला गया और कांग्रेस उसे वापस नहीं खींच पा रही है. जाति-धर्म की काट उसके पास नहीं है. इसलिए उन्होंने महिलाओं का मुद्दा उठाया.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसका सकारात्मक परिणाम आज नहीं तो कल जरूर मिलेगा, बस कांग्रेस को लगकर काम करना होगा, लेकिन वे चुनावों को ध्यान में रखकर काम करते हैं. धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर वे टिकते नहीं हैं और हिंदू कार्ड खेलने लगते हैं. एक समय राहुल गांधी दलितों के घर जाया करते थे, लेकिन उनकी यह पहल केवल चुनाव तक सीमित रही. रफाल पर आक्रामक रहे, लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद उसे भुला दिया. किसी मुद्दे को ये अंजाम तक नहीं पहुंचाते, मुद्दा उठाकर ठंडे पड़ जाते हैं, इसलिए लोगों को इनकी हर कोशिश चुनावी स्टंट लगती है.’

इसी कड़ी में अगर बात करें तो 2019 लोकसभा चुनावों में प्रियंका गांधी स्वयं को गंगापुत्री बताती नजर आईं थीं और गंगा नदी की दुर्दशा पर टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘मां का दर्द बेटी ही समझ सकती है’, लेकिन चुनावों के पहले और बाद में गंगा उनकी प्राथमिकता सूची में नहीं रही.

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल और बाबा नागनाथ जैसे लोगों ने गंगा को बचाने के लिए अपना बलिदान दे दिया, लेकिन प्रियंका परिदृश्य से गायब रहीं. इसी संदर्भ में संदीप कहते हैं, ‘एक बार प्रियंका गांधी के कार्यालय से संदेश आया कि वे इस मुद्दे पर मुझसे बात करना चाहती हैं. मैंने हामी भर दी क्योंकि हम चाहते थे कि कांग्रेस ये मुद्दा उठाए, लेकिन बाद में उन्होंने कोई संपर्क नहीं किया. उन्होंने इलाहाबाद से बनारस तक नाव में गंगा की यात्रा कर ली लेकिन बनारस में ही बाबा नागनाथ ने जान दी थी, लेकिन प्रियंका ने इस मुद्दे का जिक्र तक नहीं किया.’

वे आगे कहते हैं, ‘शायद उन्हें डर हो कि सभी साधु बड़े बांधों के खिलाफ हैं और यह मुद्दा उठाया तो उन्हें भी बड़े बांधों के खिलाफ भूमिका निभानी पड़ेगी. इसलिए, इससे फिर मैसेज जाता है कि वे सब-कुछ चुनावों के लिए करती हैं और उनकी संभावनाएं कमजोर होती हैं.’

इसलिए कहा जा सकता है कि अगर कांग्रेस यूपी में भविष्य की दृष्टि से चुनावों में उतरी है तो उसे पुरानी गलतियों से सबक लेना होगा और किसी मुद्दे को उठाया है तो उसे अंजाम तक भी पहुंचाना होगा.

रामदत्त त्रिपाठी कांग्रेस की संभावनाओं और चुनावी कैंपेन पर आगे बात करते हुए कहते हैं, ‘कांग्रेस को हर जगह लड़ने का फायदा तो मिलेगा, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं क्योंकि राहुल और प्रियंका की ज़मीनी कार्यकर्ताओं में पकड़ नहीं है, स्थानीय नेतृत्व को कांग्रेस ने तवज्जो नहीं दी, जो पनपा उसे किनारे कर दिया.’

राहुल गांधी के साथ यूपी के लिए कांग्रेस का ‘भर्ती विधान’ जारी करतीं प्रियंका गांधी. (फोटो साभार: फेसबुक/@/priyankagandhivadra)

वे आगे कहते हैं, ‘लोगों को लगना चाहिए कि उनके नेता तक उनकी पहुंच है, लेकिन राहुल, प्रियंका आते हैं और वापस चले जाते हैं. अमेठी-रायबरेली तक में उन्होंने अपना रहने का ठिकाना नहीं बनाया. इलाहाबाद इनका था, उससे किनारा कर लिया. इसलिए यूपी में स्थानीय चेहरे की जरूरत है, ताकि लोगों को लगे कि हम उनके जरिये राहुल, प्रियंका तक पहुंच सकते हैं. अभी तो वे दोनों आम लोगों को राजघराने का आभास देते हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं, किसी चुनाव का स्लोगन नहीं हो सकता, महिला आंदोलन का जरूर हो सकता है क्योंकि चुनाव में ऐसे स्लोगन की जरूरत होती है जिससे हर लिंग, जाति, धर्म, वर्ग और समुदाय का मतदाता जुड़ाव महसूस करे. वहीं, महिलाओं के नाम पर उन्हें टिकट दिया गया जिनकी राजनीतिक जमीन तक नहीं है. लड़की होना पर्याप्त नहीं है, लोग ऐसा प्रतिनिधि चाहते हैं जिसमें उनका प्रतिनिधित्व करने की क्षमता हो.’

रामबहादुर वर्मा भी ऐसा ही मानते हैं और उन्नाव कांड की बलात्कार पीड़िता की मां को दिए टिकट को गलत टिकट वितरण करार देते हुए कहते हैं कि प्रतीकात्मक तौर पर उन्हें टिकट तो दे दिया लेकिन लोग सिर्फ जातिगत प्रतीक समझते हैं, अन्याय के पीड़ितों को प्रतीक नहीं मानते. साथ ही वे कहते हैं कि प्रियंका का नारा शहरी महिलाओँ के लिए तो सच हो सकता है, लेकिन ग्रामीण महिलाओं की प्राथमिकताएं अलग होती हैं.

संदीप पांडे महिलाओं की प्राथमिकताओं से संबंधित एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘महिलाओं को लेकर कांग्रेस का घोषणा-पत्र अच्छा है, लेकिन लगता है कि वह मध्यमवर्गीय औरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है. गरीब-मजदूर महिलाओं के लिए शराबबंदी सबसे बड़ा मुद्दा है, उसके लिए इसमें कोई जगह नहीं है.’

वे आगे कहते हैं, ‘कोरोनाकाल में योगी की हिंदुत्ववादी सरकार बढ़-चढ़कर शराब बेच रही थी, अगर कांग्रेस शराबबंदी को मुद्दा बनाती तो गरीब, मजदूर और ग्रामीण महिलाओं के बीच फायदे में रह सकती थी.’

हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि इतनी कवायद के बावजूद भी कांग्रेस की उम्मीदों को कुठाराघात इसलिए भी लगेगा क्योंकि केंद्र की तरह ही यूपी में भी ‘नई कांग्रेस बनाम पुरानी कांग्रेस’ की लड़ाई है. प्रियंका गांधी द्वारा जिला स्तर की नियुक्तियों में युवाओं को तरजीह देने से पुराने कांग्रेसी नाराज हो गए हैं.

वहीं, अभय दुबे मानते हैं कि यदि प्रियंका गांधी खुद विधानसभा चुनाव लड़तीं तो निश्चित तौर पर कांग्रेसी कार्यकर्ता और संगठन ऊर्जा से भर जाते तो कुछ बात बनती. लेकिन, वे स्वयं को राष्ट्रीय नेता के तौर पर देखती हैं, प्रादेशिक नेता नहीं बनना चाहती थीं.

वे कहते हैं, ‘इसके उलट, योगी की मांग एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर अन्य चुनावी राज्यों में भी है लेकिन उन्होंने यूपी को अपनी पहली जिम्मेदारी माना, जबकि प्रियंका के लिए पहली जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश नहीं है.’

ऐसा ही कुछ ऊपर रामदत्त त्रिपाठी ने भी कहा था कि राहुल-प्रियंका आते हैं और चले जाते हैं, इसलिए लोग उनसे जुड़ नहीं पाते हैं.

अंत में, मनोज कहते हैं, ‘यह चुनाव कांग्रेस के लिए जीत-हार से ज्यादा महत्वपूर्ण अपना संगठन बनाने के लिहाज से है. ये चुनाव कांग्रेस के प्रति मतदाता के मन में एक अच्छी धारणा लेकर आया है कि वह गंभीर और सुधारात्मक राजनीति करना चाहती है.’