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न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी कम, शीर्ष अदालत में 1950 से सिर्फ़ 11 महिला जज: जस्टिस बनर्जी

पहले ‘अंतराष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस’ के कार्यक्रम में जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है. कार्यक्रम में जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि उच्च न्यायालयों के 680 न्यायाधीशों में 83 महिला न्यायाधीशों का होना बहुत कम संख्या है और निचली अदालतों में क़रीब 30 प्रतिशत महिला न्यायिक अधिकारी हैं.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ‘बहुत कम’ है और 1950 में उच्चतम न्यायालय की स्थापना के बाद से शीर्ष न्यायालय में सिर्फ 11 महिला न्यायाधीश नियुक्त की गई है.

उन्होंने सार्वजनिक जीवन में निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को रेखांकित करते हुए यह बात कही.

पहले ‘अंतराष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस’ के उपलक्ष्य में आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम में जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस बीवी नागरत्ना के अलावा, सीजेआई एनवी रमना और दो अन्य महिला जजों- जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस हिमा कोहली ने संबोधित किया.

शीर्ष न्यायालय की वरिष्ठतम महिला न्यायाधीश जस्टिस बनर्जी के विचारों से जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सहमति जताई, जो पहली महिला प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बनेंगी.

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि न्यायपालिका में महिलाओं का समावेश यह सुनिश्चित करेगा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया कहीं अधिक उत्तरदायी, समावेशी और हर स्तर पर सहभागिता वाली है.

जस्टिस कोहली ने कहा कि उच्च न्यायालयों के 680 न्यायाधीशों में 83 महिला न्यायाधीशों का होना बहुत कम संख्या है और निचली अदालतों में करीब 30 प्रतिशत महिला न्यायिक अधिकारी हैं.

जस्टिस बनर्जी ने कहा, ‘महिलाओं को न केवल औपचारिकता के, बल्कि सकारात्मक कार्य के जरिये समानता पानी होगी. सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है.’

उन्होंने कहा, ‘आज भी महिलाओं को उनमें अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है, जो निर्णय लेते हैं और जिसका भविष्य की पीढ़ी पर प्रभाव पड़ता है.’

उन्होंने कहा कि यदि महिलाएं पीछे छूट जाती हैं तो भारतीय न्यायपालिका अपेक्षाकृत बेहतर नहीं हो पाएगी.

उन्होंने कहा, ‘भारत में, न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 1950 में उच्चतम न्यायालय की स्थापना के बाद से बहुत कम रहा है और शीर्ष न्यायालय में सिर्फ 11 महिला न्यायाधीश नियुक्त की गई हैं.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, जस्टिस बनर्जी ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय में 34 जजों में केवल सात महिला न्यायाधीश हैं और बॉम्बे उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 59 है, इसमें केवल छह महिला न्यायाधीश हैं. ऐसे ही पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में सात और कलकत्ता उच्च न्यायालय में केवल पांच महिलाएं हैं.

उन्होंने कहा कि त्रिपुरा के उच्च न्यायालय में कोई महिला नहीं है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय 160 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या वाला देश का सबसे बड़ा हाईकोर्ट है, जिसमें वर्तमान में 93 न्यायाधीश हैं, जिसकी पीठ में केवल पांच महिलाएं हैं.

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अधिक संख्या में महिला न्यायाधीशों के होने से महिलाओं के न्याय मांगने की इच्छा बढ़ सकती है और अदालतों के द्वारा उनके अधिकार उन्हें मिल सकते हैं.

उन्होंने कहा, ‘उच्चतम न्यायालय में अभी चार महिला न्यायाधीश हैं. मुझे लगता है कि देश के शीर्ष न्यायालय की संरचना में यह एक बड़ा बदलाव लाएगा. मुझे लगता है कि इस महान संस्था के इतिहास में यह एक नए युग की शुरुआत है.’

जस्टिस कोहली ने कहा कि एक आदर्श स्थिति में महिलाओं की न्यायपालिका में पुरुषों के समान संख्या होनी चाहिए, लेकिन मामला वह नहीं है. वास्तविकता यह है कि भारत की आजादी के 75 साल पूरे होने के बाद भी पहली बार सुप्रीम कोर्ट में 32 जजों में से चार महिला जज हैं.

जस्टिस त्रिवेदी ने कहा कि लैंगिक समानता एक बड़ा सतत विकास लक्ष्य है. उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता प्रमुख सतत विकास लक्ष्यों में से एक है और एक में कार्रवाई दूसरे में विकास को प्रभावित करेगी.

त्रिवेदी ने कहा कि कानून मंत्रालय के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में न्यायाधीशों के केवल 12 और 18 प्रतिशत पदों का प्रतिनिधित्व महिला न्यायाधीशों द्वारा किया जाता है.

उन्होंने कहा, ‘2021 में इतिहास बनाया गया था जब 3 महिला न्यायाधीशों को पदोन्नत किया गया था और इसके लिए हम भारत के मुख्य न्यायाधीश के आभारी हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)