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जम्मू कश्मीर में सरकारी नीतियों से असहमति जताने वाले पत्रकार प्रताड़ितः फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की फैक्ट फाइंडिंग समिति द्वारा जारी रिपोर्ट बताती है कि अख़बारों की कवरेज की प्रकृति के आधार पर सरकारी विज्ञापन जारी किए जाते हैं. साथ ही केंद्रशासित प्रदेश के पत्रकारों को काम के दौरान सुरक्षाबलों के लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है.

कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन के खिलाफ प्रदर्शन करते पत्रकार (फोटो साभारः माजिद मकबूल)

नई दिल्लीः एक फैक्ट फाइंडिंग समिति की रिपोर्ट से पता चला है कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से सरकार द्वारा आवंटित आवासों से पत्रकारों को निकाले जाने के हथकंडे का इस्तेमाल उन पत्रकारों पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, जिन्हें लेकर प्रशासन को लगता है कि वे सरकार की नीतियों से सहमत नहीं हो.

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) की फैक्ट फाइंडिंग समिति (एफएफसी) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट से यह जानकारी सामने आई है.

रिपोर्ट कहती है कि इसके अलावा सरकारी विज्ञापन ‘अखबारों की कवरेज की प्रकृति के आधार’ पर जारी किए जा रहे हैं और इस केंद्रशासित प्रदेश के पत्रकारों को काम के दौरान सुरक्षाबलों के हाथों ‘लगातार उत्पीड़न’ का सामना करना पड़ रहा है.

एफएफसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार द्वारा आवंटित आवासों से पत्रकारों और समाचार संगठनों को हटाने और सरकारी नीतियों के बारे में उनके आलोचनात्मक रुख को लेकर जम्मू कश्मीर के सरकारी एस्टेट विभाग के बीच स्पष्ट संबंध है.

पीसीआई चेयरमैन जस्टिस सीके प्रसाद ने जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) नेता महबूबा मुफ्ती की शिकायत के बाद पिछले साल 29 सितंबर को फैक्ट फाइंडिंग टीम का गठन किया था.

इस समिति में संयोजक के रूप में प्रकाश दुबे भी हैं और गुरबीर सिंह और सुमन गुप्ता इसके सदस्य हैं.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वर्चुअली गला घोंट दिया गयाः महबूबा मुफ्ती

महबूबा मुफ्ती ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि सुरक्षाबलों और सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा मीडिया का उत्पीड़न किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि सुरक्षाबलों द्वारा विभिन्न पत्रकारों पर छापे मारे जा रहे हैं और इनमें से कई के लैपटॉप जैसे कम्युनिकेशन उपकरण जब्त कर लिए गए हैं. कई पत्रकारों का दावा है कि पूछताछ के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जा रहा है.

मुफ्ती का आरोप है कि सरकारी आवासों से बेदखल कर और एग्जिट कंट्रोल लिस्ट (ईसीएल) में रखकर उन्हें (पत्रकारों) विदेशी यात्राओं से रोका जा रहा है और इसका इस्तेमाल उत्पीड़न के लिए किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गांरटी देता है लेकिन केंद्रशासित प्रदेश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया गया है.

समिति के कश्मीर दौरे पर दिखा ‘प्रतिकूल माहौल’

तीन सदस्यीय समिति ने अक्टूबर 2021 को श्रीनगर और नवंबर 2021 को जम्मू का दौरा किया था. इसके बाद दोबारा श्रीनगर गए जहां उन्होंने बड़ी संख्या में पत्रकारों, मीडिया कंपनियों के मालिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और एनजीओ के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उनके बयान दर्ज किए.

साथ ही वे महबूबा मुफ्ती, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, पुलिस महानिरीक्षक विजय कुमार, कश्मीर के संभागीय आयुक्त पांडुरंग पोल से भी मुलाकात की.

टीम ने कहा, ‘श्रीनगर के हमारे दोनों दौरों के दौरान वहां संघर्ष और प्रतिकूल माहौल महसूस किया गया.’

उन्होंने रिपोर्ट में सात अक्टूबर को श्रीनगर के अलोची बाग इलाके में स्कूल प्रिंसिपल सतिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या, उसके कुछ दिन पहले जाने-माने फार्मासिस्ट माखन लाल बिंद्रू की हत्या का उल्लेख किया. इसके साथ हैदरपोरा मुठभेड़ में दो नागरिकों की पुलिस की फायरिंग में मौत (मुदासिर गुल और अल्ताफ अहमद भट) का भी उल्लेख किया.

टीम ने कहा कि ये घटनाएं कश्मीर में बदतर स्थिति को दर्शाती हैं. उन्होंने कहा, ‘सरकारी सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच संघर्ष और तनाव रोजाना की बात है और लोगों को बंदूक के साए में रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.’

उन्होंने कहा, ‘मीडिया के लोग इसी संघर्षरत माहौल में काम कर रहे हैं और उन पर अक्सर विभिन्न पक्षों द्वारा दबाव भी बनाया जाता है.’

पत्रकारों ने कहा- संतुलित रिपोर्टिंग करने वालों को निशाना बनाया गया

फैक्ट फाइंडिंग समिति का कहना है कि जम्मू कश्मीर की आबादी 1.36 करोड़ है. जम्मू में 259 प्रिंट प्रकाशन और कश्मीर में 166 पंजीकृत प्रकाशन हैं. इसके अलावा क्षेत्रीय टेलीविजन नेटवर्क और इंटरनेट आधारित समाचार चैनल भी हैं.

रिपोर्ट में कहा गया कि पत्रकारों के लिए आवासों की कमी और कम आय की वजह से इनमें से अधिकतर सरकार द्वारा आवंटित आवासों में रहते हैं.

रिपोर्ट में एडिटर्स फोरम के अध्यक्ष मोहम्मद असलम भट के हवाले से बताया गया कि हाल के दिनों में सरकारी आवासों को खाली कराने के लिए जिन 40 लोगों को नोटिस भेजा गया है, उनमें से 20 पत्रकार हैं.

कश्मीर न्यूज सर्विस के कार्यकारी संपादक भट ने कहा, ’15 अक्टूबर 2020 को उनके प्रकाशन कार्यालय को बिना किसी नोटिस के सील कर दिया गया था जबकि वह बिना किसी डिफॉल्ट के नियमित रूप से 7,000 रुपये के किराए का भुगतान कर रहे थे.’

उन्होंने कहा कि एक साल के बाद भी संगठन को सील कार्यालय से कोई उपकरण या सामग्री नहीं लेने दी गई. उन्होंने कहा कि इस कार्रवाई की कोई वजह उन्हें नहीं बताई गई.

उन्होंने बताया, ‘हमारा संदेह है कि हम विपक्षी समूहों और पार्टियों के बारे में खबरें बता रहे थे, यही एक वजह हो सकती है.’

वरिष्ठ पत्रकार यूसुफ जमील का आरोप है कि जिन पत्रकारों ने संतुलित रिपोर्टिंग की, उन्हें निशाना बनाया गया.

उन्होंने कहा कि उन्हें भी बिना किसी नोटिस या कारण बताए आवास खाली करने को कहा गया.

रिपोर्ट में विस्तृत रूप से बताया गया है कि फैक्ट फाइंडिंग समिति के संयोजक दुबे ने जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव को जनवरी में पत्र लिखकर कई पत्रकारों को उनके आवासों और कार्यालयों से निष्कासित करने का कारण जानना चाहा और इस पत्र का रिमाइंडर भेजे जाने के बावजूद उन्हें इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

समिति ने मीडिया को नियंत्रित करने के लिए सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने के आरोप को जांचा

एफएफसी की रिपोर्ट में इन आरोप की भी पड़ताल की गई है कि सरकार अपने विज्ञापनों का इस्तेमाल मीडिया को डराने या उसे नियंत्रित करने के लिए कर रही है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘कुछ अखबारों पर स्थानीय प्रशासन की गाज गिरी है और यह पता चला है कि या तो विज्ञापनों को पूरी तरह से वापस ले लिया गया या इन्हें कम कर दिया गया.’

रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार सबसे बड़ी विज्ञापनदाता बनी हुई है. नई मीडिया पॉलिसी के जरिये 40 फीसदी फंड प्रिंट के अलावा अन्य प्लेटफॉर्म के लिए रखा गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस नीति के तहत मीडिया को सूचना एवं प्रचार निदेशालय (डीआईपीआर) के साथ सूचीबद्ध करने की जरूरत है. रिपोर्ट में कहा गया, ‘डीआईपीआर इस तरह के समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी नहीं करेगा…  जो सांप्रदायिक भावनाएं को भड़काए, हिंसा का प्रचार करें, सार्वजनिक गरिमा के नियमों का उल्लंघन करें या देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए घातक किसी जानकारी का प्रचार करें.’

इस तरह के क्लॉज का इस्तेमाल किसी भी खबर के दोनों पक्षों को दिखाने वाले प्रकाशनों को विज्ञापनों से महरूम रखने के लिए किया जाता है.

सूचना विभाग ने एफएफसी को बताया कि जम्मू क्षेत्र में 259 प्रकाशनों में से 26 को और कश्मीर में 166 प्रकाशनों में से 17 को दिए गए विज्ञापनों को विभिन्न आधारों पर सस्पेंड कर दिया गया.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘कुछ मामलों (ग्रेटर कश्मीर, कश्मीर रीडर और उर्दू खश्मीर उज्मा) में इन प्रकाशनों को विज्ञापन सस्पेंड करने का कोई कारण नहीं बताया गया.’

कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने एफएफसी को बताया, ‘विज्ञापनों को जारी करने में भेदभाव कोई नया नहीं है, यह लगभग एक दशक पहले उस समय से है, जब कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए ने केंद्र में सरकार बनाई थी.’

इस संबंध में प्रेस काउंसिल और अदालतों के समक्ष की गई शिकायतें और अपीलों से स्थिति में कोई सुधार नही आया.

उत्पीड़न के आरोपों के बीच पुलिस ने स्वीकारा- 2016 के बाद से पत्रकारों के खिलाफ 49 मामले दर्ज

सुरक्षाबलों की ओर से मीडियाकर्मियों के उत्पीड़न के मुद्दे पर रिपोर्ट में कहा गया है कि अलागववादियों की मदद करने के आरोप लगाने से लेकर, पुलिस कैंप में लंबी-लंबी पूछताछ, फेक न्यूज फैलाने के लिए हिरासत और गिरफ्तारी की गई हैं.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘कई पत्रकारों का कहना है कि श्रीनगर के कुख्यात कार्गो सेंटर में उनसे पूछताछ की गई. यह कार्गो सेंटर कट्टर आतंकियों से पूछताछ करने के लए डिटेंशन और पूछताछ केंद्र के रूप में जाना जाता है.’

रिपोर्ट में कहा गया कि कश्मीर के आईजीपी विजय कुमार ने बयान जारी कर कहा कि 2016 से अक्टूबर 2021 तक पत्रकारों के खिलाफ 49 मामले दर्ज किए गए. इनमें से आठ पत्रकारों पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज किए गए, 17 पर आपारधिक धमकी देने और 24 के खिलाफ उगाही और अन्य अपराधों के आरोप में मामला दर्ज हुए.

रिपोर्ट में डेक्कन हेराल्ड के संवाददाता जुल्फिकार मजीद के हवाले से कहा गया कि जून 2020 में सीआईडी ने उन्हें कुछ ट्वीट करने को लेकर यह कहते हुए तलब किया कि वे सभी पत्रकारों की पृष्ठभूमि को लेकर नोट तैयार कर रहे हैं.

जुल्फिकार ने बताया कि यह हथकंडा बहुत अपमानजनक था. उन्हें दर्जनों बार तलब किया गया. इससे उन्हें और उनके परिवार को कई सामाजिक दिक्कतें हुईं, जिसके बाद उन्होंने पिछले साल सितंबर में ट्वीट करना ही बंद कर दिया गया.

उन्होंने कहा, ‘हो सकता है कि वे चाहते हो कि मैं उनके सामने झुक जाऊं. मैं सबसे अधिक प्रताड़ित शख्स नहीं हूं, ऐसे कई हैं, जिनकी स्थिति मुझसे भी खराब है.’

अधिकारी की अपने बचाव में सफाई

एफएफसी का कहना है कि संभागीय आयुक्त पोल और आईजीपी कुमार ने जारी बयान में पत्रकारों के खिलाफ इस कार्रवाई को यह कहकर न्यायोचित ठहराते हुए कहा, ‘कुछ अवसरों पर यह देखा गया है कि मीडियाकर्मी अपनी स्थिति का दुरुपयोग कर उन गतिविधियों में लिप्त रहते हैं, जिससे लोगों को उकसाया जा सकता है और जिससे आखिरकार गंभीर कानून एवं व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होती है.’

रिपोर्ट में कहा गया, कई पत्रकारों और कुछ निर्दलीय स्तंभकारों ने पुलिस की इस कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा कि कई पत्रकार ‘आतंकियों के कार्यकर्ता’ बन गए हैं और ‘इस पेशे की आड़ में अपराधी’ बन गए हैं या ‘राष्ट्रविरोधी गतिविधियों’ में लिप्त हैं.

इंटरनेट बंद करना, मान्यता संबंधी समस्याएं

एफएफसी टीम ने यह भी रिपोर्ट में बताया कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जानबूझकर संचार नेटवर्क को बाधित किया गया.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘पांच अगस्त 2019 के बाद लगभग दो महीने तक घाटी में इंटरनेट सेवा बंद कर संचार को बाधित किया गया.’

रिपोर्ट में कहा गया, ‘किसी भी तरह से अशांति से बचने के लिए आम आबादी के लिए संचार को बाधित करने को न्यायोचित ठहराया जा सकता है लेकिन पत्रकारों के लिए इंटरनेट सेवाओं को प्रतिबंधित करना सामान्य नहीं है क्योंकि इससे न्यूज मीडिया का सामान्य कामकाज बाधित होता है.’

एफएफसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उनकी जिन भी पत्रकारों से बात हुई, उन्होंने बताया कि 31 मार्च 2020 से पत्रकारों को एक्रिडेशन (मान्यता) कार्ड जारी करना बंद कर दिया गया है, जबकि यह संघर्षरत क्षेत्रों में यात्रा करने के दौरान किसी तरह के उत्पीड़न से बचने और वहां से सुरक्षित तरीके से निकलने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले इस आईडी के बिना सीमित क्षेत्रों और सरकारी कार्यालयों में जाना मीडियाकर्मियों के लिए मुश्किल हो गया है.’

एफएफसी ने रिपोर्ट में बताया कि अधिकतर पत्रकारों ने स्वीकार किया है कि मुफ्ती का यह आरोप कि उन्हें तलब किया जा रहा है और उनसे एक प्रश्नावली भरवाई जा रही है, जिसमें कहा गया है कि इस शख्स (पत्रकार) का राष्ट्रविरोधी ताकतों से संबंध हो सकता है, सच है.

रिपोर्ट में बताया गया कि आईजीपी कुमार ने यह स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखा कि जम्मू कश्मीर में काम कर रहे पत्रकारों की प्रोफाइलिंग के लिए इस तरह का अभ्यास मौजूद है.

कुमार ने कथित तौर पर कहा था, ‘हमारा उद्देश्य 80 फीसदी कश्मीरियों की प्रोफाइलिंग करना है और यही पत्रकारों के लिए भी करेंगे.’

संदेह की वजह से संचार की सामान्य लाइनें बाधित

रिपोर्ट में कहा गया, ‘जम्मू कश्मीर के पत्रकार अत्यधिक तनाव में काम करते हैं और उन पर सरकारी एजेंसियों, पुलिस और आतंकियों की ओर से भी लगातार दबाव रहता है लेकिन फिर भी इस तरह के प्रतिकूल माहौल में काम करना सराहनीय है लेकिन न्यूज मीडिया में नौकरियां सुरक्षित नहीं है. इस माहौल में अच्छी और सच्ची पत्रकारिता सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.’

रिपोर्ट में कहा गया, ऐसे परिदृश्य में स्थानीय प्रशासन और पत्रकारों के बीच सामान्य संचार बाधित है और इसका कारण स्थानीय प्रशासन का यह संदेह है कि बड़ी संख्या में स्थानीय पत्रकार आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं.

एफएफसी ने कहा कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने भी इसे स्वीकार किया है, जिन्होंने एफएफसी को स्पष्ट रूप से बताया कि कई पत्रकार का राष्ट्रविरोधी झुकाव है.

सिन्हा ने स्वीकार किया कि जब वह पहली बार नियुक्त हुए थे तो वह ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस को प्रोत्साहित करते थे लेकिन अब वह कुछ चुनिंदा पत्रकारों के साथ ही कॉन्फ्रेंस को तवज्जो देते हैं.

नियमित आवंटन, सरकारी आवासों को खाली करने के लिए स्पष्ट नीति की जरूरत

रिपोर्ट में कहा गया कि जम्मू कश्मीर सरकार के पास कुछ निश्चित आधारों पर आवंटित आवासों को वापस लेने की शक्तियां है और इस तरह की प्रक्रिया मनमानी नहीं हो सकती और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए इन्हें नहीं किया जा सकता.

रिपोर्ट में कहा गया, सरकारी आवासों के आवंटन और उन्हें वापस लेने को नियमित करने के लिए एक स्पष्ट लिखित नीति का ऐलान किया जाना चाहिए ताकि यह सरकारी अधिकारियों की मनमर्जी पर निर्भर नहीं हो.

पक्षपाती विज्ञापन नीति की समीक्षा की जानी चाहिए

एफएफसी रिपोर्ट में कहा गया है, ‘जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा बड़ी संख्या में उन प्रकाशनों को विज्ञापन जारी किए जाते हैं, जिनका रुझान या समर्थन सरकारी योजनाओं और नीतियों के पक्ष में है. यह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मुक्त मीडिया के विपरीत है.’

रिपोर्ट में कहा गया, ‘जम्मू कश्मीर में, जहां बहुत कम निजी विज्ञापनदाता हैं, सरकार द्वारा किसी प्रकाशन को विज्ञापन से महरूम करना उस संस्थान को खत्म कर सकता है.’

एफएफसी की मांग है कि जम्मू कश्मीर सरकार को इस पक्षपाती नीति की समीक्षा करनी चाहिए. जब तक कोई प्रकाशन कानून के दायरे में काम करता रहेगा, तब तक विज्ञापन को निष्पक्ष तरीके से जारी किया जाना चाहिए.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)