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छत्तीसगढ़: आदिवासियों के लिए न्याय पाने की राह इतनी मुश्किल क्यों है

मार्च 2011 में सुकमा ज़िले के तीन गांवों में आदिवासियों के घरों में आग लगाई गई थी. पांच महिलाओं से बलात्कार हुआ और तीन ग्रामीणों की हत्या हुई थी. इसका आरोप पुलिस पर लगा था. सीबीआई की एक रिपोर्ट में भी विवादित पुलिस अधिकारी एसआरपी कल्लूरी और पुलिस को ज़िम्मेदार बताया गया था, लेकिन हाल ही में विधानसभा में पेश एक रिपोर्ट बताती है कि मामले में पुलिस को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया.

(फोटो साभार: फेसबुक)

छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के तीन गांवों में मार्च 2011 में आदिवासियों के घरों में आग लगाई गई थी. पांच महिलाओं से बलात्कार किया गया था और तीन ग्रामीणों की हत्या की गई थी. गांव वालों ने कहा था कि यह सब पुलिस फोर्स ने किया है.

जब इस घटना की रिपोर्टिंग करने पत्रकार अनिल मिश्र और अमन सेठी ने वहां जाने की कोशिश की तो उन्हें पुलिस ने जाने नहीं दिया. तब यह पत्रकार आंध्र प्रदेश के रास्ते जंगल से होकर वहां गए थे. बाद में, पत्रकार सुप्रिया शर्मा भी एक ट्रक में छिप कर वहां पहुंची थीं. कुछ समय बाद आदिवासी पत्रकार लिंगा कोडोपी भी जंगल के रास्ते वहां गए और उन्होंने वीडियो बनाए.

लिंगा कोडोपी के वीडियो से नाराज़ होकर उन्हें फर्जी मामले में फंसाकर जेल में डाल दिया गया था. उन्हें ढाई साल जेल में रहना पड़ा. अभी हाल ही में अदालत ने उन्हें सभी आरोपों में निर्दोष घोषित किया है.

दंतेवाड़ा के तत्कालीन कलेक्टर आर. प्रसन्ना को भी इन गांवों में जाने नहीं दिया गया था, जिसकी रिपोर्ट समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने के बाद उनका स्थानांतरण दंतेवाड़ा से बाहर कर दिया गया था.

सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश इस घटना के तुरंत बाद वहां आदिवासियों की मदद करने पहुंचे थे. स्वामी अग्निवेश को गांव में नहीं जाने दिया गया और उनकी गाड़ी पर पथराव किया गया था.

इस घटना में स्वामी अग्निवेश के साथ स्थानीय मीडिया के लोग भी थे. स्वामी अग्निवेश ने सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में इस घटना के बारे में शपथ-पत्र पेश किया था और खुद पर हमले समेत इस पूरी घटना के पीछे दंतेवाड़ा के उस समय के एसएसपी एसआरपी कल्लूरी को जिम्मेदार बताया था.

सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई की टीम को जांच करने का जिम्मा सौंपा. जुलाई में सीबीआई की टीम इस पूरे मामले की जांच करने आई.

सीबीआई की टीम पर भी पुलिस के विशेष पुलिस अधिकारियों के दल ने जानलेवा हमला किया था. पुलिस से अपनी जान बचाने के लिए सीबीआई की टीम ने खुद को सुकमा के सरकारी गेस्ट हाउस में बंद कर लिया था.

जब सीआरपीएफ का दल सीबीआई जांच दल के सदस्यों की जान बचाने आया तो पुलिस ने सीआरपीएफ दल पर हमला किया, जवाब में दोनों ओर से गोलियां चली थीं. इस बारे में सीबीआई का एक शपथ -पत्र, जो उसने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल किया था, आज भी मौजूद है.

इस घटना के विषय में इसी हफ्ते छत्तीसगढ़ विधानसभा में एक जांच रिपोर्ट पेश की गई है. जस्टिस टीपी शर्मा की अध्यक्षता में बने जांच दल ने इस पूरे मामले में कल्लूरी और पुलिस को सभी आरोपों से बरी कर दिया है.

इस रिपोर्ट को लेकर आदिवासियों और इस घटना की जांच की मांग करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं में आश्चर्य है. सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह है कि सीबीआई ने घटना की जांच करने के बाद अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी.

सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि आगजनी के लिए पुलिस फोर्स ही जिम्मेदार थी. ग्रामीणों के घरों में पुलिस ने ही आग लगाई थी. इस मामले में उस समय समाचार-पत्रों में एसएसपी कल्लूरी का यह बयान भी छपा था कि आगजनी के लिए मैं जिम्मेदार हूं.

कल्लूरी का बयान.

यह भी याद रखा जाना चाहिए कि सीबीआई की रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने छह विशेष पुलिस अधिकारियों को नौकरी से बर्खास्त किया था. इस बर्खास्तगी से गुस्सा होकर पुलिस के सिपाहियों ने बस्तर संभाग के पांच स्थानों पर सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाए थे. इनमें नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया, शालिनी गेरा, सोनी सोरी, मनीष कुंजाम और हिमांशु कुमार के पुतले शामिल थे.

पुलिस द्वारा सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाए जाने की इस घटना की जांच के लिए भी सरकार ने एक जांच समिति गठित की थी, जिसकी रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है.

पुतले जलाए जाने की घटना के बाद वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, जो उस समय विपक्ष में विधायक थे, ने अपनी फेसबुक वॉल पर कल्लूरी के बारे में 25 अक्तूबर 2016 को टिप्पणी करते हुए एक पोस्ट डाली थी.

भूपेश बघेल की फेसबुक पोस्ट.

सवाल यह उठता है कि जिस घटना में पुलिस के खिलाफ सीबीआई की रिपोर्ट आ चुकी हो, जिसके आधार पर छोटे स्तर के पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी हो चुकी हो, उस मामले में निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को आदेश देने वाले अधिकारी को किस आधार पर क्लीन चिट दी गई है?

इस घटना की जांच में सहयोग देने के लिए आदिवासी जब बयान देने जाते थे, तब उन्हें पुलिस की तरफ से धमकियां मिलती थी. न्याय की आस में आदिवासियों ने इतने साल गुजारे हैं, लेकिन उनके घर जलाने, उनके समुदाय की महिलाओं के साथ बलात्कार के दोषियों को क्लीन चिट मिलने से वे निराश ज़रूर हैं.

आदिवासी इलाकों में अशांति का एक कारण आदिवासियों के बीच फैली हुई यह धारणा भी है कि यह व्यवस्था उन्हें न्याय नहीं देती है. इसलिए आदिवासियों को न्याय देने के मामले में पूरी व्यवस्था को अधिक सतर्क रहना चाहिए.

लेकिन, फिलहाल के घटनाक्रम को देखते हुए तो लगता है कि न्याय पाने की आस करने वाले आदिवासियों को अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)