द कश्मीर फाइल्स का मक़सद पंडितों के प्रति हमदर्दी है या एक वर्ग के प्रति नफ़रत उपजाना

कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ़ हिंसा ऐसी त्रासदी है जिस पर बात करते समय सिर्फ उसी पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए. किसी त्रासदी को तुलनीय बनाना उसका अपमान है. 'कश्मीर फ़ाइल्स' के निर्माताओं को यह सवाल करना चाहिए कि क्या वास्तव में कश्मीरी पंडितों की पीड़ा ने उन्हें फिल्म बनाने को प्रेरित किया या उसकी आड़ में वे अपनी मुसलमान विरोधी हिंसा को ज़ाहिर करना चाहते थे?

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(फोटो साभार: फेसबुक)

कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ़ हिंसा ऐसी त्रासदी है जिस पर बात करते समय सिर्फ उसी पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए. किसी त्रासदी को तुलनीय बनाना उसका अपमान है. ‘कश्मीर फ़ाइल्स’ के निर्माताओं को यह सवाल करना चाहिए कि क्या वास्तव में कश्मीरी पंडितों की पीड़ा ने उन्हें फिल्म बनाने को प्रेरित किया या उसकी आड़ में वे अपनी मुसलमान विरोधी हिंसा को ज़ाहिर करना चाहते थे?

(फोटो साभार: फेसबुक)

‘कश्मीर फ़ाइल्स’ के निर्देशक को सरकार ने उच्च स्तर की सुरक्षा प्रदान की है. किसी कलाकार के लिए यह उपलब्धि है या नहीं, इस पर बहुत विचार की ज़रूरत नहीं. तर्क यह है कि फिल्म पर विवाद के कारण निर्देशक को यह सुरक्षा दी गई है. लेकिन दर्शकों के लिए निर्देशक से ज़्यादा अभिनेता परिचित होते हैं. अगर फिल्म पर विवाद है और उससे जुड़े लोगों को ख़तरा है तो अभिनेताओं को भी सुरक्षा दी जानी चाहिए.

फिल्म पर विवाद क्यों और कहां है और खतरा किसको है? क्या इस फिल्म के खिलाफ किसी ने प्रदर्शन किया है? क्या किसी ने उन सिनेमाघरों में तोड़ फोड़ की है? क्या किसी ने फिल्म के खिलाफ कोई ऐसा बयान दिया है जिससे लगे कि फिल्म से जुड़े लोगों को खतरा हो सकता है?

सरकारी सुरक्षा के लिए कारण बतलाया है कि समाज का एक हिस्सा इस फिल्म का विरोध कर रहा है और इसकी आशंका है कि इससे कुछ समुदाय आहत हो सकते हैं. इस आशंका में यह बात अव्यक्त है कि इन समुदायों से फिल्मकार को खतरा हो सकता है जिससे उन्हें बचाने के लिए सुरक्षा दी गई है. लेकिन क्या ऐसी कोई रिपोर्ट हमने देखी है?

जो फिल्म उच्च स्तर पर राजकीय संरक्षण में प्रचारित और प्रसारित की जा रही हो, उसे बाकायदा सरकारी पैसे पर दिखलाया जा रहा हो, उसके निर्देशक को कोई असुरक्षा हो सकती है, यह सोचना भी हास्यास्पद है.

जाहिर है ‘एक समुदाय’ की तरफ से कल्पित हिंसा और असुरक्षा का वातावरण खड़ा किया जा रहा है बिना उसका नाम लिए जिससे यह कहा जा सके कि वह कितना खतरनाक है कि उससे हिफाजत का इंतजाम करना ही होगा.

सिनेमाघरों से फिल्म देखकर लौटने वालों की जो रिपोर्ट है, उसके मुताबिक़ फिल्म के दौरान और उसके बाद मुसलमानों के खिलाफ नारे लगाए जा रहे हैं, उनके संहार के लिए उकसावा दिया जा रहा है. एक दर्शक उठकर बाकी दर्शकों से मुसलमान औरतों से रिश्ता बनाने और बच्चे पैदा करने का ‘आह्वान’ करता है. उनकी आबादी घटाने के उपाय करने को कहता है. इस तरह की रिपोर्ट कई जगहों से आई है.

यानी इस फिल्म के प्रदर्शन से अगर किसी को खतरा पैदा हुआ है तो वे मुसलमान हैं. क्या कोई भी मुसलमान दर्शक इस फिल्म को देखते वक्त, देखने के बाद, इन नारों को सुनते हुए सुरक्षित महसूस करेगा? क्या ऐसी ख़बरें सुनने के बाद कोई मुसलमान यह फिल्म देखने जाएगा?

यह फिल्म ही नहीं, जैसा एक मित्र ने लिखा क्या इसके बाद सिनेमाघर मात्र मुसलमानों के लिए सुरक्षित रह गए हैं? क्या किसी और फिल्म के दौरान भी उन पर हमला नहीं हो सकता?

कहा जा सकता है कि अब तक किसी जगह से मुसलमानों पर हमले की खबर नहीं आई है. यह ज़रूर संतोष की बात है लेकिन क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि इस फ़िल्म ने उनके खिलाफ घृणा में इजाफा किया है और उनके खिलाफ हिंसा की आशंका और बढ़ गई है?

यह भी सुना कि मुसलमानों के अलावा इस फिल्म में कुछ ऐसे पात्र हैं जो कश्मीरी नहीं हैं लेकिन जीवित वास्तविक व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. पत्रकार, लेखक, अध्यापक. फिल्मकारों ने तो उनके वास्तविक नाम नहीं इस्तेमाल किए हैं लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार तंत्र ने बाकायदा कुछ पत्रकारों, अध्यापकों आदि को इनसे जोड़कर इनके खिलाफ घृणा प्रचार करना शुरू कर दिया है. एक शिक्षा संस्थान का भी.

सोशल मीडिया पर नाम लेकर इनके खिलाफ नफ़रत का प्रचार चल रहा है. इससे क्या ये असुरक्षित नहीं हुए हैं? या इनके खिलाफ यह घृणा प्रचार जायज़ है? एक अभिनेत्री ने कहा कि वे चाहती हैं कि उन्होंने चरित्र निभाया है उससे लोग घृणा करें. क्या उन्होंने सोचा है कि इसका नतीजा क्या हो सकता है?

उम्मीद थी कि इन ख़बरों के बाद इस फिल्म के निर्देशक और अभिनेता, जिनमें कुछ तो सार्वजनिक मुद्दों पर मुखर रहते हैं, अपने दर्शकों से अपील करेंगे कि वे इस घृणा से बाज़ आएं. वे कहेंगे कि यह फिल्म मुसलमानों के खिलाफ घृणा पैदा करने या बढ़ाने के लिए नहीं बनाई गई है. वे अपने दर्शकों को समझाएंगे कि यह कश्मीरी पंडितों के लिए हमदर्दी पैदा करने के मक़सद से बनाई गई है, कश्मीरी मुसलमानों या मुसलमानों से नफरत करने के लिए नहीं.

लेकिन उन्होंने इसकी ज़रूरत महसूस नहीं की है. तो क्या वे ऐसी ही प्रतिक्रिया चाहते थे? क्या वे यह चाहते हैं कि उनकी फिल्म कोई मुसलमान न देखे? क्या वे चाहते हैं कि जिस अध्यापक, पत्रकार के खिलाफ उनकी फिल्म के सहारे नफरत फैलाई जा रही है, वे उसके चलते हिंसा के शिकार हों? अगर नहीं, तो वे चुप क्यों हैं?

कोई भी कलाकार चाहता है कि उसकी कलाकृति हर तरह के लोग देखें. सिर्फ एक धर्म, एक संप्रदाय के लोगों के लिए वह रचना नहीं करता. बल्कि यह उसकी असफलता होगी अगर उसकी कृति से कोई समुदाय असुरक्षित महसूस करने लगे. इस पर और बात आगे.

यह सब सुनकर मुझे अरसा पहले की एक फिल्म या टीवी सीरियल की याद हो आई. बाद में उसे एक फिल्म के तौर पर जारी किया गया. उसका नाम है ‘तमस’. गोविंद निहलानी ने भीष्म साहनी के उपन्यास पर यह फिल्म बनाई थी.

उसके बनते ही उसके खिलाफ आरएसएस के पूरे तंत्र, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आदि ने बाकायदा हिंसक अभियान चलाया था. उससे उस फिल्म के निर्देशक और लेखकों की जान को खतरा पैदा हो गया था. मुझे एक सहकर्मी ने बतलाया कि भीष्म साहनी को कॉलेज बुलाना कितने जोखिम का मामला बन गया था. इस बात के कुछ दशक बाद, भीष्म साहनी की जन्मशती पर इस फिल्म का प्रदर्शन हम अपने विभाग में नहीं कर पाए थे क्योंकि विभागाध्यक्ष को एक संगठन की तरफ से हमले की आशंका थी.

ऐसी बीसियों फ़िल्में हैं, मसलन, ‘मुज़फ़्फ़रनगर बाकी है’, ‘राम के नाम’, ‘परज़ानिया’, जिनके प्रदर्शन का मतलब है आरएसएस तंत्र के लोगों की तरफ से हिंसा या उसकी आशंका.

क्या इस फ़िल्म को प्रतिबंधित करने, न दिखलाए जाने के लिए प्रदर्शन हुए हैं? कोई धमकी कहीं दी गई है? जैसा पहले लिखा, इस फिल्म ने घृणा का जो माहौल बनाया है उसने एक समुदाय और कुछ व्यक्तियों को असुरक्षित कर दिया है. क्या यह चिंता का विषय नहीं है?

इस फिल्म के बाद कई लोग नेल्ली, गुजरात, मुज़फ़्फ़नगर आदि पर फिल्मों की मांग कर रहे हैं. यह प्रतिक्रिया गलत है. किसी एक त्रासदी पर बात करने का मतलब हमेशा और तुरंत दूसरी त्रासदी की चर्चा नहीं है.

कश्मीर में पंडितों के खिलाफ हिंसा और उनका पलायन ऐसी त्रासदी है जिस पर बात करते समय हमें सिर्फ उसी पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए. जैसे गुजरात की हिंसा पर बात करने पर यह सवाल नहीं करना चाहिए कि कश्मीरी पंडितों पर हिंसा की बात क्यों नहीं करते. या यह कि 1984 का क्या!

यह विचार भी गलत है कि अगर मारे गए पंडितों की संख्या गुजरात या नेल्ली के मारे गए मुसलमानों से तुलनीय नहीं है तो वह विचारणीय भी नहीं है. प्रत्येक हिंसा या त्रासदी अपने ऊपर ध्यान दिए जाने की अपेक्षा करती है. उसे किसी से तुलनीय बनाना एक तरह से उसकी गंभीरता को कम करना या उसका अपमान है.

हम देख रहे हैं कि यूक्रेन की हिंसा पर बात करते समय कुछ लोग यमन, फ़िलीस्तीन का जिक्र कर रहे हैं. ऐसा करके क्या वे सामाजिक पाखंड को उजागर कर रहे हैं या यूक्रेन के लोगों पर हिंसा की गंभीरता को छोटा कर रहे हैं? यह सवाल हमें ईमानदारी से करना चाहिए.

वैसे ही जैसे ‘कश्मीर फ़ाइल्स’ के निर्माताओं और अभिनेताओं से यह सवाल करना चाहिए कि पीछे क्या वास्तव में कश्मीरी पंडितों की त्रासदी और पीड़ा ने उन्हें यह फिल्म बनाने को प्रेरित किया या उसकी आड़ में वे अपनी मुसलमान विरोधी हिंसा को जाहिर करना चाहते थे? क्या यह त्रासदी एक आवरण है जो मुसलमान विरोधी घृणा को जायज़ ठहराती है?

यह सोचना इसलिए चाहिए कि इस फ़िल्म को देखनेवालों के बीच से पंडितों को इंसाफ दिलाने की आवाज़ कहीं उठती नहीं सुनाई पड़ी, जो शोर है वह मुसलमान विरोधी नफ़रत का. क्या सारे अभिनेता और निर्देशक यही नहीं चाहते थे?

यह भी कितना दिलचस्प है कि जो दूसरों को असुरक्षित बना रहा है, वही खुद को उनसे असुरक्षित दिखला रहा है!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)