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गंगूबाई काठियावाड़ी के बहाने: मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी, यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी…

गंगूबाई फिल्म एक सिनेमेटिक अनुभव की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, पर इस फिल्म के योगदान को जिस चीज़ के लिए माना जाना चाहिए वह है- वेश्याओं के छुपे हुए संसार को अंधेरे गर्त से निकाल कर सतह पर लाना.

गंगूबाई काठियावाड़ी फिल्म के दृश्य में आलिया भट्ट. (फोटो साभार: फेसबुक/@aliabhatt)

हाल ही में आई फिल्म गंगूबाई काठियावाड़ी ने भारतीय संदर्भों में वेश्यावृत्ति या सेक्स-वर्क से जुड़ी महिलाओं के त्रासद संसार के चित्रण से हमारी मध्यवर्गीय मानसिकता को झकझोर कर रख दिया है. जिस तरीके से आलिया भट्ट परदे पर गंगूबाई काठियावाड़ी का किरदार निभाती हैं, जिस तरह से निर्देशक संजय लीला भंसाली परदे पर 1960 के मुंबई की उन ‘बदनाम’ गलियों को जीवंत कर देते हैं, वह आम दर्शक को किसी इंद्रजाल में उतार देता है… दृश्य-दर-दृश्य, घंटे-दर-घंटे, दर्शक इस कड़वी यथार्थ की दुनिया में उतरता जाता है.

यूं लगता है हम परदे पर कुछ ऐसा देख रहे हैं, जो हमारा अपना अनुभव नहीं है, पर जिस सच्चाई से भंसाली यह संसार रचते हैं, वह हमारी संवेदनाओं में हमेशा के लिए अंकित हो जाता है.

पश्चिमी काव्यशास्त्र में नाटकों का मुख्य उद्देश्य दर्शकों को विरेचन की स्थिति में ले आना माना जाता है. मसलन, शेक्सपियर के नाटकों में नायक की त्रुटियों के बावजूद दर्शकों की सहानुभूति उसी के साथ होती थी. प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक कुछ समय के लिए नायक के साथ जिस तन्मयता के सूत्र से बंधते थे, वह उन्हें मानसिक विस्मृति की अवस्था में ले कर चला जाता था.

भारतीय काव्यशास्त्र में भी ‘भरत मुनि’ काव्य से प्राप्त होने वाले आनंद को ‘ब्रह्मानन्द’ कहते हैं. नाट्यकलाओं में दर्शक के साधारणीकरण करने की वह क्षमता होती है जो उन्हें आनंद की ऐसी चरम सीमा पर ले जाता है, जहां दर्शक, अभिनेता के हर भाव से तादात्म्य स्थापित कर लेता है.  फिल्म गंगूबाई काठियावाड़ी को देखने के बाद लगभग यही मनोदशा होती है.

फिल्म के अंतिम दृश्य में जहां गंगूबाई अपने चुनावी जीत की खुशी में निकलने वाली सम्मान-यात्रा में हाथ बांधे सबका अभिवादन करती है, तो दर्शकों को भी उसकी जीत, अपनी जीत लगने लगती है.

आलिया भट्ट तो परदे पर एक किरदार निभा रही होतीं हैं, पर अभिनय के पीछे छुपी शख्सियत, जिसे गंगूबाई हरजीवनदास काठियावाड़ी के नाम से जाना जाता है, निस्संदेह हमें हैरत में डालती है. सहसा यह विश्वास करना असंभव हो जाता है कि कैसे तथाकथित रूप से सबसे घृणित पेशा करने वाले समुदाय की एक स्त्री अपने जीवन में इतनी बड़ी शख्सियत बन जाती है कि सालों बाद उसकी ज़िंदगी पर किताबें लिखी जा रहीं है, मुख्यधारा की व्यावसायिक बड़े-बजट-बड़े निर्देशक की फिल्में उसे केंद्र में रख कर बनाई जा रही है.

क्या ये वो सबाल्टर्न (subaltern) हैं जिन्हें हाशिए से केंद्र में लाने की क़वायद की जा रही है?

बहरहाल, हीरो वरशिप करने वाले हमारे भारतीय समाज में जहां सिर्फ महान पुरुषों की ज़िंदगियों पर, उनके द्वारा किए गए महान कार्यों पर सिनेमा बनते थे, ऐसे में यह कैसे संभव है कि पेशे से वेश्या गंगूबाई की ज़िंदगी इतनी ज़्यादा प्रभावशाली हो सकती है कि उसे एक नायिका के रूप में सिनेमा में स्थान दिया जाए और वह भी किसी महिला निर्देशक द्वारा नहीं!

साल 2011 में लेखक व पत्रकार हुसैन ज़ैदी, जिन्होंने मुंबई के अंडरवर्ल्ड अपराध पर कई शोधपरक किताबें लिखीं हैं, ने माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई शीर्षक उपन्यास में गंगूबाई काठियावाड़ी के विषय में लिखा था, जिससे निर्देशक भंसाली को यह फिल्म बनाने की प्रेरणा मिली.

गंगूबाई की इस पेशे में आने की कहानी तक़रीबन उन तमाम कहानियों जैसी ही हैं, जहां पर भोली-भाली, असहाय लड़कियों को प्रेम या नौकरी का झांसा देकर कोठों पर बेच दिया जाता है.

गंगूबाई गुजरात के एक संभ्रांत परिवार से ताल्लुक रखतीं थीं और बचपन से ही फिल्मों के बड़े परदे पर अभिनय करने का स्वप्न देखती थी. यह स्वप्न उन्हें बंबई खींचकर ले तो आया पर जिस व्यक्ति- रमणीक लाल (जो उनका पति भी था) के साथ वह बंबई आई थीं, उसने उन्हें एक कोठेवाली को बेच दिया.

यह सोचकर वाक़ई क्षोभ होता है कि स्त्रियों को वेश्यावृति में धकेलने के लिए कई बार अपने निकटतम परिचित ही कारण बन जाते हैं. पर जिस संदर्भ से गंगूबाई आती थीं, उन परिस्थितियों में वापस घर लौटना निषिद्ध था. एक संभ्रांत पारंपरिक गुजराती परिवार में यह बिल्कुल भी संभव नहीं था कि एक बार घर से भाग गई बेटी अपनी गलती की तलाफ़ी कर घर वापस जा सके.

ऐसे में शरीर को जब हर तरीके से कष्ट दिया जाए, जब उसे कई दिनों तक भूखा-प्यासा छोड़ दिया जाए और इतना मारा जाए कि उसकी सभी संवेदनाएं शून्य हो जाएं, तब अंतत: हार मानकर शरीर को ही झुकना पड़ता है और वह करना पड़ता है जिसके लिए वह मानसिक रूप से कभी तैयार नहीं हो. कुछ इसी तरह गंगूबाई वेश्यावृत्ति के इस पेशे में आईं.

फिल्म की शुरुआती भंसाली ने इसी बिंदु से की है, पर जैसा कि अपने साक्षात्कार में उन्होंने यह कहा है कि फिल्म और पटकथा की प्रेरणा ज़ैदी की किताब से ली है, पर फिल्म पूरी समग्रता में किताब को ग्रहण नहीं करती. अपनी किताब में ज़ैदी ने गंगूबाई के जीवन को काफी विस्तार से बताया है और कई महत्वपूर्ण घटनाओं को समाहित किया है, जो गंगूबाई काठियावाड़ी की ज़िंदगी और उनके व्यक्तित्व की कई परतों को खोलता है.

इस दृष्टि से भंसाली की फिल्म में गंगूबाई के जीवन की एक सरल, एकरैखीय विवरण को प्लॉट का हिस्सा बनाया है. निर्देशक ने कई पहलुओं को फिल्म में एकदम ही छोड़ दिया है, और इससे फिल्म में तमाम खूबियों के बावजूद एक कमी यह रह जाती है कि गंगूबाई के जीवन और व्यक्तित्व की बाराकियों (nuance) को फिल्म नहीं दिखलाती.

फिल्म में बेहतरीन अभिनय और छायांकन की वजह से एक लार्जर देन लाइफ व्यक्तित्व तो देखने को मिलता है, पर इस मुकाम को हासिल करने में हुए उसके संघर्ष या उसके मानसिक गहराई की थाह दर्शकों को नहीं मिल पाती. निर्देशक ने संभवतः अभिनय की दृष्टि या व्यावसायिकता की मांग के कारण किताब की मूल कथावस्तु को परिवर्तित तो नहीं पर, आधा-अधूरा ही ग्रहण किया है.

हालांकि, फिल्म को इस बात का श्रेय ज़रूर दिया जाना चाहिए कि वह गंगूबाई को हमारी कल्पना में एक आकार, एक प्रकार की मूर्तता दे देता है. किसी व्यक्ति के बारे में सिर्फ़ पढ़ना, हमारे मनो-मस्तिष्क पर इतना प्रभाव नहीं डालता, जितना कि एक दृश्य माध्यम में देखने पर होता है और अगर अच्छे अभिनेता उस किरदार को निभा रहें हों तो यह सहज हो जाता है कि हम किरदार के माध्यम से जो शख्सियत है उसे देखने लगते हैं.

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भारत में वेश्यावृत्ति ग़ैर क़ानूनी नहीं है, और भारतीय क़ानून सेक्स-वर्क को नियंत्रित नहीं करता. हालांकि कोठों (Brothels) की व्यवस्था और दलालों के धंधों को अवैध माना गया है. कहने का अर्थ यह कि अनैतिक रूप से देह व्यापार के लिए स्त्रियों और बच्चों का अपहरण करना ग़ैरक़ानूनी  है.

महिला और बाल कल्याण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2007 में भारत में लगभग 30 लाख स्त्रियां सेक्स-वर्क से जुड़ी हुई थीं. पर यूएनएड्स ( UNAIDS) [The Joint United Nations Programme on HIV and AIDS] के 2016-2018 के सर्वे में भारत में कुल 6,57000 स्त्रियं सेक्स-वर्क से जुड़ी हुई हैं.

महिलाओं के लिए काम करने वाले एनजीओ संलाप द्वारा किए गए शोध, महिलाओं के सेक्स-वर्क में शामिल होने के पीछे मुख्य कारण प्रायः उनके लिए अन्य रोज़गार और संसाधनों की कमी को मानते हैं. अधिकांश स्त्रियां इस पेशे को अपनी मर्ज़ी से नहीं चुनती, बल्कि घरेलू आवश्यकता के बोझ तले या फिर अक्सर शादी टूटने के बाद या अपने परिवारों द्वारा त्याग दिए जाने के कारण चुनती हैं.

प्रायः: इन सब महिलाओं को सेक्स वर्कर या सेक्स वर्क के एक समान खांके में परिभाषित कर दिया जाता है जो कि तकनीकी दृष्टि से सही नहीं है. जैसा कि रोहिनी साहनी, ‘प्रॉस्टिट्यूशन एंड बियोंड’ (Prostitution and Beyond) किताब की भूमिका में लिखती हैं:

‘The use of the term ‘sex work’ is a linguistic homogenization, that does not do justice to the individuality of different practices of prostitution that have come to survive in India today.’

यानी ‘सेक्स वर्क’ शब्द का इस्तेमाल एक भाषाई समरूपीकरण है, जो आज भारत में आजीविका के लिए प्रचलन में आने वाली वेश्यावृत्ति की विभिन्न तरीकों के साथ न्याय नहीं करता.

गंगूबाई पर बात करते हुए जो मुख्य मुद्दा उभरकर आता है वह है- वेश्यावृत्ति का- जो हमारी मानवीय संस्कृति, या सभ्यता का वह सबसे पुराना व्यवसाय है जो कभी देवदासी परंपरा के नाम पर मान्यता प्राप्त करता रहा तो, कभी मध्यकाल में नगरवधुओं और राजनर्तकी के रूप में ख्याति प्राप्त करता रहा, तो फिर ब्रिटिश शासन के बाद एक संस्थागत रूप में नॉचगर्ल्स (nautchgirls) और तवायफ़ों के रूप में स्वयं को परिवर्तित करता रहा.

जैसा कि कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण है और अपने समय के समाज का प्रतिनिधित्व करता है, वेश्याओं, वारांगनाओं की उपस्थिति हर युग में रही है और साहित्य ने इसे पूरा प्रतिनिधित्व दिया है. चाहे वह मृच्छकटिकम् (शूद्रक) में उज्जयिनी की प्रसिद्ध गणिका वसंतसेना हो या, आचार्य चतुरसेन शास्त्री की रचना ‘वैशाली की नगरवधू’ की आम्रपाली, या यशपाल की प्रसिद्ध उपन्यास दिव्या की नायिका दिव्या जो अंततः वेश्या का जीवन चुनती है, साहित्य में इस समुदाय की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि वेश्यावृत्ति संस्थागत रूप से भारतीय समाज का एक हिस्सा रहा है.

यह पूरा साहित्य आधुनिक भारत की पृष्ठभूमि में नहीं, बल्कि प्राचीन और मध्य काल के भारतीय समाज की वास्तविकता को दिखलाता है, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि आज के आधुनिक रेड लाइट एरिया भारतीय संस्कृति की अविरल धारा के साथ, काल के प्रवाह में ही अपना स्वरूप बदलते-बदलते यहां तक पहुंचे हैं.

उमराव जान फिल्म का दृश्य. (फोटो साभार: सिनेस्तान डॉट कॉम)

मुग़लों तक इस व्यवसाय में या इस पूरी वृत्ति में फिर भी एक सम्मान और विशिष्टता की मुहर लगी हुई थी, जहां उन्हें नगरवधुओं या राजनर्तकी का दर्जा मिला करता था. इन तवायफ़ों को तहज़ीब और अदब का मेयार समझा जाता था. फोटो जर्नलिस्ट और लेखक मयंक ऑस्टिन सूफ़ी अपनी किताब में लिखते हैं,

‘People from high castes and rich families sent their sons to tawayifs or courtesans so that they could learn etiquette’. (पेज:58, नोबडी कैन लव यू मोर- लाइफ इन डेल्हीज़ रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट)

(उच्च जातियों और धनाढ्य परिवारों के लोग अपने बेटों को तवायफ़ों के पास भेजते थे, ताकि वे तहज़ीब और शऊर सीख सकें. )

इस व्यवसाय को सिर्फ़ देह के व्यापार तक सीमित करने और सुनियोजित करने के पीछे असल हाथ ब्रिटिश शासन का रहा, जिन्होंने अपनी सेना के मनोरंजन और तुष्टि के लिए इन पारंपरिक नर्तकियों को ज़िस्मफ़रोशी के लिए उपयोग में लाना शुरू किया. ब्रिटिश सैनिकों के लिए छावनी के आस-पास के गांवों से स्त्रियों को मंगवाई जातीं और इस प्रकार आधुनिक काल में तवायफ़ या राजनर्तकी, जिसे कला और संस्कृति का एक प्रमुख अंग माना जाता था, उसे सिर्फ़ दैहिक तुष्टिकरण के यंत्र के रूप में तब्दील कर दिया गया.

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इस आलोक में गंगूबाई काठियावाड़ी पर बात करें तो यह बात वाक़ई में हतप्रभ करती है कि एक आम वेश्या किस प्रकार से अपने जीवन काल में ऐसा ऊंचा मुक़ाम हासिल कर लेती है? गंगूबाई को जो स्थान, इस पूरे समुदाय ने दिया है, वह अपने आप में अभूतूर्व है. रेड लाइट एरिया में जो ज़िंदगियां हैं, उनमें, उनके घरों में भगवान के साथ-साथ दीवार पर गंगूबाई की भी तस्वीर लगी होती है. वह व्यक्ति से लेजेंड बनने की प्रक्रिया अपने जीवन काल में ही पूरा कर गईं, जो विरल है.

गंगूबाई संभवतः एक मात्र ऐसी वेश्या रही जिन्होंने वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की मांग सबसे पहले की, और वह भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से. हालांकि, प्रधानमंत्री से मिलने की उनकी कहानी कितनी वास्तविकता से युक्त है, इस पर सवाल उठाए जा सकते हैं, क्योंकि जैसा कि ज़ैदी अपनी किताब में लिखते हैं

गंगूबाई से जुड़ी कई घटनाओं को कहीं लिखा नहीं गया है और न ही इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि करने के लिए कोई मौजूदा प्रमाण भी हैं. इन घटनाओं की विश्वसनीयता केवल मौखिक साक्ष्य से ही तौली जा सकती है, इन घटनाओं के साक्ष्य की पुष्टि सिर्फ लोगों की ज़बानी ही समझी जा सकती है, जो पिछले चार दशकों से इस पूरे समुदाय में पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहानियों की भांति सुनाई जाती रहीं हैं.

पर यह दिखलाता है कि गंगूबाई इस समाज को एक अगुआ या एक नेता देने की कोशिश कर रही थीं, वह नेता जो उन स्त्रियों के हक़ की बात करे जिन्हें बस सामान की तरह उपयोग में लाया जाता है, जो हर रात अनजान लोगों को अपना शरीर बेचने के लिए विवश हैं.

वह उनके लिए, उनकी संतानों के लिए भी मानवीय अधिकारों की बात करती हैं क्योंकि इन स्त्रियों का जीवन तो व्यतीत हो ही जाता है, असल समस्या इनके बच्चों की है, जिनका भविष्य इन कुख्यात मुहल्लों में एकदम अंधकारमय है.

साल 2004 में डॉक्यूमेंट्री फ़ोटोग्राफ़र ज़ाना ब्रिसकी की डॉक्यूमेंट्री बॉर्न इनटू ब्रॉथेल्स (Born Into Brothels), जिसे उस साल के अकेडेमी  अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था, वेश्याओं के संदर्भ में इसी अहम मुद्दे को सामने लाता है.

यह कलकत्ता के सोनागाछी रेड लाइट एरिया पर आधारित है, जिसमें इन कोठों पर जन्म लिए गए बच्चों के त्रासद वर्तमान और अंधकारमय भविष्य पर बात की गई है. क्या ये बच्चे भी अपने माता-पिता की नियति को जीने के लिए अभिशप्त हैं? क्या इन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, चिंतामुक्त बचपन का अधिकार नहीं है?

क्योंकि कोठों पर काम करने वाली स्त्रियों की आमदनी इतनी नहीं होती कि प्राइवेट स्कूलों में इनका दाख़िला करवाया जा सके और अगर पैसे का बंदोबस्त कर भी लिया जाए तो ये तथाकथित कुलीन वर्गों के विद्यालय इन बच्चों को दाख़िला ही नहीं देते.

गंगूबाई काठियावाड़ी फिल्म में भी भंसाली ने इस गंभीर मुद्दे को दिखाया है. जब गंगूबाई अपने कोठे के बच्चों का दाख़िला पड़ोस के एक मिशनरी स्कूल में करवाने जाती है, तो दाख़िले के वक्त स्कूल के फादर यह पूछते हैं कि मां के नाम पर तो गंगूबाई का नाम चल जाएगा पर इन बच्चों के पिता के नाम में  क्या डाला जाएगा?

गंगूबाई काठियावाड़ी फिल्म के दृश्य में आलिया भट्ट. (फोटो साभार: स्क्रीनग्रैब/यूट्यूब/Pen Movies)

ऐसे में गंगूबाई का स्कूल के फ़ादर से किया गया सवाल, वस्तुतः इस पूरे समाज के लिए विचारणीय बन जाता है कि- क्या बच्चे की मां का नाम काफ़ी नहीं होता?

बहरहाल, इन बच्चों को दाख़िला तो दे दिया जाता है पर अगले ही दिन नैतिक दलीलों पर इन्हें स्कूल परिसर से निकाल दिया जाता है और इस प्रकार सबको शिक्षा और विकास के समान अवसर मिलने के ‘कल्याणकारी भारतीय राज्य’ के स्वप्न की धज्जियां उड़ जाती हैं.

किसी अल्पसंख्यक या अधिकारहीन- पददलित समुदाय के बारे में बात करने और उनमें अधिकार-चेतना जागृत करने के लिए बाह्य तत्वों और कारकों का महत्व निश्चित ही होता है, पर अपने अधिकारों के प्रति चेतना इसी समुदाय में अगर पाई जाए तो वह ज़्यादा असर रखती है.

गंगूबाई के संदर्भ में इस बात के महत्व को निश्चय ही स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि कमाठीपुरा की गलियों में वेश्याओं के अधिकार को मुखर रूप से उठाने में सिर्फ़ व्यक्तित्व की प्रखरता नहीं बल्कि इन अधिकारहीन वेश्याओं के लिए एक मां की-सी संवेदनशीलता आवश्यक थी.

वेश्याओं के प्रति गंगूबाई के प्रेम और ममत्व को प्रायः इस समुदाय की सभी वेश्याओं ने एक सिरे से स्वीकार किया है. प्रसिद्ध पत्रकार आबिद सुरती की किताब जो पहले गुजराती में 1979 में ‘वासकसज्जा’ और फिर साल 2021 में ‘केजेस: लव एंड वैंजेयेंस इन अ रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट’ (Cages: Love and Vengeance in a Red-Light District) के रूप में प्रकाशित हुई, मुंबई के कमाठीपुरा की गलियों की कहानी बताते हैं.

वेश्या कुमुद के माध्यम से सुरती इन कुख्यात गलियों की कहानी को एक प्रत्यक्षदर्शी की तरह देखते हैं. स्वयं सुरती, कुमुद से उसके जीवन के बाद के वर्षों में मिलते हैं, जब वह फिल्मों की पटकथा लिखने के अपने संघर्ष में रत थे. कुमुद के माध्यम से गंगूबाई के जीवन पर एक समकालीन की दृष्टि से देखा जाता है और किताब में ऐसे विवरण भरे पड़े हैं, जहां गंगूबाई के व्यक्तित्व की बात गाहे-बगाहे की जाती है.

कुमुद के ही शब्दों में:

‘हर दीवाली पर गंगूबाई 200 साड़ियां मंगवाया करती थीं. इनमें से 150 साड़ियां अपने कोठे की लड़कियों के लिए और बाकी उन सभी वेश्याओं के लिए जिन्हें वह जानती थीं, पर जो अब किसी और जगह काम करने चली गई थीं. शायद ही वह किसी को भूलती थीं. वह मां से बढ़कर थीं. कमाठीपुरा की इन 14 गलियों में जहां भगवान नहीं थे, उनके लिए गंगूबाई वह दैवीय शक्ति थी जो यहां की जिंदगियों और तक़दीरों को बनाती थी.’

गंगूबाई की इसी छवि ने उन्हें कमाठीपुरा में इतना सशक्त बना दिया था कि हर राजनीतिक पार्टी के प्रतिनिधियों को भी उनके सहयोग की आवश्यकता पड़ती थी, क्योंकि एक तरीक़े से वह इन सारे इलाक़ों के वोट को नियंत्रित करती थीं जो किसी भी उमीदवार के जीतने में एक महत्वपूर्ण कारक बनता था.

इस इलाक़े में अंडरवर्ल्ड माफिया के विरोधी गुटों में भी गंगूबाई की लोकप्रियता समान रूप से थी. इन गैंग मफ़ियाओं की अपनी हुकूमत इन इलाक़ों में चलती थी, पर शक्ति का संतुलन गंगूबाई के हाथों में रहता था. सुरती लिखते हैं:

‘Even though Rehmat Khan Lala and Babu Raw were the two mafia dons who fought fierce battles over Kamathipura, it was Gangu Bai who reigned supreme over its fourteen streets……if she ever visited the police station, senior officers would rise from their seats as if the home secretary had arrived.’ (पेज-57, केजेस: लव एंड वैंजेयेंस इन अ रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट)

भले ही माफिया डॉन रहमत खान लाला और बाबू राव ने कमाठीपुरा को लेकर बड़ी लड़ाइयां लड़ी थीं, लेकिन यह गंगूबाई ही थीं जिन्होंने इसकी चौदह सड़कों पर राज किया… अगर कभी वो थाने पहुंच जाती थीं, बड़े अधिकारी अपनी सीट छोड़कर यूं खड़े हो जाते थे मानो गृह सचिव आए हों.

किसी भी समुदाय को पास से देखने और समझने के लिए उनके बीच रहना अनिवार्य है. और यह प्रविधि नृविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) में सभी समुदायों को अध्यययन के लिए उपयोग में लाई जाती है. संभवतः यही वजह है कि रेड लाइट बस्तियों, इनमें रहने वाली वेश्याओं पर बात करने के लिए उनके बीच जाना पड़ता है.

जिस प्रकार से आबिद सुरती कुमुद से मिलकर ही उसकी कहानी लिख पाते हैं, ठीक उसी प्रकार गंगूबाई की कहानी में भी पत्रकार फ़ैज़ी कमाठीपुरा जाकर उनके बीच रहकर ही उनके अधिकारों की मांग को जनता तक पहुंचाने का काम करते हैं. मयंक ऑस्टिन सूफ़ी दिल्ली के जीबी रोड में रहने वाली वेश्याओं का अध्ययन भी उनके यहां अक्सर जाने के बाद ही कर पाते हैं. भंसाली ने भी शायद इसीलिए फिल्म में फ़ैज़ी के रूप में जिस पत्रकार के चरित्र को प्रयोग किया है, वह फिल्म को एक पत्रकारीय प्रामाणिकता देने का काम करता है.

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गंगूबाई फिल्म एक सिनेमेटिक अनुभव की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, पर इस फिल्म के योगदान को जिस चीज़ के लिए माना जाना चाहिए वह है- वेश्याओं के छुपे हुए संसार को अंधेरे गर्तों से निकाल कर सतह पर लाना.

ऐसा नहीं है कि उनके इस त्रासद संसार को पहले कभी सिनेमा का आधार नहीं बनाया गया. वेश्याएं पहले भी पाकीज़ा, उमराव जान जैसी व्यावसायिक और काली सलवार, बाज़ार जैसी कला फिल्मों में पर्दे पर चित्रित होती रही हैं.

पाकीज़ा फिल्म में मीना कुमारी (फोटो साभार: IMDB)

पाकीज़ा और उमराव जान में कथा का आधार कल्पना होने के बावजूद उनके संसार को एक मध्ययुगीन संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है, जहां ये तवायफ़ें अपने फ़न के लिए ज़्यादा मशहूर हुआ करती थीं. इन फिल्मों में वेश्याओं की उस पिछली पीढ़ी का रेप्रेज़ेंटेशन था, जो एक सामंतवादी व्यवस्था का अनिवार्य अंग थीं.

इसलिए यह मनोरंजन सिर्फ़ उच्च वर्गों के पास था और इसलिए इन तवायफ़ों या वेश्याओं में भी एक ख़ास क़िस्म की एक्सक्लूसिविटी देखने को मिलती है. अगर फिल्मों के ही संदर्भ में इसे देखा जाए, तो पाकीज़ा की मीना कुमारी और उमराव जान की रेखा दोनों ही सामंती धनाढ्य नवाबों के सामने ही नृत्य-संगीत प्रस्तुत करती हैं और इन्हीं में से किसी एक की संगिनी बनती हैं.

इन फिल्मों में प्रतिनिधित्व एक विशिष्ट वर्ग का था. हालांकि इन स्त्रियों की संवेदनाएं विशिष्ट नहीं बल्कि सार्वभौम थीं. उमराव, जिसे बचपन में ही परिवारों की आपसी दुश्मनी के कारण अगवा कर के कोठे पर बेच दिया जाता है, ताउम्र अपने बचपन के उस घर के लिए सिसकती रहती है. अंत में जिस मार्मिकता से वह अपनी बूढ़ी मां से मिलती है, वह यह दिखाता है कि किस प्रकार मानवीय संबंधों की प्रगाढ़ता कभी भी ख़त्म नहीं होती.

इसी प्रकार पाकीज़ा में भी मीना कुमारी, जो अपनी वेश्या मां के मरने के बाद वापस से कोठे पर ही एक तवायफ़ की ज़िंदगी बसर करने के लिए अभिशप्त है, राजकुमार के सच्चे प्रेम को सिर्फ़ इसलिए ठुकराती है कि वह अंततः एक तवायफ़ है. इन फिल्मों ने भी तवायफ़ों और वेश्याओं की समस्या को दिखलाया है, हालांकि उनमें एक मध्यवादी भावुकता और रोमांटिकता दिखती है.

कला फिल्मों ने इस भावुकता और रूमानियत से परे वेश्याओं की दुनिया को दिखाया. सआदत हसन मंटो की कहानी काली सलवार पर आधारित फिल्म सुल्ताना के माध्यम से इस दुनिया के नग्न यथार्थ को सामने लाती है, तो वहीं बाज़ार में सागर सरहदी नज़मा के माध्यम से स्त्रियों द्वारा किए गए समझौतों और पुरुष वर्चस्व के सामने एक खिलौना बनकर रह जाने की नियति को दिखलाते हैं.

इन सब फिल्मों में कथा का आधार कोई वास्तविक व्यक्ति नहीं है, हालांकि परिस्थितियां यथार्थपरक हैं, अनुभव सच्चे हैं. गंगूबाई काठियावाड़ी इस दृष्टिकोण से एक नई शुरुआत लगती है, जहां वास्तविक रूप से एक वेश्या की ज़िंदगी को पर्दे पर उतारा गया है. हां, इस चित्रण में भंसाली सभी आयामों को नहीं दिखलाते, और फिल्म के सतही लगने का ख़तरा होता है, पर कई ज़रूरी सवालों के साथ वह अपने दर्शकों को छोड़ देते हैं.

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वेश्यावृत्ति आज भारत में कानूनन अवैध है, इसे लेकर जो कानून हैं वह यह निर्देशित करता है कि किसी भी तरह की सार्वजनिक जगहों, या आवासीय मोहल्लों में वेश्यावृत्ति के पेशे को खुले रूप से नहीं कर सकते. इस प्रकार से देखा जाए, तो इस तथाकथित सामाजिक बुराई का पूरी तरह से उन्मूलन किया जाए और इस पेशे से जुड़ी स्त्रियों और पुरुषों को आजीविका के दूसरे साधन या विकास के अन्य अवसर मुहैया कराए जाएं, ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया है, बल्कि इसके जगह इसे ढक-छुपकर किए जाने की एक वैकल्पिक व्यवस्था कर दी गई.

और यही वजह है कि सेक्स-वर्कर्स उन सारे इलाकों के, उन कोने-खुदरों में जाकर स्वयं को संगठित कर लेते हैं, और अपने आप को एक घेटो (Ghettoised) समुदाय के रूप में बरकरार रखते हैं. मुंबई में कमाठीपुरा, कलकत्ता के सोनागाछी या दिल्ली का जीबी रोड आज भी अपने इस विशिष्ट पेशे से जुड़े समुदायों की उपस्थिति के लिए जाना जाता है.

महिलाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर पहचान दिलाने की कई कोशिशें की जा रही है, उनके लिए विशिष्ट दिन नियत किए गए हैं, पर बहुत ज़रूरी है कि हम समाज की मुख्यधारा, विकास के प्रवाह में पीछे छूट गई इन कामगार महिलाओं की इस बड़ी आबादी का सच स्वीकार करते हुए इन्हें वह मानवीय गरिमा और सम्मान देने के प्रयास करें जो इन्हें तो सुरक्षित करे ही, साथ ही इनकी आने वाली पीढ़ियों को भी भविष्य के लिए आशावान बना सके.

(फोटोः रॉयटर्स)

क्योंकि फिल्म में गंगूबाई काठियावाड़ी जिस तरह से जवाहर लाल नेहरू से पूछती हैं, साहिर लुधियानवी के लिखे वो सवाल आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक है:

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत , जुलेखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं?
कहां है? कहां है? कहां है?

(अदिति भारद्वाज दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)