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शिक्षा के भगवाकरण में ग़लत क्या है: उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू

उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई शांति एवं सुलह संस्थान का उद्घाटन करने के बाद अपने संबोधन में शिक्षा की मैकाले व्यवस्था को पूरी तरह से ख़ारिज करने का आह्वान करते हुए कहा कि शिक्षा के भगवाकरण को लेकर इतना हंगामा क्यों है. उन्होंने भारतीयों से औपनिवेशिक मानसिकता को त्यागने और भारतीय पहचान को लेकर गौरवान्वित होने को कहा है.

वेंकैया नायडू. (फोटो: पीटीआई)

हरिद्वारः देश के उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने शिक्षा की मैकाले व्यवस्था को पूरी तरह से खारिज करने का आह्वान करते हुए कहा कि शिक्षा के भगवाकरण को लेकर इतना हंगामा क्यों है?

उपराष्ट्रपति ने हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई शांति एवं सुलह संस्थान का उद्घाटन करने के बाद अपने संबोधन में कहा कि भारतीयों को औपनिवेशिक मानसिकता त्याग देनी चाहिए और अपनी भारतीय पहचान पर गर्व करना सीखना चाहिए.

नायडू ने कहा कि शिक्षा प्रणाली का भारतीयकरण भारत की नई शिक्षा नीति का केंद्र है, जो मातृ भाषाओं को बढ़ावा देने पर बहुत जोर देती है.

उन्होंने पूछा, ‘हम पर शिक्षा का भगवाकरण करने का आरोप है, लेकिन भगवा में गलत क्या है?’

स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में मैकाले की शिक्षा प्रणाली को खारिज करने का आह्वान करते हुए नायडू ने कहा कि इसने देश में शिक्षा के माध्यम के रूप में एक विदेशी भाषा थोप दी और शिक्षा को अभिजात वर्ग तक सीमित कर दिया.

नायडू ने भारतीयों से औपनिवेशिक मानसिकता को त्यागने और भारतीय पहचान को लेकर गौरवान्वित होने को कहा.

नायडू ने कहा, ‘सदियों के औपनिवेशिक शासन ने हमें खुद को एक निम्न जाति के रूप में देखना सिखाया और हमें अपनी संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान का तिरस्कार करना सिखाया गया. इसने एक राष्ट्र के रूप में हमारे विकास को धीमा कर दिया, क्योंकि शिक्षा के माध्यम के रूप में एक विदेशी भाषा को लागू करने से शिक्षा सीमित हो गई. समाज का एक छोटा वर्ग शिक्षा के अधिकार से एक बड़ी आबादी को वंचित कर रहा है.’

बता दें कि थॉमस बबिंगटन मैकाले एक ब्रिटिश इतिहासकार थे, जिन्होंने भारत में शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की शुरुआत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘हमें अपनी विरासत, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों पर गर्व महसूस करना चाहिए. हमें अपने बच्चों को अपनी भारतीय पहचान पर गर्व करना सिखाना चाहिए और अपने शास्त्रों को जानने के लिए संस्कृत सीखनी चाहिए, जो ज्ञान का खजाना है.’

युवाओं को अपनी मातृभाषा का प्रचार करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूं जब सभी गजट अधिसूचनाएं संबंधित राज्य की मातृभाषा में जारी की जाएंगी. आपकी मातृभाषा आपकी दृष्टि की तरह है, जबकि एक विदेशी भाषा का आपका ज्ञान, आपके चश्मे की तरह.’

उन्होंने कहा, ‘भारत में आने वाले विदेशी गणमान्य अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होने के बावजूद अपनी मातृभाषा में बोलते हैं क्योंकि उन्हें अपनी भाषा पर गर्व है.’

नायडू ने कहा, ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का हमारे प्राचीन ग्रंथों में जो निहित दर्शन है, वही आज भी भारत की विदेश नीति के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत है.

उन्होंने कहा, ‘भारत के लगभग सभी दक्षिण एशियाई देशों के साथ मजबूत संबंध रहे हैं, जिनकी जड़ें समान हैं. सिंधु घाटी सभ्यता अफगानिस्तान से गंगा के मैदानों तक फैली हुई है. किसी भी देश पर पहले हमला न करने की हमारी नीति का पूरी दुनिया में सम्मान किया जाता है. यह सम्राट अशोक जैसे महान योद्धाओं का देश है, जिन्होंने हिंसा पर अहिंसा और शांति को चुना.’

उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘एक समय था जब दुनियाभर से लोग नालंदा और तक्षशिला के प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए आते थे, लेकिन अपनी समृद्धि के चरम पर भी भारत ने कभी किसी देश पर हमला करने के बारे में नहीं सोचा, क्योंकि हम दृढ़ता से मानते हैं कि दुनिया को शांति की जरूरत है.’

उन्होंने कहा कि शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को प्रकृति के करीबी संपर्क में रहना भी सिखाया जाना चाहिए, क्योंकि प्रकृति एक अच्छी शिक्षक है.

नायडू ने कहा, ‘आपने जरूर ध्यान दिया होगा कि जो लोग प्रकृति के करीब रहते हैं, उन्हें कोरोना के दौरान कम तकलीफें हुईं. बेहतर भविष्य के लिए हमारा सिद्धांत प्रकृति और संस्कृति का मेल होना चाहिए.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)