दुनिया

रूस-यूक्रेन युद्ध पर दस सिद्धांत और भारत के लिए चुनौतियां

अफ़सोस की बात है कि भारत के पास ऐसी समस्या के समाधान के लिए रचनात्मक प्रस्ताव देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, जिस पर वह स्पष्ट रुख़ लेने को भी अनिच्छुक है.

कीव के इरपिन में रूसी हमले में क्षतिग्रस्त रिहायशी इमारतें. (फोटो: रॉयटर्स)

अमेरिका, चीन, इजरायल और रूस  (और पूर्ववर्ती सोवियत संघ) ने अतीत में कई बार दूसरे देशों पर हमला किया है, लेकिन रूस द्वारा यूक्रेन पर जारी मौजूदा हमले ने विश्व की बड़ी शक्तियों के बीच जैसे गंभीर टकराव को जन्म  दिया है, वह क्यूबा मिसाइस संकट के बाद से अब तक नहीं देखा गया था.

एजी नूरानी लिखते हैं, ‘इतिहास हमेशा प्रासंगिक रहता है, लेकिन निश्चित तौर पर इतिहास इस गलत को जायज नहीं ठहरा सकता.’ दुखद तौर पर अतीत के पापों और गलतियों के इस इतिहास के बोझ से वाम, दक्षिण और मध्यमार्गी हर धड़े के इतिहासकार दबे हैं, जो कई को हो रही घटनाओं को स्पष्ट तरीके से समझने से रोकता है. यहां इन दस बिंदुओं से इस युद्ध और इसके परिणामों को समझा जा सकता है.

  1. कानून स्पष्ट है…

रूस पर यूक्रेन का हमला गैरकानूनी है. यह संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का उल्लंघन है. अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से यह कार्रवाई आक्रमण की श्रेणी में आएगी. यह रूस द्वारा यूक्रेन को 1994 के बुडापेस्ट मेमोरेंडम के हिस्से के तौर पर दिए आश्वासनों का भी अतिक्रमण करता है, जिसके तहत रूस ने कीव द्वारा परमाणु हथियारों को छोड़ने के एवज में यूक्रेन की संप्रभुता और सीमाओं का सम्मान करने का वादा किया था.

यहां तक कि मॉस्को द्वारा रूसीभाषी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने के शुरुआती (और संदेहास्पद) तर्क के हिसाब से भी देखें, जिस प्रकार का बल-प्रयोग किया जा रहा है, वह आवश्यकता और आनुपातिकता के सिद्धांतों के खिलाफ है. इसलिए रूस को तत्काल सभी आक्रामक ऑपरेशनों को बंद करना चाहिए.

  1. उकसावा भी प्रकट है…

यूक्रेन पर रूसी हमला साफतौर पर अमेरिका द्वारा यूक्रेन को रूस के खिलाफ अपने और नाटो की सैन्य छावनी में बदलने की कोशिश की प्रतिक्रिया है- हालांकि यह गैर आनुपातिक और विचारहीन है. हालांकि ओबामा, ट्रंप और बाइडन प्रशासन की कार्यशैली में बारीक अंतर रहा है, लेकिन अमेरिका ने इस मकसद को आगे बढ़ाने के लिए मिली-जुली रणनीतियों का इस्तेमाल किया है.

इनमें यूक्रेन के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप, नाटो में यूक्रेन की सदस्यता के विचार को प्रोत्साहन देना और इन सबके बीच कार्यकारी अंतरिम व्यवस्था के तौर पर (चूंकि सदस्यता संभव नहीं है) यूक्रेनी सेना को हथियार और उन्नत प्रशिक्षण मुहैया कराना शामिल है.

अगर आज रूस के लिए यूक्रेन का महत्व वही है, जो 1962 के मिसाइल संकट के दौरान अमेरिका के लिए क्यूबा का था (जब क्यूबा ने रूसी परमाणु हथियारों को अपनी जमीन पर तैनात करने की इजाजत दी थी) तो इसके द्वारा बल प्रयोग- हालांकि यह निस्संदेह निंदनीय है- से हमें हैरानी नहीं होनी चाहिए.

पुतिन का ‘स्पेशल मिलिट्री ऑपरेशन’ उसी तरह से एक सनकी नेता की करतूत है, जैसे कि केनेडी का क्यूबाई बंदरगाहों को अवैध तरीके से क्वारंटीन करना था.

  1. इस युद्ध का कहीं से भी सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है

हालांकि कई महत्वपूर्ण सिद्धांत यहां दांव पर लगे हुए हैं- यूक्रेन की संप्रभुता, युद्धों को शासित करनेवाले कानून, जिनमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी कानून भी शामिल हैं, देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की जिम्मेदारी, बहु-सांस्कृतिक या बहु-धार्मिक राज्यों में अल्पसंख्यकों के अधिकार-रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में से कोई भी इन सिद्धांतों की सार्वभौमिकता को लेकर प्रतिबद्ध नहीं हैं.

रूस और अमेरिका, दोनों ने ही, यूक्रेन के संघर्ष को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की हैं. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ‘अ-नाजीकरण’ और ‘असैन्यीकरण’ की बात करते हैं. जबकि अमेरिका का कहना है कि इसका पक्ष राष्ट्रीय संप्रभुता की अनुल्लंघनीयता और नियम आधारित वैश्विक-प्रणाली की हिफाजत के महत्व में इसके यकीन से संचालित है.

लेकिन ये सिद्धांत विदेशी कब्जे और हमले की दूसरी परिस्थितियों पर कभी लागू नहीं किए जाते हैं, जहां मानवाधिकारों का हनन और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी कानूनों का उल्लंघन हो रहा है.

मिसाल के लिए, मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में कब्जे वाले यूक्रेन में रूसी कार्रवाई के खिलाफ बोलते हुए अमेरिकी गृह मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) एंथनी ब्लिंकेन वास्तव में सीमा लांघते हुए कब्जे वाले फिलीस्तीन में इजरायली कार्रवाई की उसी तरह से समीक्षा करने के लिए- जिस तरह की समीक्षा की मांग अमेरिका अभी रूस के लिए कर रहा है- संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की आलोचना की और उस पर ‘इजरायल के खिलाफ पूर्वाग्रह’ रखने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ‘जांच आयोग और स्टैंडिंग एजेंडा आइटम– ये दोनों कब्जे वाले फिलीस्तीनी क्षेत्रों में अंतररराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के उल्लंघन से संबंधित हैं- परिषद की विश्वसनीयता पर एक धब्बा हैं और हम पूरी दृढ़ता से इसका विरोध करते हैं. ऐसा कहते हुए उनमें अपने खुले दोहरे मापदंडों को लेकर थोड़ी सी भी शर्मिंदगी नहीं थी.

 4. इसके पीछे है महाशक्तियों की आपसी प्रतिस्पर्धा, हम 1914 के मूल्यहीन विश्व में पहुंच गए हैं

वास्तव में, यूक्रेन युद्ध वर्चस्व की महात्वाकांक्षा से भरे दो महाशक्तियों के बीच संघर्ष का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम है- एक बदले की भावना से भरा हुआ-रूस- है और उसका ध्यान सोवियत संघ से बाहर निकलकर बने गणराज्यों पर केंद्रित है और दूसरे (अमेरिका) का ध्यान वैश्विक स्तर पर अपने शक्ति प्रक्षेपण (अपनी सैन्य उपस्थिति के फैलाव) पर केंद्रित है.

यह संघर्ष उस भू-सामरिक प्रणाली की पृष्ठभूमि में हो रहा है, जिसमें एक तरफ चीन का उभार हो रहा है- और तेजी से हो रहा है- और दूसरी तरफ अमेरिका का वर्चस्व कम हो रहा है, हालांकि इसकी गति धीमी है.

एक कमजोर पड़ रही वर्चस्ववादी शक्ति के तौर पर भी अमेरिका के पास आज भी उसे पसंद न आने वाली व्यवस्था को तबाह करने की क्षमता है; लेकिन जैसा कि अफगानिस्तान से हड़बड़ी में सैन्य वापसी और लीबिया और इराक में बनी हुई असुरक्षा से पता चलता है, इसमें नई और स्थायी व्यवस्थाओं को कायम करने की क्षमता नहीं है.

अपने उभार के बावजूद चीन में भी व्यवस्था लागू करने की क्षमता की कमी है. यही हाल रूस का है, हालांकि इसकी सैन्य शक्ति जबरदस्त है. तीनों वर्चस्ववादी शक्तियां इस हकीकत से टकराने के लिए अपनी रणनीतियों में फेरबदल करने की प्रक्रिया में हैं, लेकिन उनकी कोशिशों ने एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में असंतुलन लाने का काम किया है.

2016 के चुनावों में हिलेरी क्लिंटन ने रूस और सीरिया और जॉर्जिया के खिलाफ संघर्ष की नीति का समर्थन किया था, लेकिन वे डोनाल्ड ट्रंप से हार गईं, जिनके लिए चीन के उभार को रोकना ज्यादा बड़ी प्राथमिकता थी.

ट्रंप के कार्यकाल के दौरान अमेरिका और रूस के बीच सुलह की स्थिति नहीं बन पाई, जिसका एक कारण ‘रशियागेट’ का मसला भी था. लेकिन, ट्रंप से बाइडन को सत्ता हस्तांतरण के बाद अमेरिका द्वारा चीन और रूस दोनों के ही खिलाफ आक्रामक रणनीति अपनाने की कोशिश दिखाई दे रही है.

इस बीच ईरान के साथ तनाव को कम करने और अफगानिस्तान में अपने नुकसान को सीमित करने की कोशिश की जा रही है. ज्यादा संभावना इस बात की है कि यह शक्ति प्रक्षेपण अमेरिकी शक्ति के पतन को रोकने की कोशिश है.

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लैवरोव की ‘तीसरा विश्वयुद्ध’ को लेकर अनुचित चेतावनी कि परमाणु बमों के होने के कारण यह युद्ध पहले के युद्धों से अलग होगा, इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि हम साम्राज्यवादियों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा का दोहराव देख रहे हैं, जो प्रथम विश्वयुद्ध की विशेषता थी.

फासीवाद औ सैन्यवाद के खिलाफ युद्ध के उलट, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के मूल में था, प्रथम विश्वयुद्ध का मूल्यों से कोई-लेना देना नहीं था. हमले का शिकार होने वाले यूक्रेन जैसे देश के लिए,  इस तरह के फर्क बेमानी हो सकते हैं. लेकिन भारत समेत शेष विश्व को यूक्रेन का समर्थन करने के रास्तों की तलाश करने की जरूरत है, जो इस युद्ध का कारण बनने वाली महाशक्तियों के बीच की प्रतिस्पर्द्धा को कम करे, न कि उसे और पैना करे.

अमेरिका के लिए वैश्विक वर्चस्व काफी अहम तरीके से यूरेशिया के दोनों छोड़ों पर क्षेत्रीय वर्चस्ववादी शक्ति के उभार को रोकने पर निर्भर करता है. दुनिया के देश आपस में किस तरह से समूहों में शामिल होते हैं, इसका हमेशा आसानी से पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है.

लेकिन अमेरिका अब ‘दो मोर्चों’ वाली स्थिति में है, जहां इसे दोनों तरफ से चुनौती मिल रही है. ये चुनौती दो शक्तिशाली यूरेशियाई देशों के उभरते हुए दिख रहे गठजोड़ से मिल रही है.

यूरोप वाले अभी तक पूर्वी हिस्से में खास प्रभावशाली नहीं रहे हैं- अनुभवी टिप्पणीकारों ने इस बात को रेखांकित किया है कि कैसे अमेरिका की वर्तमान भारत-प्रशांत रणनीति इस क्षेत्र को लेकर जर्मन और फ्रांसीसी विजन से मेल नहीं खाती है– लेकिन इस बात की संभावना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध यूरोप और अमेरिका को चीन और भारत-प्रशांत के मसले पर भी ज्यादा नजदीकी गठजोड़ में लेकर आएगा.

यहां पुतिन को आगे इस बात का एहसास हो सकता है कि उन्होंने जर्मनी और अमेरिका में दरार पैदा करने की अपनी क्षमता का आकलन कुछ ज्यादा ही कर लिया था.

महाशक्तियों की प्रतिस्पर्द्धा, काफी बड़े अंशों में, घरेलू आर्थिक और राजनीतिक कारकों से संचालित होती है. अमेरिका, रूस, यूरोप और चीन इन सबके बाहरी प्रसार की प्रेरणा अंदरूनी प्रवृत्तियों से मिलती है. यही तर्क साम्राज्यवाद की एक अहम विशेषता पर प्रकाश डालता है.

संघर्ष और युद्ध, फिर चाहे वे प्रकट हों या शीतयुद्धनुमा, हमेशा से साम्राज्यवाद के तहत पूंजावादी की अभिन्न विशेषता रही है. अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक परिसर की भूमिका और प्रभाव का पर्याप्त दस्तावेजीकरण हुआ है. रूस में भी, सैन्य उद्योग अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख भूमिका अदा करते हैं और यह देश के 2.7 फीसदी कार्यबल को रोजगार मुहैया कराता है.

पूंजीवाद में युद्ध के अपने ‘उपयोग’ हैं. यह पूंजी का नाश पूंजी के लिए नए मौकों का निर्माण करने के लिए करता है (मिसाल के लिए, सर्बिया में क्रेगुजेवैक कार प्लांट पर नाटो द्वारा 1999 में बम बरसाए गए थे और अब इसका संचालन इतालवी ऑटो कंपनी फियैट द्वारा किया जा रहा है).

यह संसाधनों को सतत तरीके से उत्पादन के साधनों से विध्वंस के साधनों की तरफ (जैसे हथियार) दूसरी तरफ मोड़ने में मदद करता है- जिसके लिए कामगारों का उपभोक्ता होना जरूरी है. लेकिन, इसके साथ ही मजदूरी को कम और बेरोजगारी को उच्च स्तर पर बनाए रखा जाता है. यह सिर्फ (राजनीतिक तौर पर जायज ठहराए जाने लायक) सार्वजनिक कर्ज को और बढ़ाता है.

 5. नाटो का अस्तित्व कायम ही नहीं है, अमेरिका को यूरोप में बनाए रखने के लिए इसमें विस्तार भी हो रहा है

यूक्रेन को लेकर अमेरिका की रणनीति का मकसद कभी भी इस देश और इसके लोगों को ज्यादा सुरक्षित करना नहीं था. न ही इसका लक्ष्य यूरोप को मजबूत करना रहा है. इसकी जगह इसका पूरा लेना-देना यूरोपीय सुरक्षा मामलों में अमेरिका की केंद्रीय भूमिका बनाए रखने से रहा है.

लॉर्ड इजमे ने शीत युद्ध के दौरान कभी नाटो के मिशन की व्याख्या  सोवियत संघ को बाहर, अमेरिका को अंदर और जर्मनी को दबाकर रखो’ के तौर पर की थी. शीत युद्ध के अंत के बाद यह तर्क और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.

1990-1991 में शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों ने कभी भी नाटो का विस्तार पूर्व की तरफ करने का वादा नहीं किया था, भले ही वे गठबंधन की प्रासंगिकता बनाए रखने के पक्ष में दलील दे रहे थे. उनका तर्क था कि यूरोप में सैन्य मौजूदगी बनाए रखने और एकीकृत जर्मनी को नियंत्रण में रखने का यह एकमात्र तरीका था.

तत्कालीन अमेरिकी गृह मंत्री सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जेम्स बेकर ने 9 फरवरी, 1990 को मिखाइल गोर्वोचेव से कहा था, ‘मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं और आपको इसका जवाब अभी देने की जरूरत नहीं है… अगर हम यह मानकर चलें कि [जर्मनी का] एकीकरण हो जाता है, ऐसी सूरत में आपकी पहली पसंद क्या होगी : नाटो के बाहर एक एकीकृत जर्मनी, जो कि पूरी तरह से स्वतंत्र हो और वहां रूसी सेना की कोई उपस्थिति न हो; या एक ऐसा एकीकृत जर्मनी, जिसका नाटो के साथ संबंध हो, लेकिन इस गारंटी के साथ कि नाटो का अधिकार क्षेत्र या सेनाएं अपने वर्तमान सीमा से पूर्व की ओर प्रसार नहीं करेंगे?’

इसी बातचीत में उन्होंने काफी स्पष्टता से यह स्वीकार किया था:

‘नाटो यूरोप में अमेरिका की मौजूदगी को पुख्ता पक्का करने का तरीका है. अगर नाटो को कमजोर किया जाता है, यूरोप में ऐसा कोई तरीका नहीं रह जाएगा. हम समझते हैं कि सिर्फ सोवियत संघ के लिए नहीं, बल्कि अन्य यूरोपीय देशों के लिए इस बात की गारंटी का होना महत्वपूर्ण है कि अगर अमेरिका नाटो के फ्रेमवर्क के भीतर जर्मनी में अपनी उपस्थिति रखता है, तो नाटो का सैन्य क्षेत्राधिकार पूर्व की ओर एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगा.’

यह नीति बहुत दिनों तक नहीं चली. यूरोपीय संघ के लिए एक साझा विदेश और सुरक्षा नीति के लिए फ्रांस और जर्मनी द्वारा दबाव बनाए जाने के कारण क्लिंटन प्रशासन ने (1994 में पार्टनरशिप फॉर पीस प्रोग्राम के तहत) और फिर 1999 में अपनाई गई ‘नई रणनीतिक अवधारणा’ के जरिए और इसके बाद वास्तविक आदेश के द्वारा नाटो की क्षेत्रीय मौजूदगी के प्रसार की पैरोकारी शुरू कर दी.

पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य 1999 में उसी समय नाटो के सदस्य बने जिस समय इस गठबंधन ने यूगोस्लाविया पर हमला किया- इन हमलों के समर्थन में दी जानेवाली दलील आज रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के समर्थन में दी जा रही दलील से काफी मेल खाती है.

बोरिस येल्तसिन के कार्यकाल के दौरान रूस नाटो की आक्रामकता के साथ रहा. जब रूस के भीतर के बदलते हुए घरेलू हालात के कारण मार्च, 2000 में व्लादिमीर पुतिन राष्ट्रपति बने, तब यह निष्क्रियता धीरे-धीरे समाप्त हो गई. नाटो का प्रसार जारी रहा; 2004 में पूर्व सोवियत संघ से अलग हुए तीन देश लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया को इसमें शामिल कर लिया गया. 2020 तक नाटो ने रूस और पूर्ववर्ती पूर्वी जर्मनी को छोड़कर पूर्ववर्ती वॉर्साय की संधि के सभी सदस्यों को अपने गठबंधन में शामिल कर लिया.

सेवियत संघ के पूर्व गणराज्यों जॉर्जिया और यूक्रेन को नाटो में शामिल करने की अमेरिकी योजना- जिसे अप्रैल, 2008 में सैन्य गठजोड़ के बुखारेस्ट सम्मेलन में औपचारिक तौर पर अपनाया गया था- जॉन एल. मीअरशीमर के शब्दों में रूसी नेतृत्व के लिए रेत पर रेखा जैसी बन गई. शुरुआत में आलोचना करने से बचने वाले रूस ने अपनी उम्मीदें नाटो के साथ सहानुभूति रखने वालों के अनुपात में बदलाव लाने में यूक्रेन की असमर्थता पर टिका दीं.

यह कीव में राजनीतिक समीकरणों को लेकर एक व्यंग्यपूर्ण उक्ति थी. 2010 में रूस समर्थक विक्टर यानुकोविच के चुनाव ने इस नजरिए को सही साबित करने का काम किया. यानुकोविच ने 2014 में अमेरिकी समर्थक ‘यूरोमैडान’ घटनाओं के बाद सत्ता से बाहर होने तक अपनी पक्षधरता बनाए रखी. यानुकोविच की विदाई के साथ एक दौर का अंत कर दिया, जिसे मीअरशीमर ने 1991 से अब तक ‘यूक्रेन की तटस्थता का दौर’ कहा है.

रूस की नजर में नाटो के प्रति सहानुभूति रखने वालों का महत्वपूर्ण बनकर उभरना रूस द्वारा क्रीमिया के अधिग्रहण करने का फौरी और प्रत्यक्ष कारण बना. रूस का सेवस्तोपोल नौसैनिक अड्डा क्रीमिया में ही है. क्रीमिया का यह विलय कीव में सत्ता परिवर्तन के कुछ दिनों के बाद ही हो गया. 10 नवंबर 2021 को अमेरिका और यूक्रेन ने रणनीतिक भागीदारी के एक चार्टर पर दस्तखत किया.

इतिहासकार रोबर्ट सर्विस ने इसे अमेरिका की बड़ी रणनीतिक चूक करार दिया है, जो यूक्रेन युद्ध का कारण बना. इस समझौते ने नाटो की सदस्यता को सबसे ज्यादा प्रमुखता दी :

13 अप्रैल, 2008 के नाटो नॉर्थ अटलांटिक परिषद के बुखारेस्ट सम्मेलन की घोषणा के निर्देशित होकर जिसे 14 जून, 2021 के नाटो नॉर्थ अटलांटिक काउंसिल को ब्रसेल्स सम्मेलन के भेजे गए पत्र में दोहराया गया था, अमेरिका यूक्रेन के बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त होकर अपनी भविष्य की विदेश नीति का फैसला करने के अधिकार का समर्थन करता है. इसमें नाटो में शामिल होने की यूक्रेन की इच्छा भी शामिल है.

और 13 हफ्ते बाद शेष यूक्रेन पर रूस ने हमला कर दिया.

जैसा कि स्कॉट रिटर हमें याद दिलाते हैं, इस परिणाम का पूर्वानुमान विलियम बर्न्स, जो वर्तमान में सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) के निदेशक हैं, 12 साल पहले लगा लिया था, जब वे रूस में अमेरिका के राजदूत थे. 1 फरवरी, 2008 के एक गोपनीय केबल संदेश में (जिसे विकीलीक्स द्वारा जारी किया गया था) यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने को लेकर रूस का विरोध काफी ‘प्रबल आवेग वाला और ठोस’ है.

‘यूक्रेन और जॉर्जिया की नाटो महत्वाकांक्षा न सिर्फ रूस की दुखती रग को दबाती है, बल्कि यह इस क्षेत्र की स्थिरता को लेकर गंभीर चिंताओं को भी जन्म देने वाली है. रूस को सिर्फ यह नहीं लगता है कि उसे घेरा जा रहा है और क्षेत्र में रूस के प्रभाव को कम करने की कोशिशें की जा रही हैं, बल्कि उसे यह भी डर है कि इसके परिणाम ऐसे होंगे जिनका अभी पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है और जिस पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता है, जो रूस के सुरक्षा हितों को गंभीर रूप से प्रभावित करेंगे.

विशेषज्ञ हमें बताते हैं कि रूस को खासतौर पर इस बात की चिंता है कि नाटो की सदस्यता को लेकर यूक्रेन में जबरदस्त विभाजन की स्थिति, जबकि ज्यादातर रूसी मूलवासी समुदाय इस सदस्यता के खिलाफ हैं, एक बड़े बंटवारे की स्थिति पैदा कर सकती है, जो काफी हिंसा और यहां तक कि गृहयुद्ध को भी जन्म दे सकता है. उस स्थिति में रूस को यह फैसला लेना पड़ेगा कि उसे हस्तक्षेप करना है या नहीं; और रूस नहीं चाहता है कि ऐसी कोई नौबत आए जहां उसे ऐसा कोई फैसला लेना पड़े.’

अमेरिकी नीति-निर्माताओं को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने आखिरकार रूस को वह फैसला- हस्तक्षेप करने का- लेने के लिए बाध्य कर दिया, ‘जिसका सामना वह नहीं करना चाहता था.’

6. यूरोप के पास अपने हितों को आगे बढ़ाने की गुंजाइश कम बचेगी

दशकों तक ब्रिटेन की यूरोपीय संघ की सदस्यता ने अमेरिका को एक तरह से यह आश्वस्ति देने का काम किया कि इससे जर्मनी और फ्रांस द्वारा यूरोप को ज्यादा स्वतंत्र आर्थिक और रणनीतिक मार्ग पर लेकर जाने की महत्वाकांक्षा पर अंकुश लगाया जा सकेगा.

ब्रिटेन ने खुद को यूरो से अलग रखा और वह कभी भी यूरोपीय संघ के लिए एक साझा विदेश और सुरक्षा नीति के महत्वाकांक्षी योजनाओं को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं था. लेकिन अब यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर निकलने (ब्रेक्जिट) के बाद यूरोप एक प्रमुख अमेरिकी सहयोगी से महरूम हो गया है.

यह बात अहमियत रखती है, क्योंकि दूसरी विश्व शक्तियां महाद्वीप में प्रभाव जमा रही हैं. चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को अमेरिका- यूरो-अटलांटिक अलायंस के लिए एक खतरे के तौर पर देखता है.

गेर्हार्ड श्र्योडरके नेतृत्व में उर्जा से संचालित जर्मनी-रूसी समझौते के बाद पहले ही नॉर्ड स्ट्रीम-1 पाइपलाइन का निर्माण हो चुका था और अब अंजेला मर्केल के कार्यकाल में 2015 में नॉर्ड स्ट्रीम-2 की शुरुआत हो चुकी है.

अमेरिका ने इन समुद्र्तलीय परियोजनाओं का विरोध किया है, क्योंकि उसे लगता है कि इनसे यूक्रेन जैसे देशों पर रूस की निर्भरता कम होगी- जिसे अमेरिका मॉस्को को लेकर अपनी आगे की नीति का अभिन्न हिस्सा मानता है. इस तरह से रूस के हमले का इस्तेमाल अमेरिका द्वारा अपने और यूरोप के बीच ऊर्जा संबंधों को मजबूत बनाने के लिए किया जाएगा और संभावना है कि अमेरिका के एलएनजी उत्पादकों को इससे भारी मुनाफा होगा.

यह इस बात को भी सुनिश्चित करेगा कि जर्मनी और बाकी महाद्वीप अटलांटिक गठजोड़ से मजबूती के साथ जुड़े रहें. और यह सिर्फ सैन्य स्तर पर न होकर राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी होगा.

यूक्रेन पर हमला और इसका संभावित विध्वंस- जो अमेरिका की आगे की नीति का एक निश्चित नतीजा था- को एक स्वीकार्य दोतरफा विध्वंस के तौर पर देखा जाता है, खासकर जब यूरोप में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति को मजबूत करने के ज्यादा महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक फायदों को ध्यान में रखा जाए.

  1. बहुलवादी देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकार मायने रखते हैं

अगर यूक्रेन पर रूसी हमला अंतरराष्ट्रीय कानून का उतना ही उल्लंघन है, जितना कि 1999 का नाटो का यूगोस्लाविया पर हमला था, तो देश के अल्पसंख्यों के साथ यूक्रेन का व्यवहार और सत्ता हस्तांतरण और स्वायत्तता के प्रति इसका तिरस्कार उतना ही वर्चस्ववादी रहा है, जितना कि सर्बिया का रवैया मूल निवासी अल्बेनियाइयों के खिलाफ था.

क्या यूक्रेनी सरकार रूसी प्रतिशोधात्मक कार्रवाई को मिन्स्क-2 समझौतों को ईमानदारी पूर्वक लागू करके, जिसमें रूसी भाषी दोनबास इलाके के लिए स्वायत्ता और शक्ति का हस्तांतरण शामिल है, टाल सकती थी? इसका जवाब होगा, शायद हां और शायद न.

2014 के एक लेख में एस्टोनियाई लॉ प्रोफेसर रीन मुलर ने क्लिंटन प्रशासन के एक अहम अधिकारी जॉन नॉरिस के हवाले से 1999 के युद्ध में कोसोवो के लिए नाटो की चिंता पर सवाल उठाते हैं.  नॉरिस ने लिखा था, ‘नाटो के युद्ध के पीछे कारण राजनीतिक और आर्थिक सुधारों को लेकर यूगोस्लाविया का विरोध था, न कि कोसोवो के अल्बेनियाइयों की तकलीफें. मिलोसेविच काफी लंबे समय से अटलांटिक पारीय समुदाय की आंखों का कांटा थे और अमेरिका की यह राय बनी कि उन पर सिर्फ सैन्य दबाव ही काम कर सकता है.’

पिछले हफ्ते की घटनाओं की रोशनी में पुतिन का जुलाई, 2021 का लंबा और विवादास्पद निबंध – ‘ऑन द हिस्टोरिकल यूनिटी ऑफ रशियंस एंड यूक्रेनियन्स’  निश्चित तौर पर एक (एक देश की) मृत्यु का पूर्वलिखित रोजनामचा (क्रॉनिकल ऑफ अ डेथ फोरटोल्ड) लगता है. लेकिन जिस समय यह लिखा गया था, तब तक नीपर (रूस,  बेलारुस और यूक्रेन से होकर बहनेवाली नदी-) में बहुत पानी बह चुका था.  कुछ भी हो, एक बहु-सांस्कृतिक और बहु धार्मिक देशों के लिए सबक काफी स्पष्ट है: राष्ट्रीय वर्चस्ववादी, नस्लवादी और सांप्रदायिक नीतियां देशों को मजबूत करने की जगह कमजोर करती हैं और संघर्ष और बाहरी हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त करती हैं.

8. चीन के लिए मौका भी और चुनौतियां भी

चीन को उम्मीद है कि रूस की कार्रवाई से एशियाई धुरी के पीछे के अमेरीकी रणनीतिक तर्क को कमजोर करेगी. लेकिन ऐसा होने के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए इसके अपने आर्थिक और तकनीकी जरूरतों के साथ समझौता नहीं होता है, चीन को वाशिंग्टन में इस धारणा को हतोत्साहित करना होगा कि रूस और चीन अमेरिका को एक संयुक्त चुनौती है. लेकिन ऐसा कहना आसाना है, करना मुश्किल.

पिछले कुछ वर्षों से, रूस ने भारत-प्रशांत में अमेरिकी नेतृत्व वाले रणनीतिक पहलकदमियों की मुखालफत की है, जो मुख्य तौर पर चीन को चुनौती देते हैं. इसने इस धारणा के निर्माण में मदद की है कि रूस और चीन के वैश्विक लक्ष्य पूरी तरह से एक दूसरे से मिले हुए हैं. और फिर भी इस प्रसिद्ध दावे के बावजूद कि उनके बीच भागीदारी की ‘कोई सीमा नहीं है’, दोनों के ही बीच संभावित संघर्ष के बिंदु भी हैं. खासकर तब जब वे मध्य एशिया में एक दूसरे के आमने-सामने होंगे.

अमेरिकी नेतृत्व वाले प्रतिबंधों का दंश जितना ज्यादा बढ़ेगा, रूस द्वारा अपने कुछ हितों को चीन के हवाले करने की संभावना बढ़ती जाएगी और यह दोनों को नजदीक लेकर आएगा. ज्यादा संभावना इस बात की है कि इसमें चीन को कलाबाजी दिखाने की ज्यादा जगह मिलती नजर आएगी- अपने पड़ोसियों के साथ क्षेत्रीय विवादों के मामले में भी और बीआरआई और अन्य दूसरे रणनीतिक पहलकदमियों को लेकर भी.

भारत को इस बात का डर है कि चीन रूस को मुहैया कराए जाने वाले समर्थन के एवज में दक्षिण एशिया में उसकी वफादारी का इम्तिहान ले सकता है, जो हथियारों की आपूर्ति, रणनीतिक सहयोग (नाभिकीय, समुद्री और अंतरिक्ष के क्षेत्र में) के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के लिए राजनीतिक कवच को भी प्रभावित कर सकता है.

अंतिम बिंदु का अब शायद ज्यादा महत्व न हो, लेकिन विरोधाभासी तरीके से यूक्रेन पर रूसी हमले ने भारत जैसे देशों को यह संदेश देने का काम किया है कि वे चीन, यहां तक कि पाकिस्तान के साथ भी संघर्ष की स्थिति में अमेरिका और इसके सहयोगियों से सैन्य समर्थन पर भरोसा नहीं कर सकते हैं.

  1. भारत का ढुलमुल रवैया इसकी महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेर सकता है

यूक्रेन संकट ने भारत की कूटनीति और महाशक्ति के दर्जे के दावे के खोखलेपन को उजागर कर दिया है. यहां तक कि संघर्ष के क्षेत्र में अपने नागरिकों की सुरक्षा करने के मामलें में भारत ने बहुत सुस्ती दिखाई. अमेरिका ने रूसी हमले की भविष्यवाणी कर दी थी और भले ही कई विशेषज्ञ और देशों को इसको लेकर संशय था, अमेरिका का रणनीतिक भागीदार होने के नाते भारत को हर संभव एहतियात बरतने के लिए वाशिंग्टन के साथ संपर्क में रहना चाहिए था.

अगर यह अमेरिकी दावों को लेकर संदेह में था, तो इसे रूसी नेतृत्व से उसके इरादों का पता लगाने के लिए शीर्षस्थ स्तर पर संवाद करना चाहिए था, क्योंकि 20,000 से ज्यादा भारतीयों का जीवन दांव पर लगा हुआ था. शायद मोदी सरकार ने मास्को और वाशिंग्टन में से किसी से भी संवाद नहीं किया; या शायद इसने ऐसा किया और इसे अमेरिका द्वारा या तो झिड़क दिया गया या रूस द्वारा दिग्भ्रमित किया गया.

रूस के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध देशों को एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ और दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ उनके लेन-देन की मात्रा के हिसाब से पक्ष लेने पर मजबूर कर रहे हैं. 2 मार्च को संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूसी हमले की निंदा करने वाले प्रस्ताव पर की गई वोटिंग से एक संकेत मिलता है. 18 अफ्रीकी देशों ने अमेरिका के साथ नहीं जाने का फैसला किया जबकि एशिया से चीन, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, ईरान, इराक, कजाखस्तान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, मंगोलिया, लाओस और वियतनाम मतदान से अनुपस्थित रहे.

यह मामला जब पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आया, तब भारतीय राजनयिकों को थोड़ी दृढ़ता दिखाते हुए रूस द्वारा यूक्रेन की संप्रभुता के स्पष्ट उल्लंघन की आलोचना करनी चाहिए थी और तत्काल युद्धविराम की मांग को अपना समर्थन देना चाहिए था. साथ ही साथ इसे इस बात पर भी जोर देना चाहिए था कि इस आक्रमण की वजह बने व्यापक कारकों पर भी विचार होना चाहिए.

अगर भारत ने हद से हद संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव, जिस पर हुए मतदान में भारत अनुपस्थित रहा, को तैयार करने में बहुत मामूली सी भूमिका निभाई, तो इसका कारण सिर्फ इसका अस्थायी सदस्य होना नहीं है. एक सुस्पष्ट पक्ष लेने में विफलता ने भारत को विचार-विमर्श से बाहर कर दिया.

1999 में जब भारत, सुरक्षा परिषद का सदस्य भी नहीं था, उस समय भी, यह (रूस और बेलारूस के साथ) यूगोस्लाविया पर नाटो के हमले का विरोध करने वाले प्रस्ताव को लाने वालों में था. उस समय भारत के राजदूत कमलेश शर्मा ने परिषद में जो कहा था (26 मार्च, 1999 को संयुक्त राष्ट्र की प्रेस रिलीज के अनुसार-) वह यूक्रेन पर रूस के हमले पर भी उतना ही लागू होता है.

‘ऐसा लगा कि नाटो खुद को कानून से ऊपर मानता है और यह काफी परेशान करने वाला था. नाटो का तर्क था कि कोसोवो में सर्बियाई पुलिस ने हिंसक तरीके से कानून का कोई सम्मान किए बगैर काम किया. दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से ऐसा लगता है कि नाटो ने उन लोगों के व्यक्तित्व और तरीकों को ही अपना लिया, जिनकी गतिविधियों पर यह लगाम लगाना चाहता था. कानून को अपने हाथ में लेने वाले लोगों ने कभी भी देशों के भीतर शांति को बढ़ावा नहीं दिया है; न ही वे अंतराष्ट्रीय संबंधों में कोई मदद पहुंचाएंगे.’

भारत में ऐसा कह सकने का राजनीतिक साहस था, वह भी तब जब परमाणु परीक्षण करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा उसके निंदा प्रस्ताव पारित किए जाने को एक साल भी नहीं बीता था. इन परीक्षणों का मकसद भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और अंतरराष्ट्रीय मामलों में मोलभाव की ज्यादा शक्ति देना था और नाटो के हमले पर इसके पक्ष ने परमाणु शक्ति का प्रदर्शन करने के फैसले पर एक तरह से मुहर लगाने का काम किया.

लेकिन 2022 में जब एक महाशक्ति द्वारा कानून के उल्लंघन का मामला आया है, मोदी सरकार ने पक्ष लेने से बचने और छिपने की कोशिश की है. भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति वास्तव में उलझन भरी है.

भारत एक महाशक्ति बनना चाहता है और उसे लगता है कि एक शक्तिशाली मगर ढलान की ओर अग्रसर अमेरिका के साथ साझेदारी उसे वहां तक पहुंचा सकती है. साझेदारियों की कीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन भारत अभी तक रूस के साथ अपने विशेष संबंध को भी बचाए रखने में कामयाब रहा है.

यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर एक स्पष्ट पक्ष लेने से इनकार में भारत की यह आशा झलकती है कि यूक्रेन के मसले पर अमेरिका साथ हुए संबंधों के नुकसान की क्षतिपूर्ति भारत-प्रशांत में अमेरिकी हितों को लेकर ज्यादा ज्यादा उदारता दिखाकर की जा सकती है.

यह न सिर्फ एक जोखिमभरा जुआ है, बल्कि जिस परिणाम की भारत को आशा है, वह काफी महंगा साबित हो सकता है: इसके नतीजे के तौर पर यह चीन के साथ ज्यादा व्यापक संघर्ष को न्योता देने वाला हो सकता है, वह भी यह जानते हुए कि मुसीबत के समय अमेरिका या इसके सहयोगी से कोई ठोस मदद नहीं मिलेगी.

  1. यूक्रेन की तटस्थता ही शायद एकमात्र व्यावहारिक समाधान है

शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ दो महाशक्तियों में से किसी का पक्ष न लेना ही नहीं था. सबसे बढ़कर यह गुटनिरपेक्ष समूह द्वारा अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रतिस्पर्द्धा पर लगाम लगाना और इसे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लिए नुकसानदेह होने की हद तक तीखा होने से रोकना.

रूस पर यूक्रेन का हमला निस्संदेह अमेरिका की आगे बढ़ने की रणनीति की उपज है, लेकिन यह दुनियाभर में अंतर-उपनिवेशी प्रतिस्पर्द्धाओं की धार को तेज करने का काम करेगा. इस बिंदु पर नाभिकीय शस्त्रों, यहां तक कि नाभिकीय परीक्षणों की शुरुआत को भी नकारा नहीं जा सकता है.

शीतयुद्ध के दौर में जिस फिनलैंड की तटस्थता यूरोप में स्थिरता बनाए रखने का एक अहम कारक था, उसी फिनलैंड का अब कहना है कि वह नाटो में शामिल होने पर विचार कर सकता है. हालांकि, यह काफी आगे की बात लग सकती है (और भारत में भी विशेषज्ञों का एक तबका ऐसा होगा, जो परमाणु परीक्षण को लेकर निषेध का खत्म होना काफी पसंद करेगा) लेकिन रूस-चीन (और पाकिस्तान भी) संबंध भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए.

क्या इस वर्तमान संकट के समाधान का कोई रास्ता है? रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध एक अविचारित-असंतुलित प्रतिक्रिया है; ये असरदार नहीं होंगे और ये उल्टा काम भी कर सकते हैं. अमेरिका ने समझदारी दिखाते हुए सैन्य प्रतिक्रिया से इनकार किया है, जिसमें यूक्रेन के ऊपर ‘नो फ्लाई जोन’ भी शामिल है, क्योंकि यह यह उसके सैन्यबल को सीधे रूस के सैन्य बल के साथ संघर्ष में ले आएंगे.

रूस के खिलाफ इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट द्वारा युद्ध अपराध को लेकर मामला चलाने से भी कोई फायदा नहीं होगा, खासकर कोर्ट के वकील द्वारा अफगानिस्तान में अमेरिका के युद्ध अपराधों को प्राथमिकता से हटाने यानी खत्म करने की हालिया घोषणा को देखते हुए.

रूसी सेना की वापसी किसी भी समाधान का अनिवार्य तत्व है, लेकिन यह तब तक पर्याप्त नहीं होगा, जब तक कि अमेरिका और रूस, दोनों ही यूक्रेन की तटस्थता की गारंटी नहीं लेते हैं, जैसा कि जमीनी हकीकतों से वाकिफ विशेषज्ञ मीअरशीमर ने सलाह दी है. आदर्श तौर पर यही गारंटी जॉर्जिया को लेकर भी दी जानी चाहिए.

जेम्स उपचर के शब्दों में, ‘एक स्थायी तौर पर तटस्थ देश पर किसी ऐसे गठजोड़ या संधि में शामिल होने पर प्रतिबंध होता है, जो इससे ऐसे किसी युद्ध मे शामिल होने की अपेक्षा करे, जिसमें इसकी अपनी जमीन की रक्षा न की जानी हो.’

यूक्रेन पर हमला करने के ठीक बाद रूस की यूक्रेन का ‘असैन्यीकरण’ करने की मांग की सफलता की कोई संभावना नहीं है. लेकिन पोलैंड, रोमानिया में स्थापित की गई बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली- जिसका मकसद कथित तौर पर ईरान जैसे से ‘दुष्ट देशों’ से मिलने वाले खतरे से निपटना है, लेकिन जो रूस के लिए परेशानी का सबब हैं- को इन देशों से हटाने को भी समाधान का हिस्सा होना जरूरी है.

दुखद तौर, पर स्पष्ट पक्ष लेने की अनिच्छा के कारण भारत के पास इस समस्या के समाधान के लिए कोई रचनात्मक प्रस्ताव देने लायक कोई राजनीतिक या नैतिक आधार ही नहीं है. और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का भारत का दावा इससे कतई मजबूत नहीं होता.

(हैरिस गजदर और मनोज जोशी की टिप्पणियों और सुझावों के साथ)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)