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फास्ट ट्रैक अदालतों में पॉक्सो के 2.26 लाख मामले लंबित, यूपी में सर्वाधिक: केंद्र

लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कानून एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि केंद्र सरकार ने 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1,023 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें गठित करने की योजना शुरू की है, जिनमें 389 विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं. ऐसा इसलिए किया गया, ताकि पॉक्सो एक्ट के तहत बलात्कार से जुड़े मामलों की सुनवाई और उनका निपटान तेजी से किया जा सके.

(इलस्ट्रेशनः द वायर)

नई दिल्लीः बच्चों के खिलाफ अपराध के 2.26 लाख से अधिक मामले जनवरी के अंत तक फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों में लंबित हैं. इनमें यौन अपराधों से बच्चों के विशेष संरक्षण की अदालतें भी शामिल हैं, जिन्हें ऐसे मामलों के जल्द निपटारे के लिए गठित किया गया था.

राजस्थान लोकतांत्रिक पार्टी के राजस्थान से सांसद हनुमान बेनीवाल द्वारा लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कानून एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि केंद्र सरकार ने 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1,023 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें गठित करने की योजना शुरू की है, जिनमें 389 विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं. ऐसा इसलिए किया गया ताकि पॉक्सो एक्ट के तहत बलात्कार से जुड़े मामलों की सुनवाई और उनका निपटान तेजी से किया जा सके.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2019 में ऐलान किया था कि सरकार निर्भया फंड का इस्तेमाल कर इन फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना करेगी.

यह भी कहा गया था कि पॉक्सो के तहत दर्ज मामलों के निपटान के लिए 18 राज्य ऐसी अदालतों के गठन से सहमत थे.

उसी समय कानूनी एवं बाल अधिकार विशेषज्ञों ने चेताया था कि सिर्फ फास्ट ट्रैक अदालतें बना देने से तब तक मदद नहीं मिलेगी, जब तक जजों को नियुक्त नहीं किया जाता या सरकारी अभियोजकों को प्रशिक्षित नहीं किया जाए और उन्हें इस तरह के मामलों के प्रति संवेदनशील न बनाया जाए.

सदन में रिजिजू के जवाब से पता चला कि जिन राज्यों में सबसे अधिक मामले लंबित है, वे उत्तर प्रदेश (60729 मामले), महाराष्ट्र (30,677 मामले), पश्चिम बंगाल(19,649 मामले), बिहार (14,089 मामले), ओडिशा (12,332 मामले) और मध्य प्रदेश (10,409 हैं. कुल मिलाकर 226,728 मामले लंबित हैं.

सात राज्यों तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और असम में लंबित मामलों की संख्या 5,000 और 10,000 के बीच है.

रिजिजू ने कहा कि शुरुआत में फास्ट ट्रैक अदालतों की योजना एक साल के लिए तैयार की गई थी, लेकिन बाद में इसे 31 मार्च 2023 तक बढ़ा दिया गया.

उन्होंने कहा कि इस योजना पर 1572.86 करोड़ रुपये का खर्च किया जाएगा, जिसमें से केंद्र सरकार 971.70 रुपये व्यय करेगी. यह धनराशि से निर्भया फंड से ली जाएगी.

अब तक 28 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश इस योजना से जुड़ गए हैं और सिर्फ पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह इससे बाहर हैं.

मंत्री ने अपने जवाब में कहा कि उच्च न्यायालयों से मिली जानकारी के मुताबिक, फरवरी 2022 से कुल 712 फास्ट ट्रैक अदालतें शुरू की गई हैं, जिनमें 399 ई-पॉक्सो अदालतें भी हैं. इन अदालतों के जरिये 81,400 मामलों का निपटान हुआ है.

रिजिजू ने कहा कि उच्च न्यायालयों ने नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की है और मासिक आधार पर उनके डेटा अपलोड के लिए राज्यों और केंद्रशासि प्रदेशों के लिए डैशबोर्ड बनाए गए हैं.

मंत्री ने जवाब में कहा कि इस योजना के क्रियान्वयन के लिए राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और हाईकोर्ट के अधिकारियों के साथ नियमित तौर पर समीक्षा बैठकें की गईं. बाकी बची फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों को शुरू करने का मामला इंटर स्टेट जोनल काउंसिल बैठकों में भी उठाया गया था.

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