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एल्गार परिषद: वरवरा राव की स्थायी ज़मानत की याचिका ख़ारिज, सरेंडर करने की अवधि बढ़ाई गई

एल्गार परिषद मामले में 83 वर्षीय वरवरा राव पिछले साल फरवरी से अस्थायी चिकित्सा ज़मानत पर जेल से बाहर हैं. उन्होंने ज़मानत पर बाहर रहते हुए अपने गृह नगर हैदराबाद में रहने और सुनवाई पूरी होने तक स्वास्थ्य आधार पर स्थायी ज़मानत का अनुरोध किया था. हालांकि अदालत ने इससे इनकार कर दिया.

वरवराा राव. (फाइल फोटो, साभार: फेसबुक/@VaravaraRao)

मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एल्गार परिषद-माओवादी संपर्क मामले में कवि-कार्यकर्ता वरवरा राव की वह याचिका बुधवार को खारिज कर दी जिसमें उन्होंने चिकित्सा आधार पर स्थायी जमानत दिए जाने का अनुरोध किया था.

जस्टिस एसबी शुक्रे और जस्टिस जीए सानप की पीठ ने हालांकि 83 वर्षीय कार्यकर्ता के लिए तलोजा जेल प्राधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने की अवधि तीन महीने तक बढ़ा दी ताकि वह मोतियाबिंद का ऑपरेशन करा सकें.

पीठ ने राव की यह अर्जी खारिज कर दी कि उन्हें जमानत पर रहते हुए मुंबई के बजाय हैदराबाद में रहने की अनुमति दी जाए.

अदालत ने यह भी कहा कि उसने पड़ोसी नवी मुंबई में स्थित तलोजा जेल में चिकित्सा सुविधाओं की कमी और वहां साफ-सफाई की खराब स्थिति पर राव के वकील आनंद ग्रोवर के कई दावे सही पाए. अत: उसने महाराष्ट्र के कारागार महानिरीक्षक को खासतौर से तलोजा जेल में ऐसी सुविधाओं की स्थिति पर ‘स्पष्ट’ रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है.

अदालत ने आईजी को इस साल 30 अप्रैल तक रिपोर्ट अदालत को सौंपने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा, ‘आईजी कारागार यह सुनिश्चित करें कि अब से कैदियों को राज्य भर की जेलों में अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं पर शिकायत करने की वजह न मिले.’

उसने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की विशेष अदालत से एल्गार परिषद मामले में सुनवाई तेज करने और दैनिक आधार पर सुनवाई करने को कहा.

राव पिछले साल फरवरी से अस्थायी चिकित्सा जमानत पर जेल से बाहर हैं. उन्होंने तीन याचिकाएं दायर की थीं.

उन्होंने अपनी चिकित्सा जमानत छह महीने तक बढ़ाने का अनुरोध किया था. उन्होंने जमानत पर बाहर रहते हुए तेलंगाना में अपने गृह नगर हैदराबाद में रहने और मामले की सुनवाई पूरी होने तक स्वास्थ्य आधार पर स्थायी जमानत दिए जाने का भी अनुरोध किया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, उनके वकील ने उच्च न्यायालय को बताया था कि राव को पार्किंसंस रोग के शुरुआती लक्षण हैं और वे मुंबई के बांद्रा इलाके में कुछ ईसाई मिशनरियों द्वारा किराए पर दिए गए एक हॉल में रह रहे हैं.

एनआईए के वकील अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने राव की सभी याचिकाओं का विरोध किया और उच्च न्यायालय से उन्हें वापस जेल भेजने का अनुरोध किया.

सिंह ने तर्क दिया कि सैकड़ों अन्य कैदी, जो वरिष्ठ नागरिक हैं और स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं, जेल में हैं और उन्हें जेल अस्पताल में चिकित्सा देखभाल प्रदान की जा रही है.

बता दें कि ज्ञात हो कि एल्गार परिषद मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एक सम्मेलन में दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है, जिसके बारे में पुणे पुलिस का दावा था कि इन भाषणों के कारण अगले दिन पुणे के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई.

पुणे पुलिस ने दावा किया था कि सम्मेलन को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था. मामले में एक दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को आरोपी बनाया गया है. इसकी जांच बाद में एनआईए को सौंप दी गई थी.

एनआईए ने भी आरोप लगाया है कि एल्गार परिषद का आयोजन राज्य भर में दलित और अन्य वर्गों की सांप्रदायिक भावना को भड़काने और उन्हें जाति के नाम पर उकसाकर भीमा-कोरेगांव सहित पुणे जिले के विभिन्न स्थानों और महाराष्ट्र राज्य में हिंसा, अस्थिरता और अराजकता पैदा करने के लिए आयोजित किया गया था.

मामले में केवल एक अन्य आरोपी वकील और अधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. 13 अन्य अभी भी महाराष्ट्र की जेलों में बंद हैं. फादर स्टेन स्वामी की पिछले साल पांच जुलाई को अस्पताल में उस समय मौत हो गई थी, जब वह चिकित्सा के आधार पर जमानत का इंतजार कर रहे थे. अन्य आरोपी विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में बंद हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)