केंद्र ने न्यायिक अवसंरचना प्राधिकरण और रिटायर जजों की एडहॉक नियुक्ति को मंज़ूरी नहीं दी

भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना प्राधिकरण के गठन और पीठ की कमी के मुद्दे को हल करने के लिए अस्थायी तौर पर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों को एडहॉक के आधार पर नियुक्त करने की योजना का प्रस्ताव रखा था.

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सीजेआई एनवी रमना. (फोटो: पीटीआई)

भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना प्राधिकरण के गठन और पीठ की कमी के मुद्दे को हल करने के लिए अस्थायी तौर पर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों को एडहॉक के आधार पर नियुक्त करने की योजना का प्रस्ताव रखा था.

सीजेआई एनवी रमना. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना ने शनिवार को मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन को संबोधित करते हुए दो प्रस्ताव रखे, जिन्हें केंद्र सरकार और कुछ भाजपा शासित राज्यों का समर्थन नहीं मिला.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई रमना ने राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) प्राधिकरण के गठन और हाईकोर्ट की पीठों की कमी के मुद्दे को हल करने के लिए अस्थायी तौर पर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों को एडहॉक के आधार पर नियुक्त करने की योजना का प्रस्ताव रखा था.

इसके बजाय अदालतों की ढांचागत जरूरतों को पूरा करने के लिए राज्यस्तरीय निकायों के गठन पर एक समझौता हुआ.

केंद्र सरकार ने शुरुआती कुछ आपत्तियों के बाद राज्यों को बुनियादी ढांचे के विकास के लिए एकमुश्त अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने के विचार करने पर सहमति जताई.

सूत्रों का कहना है कि सीजेआई रमना ने प्रस्ताव दिया था कि सीजेआई की अध्यक्षता में राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना प्राधिकरण का गठन किया जाए और राज्यों में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की अध्यक्षता में एक समान तंत्र स्थापित किया जाए.

केरल जैसे कुछ विपक्ष शासित राज्यों ने बताया कि राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण किए बिना प्रणाली को स्वीकार किया जा सकता है.

वहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि उन्हें प्रस्ताव का लेकर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तर्क दिया कि अगर केंद्र जिला अदालतों के बुनियादी ढांचे के लिए फंड मुहैया करा रहा है तो इस तरह के प्राधिकरण की कोई जरूरत नहीं है.

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि इस तरह के विशेष तंत्र की कोई जरूरत नहीं है.

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार धन आवंटित कर रहा है और कार्यकारी बुनियादी ढांचे को लागू कर रहा है. कुछ भाजपा शासित राज्यों ने भी इसी तरह का रुख अपनाया.

रिपोर्ट के मुताबिक, इन मतभेदों पर लंबी चर्चा के बाद इस प्रस्ताव को वापस ले लिया गया, लेकिन राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री या उनके प्रतिनिधि या हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में तंत्र का गठन किया जाएगा, ताकि धन खर्च पर नजर रखी जा सके और उचित कार्रवाई की जा सके.

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने सीजेआई रमना के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए बैठक के अंत में कहा, ‘मुझे खुशी है कि मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने सहमति जताई है कि राज्य स्तर पर इस निकाय की स्थापना की जाएगी और इसमें माननीय मुख्यमंत्री, चीफ जस्टिस या फिर उनके किसी दावेदार की भागीदारी होगी. हम राज्य स्तर पर न्यायिक बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए विशेष रूप से जिला अदालतों, निचली न्यायपालिकाओं में राज्य सरकारों का सहयोग करने के लिए तैयार हैं.’

सीजेआई ने कहा कि अवसंरचना प्राधिकरण के गठन पर विचार-विमर्श हुआ, जिसका सुझाव उन्होंने 10 अक्टूबर 2021 के पत्र में दिया था.

एक अन्य मुद्दा जजों की कमी से निपटने के लिए एडहॉक आधार पर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति था. केंद्र ने इस प्रस्ताव पर भी आपत्ति जताई, जिसके बाद इस मुद्दे को टाल दिया गया.

रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि हाईकोर्ट जजों के 388 पद खाली पड़े हैं. गुजरात हाईकोर्ट में 66 पद खाली पड़े हैं, जिसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट में 37 पद, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में 37 पद, कलकत्ता हाईकोर्ट में 33, पटना हाईकोर्ट में 26 पद, दिल्ली हाईकोर्ट में 25 पद और राजस्थान हाईकोर्ट में 24 पद खाली पड़े हैं.

केंद्र सरकार ने कथित तौर पर कहा कि उसने पहले सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह पदों पर नियुक्तियों के लिए एडहॉक जजों को नियुक्त करने के पक्ष में नहीं है. पदों पर नियुक्तियों के बाद भी काम का भार अधिक होने पर इस विकल्प पर विचार किया जा सकता है.

सूत्रों का कहना है कि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति पर भी चर्चा हुई और न्यायपालिका ने कहा कि नियुक्तियां उस निश्चित समयसीमा के भीतर होनी चाहिए, जिसके आधार पर 1993 में सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम केंद्र सरकार का फैसला हुआ था.

मामलों के लंबित होने पर बात करते हुए सूत्रों ने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बताया कि एक राजनीतिक दल की ओर से बड़ी संख्या में कलकत्ता हाईकोर्ट में सरकार के खिलाफ राजनीति से प्रेरित जनहित याचिकाएं दायर की जा रही हैं.

बघेल ने कहा कि मुख्यमंत्री और चीफ जस्टिस के बीच बेहतर संवाद होना चाहिए. उन्होंने कहा कि सभी मुद्दों को सिर्फ बातचीत से ही सुलझाया जा सकता है.

इस दौरान पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और हरियाणा के मुख्यंत्री एमएल खट्टर ने दोनों राज्यों के लिए अलग-अलग हाईकोर्ट की जरूरत का भी उल्लेख किया.