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गुजरात: कोर्ट ने 2017 की आज़ादी रैली मामले में जिग्नेश मेवाणी को तीन महीने जेल की सज़ा सुनाई

गुजरात की एक अदालत ने साल 2017 में मेहसाणा से बनासकांठा ज़िले के धनेरा तक बगैर अनुमति के ‘आज़ादी रैली’ निकालने के लिए निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी और नौ अन्य लोगों को तीन महीने क़ैद की सज़ा सुनाई है. मेवाणी को बीते हफ्ते असम पुलिस द्वारा दर्ज एक मामले में ज़मानत पर रिहा किया गया था.

जिग्नेश मेवाणी. (फोटो साभार: फेसबुक/@jigneshmevaniofficial)

मेहसाणा: गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी और नौ अन्य लोगों को गुरुवार को यहां की एक अदालत ने बगैर अनुमति के ‘आजादी रैली’ निकालने के पांच साल पुराने में दोषी ठहराते हुए तीन महीने कैद की सजा सुनाई.

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जेए परमार ने मेवाणी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की पदाधिकारी रेशमा पटेल और मेवाणी के राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के कुछ सदस्यों सहित नौ लोगों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 143 के तहत गैरकानूनी जनसमूह का हिस्सा बनने का दोषी पाया.

अदालत ने सभी दोषियों पर एक-एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया.

मेहसाणा ‘ए’ डिवीजन पुलिस ने वर्ष 2017 के जुलाई महीने में मेहसाणा से बनासकांठा जिले के धनेरा तक बगैर अनुमति के ‘आजादी रैली’ निकालने के लिए आईपीसी की धारा 143 के तहत प्राथिमिकी दर्ज की थी.

रेशमा पटेल ने जब इस रैली में हिस्सा लिया था तब वह किसी राजनीतिक दल की सदस्य नहीं थीं. वह पाटीदार समाज को आरक्षण दिए जाने की समर्थक रही हैं और बतौर कार्यकर्ता उन्होंने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया था.

इस मामले में कुल 12 लोगों को आरोपित किया गया था. इनमें से एक आरोपी की मौत हो गई है जबकि एक अभी भी फरार है.

रिपोर्ट के अनुसार, अदालत के फैसले से इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या मेवाणी इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में उतर पाएंगे.

मालूम हो कि इससे पहले बीते 19 अप्रैल को असम पुलिस ने मेवाणी को गुजरात से गिरफ्तार किया गया था और पूर्वोत्तर राज्य असम लाई थी. असम पुलिस ने मेवाणी के खिलाफ यह कार्रवाई उनके द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को लेकर एक कथित ट्वीट किए जाने के बाद की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि प्रधानमंत्री मोदी ‘गोडसे को भगवान मानते हैं.’

इसके बाद ट्वीट से संबंधित मामले में 25 अप्रैल को जमानत मिलने के तुरंत बाद पुलिस ने उन्हें एक  महिला पुलिसकर्मी से कथित तौर पर छेड़छाड़ के आरोप में फिर गिरफ्तार किया था.

 26 अप्रैल को बारपेटा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मुकुल चेतिया ने मेवाणी को जमानत देने से इनकार करते हुए उन्हें पांच दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया था. इसके बाद मेवाणी ने 28 अप्रैल को नई जमानत याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई के बाद उन्हें जमानत मिल गई.

असम में बारपेटा जिला न्यायाधीश ने 29 अप्रैल को मेवाणी को जमानत देते हुए कहा था कि पुलिस ने उन्हें हिरासत में रखने के लिए छेड़छाड़ का झूठा मामला गढ़ा था. अदालत ने ‘झूठी एफआईआर’ दर्ज करने के लिए असम पुलिस की खिंचाई भी की थी.

मेवाणी भाजपा सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं. असम से रिहा होने के बाद उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय से की गई एक प्रेस वार्ता में कहा कि उनके ख़िलाफ़ दर्ज मामले गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें ‘बदनाम करने’ की ‘पूर्व नियोजित साज़िश’ का हिस्सा थे.

उन्होंने इसे ‘56 इंच का कायरतापूर्ण’ कृत्य करार दिया. उन्होंने राजधानी दिल्ली स्थिति कांग्रेस मुख्यालय में संवाददाताओं से कहा, ‘मेरी गिरफ्तारी के पीछे पीएमओ में बैठे कुछ गोडसे भक्त थे.’

इसके बाद मंगलवार को वे गुजरात पहुंचे थे, जहां उन्होंने उना तहसील में दलितों के खिलाफ दर्ज मामले (जुलाई 2016 में कुछ दलितों पर हमले के बाद विरोध प्रदर्शन को लेकर दर्ज), राज्य के अन्य आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस नहीं लेने और पुलिसकर्मियों के लिए ग्रेड-पे एवं अन्य विरोध प्रदर्शन करने वाले समूहों की मांग सरकार द्वारा पूरी नहीं किए जाने पर एक जून को ‘गुजरात बंद’ का आह्वान करने की चेतावनी दी है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)