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परिसीमन आयोग ने कश्मीर में विधानसभा सीट की संख्या 47, जबकि जम्मू में 43 रखने की सिफ़ारिश की

जम्मू कश्मीर को लेकर गठित तीन सदस्यीय परिसीमन आयोग ने अंतिम आदेश में जम्मू में छह, जबकि कश्मीर में एक अतिरिक्त सीट का प्रस्ताव रखा है. वहीं, राजौरी और पुंछ के क्षेत्रों को अनंतनाग संसदीय सीट के तहत लाया गया है. 12 सीटें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित किया है. घाटी राजनीतिक दलों ने आदेश को ख़ारिज करते हुए कहा कि यह घाटी में राजनीतिक रूप से लोगों को कमज़ोर करने का प्रयास है.

जम्मू कश्मीर परिसीमन आयोग की अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई (बीच में), पदेन सदस्य सीईसी सुशील चंद्र (बाएं) और जम्मू कश्मीर राज्य चुनाव आयुक्त केके शर्मा (दाएं). (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली/जम्मू/श्रीनगर: जम्मू कश्मीर को लेकर गठित तीन सदस्यीय परिसीमन आयोग ने बृहस्पतिवार को अपने अंतिम आदेश में कश्मीर में विधानसभा सीट की संख्या 47 जबकि जम्मू में 43 रखने की अनुशंसा की है. 90 विधानसभा और पांच संसदीय क्षेत्रों के विस्तार का आदेश गजट अधिसूचना के रूप में जारी किया गया है.

अंतिम आदेश में जम्मू में छह, जबकि कश्मीर में एक अतिरिक्त सीट का प्रस्ताव रखा गया है, वहीं राजौरी और पुंछ के क्षेत्रों को अनंतनाग संसदीय सीट के तहत लाया गया है.

आयोग ने एक बयान में कहा, ‘केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने की तारीख से बदलाव प्रभावी होंगे.’

परिसीमन आयोग का गठन मार्च 2020 में किया गया था. इस रिपोर्ट के साथ ही केंद्रशासित जम्मू कश्मीर में पहले विधानसभा चुनाव का रास्ता साफ हो गया है.

सीटों के पुनर्निर्धारण के बाद जम्मू कश्मीर विधानसभा में सीट की कुल संख्या 90 हो जाएगी. फिलहाल इनकी संख्या 86 है, जिनमें से 37 सीट जम्मू में, जबकि 46 कश्मीर में हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के फैसले राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं और घाटी में मुख्यधारा की पार्टियों के बीच इन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा है.

परिसीमन आयोग की सिफारिशों में जम्मू क्षेत्र को कश्मीर घाटी की तुलना में अपनी जनसंख्या के सापेक्ष अधिक सीटें मिली हैं और यह जनसंख्या मानदंड का उल्लंघन है और एक प्रमुख विवाद भी है.

2011 की जनगणना के आधार पर सीटों के निर्धारण का मतलब है कि 44 प्रतिशत आबादी वाले जम्मू को सीटों में 48 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा, जबकि 56 प्रतिशत आबादी वाले कश्मीर को सीटों में केवल 52 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा. इससे पहले कश्मीर क्षेत्र में सीटों में 55.4 फीसदी और जम्मू में सीटों में 44.5 फीसदी हिस्सेदारी थी.

उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व वाले आयोग द्वारा अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर किये जाने के बाद एक राजपत्रित अधिसूचना जारी की गई.

मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा और जम्मू कश्मीर के राज्य चुनाव आयुक्त केके शर्मा परिसीमन आयोग के पदेन सदस्य हैं. इसके अलावा इसके आयोग में पांच सहयोगी सदस्य हैं- नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद फारूक अब्दुल्ला, मोहम्मद अकबर लोन और हसनैन मसूदी, प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह और भाजपा के जुगल किशोर शर्मा.

रिपोर्ट के मुताबिक, अब्दुल्ला और अन्य नेशनल कॉन्फ्रेंस सांसदों ने कुछ प्रस्तावों पर आपत्ति जताई थी – विशेष रूप से कश्मीर की तुलना में जम्मू को दी गई प्राथमिकता को लेकर, वे कहते हैं कि दोनों क्षेत्रों के बीच वास्तविक जनसांख्यिकीय संतुलन के साथ तालमेल नहीं है.

वहीं कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक दलों ने परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि यह घाटी में राजनीतिक रूप से लोगों को कमजोर करने का प्रयास है.

परिसीमन आयोग को 2011 की जनगणना के आधार पर कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के भाग-V और परिसीमन अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के अनुसार केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में विधानसभा और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की जिम्मेदारी दी गई थी.

आयोग ने निर्णय लिया था कि निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन प्रशासनिक इकाइयों यानी जिलों, तहसीलों, पटवार मंडलों आदि के संबंध में किया जाएगा, जैसा कि 15/06/2020 को अस्तित्व में था और आयोग ने केंद्रशासित प्रशासन को सूचित किया था कि जम्मू कश्मीर के संघ शासित प्रदेश में परिसीमन अभ्यास पूरा होने तक 15/06/2020 को मौजूदा प्रशासनिक इकाइयों से छेड़छाड़ न करे.

आयोग ने सिफारिश की है कि केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा में कम से कम दो सदस्य मनोनीत हों, जिनमें से एक कश्मीरी प्रवासी समुदाय की महिला हो.

बाद में आयोग की रिपोर्ट केंद्रीय कानून मंत्रालय को सौंपी गई.

आयोग ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर के विस्थापितों को मनोनयन के जरिये विधानसभा में कुछ प्रतिनिधित्व देने पर विचार करने की भी सरकार से सिफारिश की है.

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, जम्मू क्षेत्र की जनसंख्या 53.72 लाख और कश्मीर क्षेत्र की 68.83 लाख है. कुल 90 विधानसभा क्षेत्रों में से नौ को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रखा गया है. इन नौ क्षेत्रों में छह जम्मू में और तीन घाटी में हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर भाजपा जम्मू क्षेत्र में 2014 के विधानसभा चुनावों की तरह शानदार प्रदर्शन करती है, तो यह केंद्रशासित प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी हो सकती है, क्योंकि घाटी के मतदाता कई दावेदारों – नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और वाम दलों के बीच विभाजित हो जाएंगे.

इसके अलावा जम्मू क्षेत्र की नई विधानसभा सीटों को ज्यादातर हिंदू बहुल क्षेत्रों में बनाया गया है; घाटी की एकमात्र सीट सीमांत कुपवाड़ा जिले में बनाई गई है, जो सज्जाद गनी लोन के नेतृत्व वाले पीपुल्स कॉन्फ्रेंस का गढ़ है, जिसने अतीत में भाजपा के साथ गठबंधन किया था.

जम्मू को छह नई विधानसभा सीटें मिलीं, 12 सीटें एससी/एसटी के लिए आरक्षित

जम्मू कश्मीर को लेकर गठित परिसीमन आयोग ने एकसमान जनसंख्या अनुपात बनाए रखने के लिए जम्मू क्षेत्र की अधिकांश विधानसभा सीटों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया है और निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या 37 से बढ़ाकर 43 कर दी है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

आयोग ने जम्मू में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों को क्रमशः सात और पांच सीटें आरक्षित करके बड़ा प्रतिनिधित्व दिया है.

नई सीटें छह जिलों- डोडा, किश्तवाड़, सांबा, राजौरी, कठुआ और उधमपुर से बनाई गई हैं. इसके साथ ही डोडा, किश्तवाड़ और सांबा में अब तीन-तीन सीटें, उधमपुर में चार, राजौरी में पांच और कठुआ की छह सीटें हो जाएंगी.

किश्तवाड़ जिले को एक विधानसभा सीट पद्देर नागसेनी मिली है. डोडा जिले की नई सीट डोडा पश्चिम है. जसरोटा कठुआ में नई सीट है, उधमपुर में रामनगर और सांबा में रामगढ़ नई सीट है.

आयोग ने जनता के आक्रोश को देखते हुए जम्मू जिले के सुचेतगढ़ निर्वाचन क्षेत्र को बरकरार रखा है.

आयोग ने पांच सीटें – राजौरी, थानामंडी (राजौरी जिला), सुरनकोट, मेंढर (दोनों पुंछ जिला) और गुलबगढ़ (रियासी) – अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए आरक्षित की हैं, सात सीटें – रामनगर (उधमपुर), कठुआ, रामगढ़ (सांबा), बिश्नाह, सुचेतगढ़, माढ़ और अखनूर (सभी जम्मू) – को अनुसूचित जाति समुदाय के लिए आरक्षित किया गया है.

परिसीमन आदेश में कहा गया है कि स्थानीय प्रतिनिधियों की मांग को ध्यान में रखते हुए विधानसभा क्षेत्रों के नाम बदले गए हैं. तंगमर्ग का नाम बदलकर गुलमर्ग कर दिया गया है, ज़ूनीमार अब जैदीबल है, सोनवार अब लाल चौक है, पड्डर अब पड्डर-नागसेनी है, कठुआ नॉर्थ जसरोटा और कठुआ साउथ कठुआ हो गया है, खौर का नाम छंब कर दिया है, जबकि महोर, अब गुलाबगढ़ है और दरहल, बुधल हो गया है.

कश्मीर के दलों ने परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को खारिज किया

कश्मीर के राजनीतिक दलों ने जम्मू कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों के पुन: सीमांकन पर परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि यह घाटी में राजनीतिक रूप से लोगों को कमजोर करने का प्रयास है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कहा कि वह जम्मू कश्मीर में हर विधानसभा क्षेत्र पर परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के असर का अध्ययन कर रही है. पार्टी ने यह भी कहा कि जब भी केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव होंगे, मतदाता भारतीय जनता पार्टी और उसके छद्म चेहरों को सजा देंगे.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने ट्वीट किया, ‘हमने परिसीमन आयोग की अंतिम सिफारिशें देखी हैं. हम प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के लिए इन सिफारिशों के प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं.’

पार्टी ने कहा, ‘राजनीति से प्रेरित कितना भी परिसीमन क्यों न कर दिया जाए, लेकिन इससे जमीनी सचाई नहीं बदलने वाली, जो यह है कि जब भी चुनाव होंगे तब मतदाता भाजपा और इसके छद्म दलों को नहीं बख्शेंगे, उन्होंने बीते चार साल में जम्मू कश्मीर में जो किया है उसके लिए मतदाता उन्हें दंडित करेंगे.’

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने कहा कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट ने परिसीमन की कवायद शुरू किए जाते समय जताये गये पार्टी के डर को सच साबित कर दिया है.

पीडीपी के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘पीडीपी ने पहले दिन से ही इस कवायद को 5 अगस्त, 2019 को एक समुदाय और एक क्षेत्र की जनता को कमजोर करने के लिए शुरू की गई प्रक्रिया के विस्तार की तरह देखा.’

पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने अनंतनाग में एक समारोह में शामिल होने के बाद संवाददाताओं से कहा, ‘किस परिसीमन की बात कर रहे हैं आप? उस परिसीमन आयोग की, जो भाजपा की विस्तार इकाई बन गया है? उसने जनसंख्या के बुनियादी मानदंड की अनदेखी की है और उनकी इच्छाओं के विपरीत क्षेत्रों को जोड़ा या घटाया है. हम इसे खारिज करते हैं, हमें इसमें कोई भरोसा नहीं है.’

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जम्मू कश्मीर की जनता के अधिकार कम करने के लिए आयोग का गठन किया गया है.

उन्होंने कहा, ‘परिसीमन आयोग उसी सोच का हिस्सा है, जिसके तहत अनुच्छेद 370 का प्रावधान समाप्त किया गया. उद्देश्य जम्मू कश्मीर की जनता के अधिकारों को कम करना और उन्हें कमजोर करना है. यह जनता के अधिकार कम करने का एक और तरीका है.’

चुनाव में पीडीपी की भागीदारी संबंधी प्रश्न पर पीडीपी अध्यक्ष ने कहा, ‘कौन से चुनाव? चुनाव की कोई संभावना नजर नहीं आती. हमें कुछ नहीं पता.’

सज्जाद गनी लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने नेशनल कॉन्फ्रेंस पर आरोप लगाया कि आयोग के विचार-विमर्श में उसके सांसदों ने भाग लिया था और इस तरह उसने परिसीमन की कवायद को अपनी स्वीकृति दी.

हालांकि पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने कहा कि परिसीमन की रिपोर्ट पहले का दोहराव ही है.

उसने कहा कि बीते छह दशक में जम्मू कश्मीर विधानसभा की सीटों में कश्मीर की हिस्सेदारी 43 से बढ़ाकर 47 कर दी गई, जबकि जम्मू का प्रतिनिधित्व 30 से बढ़कर 43 हो गया. पार्टी ने कहा कि 1947 के बाद से कश्मीरी लोगों के अधिकारों को सुनियोजित तरीके से छीनने के लिए कौन जिम्मेदार है.

माकपा नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने कहा कि परिसीमन आयोग का गठन परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत किया गया, लेकिन उसने केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर की विधानसभाओं का पुन: सीमांकन जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अनुरूप किया है जिसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है.

कांग्रेस वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज ने कहा कि रिपोर्ट पर सरसरी नजर डालें तो इसके ‘अत्यंत नकारात्मक’ पहलू दिखाई देते हैं, जिसे जम्मू कश्मीर की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)