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मुसलमानों से देश छोड़ने की बात कहने वाले ख़ुद देश छोड़कर चले जाएं: महमूद मदनी

देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधन समिति के सालाना अधिवेशन में महमूद मदनी ने कहा, ‘हमारा मज़हब, लिबास, तहज़ीब, खाना-पीना भी अलग है. और अगर आपको हमारा मज़हब बर्दाश्त नहीं है, तो आप कहीं और चले जाएं. वो ज़रा-ज़रा सी बात पर कहते हैं कि पाकिस्तान जाओ, भइया तुम्हें मौक़ा नहीं मिलेगा पाकिस्तान जाने का, हमें मिला था, हमने रिजेक्ट किया है. इसलिए हम नहीं जाएंगे, जिसको भेजने का शौक़ है वो चला जाए.’

महमूद मदनी. (फोटो: पीटीआई)

देवबंद: प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद (महमूद मदनी समूह) के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने रविवार को कहा कि जो लोग मुसलमानों से देश छोड़ने की बात कहते हैं वे खुद देश छोड़कर चले जाएं.

संगठन की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक, मदनी ने समान नागरिक संहिता लागू करने की कुछ राज्यों की योजना पर आपत्ति जताते हुए कहा, ‘इससे समुदाय के लोगों को डरने की जरूरत नहीं है.’

उन्होंने मुस्लिम समुदाय से धर्म के प्रति आस्थावान बने रहने और दृढ़ता का परिचय देने की गुजारिश की.

राज्यसभा के पूर्व सदस्य उत्तर प्रदेश के देवबंद में जमीयत की प्रबंधन समिति के सालाना दो दिवसीय अधिवेशन के अंतिम दिन आयोजित सत्र को संबोधित कर रहे थे. मौलाना मदनी ने कहा, ‘हम नहीं जाएंगे, जिसे हमें भेजने का शौक है वो यहां से चला जाए.’

उन्होंने यह भी कहा, ‘राष्ट्र निर्माण के लिए जो लोग हमख्याल हैं उनको साथ लेना है. समझदारी, हिम्मत और दीर्घकालिक रणनीति के तहत नफरत के सौदागरों को हराना है.’

अधिवेशन में महमूद मदनी ने कहा, ‘हमें मालूम है कि जब हम मुल्क की बात करते हैं तो भी बहुत सारे लोगों के पेट में दर्द होता है. अगर वो बात करेंगे राष्ट्र के निर्माण की, राष्ट्र की एकता और अखंडता की, तो वो राष्ट्र धर्म है और अगर हम राष्ट्र की एकता, अखंडता की बात करेंगे तो वो है हमारा तंज़ (ताना).’

उनके अनुसार, ‘अगर इस मुल्क की हिफाजत के लिए हमारी जान जाएगी, खून बहेगा तो ये हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी. मेरा मुल्क है ये. अब मेरा कह रहा हूं तो इसमें भी तकलीफ हो जाएगी. भाई हमारे लफ्ज भी तुम्हें बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं. हम तुमको सिर्फ बताने की कोशिश कर रहे हैं, डराने की नहीं, डराते तुम हो, हम बता रहे हैं कि डराना बंद कर दो, अपनों को भी और जिन्हें गैर समझते हो उनको भी डराना बंद कर दो.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हम गैर नहीं हैं, इस मुल्क के शहरी हैं. ये मुल्क हमारा है. अच्छी तरह समझ लीजिए, ये हमारा मुल्क है और हमारी इस मुल्क के लिए जो जिम्मेदारी है, वो हम हर हाल में निभाएंगे. उसके ऊपर कोई समझौता नहीं होगा.’

महमूद मदनी कहते हैं, ‘हमारा मजहब अलग है, लिबास अलग है, तहजीब भी अलग है, हमारे खाने पीने का तरीका भी अलग है. और अगर तुमको हमारा मजहब बर्दाश्त नहीं है, तो तुम कहीं और चले जाओ. वो जरा-जरा सी बात पर कहते हैं कि पाकिस्तान चले जाओ, भइया तुम्हें मौका नहीं मिलेगा पाकिस्तान जाने का, हमें मौका मिला था, हमने रिजेक्ट किया है. इसलिए हम नहीं जाएंगे, जिसको भेजने का शौक है वो चला जाए.’

उन्होंने कहा, ‘हजरत माफी चाहता हूं, मैं इस तरह बोलना नहीं चाहता, पसंद भी नहीं करता ऐसा बोलना, जो लोग नफरत का बाजार गर्म करते हैं, असल में वो अल्पसंख्यक हैं. हम आलरेडी मेजोरिटी (बहुसंख्यक) में हैं, इसको पहचान लेना. और मुल्क की हिफाजत के लिए, तरक्की के लिए, इंसाफ के लिए, बराबरी के लिए, बराबरी के हुकूक (अधिकार) के लिए, जो कुर्बानी देनी होगी, जमीयत-ए-उलेमा हमेशा देती रही है, मुल्क के मुसलमान देते रहे हैं, पहले भी देते रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे.’

संगठन के बयान के मुताबिक, जमीयत उलेमा-ए-हिंद की असम इकाई के अध्यक्ष और लोकसभा सदस्य मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि मुसलमानों की चुप्पी को कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए.

इसके अलावा संगठन ने अधिवेशन के दूसरे दिन वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह तथा समान नागरिक संहिता पर प्रस्ताव पारित किए और एक घोषणा-पत्र जारी कर सभी मुसलमानों को डर, निराशा और भावुकता से दूर रहने तथा अपने भविष्य की बेहतरी के लिए काम करने की सलाह दी.

बयान में कहा गया कि ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा ईदगाह से संबंधित प्रस्ताव में संगठन ने ‘प्राचीन इबादतगाहों पर बार-बार विवाद खड़ा करके देश में अमन और शांति को खराब करने वाली शक्तियों और उनको समर्थन देने वाले राजनीतिक दलों के रवैये पर गहरी नाराजगी जाहिर की है. पुराने विवादों को जीवित रखने और इतिहास की कथित ज्यादतियों एवं गलतियों को सुधारने के नाम पर चलाए जाने वाले आंदोलनों से देश का कोई फायदा नहीं होगा.

प्रस्ताव में कहा गया है, ‘बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की ऐतिहासिक ईदगाह और दीगर (अन्य) मस्जिदों के खिलाफ इस समय ऐसे अभियान जारी हैं, जिससे देश में अमन शांति और उसकी गरिमा एवं अखंडता को नुकसान पहुंचा है.’

इसमें आरोप लगाया गया है, ‘अब इन विवादों को उठाकर सांप्रदायिक टकराव और बहुसंख्यक समुदाय के वर्चस्व की नकारात्मक राजनीति के लिए अवसर निकाले जा रहे हैं.’

इस प्रस्ताव में पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 और रामजन्म भूमि व बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया गया है. वहीं, समान नागरिक संहिता से संबंधित प्रस्ताव में संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों से वंचित करने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है और इस पर चिंता व्यक्त की गई है.

प्रस्ताव के मुताबिक, मुस्लिम पर्सनल कानून में शामिल शादी, तलाक, ख़ुला (बीवी की मांग पर तलाक), विरासत आदि के नियम इस्लाम धर्म के आदेशों का हिस्सा हैं, जो कुरान और हदीस (पैंगबर मोहम्मद की शिक्षाओं) से लिए गए हैं.

इसमें कहा गया है, ‘उनमें किसी तरह का कोई बदलाव या किसी को उनका पालन करने से रोकना इस्लाम में स्पष्ट हस्तक्षेप और भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 में दी गई गारंटी के खिलाफ है.’

प्रस्ताव में कहा गया है, ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद का यह सम्मेलन स्पष्ट कर देना चाहता है कि कोई मुसलमान इस्लामी कायदे कानून में किसी भी दखलअंदाजी को स्वीकार नहीं करता.’

इसमें यह भी कहा गया है कि अगर सरकार समान नागरिक संहिता को लागू करने की कोशिश करेगी तो संविधान के दायरे में रहकर इसे रोकने की कोशिश की जाएगी.

अधिवेशन में इस्लाम के अंतिम पैंगबर मोहम्मद के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी के लिए भाजपा नेता नूपुर शर्मा की निंदा भी की गई है और मांग की गई कि सरकार जल्द से जल्द ऐसा कानून बनाए, जिससे मौजूदा कानून-व्यवस्था की अराजकता खत्म हो, इस तरह के शर्मनाक अनैतिक कृत्यों पर अंकुश लगे और सभी धर्मों के महापुरुषों का सम्मान हो.

अधिवेशन में 11 अलग-अलग प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें ‘इस्लामोफोबिया’ देश के हालात, शिक्षा, ‘इजराइल-फलस्तीन’ मुद्दा, ज्ञानवापी मस्जिद, शाही ईदगाह पर विवाद और समान नागरिक संहिता समेत अन्य शामिल हैं.

बीते 28 मई को इस अधिवेशन में मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा था कि सरकार ने देश के मुसलमानों की मुश्किलों के प्रति आंखें मूंद ली हैं.

उन्होंने कहा था, ‘देश उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है लेकिन सरकार में बैठे लोगों ने अपने होंठ सिल लिए हैं, जो सभी के लिए चिंता का विषय है. मुसलमानों को अपने शहरों की सड़कों पर चलते हुए भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. हम हर यातना सहेंगे, लेकिन किसी को भी हमारे देश को खंडित नहीं करने देंगे. हम सभी मुद्दों पर समझौता कर सकते हैं, लेकिन देश की कीमत पर नहीं.’

जमीयत उलेमा-ए-हिंद (अरशद मदनी समूह) के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने बीते 28 मई को कहा था कि अल्पसंख्यकों की लड़ाई किसी हिंदू से नहीं, बल्कि धर्म के आधार पर आग लगाने वाली सरकार से है, जिसका मुकाबला अदालत के जरिये किया जाएगा.

मौलाना मदनी ने कहा था कि देश का मुसलमान बाहर से नहीं आया है, बल्कि हमेशा से यहां का रहने वाला है और इस बात का सबूत उसका रंग रूप, भाषा, बोल-चाल है और पहनावा है जो बहुसंख्यक समाज से अलग नहीं है.

इस दौरान जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने देश में कथित तौर पर बढ़ती सांप्रदायिकता पर चिंता व्यक्त करते हुए आरोप लगाया था कि सभाओं में अल्पसंख्यकों के खिलाफ कटुता फैलाने वाली बातें की जाती हैं, लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है.

संगठन ने केंद्र सरकार पर सदियों पुराने भाईचारे को समाप्त करने का आरोप भी लगाया. उसने यह आरोप भी लगाया कि देश के बहुसंख्यक समुदाय के दिमाग में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत सरकार के संरक्षण में जहर घोला जा रहा है.

संगठन के लगभग दो हजार सदस्यों और अन्य अतिथियों ने अधिवेशन में भाग लिया. जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की स्थापना 1920 में हुई थी. इसने आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी. संगठन ने 1947 में बंटवारे का विरोध किया था. जमीयत देश में मुसलमानों के कल्याण के लिए काम करने वाला सबसे बड़ा संगठन है.

जमीयत उलेमा-ए-हिंद दो समूहों में बंटी हुई है. एक समूह की अगुवाई राज्यसभा के पूर्व सदस्य महमूद असद मदनी करते हैं, जबकि दूसरे समूह का नेतृत्व मौलाना अरशद मदनी के हाथ में है. अरशद मदनी महमूद मदनी के चाचा हैं.

जब 2006 में महमूद के पिता और जमीयत प्रमुख असद अहमद मदनी का इंतकाल हुआ, तो उनके और उनके चाचा के बीच संगठन के नेतृत्व को लेकर विवाद पैदा हो गया, जिससे विभाजन हो गया और संगठन गुटों में बंट गया.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)