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झारखंड: मुठभेड़ बताकर आदिवासी की हत्या करने के आरोप में आठ सुरक्षाकर्मियों पर केस दर्ज

पिछले साल जून में झारखंड के लातेहार ज़िले में सुरक्षाबलों की गोली से एक आदिवासी व्यक्ति की मौत हो गई थी. सुरक्षाबलों ने दावा किया था कि मृतक और उनके साथियों की ओर से हमला करने पर जवाबी कार्रवाई में व्यक्ति की मौत हुई, जबकि ग्रामीणों का दावा था कि सुरक्षाकर्मियों ने शिकार करने गए लोगोंं पर देखते ही फायरिंग शुरू कर दी थी.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

रांची: एक साल पहले एक आदिवासी व्यक्ति की हत्या और संबंधित सबूत नष्ट करने के आरोप में झारखंड पुलिस ने आठ सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, जिनमें एक सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट का भी नाम शामिल है.

यह पुलिस द्वारा पहले किए गए उस दावे से विपरीत है, जिसमें उसने झारखंड के लातेहार जिले के गारू ब्लॉक के पिरी गांव में हुई मौत को दोनों तरफ से हुई गोलीबारी का नतीजा बताया था.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इस संबंध में पहली एफआईआर पिछले साल 13 जून को आदिवासी समुदाय के सदस्यों के खिलाफ दर्ज की गई थी, जहां पुलिस ने दावा किया था कि एक खोजी दल, जिसमें सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट के जवान भी शामिल थे, का सामना हथियारबंद आदिवासियों से हो गया था और चेतावनी दिए जाने के बावजूद भी उन्होंने गोलियां चला दी थीं. इसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने आत्मरक्षा में फायरिंग करनी पड़ी थी.

हालांकि, दूसरे पक्ष का कहना था कि वे देशी बंदूक के साथ वन क्षेत्र में शिकार करने के लिए गए थे और उन्हें देखते ही सुरक्षा बलों ने उन पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जबकि वे चिल्लाए भी कि वे किसी ‘पार्टी’ (प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) गुट या उससे अलग हुए गुट) का हिस्सा नहीं हैं.

दूसरी एफआईआर इस साल 3 मई को सीआरपीएफ और झारखंड पुलिस के जवानों के खिलाफ दर्ज की गई, जिसमें दर्ज है कि ब्रह्मदेव सिंह की तब हत्या कर दी गई, जब वे अन्य लोगों के साथ शिकार के लिए गए थे.

रोचक बात यह है कि झारखंड हाईकोर्ट में 12 मई की सुनवाई के दौरान कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, राज्य सरकार ने कभी नहीं बताया कि उसने पहले ही एफआईआर दर्ज कर ली है.

दो एफआईआर के बीच मृतक की पत्नी जेरामनी देवी ने गारू पुलिस थाने और लातेहार मजिस्ट्रेट कोर्ट के कई चक्कर काटे और हाईकोर्ट में भी याचिका लगाई, क्योंकि पुलिस ने निचली अदालत के आदेश का पालन करने में देरी की.

मामले को आगे बढ़ाने वाले जनाधिकार महासभा का कहना था कि पुलिस सच्चाई को छिपाने की कोशिश कर रही थी और विभिन्न अधिकारियों के समक्ष मृतक के परिवार की ओर से कई याचिकाएं लगाए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई.

पिछले साल जून में ब्रह्मदेव सिंह की ‘हत्या’ के बाद 50 से अधिक ग्रामीण क्रॉस-एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस थाने गए और मामले को सुरक्षाकर्मियों द्वारा एकतरफा गोलीबारी का मामला बताया था.

पुलिस की निष्क्रियता से नाराज, जेरामनी ने पिछले साल अक्टूबर में निचली अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी. संबंधित पक्षों को सुनने के बाद इस साल 1 जनवरी को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट मिथिलेश कुमार ने पुलिस को 156 (3) के प्रावधानों का पालन करने का आदेश दिया था, जब एक अदालत पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देती है.

इस बीच, चूंकि पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया तो हाईकोर्ट में मामले की सीबीआई जांच के लिए याचिका लगाई गई थी.

कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान पता चला था कि 2 फरवरी को गारू पुलिस थाने के एसएचओ रंजीत कुमार यादव ने जूडिशियल मजिस्ट्रेट को लिखा था कि मामले में एक एफआईआर पहले से ही दर्ज है और सीआईडी भी मामले की अलग से जांच कर रही है जो कि एक स्वतंत्र एजेंसी है, इसलिए यह कानून सम्मत नहीं होगा कि दो एजेंसी एक ही घटना की जांच करें.

इस पर याचिकाकर्ता के वकील शैलेश पोद्दार ने एक शपथ-पत्र के माध्यम से हाईकोर्ट को सूचित किया था कि पुलिस का बयान अदालत की अवमानना है, क्योंकि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जहां कोई व्यक्ति या राज्य एजेंसी न्यायिक आदेश का पालन करने में असमर्थता बताते हुए अदालत को पत्र लिखती है.

उन्होंने यह भी कहा था कि पुलिस द्वारा दिखाई गई बरामदगी झूठी थी, क्योंकि जब्ती कार्रवाई के दो गवाहों ने एक हलफनामा दिया था, जिसमें कहा गया था कि उन्हें ‘कागजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया’ और इसलिए ही सीबीआई जांच के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया है.

इस साल 12 मई को झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने कहा था कि पुलिस ने आदेश के बावजूद भी एफआईआर दर्ज नहीं की. साथ ही कोर्ट ने राज्य से जवाबी हलफनामा पेश करने को कहा कि क्यों मामले को सीबीआई को न सौंपा जाए.

अदालत ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 28 जून तो तय की है.

याचिकाकर्ता के शैलेश पोद्दार ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि हाल ही में उन्हें पता लगा है कि एफआईआर पहले ही 3 मई को दर्ज कर ली गई है. यह अजीब है, क्योंकि राज्य ने हाईकोर्ट के सामने 12 मई की सुनवाई के दौरान इसका कहीं भी जिक्र नहीं किया.

उक्त सुनवाई के दौरान अदालत में पेश हुए सरकारी वकील के सहायक पीसी सिन्हा ने कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता.