मोदी सरकार के आठ साल बाद देश में बेरोज़गारी का हाल कुछ ख़ास बदला नहीं है

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, मई में भारत की बेरोज़गारी दर 7.1% रही. आंकड़े मूल रूप से दावा करते हैं कि सही प्रकार की नौकरियां न मिलने से निराश होकर कामकाजी उम्र के 90 करोड़ भारतीयों में से आधों, विशेष रूप से महिलाओं, ने रोज़गार की तलाश करना ही बंद कर दिया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, मई में भारत की बेरोज़गारी दर 7.1% रही. आंकड़े मूल रूप से दावा करते हैं कि सही प्रकार की नौकरियां न मिलने से निराश होकर कामकाजी उम्र के 90 करोड़ भारतीयों में से आधों, विशेष रूप से महिलाओं, ने रोज़गार की तलाश करना ही बंद कर दिया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

यह एक दुखद और विडंबनापूर्ण स्थिति है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), वह सरकारी योजना जो गरीब वयस्कों के लिए प्रति वर्ष 100 दिनों के भुगतान कार्य को सुनिश्चित करने का प्रयास करती है, के कर्मचारियों को पदों को नियमित करने और वेतन में वृद्धि की मांग को लेकर कई राज्यों में हड़ताल पर जाना पड़ा है.

राजस्थान सरकार ने सभी जिला कलेक्टरों को मनरेगा के संविदा कर्मचारियों के हड़ताल की अवधि के मानदेय के भुगतान को रद्द करने का निर्देश दिया है. यह योजना रोजगार में गिरावट, बजट में कटौती, वेतन भुगतान में देरी और श्रमिकों के अधिकारों के बड़े पैमाने पर उल्लंघन से पीड़ित है. मनरेगा की स्थिति वास्तव में देश की बेरोजगारी की स्थिति का प्रतीक है.

हाल ही में मुंबई स्थित स्वतंत्र निकाय सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने खुलासा किया है कि मई में भारत की बेरोजगारी दर 7.1% थी. बेरोजगारी दर कामकाजी उम्र की आबादी के अनुपात को इंगित करती है जो काम के माध्यम से मजदूरी कमाने के लिए नियोजित होना चाहती है, लेकिन रोजगार पाने में असमर्थ है.

शहरी बेरोजगारी दर अप्रैल में बढ़कर 9.22% हो गई, जो मार्च महीने में 8.28% थी. ग्रामीण इलाकों में अप्रैल में बेरोजगारी दर 7.18 फीसदी रही, जो मार्च महीने 7.29 फीसदी थी.

सीएमआईई के अनुसार, हरियाणा राज्य 34.5% के साथ उच्चतम बेरोजगारी दर दर्शाता है. इसके बाद राजस्थान में 28.8%, बिहार में बेरोजगारी दर 21.1% है. अन्य राज्य और क्षेत्र जो दोहरे अंकों में बेरोजगारी दर दर्ज करते हैं, उनमें गोवा (15.5%), जम्मू कश्मीर (14.2%), त्रिपुरा में (14.6%), और झारखंड में (14.2%) शामिल हैं.

मई 2020 में बेरोजगारी अपने चरम पर 23.7% (शहरी 26% और ग्रामीण 22%) थी, जिसका मुख्य कारण देश में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन प्रतिबंधों के नकारात्मक प्रभाव थे. अब ठीक दो साल बाद बेरोजगारी एक बार फिर वहीं है, जहां जनवरी-फरवरी 2020 में थी यानी 7.2% पर.

आंकड़े मूल रूप से दावा करते हैं कि सही प्रकार की नौकरियां न मिलने से निराश होकर कानूनी कामकाजी उम्र के 90 करोड़ भारतीयों में से आधों, विशेष रूप से महिलाओं ने रोजगार की तलाश करना बंद कर दिया है.

2017 से 2022 तक समग्र श्रम भागीदारी दर 46% से गिरकर 40% हो गई है.

सीएमआईई के आंकड़ों को अनिवार्य रूप से देखना और समझना चाहिए क्योंकि सरकार नियमित रूप से अपने आंकड़े जारी नहीं करती है.

हालांकि, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण में कहा गया है कि शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी अक्टूबर-दिसंबर 2021 में घटकर 8.7 प्रतिशत हो गई, जो पिछले वर्ष में 10.3 प्रतिशत थी.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सुस्त घरेलू मांग और बढ़ती कीमतों के बीच आर्थिक सुधार की धीमी गति से रोजगार के अवसर प्रभावित हुए हैं. मुख्य रूप से देश में लॉकडाउन प्रतिबंधों के प्रभावों के कारण अक्टूबर-दिसंबर 2020 में बेरोजगारी अधिक थी.

कई नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद नौकरी चाहने वालों की वार्षिक वृद्धि को बढ़ाने के प्रयास अपर्याप्त साबित हुए हैं.

सीएमआईई के अनुमान के मुताबिक, रोजगार-जनसंख्या दर 38 फीसदी से कम है. यह प्रतिशत हर साल श्रम बल में प्रवेश करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियों की कमी को दर्शाता है.

मनरेगा के मूल उद्देश्य ही अब तक अधूरे

नरेंद्र मोदी की सरकार ने बीते 26 मई को आठ साल पूरे किए हैं. किसी भी सरकार की आर्थिक नीतियों की कामयाबी या विफलता दिखाने के लिए आठ साल का समय पर्याप्त होना चाहिए. सभी आर्थिक संकेतकों के बीच जो बहुत बुनियादी स्तर पर व्यक्तियों को प्रभावित करता है, वह है रोजगार.

लगभग सात साल पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने मनरेगा को ’60 साल की विफलता का स्मारक’ कहा था. लेकिन, आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 इस योजना के उच्च मांग में होने का खुलासा करता है. कई राज्यों ने कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान अपने पैतृक गांवों में लौटने वाले प्रवासी कामगारों के लिए इस योजना को ‘जीवनरक्षक’ बताया है.

मनरेगा के लिए कुल आवंटन को हर नए बजट के साथ कम किया गया. मनरेगा योजना के लिए अपर्याप्त बजट ने राज्यों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में उन लोगों को पर्याप्त काम प्रदान करना मुश्किल बना दिया है जो रोजगार गारंटी योजना पर निर्भर हैं.

योजना की उच्च मांग के बावजूद वित्त वर्ष 2022-23 के लिए भी इस प्रमुख ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम को पिछले वित्तीय वर्ष (98,000 करोड़ रुपये) की तुलना में लगभग 25,000 करोड़ रुपये कम राशि का आवंटित  हुआ है.

श्रमिक अधिकार समूह ‘पीपुल्स एक्शन फॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी’ द्वारा विकसित एक मनरेगा ट्रैकर से पता चलता है कि 17 करोड़ पंजीकृत जॉब कार्डों में से केवल 9.7 करोड़ कार्ड 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2021 के बीच सक्रिय थे. एक जॉब कार्ड को तब सक्रिय माना जाता है जब इसे बीते तीन सालों में कम से कम एक बार भी पंजीकृत किया गया हो.

आंकड़ों से यह भी पता चला कि जॉब कार्ड के लिए आवेदन करने वाले लगभग 1.5 करोड़ परिवारों को कार्ड भी जारी नहीं किए गए थे. यह दर्शाता है कि मनरेगा के तहत केवल 6% परिवारों को 80 दिनों से अधिक का काम मिला, हालांकि कानून न्यूनतम मजदूरी पर प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देता है.

इन गरीब ग्रामीण परिवारों के पास काम का लगभग कोई वैकल्पिक जरिया नहीं है. इससे पहले कि वह नीतिगत उपायों के माध्यम से इससे निपटने का प्रयास करे, सरकार वास्तव में यह स्वीकार करने में भी विफल रही है कि वह एक बेरोजगारी संकट का सामना कर रही है.

तथ्य यह है कि ग्रामीण परिवर्तन के साधन के रूप में मनरेगा की वास्तविक क्षमता अभी पूरी तरह से साकार नहीं हुई है.

श्रम और रोजगार मंत्रालय ने सीएमआईई की रिपोर्ट को ‘तथ्यात्मक रूप से गलत’ कहा है. केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेंद्र यादव ने अक्टूबर-दिसंबर 2021 की अवधि के लिए तिमाही रोजगार सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी करके सीएमआईई के निष्कर्षों का विरोध किया, जिसमें केवल चुनिंदा संगठित क्षेत्रों में ही रोजगार में बढ़ती प्रवृत्ति दिखाई गई.

विडंबना यह है कि एक तरफ देश में ऐसे लोग हैं जो अच्छे काम की तलाश में हैं, और दूसरी तरफ बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं के लिए शिक्षकों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों की भारी कमी है. कोविड से संबंधित व्यवधान, विदेशी और घरेलू निवेश की कमी और अन्य भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को मुख्य रूप से एक नकारात्मक आर्थिक प्रवृत्ति के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है, जिसने रोजगार को प्रभावित किया है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि महामारी ने छोटे भारतीय स्टार्ट-अप और छोटे और मझोले उद्योगों (एमएसएमई) को नुकसान पहुंचाया है, जिससे 2020 और 2021 में बड़े पैमाने पर छंटनी हुई और व्यापार बंद हो गए. लेकिन इससे पहले 2016 में नोटबंदी और 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के जल्दबाजी में लागू होने से अनौपचारिक क्षेत्र में विकास रुका था, औद्योगिक उत्पादन गिर गया था और नौकरियां गायब हो गई थीं.

हालांकि, सरकार ने स्टार्ट-अप या पेटेंट आवेदन प्रक्रियाओं को पंजीकृत करने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आसान बना दिया है, फिर भी सरकार या भारतीय कॉरपोरेट्स के साथ व्यापार करना और समय पर भुगतान प्राप्त करना स्टार्ट-अप्स और एमएसएमई के लिए एक चुनौती बनी हुई है. छोटे व्यवसायों के लिए कई जीएसटी दरें और बोझिल कराधान प्रक्रिया प्रमुख मुद्दे हैं.

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि सरकार को शहरी बेरोजगारों के लिए एक गारंटीकृत रोजगार कार्यक्रम शुरू करना चाहिए और आय के अंतर को कम करने के लिए एक सार्वभौमिक बुनियादी आय (यूबीआई) योजना शुरू करनी चाहिए.

केरल, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और हाल ही में राजस्थान की राज्य सरकारों ने शहरी बेरोजगारों के लिए राज्य आधारित विशेष योजनाओं को शुरू किया है, ताकि वे अचानक सामने आ खड़ी होने वाली आर्थिक चुनौतियों का सामना करने लायक बन सकें. यह कहां तक सफल हो पाएगा, यह देखना बाकी है.

(वैशाली बसु शर्मा रणनीतिक और आर्थिक मसलों की विश्लेषक हैं. उन्होंने नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटरिएट के साथ लगभग एक दशक तक काम किया है.)

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