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भारत भले न माने, पर यूएन को क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को हानिकारक रसायन की सूची में रखना चाहिए

जेनेवा में हानिकारक रसायनों की आधिकारिक अंतररारष्ट्रीय सूची पर नियंत्रण रखने वाले संयुक्त राष्ट्र रॉटरडम कंवेंशन के पक्षकारों का 10वां सम्मेलन चल रहा है. इस कंवेंशन के एनेक्सचर-3 में हानिकारक रसायनों के तौर पर वर्गीकृत पदार्थों की सूची है और कंवेंशन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इनके व्यापार पर प्रतिबंध लगाता है. इसमें क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को शामिल किए जाने का विरोध करने वाले देशों में भारत भी शामिल है, जबकि इसके कैंसरकारक होने की बात किसी से छिपी नहीं है.

क्राइसोटाइल एस्बेस्टस. (फोटो साभार: Eurico Zimbres/विकीमीडिया कॉमन्स/CC BY-SA 2.5)

नई दिल्ली: हानिकारक रसायनों की आधिकारिक अंतररारष्ट्रीय सूची पर नियंत्रण रखने वाले संयुक्त राष्ट्र रॉटरडम कंवेंशन (समझौता) के पक्षकारों का 10वां सम्मेलन (कोप-10), जेनेवा में 6 से 17 जून तक हो रहा है. इस कंवेंशन के अनुलग्नक (एनेक्सचर)-3 तीन में हानिकारक रसायनों के तौर पर वर्गीकृत पदार्थों की सूची दी गई है और यह कंवेंशन अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनके व्यापार पर प्रतिबंध लगाता है.

भारत उन सात देशों के समूह में शामिल है, जिन्होंने अनुलग्नक-3 में क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को शामिल किए जाने का विरोध किया है, जबकि इसके कैंसरकारक होने की बात से सभी वाकिफ है.

महत्वपूर्ण तरीके से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि ‘एस्बेस्टस से जुड़े रोगों को खत्म करने का सबसे कारगर तरीका हर तरह के एस्बेसटस के इस्तेमाल पर रोक लगाना है.’

विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह बयान इंटरनेशनल क्राइसोटाइल एसोसिएशन (आईसीए) के पिछले महीने एक गुमराह करने वाले बयान के बाद आया है, जिसमें आईसीए ने एस्बेस्टस कंपनियों के कारोबारी हितों का बचाव किया, लेकिन ऐसा करते हुए इसने क्राइसोटाइल एस्बेस्टस के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक नतीजों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया.

एक ज्ञात कैंसरकारक

दुनिया के कुल एस्बेस्टस उत्पादन में क्राइसोटाइल एस्बेस्टस का हिस्सा 90 फीसदी से ज्यादा है और इसका प्रसंस्करण घर्षण (फ्रिक्शन) उत्पादों, एस्बेस्टस सीमेंट, सीमेंट पाइप और शीट, गास्केट और मुहरें, पेपर और कपड़ा बनाने के लिया किया जाता है. क्राइसोटाइल फाइबर्स की सबसे ज्यादा खपत एस्बेस्टस आधारित सीमेंट उद्योग में है जो इसके कुल खपत का करीब 85 प्रतिशत था.

यह पदार्थ कैंसरकारक है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, ‘एस्बेस्टस, जिसमें क्राइसोटाइल शामिल है, से संपर्क फेफड़े, लैरिंक्स और ओवरी का कैंसर मेसोथेलिओमा (प्लूरल और पेरीटोनील लाइनिंग्स का कैंसर) और एस्बेसटोसिस (फेफेड़े का फाइब्रोसिस) का कारण बनता है.

एस्बेस्टस आधारित उत्पाद श्रमिकों, उनके परिवारों, उपभोक्ताओं और सामान्य तौर पर समुदायों के लिए उनके पूरे जीवनचक्र के दौरान जानलेवा होता है. भारत सरकार को इन मुद्दों की जानकारी है.

दिसंबर, 2016 में नेशनल हेल्थ पोर्टल पर प्रकाशित एक बयान के मुताबिक :

‘एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारियों का बोझ, उन देशों में भी, जहां 1990 के दशक की शुरुआत में एस्बेस्टस के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, अब भी बढ़ रहा है. एस्बेस्टस संबंधित रोगों की लंबी सुसुप्तावस्था (यानी प्रकट होने में लगने वाले लंबे समय) के कारण अगर एस्बेस्टस के उपयोग को अभी रोका जाता है, तो एस्बेस्टस संबंधित मौतों में कमी में आनेवाले कई दशक का वक्त लग जाएगा. एस्बेस्टस का कोई सुरक्षित उपयोग नहीं है और विश्व स्वास्थ्य संगठन [और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन] ने कोई सुरक्षित सीमा नहीं तय नहीं की है.’

लेकिन इसके बावजूद भारत सरकार का आधिकारिक पक्ष इसके ठीक विपरीत है: संयुक्त राष्ट्र को क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को खतरनाक रसायन घोषित करने से रोकना.

वास्तव में विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए बयान ने संयुक्त राष्ट्र के रॉटरडम कंवेंशन के पक्षकारों के 10वें सम्मेलन (कोप-10) से पहले सार्वजनिक राय को गुमराह करने की कोशिशों पर तत्काल पानी फेरने वाला था.

आईसीए के निदेशकों में भारतीय एस्बेस्टस उत्पाद निर्माता संघ के सदस्य भी हैं. वे और फाइबर सीमेंट उत्पाद निर्माता संघ के सदस्य विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों के उलट आईसीए के हवाले से अप्रमाणित दावों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं.

इन सबको अगर साथ मिलाकर देखा जाए, तो यह जेनेवा में 6 से 17 जून तक हो रहे कोप-10 में भाग ले रहे भारतीय प्रतिनिधि मंडल के लिए आईसीए के हानिकारक प्रभाव का विरोध न करने का बाध्यकारी तर्क तैयार करता है.

क्या है रॉटरडम कंवेंशन

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कुछ हानिकारक रसायनों और कीटनाशकों के लिए पूर्व सूचित सहमति की प्रक्रिया (Prior Informed Consent Procedure) से संबंधित रॉटरडम समझौते को 1998 में अपनाया गया था. यह 24 फरवरी, 2004 में प्रभाव में आया. यह देशों के लिए ‘पूर्व सूचित सहमति’ (पीआईसी) की प्रक्रिया को लागू करने के वास्ते कानूनी तौर पर बाध्यकारी कर्तव्यों का शब्दबद्ध करता है.

शोधकर्ताओं द्वारा सफेद क्राइसोटाइल एस्बेस्टस मिनरल फाइबर्स को कैंसरकारी करार देने और भारत के नेशनल स्वास्थ्य पोर्टल पर ऐसी सूचनाओं के प्रकाशन के बावजूद भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस पदार्थ को खतरनाक रसायनों की संयुक्त राष्ट्र की सूची- जो तकनीकी रूप से रॉटरडम संधि के अनुलग्नक-3 में सूचीबद्ध हैं- में शामिल करने का विरोध किया है.

यह अवैज्ञानिक पक्ष भारत के घरेलू कानूनों और सरकार द्वारा संसद में दिए गए जवाबों के भी उलट है.

2005 में रॉटरडम संधि की बैठक में, समझौते के तहत गठित केमिकल रिव्यू कमेटी (सीआरसी) ने पक्षकारों के सम्मेलन को क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को अनुलग्नक-3 में सूचीबद्ध करने की सिफारिश करने पर अपनी सहमति जताई थी.

सीआरसी, कंवेंशन के अनुच्छेद 18 के तहत स्थापित सरकार द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों का एक समूह है. यह समिति अनुलग्नक-3 में शामिल किए जा सकने वाले रसायन को परखती है. वर्तमान में क्राइसोटाइल पीआईसी प्रक्रिया में ‘औद्योगिक रसायन’ के तौर पर शामिल है. लेकिन ब्राजील और रूस जैसे देशों के विरोध के कारण इसे ‘खतरनाक रसायन’ की सूची में नहीं रखा गया है.

यह ध्यान में रखते हुए कि आम सहमति कायम करने के लिए सारी मुमकिन कोशिशें की जा चुकी हैं, स्विट्जरलैंड ने 2019 के कोप-9 में रॉटरडम कंवेंशन में एक नया अनुलग्नक-7 अपनाने के लिए मतदान कराने की मांग की. यह प्रस्तावित अनुलग्नक अनुपालन प्रक्रिया (कॉम्पलायंस मेकेनिज्म) पर सहमत न होनेवाले पक्षकारों से इससे बाहर रहने की इजाजत देता है.

इस पर हुए मतदान में 120 देशों ने इसका समर्थन और छह ने इसका विरोध किया.

कंवेशन में एस्बेस्टस का मुद्दा

एस्बेस्टस कंपनियां जब लोगों को एस्बेस्टस फाइबर्स के संपर्क में लाती हैं, तब वे मानवाधिकारों का हनन करती हैं. इस संदर्भ में, अपने लोगों के साथ ही साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना भारत सरकार का दायित्व है- जिस दिशा में पहला कदम सफेद क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को बढ़ावा देने वाले देशों से खुद को अलग करना होगा.

क्राइसोटाइल एस्बेस्टस का मुद्दा रॉटरडम कंवेंशन के पक्षकारों के तीसरे सम्मेलन कोप-3 से ही एजेंडा में रहा है. ऑस्ट्रेलिया, कोलंबिया, कनाडा, पेरू, जॉर्जिया, जापान, उरुग्वे, गैबन और कई अन्य देशों ने क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को अनुलग्नक-3 में सूचीबद्ध करने की मांग की है.

लेकिन भारत ने अनुलग्नक- 3 में क्राइसोटाइल को शामिल करने का विरोध करने के लिए पाकिस्तान, कजाखस्तान, सीरिया, रूस, जिंबाब्वे, किर्गिस्तान और इंटरनेशनल अलायंस ऑफ ट्रेड यूनियन ऑर्गेनाइजेशन ‘क्रिसोटाइल’ से हाथ मिला लिया. इसका तर्क है कि मानव स्वास्थ्य और प्रकृति पर इसके प्रभावों को लेकर नए साक्ष्यों का अभाव है.

दुर्भाग्यजनक तरीके से, यह रुख अख्तियार करके भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनिया भर के शोधकर्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रमाणों को नजरअंदाज कर रहा है. दरअसल भारतीय प्रतिनिधिमंडल का रवैया भारतीय फाइबर सीमेंट उत्पाद निर्माता संघ- एस्बेस्टस कंपनियों का समूह- के हितों के अनुरूप है.

कोप-9 में भारत और छह अन्य देशों के विरोध के चलते, अब क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को अनुलग्नक 3 में शामिल करने मसले पर कोप-10 में विचार किया जाएगा.

एस्बेस्टस फाइबर्स की माइक्रोस्कोपिक तस्वीर (साभार: US CDC)

विश्व स्वास्थ्य संगठन का बयान

इस पृष्ठभूमि में 23 मई, 2022 का संदेश महत्वपूर्ण है. इसमें इसने 2014 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट के निष्कर्षों को दोहराया है. संगठन के केमिकल सेफ्टी एंड हेल्थ यूनिट द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया था:

‘एस्बेस्टस के साथ क्राइसोटाइल की कैंसरकारी जोखिम की किसी सीमा रेखा की पहचान नहीं की गई है. एस्बेस्टस के संपर्क में रहनेवाले व्यक्ति में सिगरेट पीने से फेफड़े के कैंसर का जोखिम और बढ़ जाता है.

… क्राइसोटाइल का अभी भी व्यापक इस्तेमाल हो रहा है और इसका लगभग 90 फीसदी एस्बेस्टस सीमेंट उत्पादन सामग्रियों में होता है, जिसके सबसे बड़े उपयोगकर्ता विकासशील देश हैं. क्राइसोटाइल के अन्य उपयोग घर्षण सामग्रियों (7%) कपड़ा तथा इसके अन्य अनुप्रयोगों में हैं.’

केमिकल सेफ्टी एंड हेल्थ यूनिट से जुड़े वैज्ञानिक लेस्ली जे. ऑनिओन द्वारा तैयार नये बयान में यह भी कहा गया है,

‘क्राइसोटाइल का व्यापक तौर पर इस्तेमाल निर्माण सामग्रियों और गाड़ियों के पुर्जे बनाने में होता है, जहां श्रमिकों और आम लोगों को इसके संपर्क में आने से रोकना संभव नहीं है. क्राइसोटाइल के शुरुआती इस्तेमाल के बाद, इन उत्पादों का अपनी जगह पर क्षय होने लगता है और ये अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियां पेश करते हैं, खासकर प्राकृतिक तथा अन्य आपदाओं की स्थिति में.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह बयान इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कन्फेडरेशन में ऑक्यूपेशनल हेल्थ एडवाइजर रोरी ओ’ नील की एक चिट्ठी के जवाब में जारी किया, जिसमें उन्होंने वैश्विक एस्बेस्टस लॉबी द्वारा चलाए जा रहे जनसंपर्क अभियान का जिक्र किया था. ओ’ नील यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल स्कूल ऑफ लॉ एंड सोशल जस्टिस में प्रोफेसर हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए संदेश में यह भी जोड़ा गया:

‘‘विकासशील देशों में, क्राइसोटाइल विषाक्तता के बारे में जानकारी का प्रसार कम हो सकता है और लोगों संपर्क में आने से बचाना मुश्किल है. क्राइसोटाइल का उत्पादन और उसका उपयोग करने वाले देशों में मेसोथेलिओमा के मामले अवश्य होते हैं, लेकिन कई देशों में मेसोथेलिओमा का पता लगाने के लिए समुचित तंत्र नहीं है. इसलिए रिपोर्ट किए गए मामलों के न होने का मतलब मामलों का न होना नहीं है.’

आईसीए द्वारा क्राइसोटाइल एस्बेस्टस के ‘कम स्तर के संपर्क’ के हानिकाकर प्रभाव को स्वीकार करने से इनकार के जवाब में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दोहराया, ‘संपर्क के सुरक्षित स्तर का निर्धारण करना मुमकिन नहीं है.’

लेकिन इस बयान के पीछे एकमात्र कारण आईसीए का दावा नहीं था. संयुक्त राष्ट्र ने भी जेनेवा में 14 जून को कोप-10 के साथ-साथ एक और अन्य आयोजन को स्वीकृति दी है, जिसका विषय है: ‘एसडीजी : द कॉन्ट्रीब्यूशन ऑफ क्राइसोटाइल एस्बेस्टस’ (एसडीजी/सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स/ टिकाऊ विकास लक्ष्य : क्राइसोटाइल एस्बेस्टस का योगदान)

इस कार्यक्रम का आयोजन वैश्विक एस्बेस्टस लॉबी द्वारा किया जा रहा है- जो विडंबनापूर्ण ढंग से यह विचार कर रही है कि (क) क्राइसोटाइल एस्बेस्टस के कैंसरकारक होने के सबूत में कितना दम है और (ख) संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास लक्ष्य 3 स्वास्थ्य के अधिकार पर केंद्रित है.

अगर यह कार्यक्रम योजना के मुताबिक आयोजित होता है, तो इससे न सिर्फ एक अस्वस्थ परंपरा के स्थापित होने का खतरा है, साथ ही साथ संयुक्त राष्ट्र के कॉरपोरेट प्रभाव के सामने कमजोर पड़ने का संदेश भी जाएगा.

भारतीय प्रतिनिधि मंडल को दिया गया दिशानिर्देश

इन ताजा घटनाक्रमों का संज्ञान लेते हुए भारत सरकार को कोप-10 गए हुए अपने प्रतिनिधिमंडल को दिए गए आधिकारिक दिशानिर्देश में अवश्य बदलाव करना चाहिए. वर्तमान दिशानिर्देश में कहा गया है कि अनुलग्नक-3 में ‘रसायनों को सूचीबद्ध करने का नजीता व्यापार लागत में वृद्धि के तौर पर निकलेगा.

लेकिन इस हिसाब में ‘नकारात्मक अन्य खर्चों’ को नहीं जोड़ा गया है: हानिकारक रसायनों के अबाध व्यापार से स्वास्थ्य पर आने वाला खर्च.

भारत का पक्ष हमेशा से ही आईसीए के हितों के अनुरूप नहीं रहा है. 22 जून, 2011 को भारत सरकार की अतिरिक्त सचिव मीरा महर्षि के नेतृत्व वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को ‘हानिकारक रसायन’ के तौर पर सूचीबद्ध करने का समर्थन किया था और इसका भरपूर स्वागत हुआ था.

रॉटरडम कंवेंशन के तहत डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल्स एंड पेट्रोकेमिकल्स (डीसीपी) अधिकृत राष्ट्रीय प्राधिकरण है. मान लीजिए, एक देश अनुलग्नक-3 की सामग्री का दूसरे देश को निर्यात कर रहा है. अगर आयातक देश रॉटरडम कंवेशन का पक्षकार है, तो उसे इस सामग्री के बाबत अपनी आयात नीति की जानकारी पीआईसी सचिवालय को देनी होगी.

निर्यातक पक्ष को भी आयातक पक्ष को निर्यात अधिसूचना देनी होगी. भारत में डीसीपी के ऊपर इन अधिसूचनाओं का परीक्षण करने और निर्यातक पक्ष को जवाब देने की जिम्मेदारी है.

अगर भारत क्राइसोटाइल के आयात को लेकर इस प्रक्रिया से खुद को वंचित कर लेता है तो यह भारत की प्रतिष्ठा पर कोई चार चांद नहीं लगाएगा.

1995 में कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर बनाम भारत संघ के मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी श्रमिकों, इंसानों और स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए सभी तरह के एस्बेस्टस को समाप्त करने के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के प्रस्ताव को अपनाया था.

कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को भी अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के ताजा प्रस्तावों की रोशनी में अपने कानूनों को अपडेट करने के लिए कहा था.

जून, 2006 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने एस्बेस्टस पर एक संशोधित प्रस्ताव को अपनाया. संगठन की तरफ से कहा गया, ‘यह विचार करते हुए कि एस्बेस्टस के सभी रूप, जिसमें क्राइसोटाइल भी शामिल हैं, को इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर और इंटरनेशनल प्रोग्राम फॉर केमिकल सेफ्टी द्वारा ज्ञात इंसानी कैंसरकारक के तौर पर श्रेणीकृत किया गया है.’

संगठन ने यह संकल्प लिया है कि,

‘एस्बेस्टस और एस्बेस्टस मिली सभी सामग्रियों के सभी रूपों में उपयोग पर प्रतिबंध और उसका अंत श्रमिकों को एस्बेस्टस के संपर्क में आने से बचाने और इस तरह से भविष्य में एस्बेस्टस से संबंधित रोगों और मौतों को रोकने का सबसे प्रभावशाली साधन है.’

लेकिन भारत की सरकारों ने भारतीय श्रम संगठन के 2006 के प्रस्ताव के अनुरूप अपने कानूनों को अपडेट नहीं किया है.

निष्पक्ष तरीके से कहा जाए, तो भारतीय सरकार ने एस्बेस्टस अपशिष्ट के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया है, 7,083 रेलवे स्टेशनों को एस्बेस्टस मुक्त कर रही है और इसने ‘ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड’ 2020 नाम से एक कानून बनाया है, जिसमें एस्बेस्टस का उल्लेख हानिकारक पदार्थ और एस्बेस्टोसिस को एक अधिसूचित किए जाने लायक रोग के तौर पर किया गया है.

इन नीतियों की अगली कड़ी के तौर पर इसे कोप-5 में प्रदर्शित अपने रुख को (फिर से) अपनाना चाहिए और क्राइसोटाइल एस्बेस्टस को अनुलग्नक 3 में सूचीबद्ध करने की इजाजत देनी चाहिए.

गोपाल कृष्ण कानून एवं सार्वजनिक नीति शोधकर्ता और अधिवक्ता हैं. उनका डिजर्टेशन ‘रोल एंड फंक्शंस ऑफ डब्ल्यूटीओ ट्रिब्यूनल इन एस्बेस्टस केस: अ रिव्यू विद स्पेशल रेफरेंस टू दि पोजीशन ऑफ इंडिया एंड ब्राजील ’ विषय पर था. वे 2002 से www.asbetsosfreeindia.org का संपादन भी कर रहे हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)