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सीआईसी ने भारतीय सुरक्षा प्रेस को चुनावी बॉन्ड के मुद्रण लागत की जानकारी देने का निर्देश दिया

राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा शुरू किए गए चुनावी बॉन्ड की छपाई की कुल लागत की जानकारी हासिल करने की ख़ातिर भारतीय सुरक्षा प्रेस को आरटीआई आवेदन दिया था. हालांकि भारतीय सुरक्षा प्रेस ने तर्क दिया था कि सूचना सार्वजनिक किए जाने से देश के आर्थिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

(फोटो साभार: cic.gov.in)

नई दिल्ली: केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने भारतीय सुरक्षा प्रेस (आईएसपी) को निर्देश दिया है कि वह एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) आवेदक को चुनावी बॉन्ड के मुद्रण की कुल लागत के साथ-साथ संबद्ध लागत की जानकारी प्रदान करे.

सूचना आयुक्त वीएन सरना ने भारतीय सुरक्षा प्रेस के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सूचना सार्वजनिक किए जाने से देश के आर्थिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. भारतीय सुरक्षा प्रेस ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून की धारा 8 (1) (ए) के तहत सुरक्षा की गारंटी का जिक्र किया था.

कानून की इस धारा के तहत किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसी जानकारी सार्वजनिक नहीं करने का अधिकार है, जिसके सामने आने से भारत की संप्रभुता और अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है या राज्य की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हित प्रभावित हो सकते हैं.

आरटीआई कार्यकर्ता कमोडोर (अवकाश प्राप्त) लोकेश बत्रा ने राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा शुरू किए गए चुनावी बॉन्ड की छपाई की कुल लागत की जानकारी हासिल करने की खातिर भारतीय सुरक्षा प्रेस को आरटीआई आवेदन दिया था.

इस साल मार्च में सरकार द्वारा लोकसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, 2018 से अब तक विभिन्न चुनावों के लिए 9,187 करोड़ रुपये मूल्य के 9,208 करोड़ चुनावी बॉन्ड बेचे जा चुके हैं.

भारतीय सुरक्षा प्रेस ने आरटीआई कानून की धारा 8 (1) (ए) का जिक्र करते हुए सूचना देने से इनकार किया था. बत्रा ने इसे आयोग के समक्ष चुनौती दी जो आरटीआई मामलों में सर्वोच्च निर्णायक निकाय है.

सूचना आयुक्त ने कहा कि उसी अपीलकर्ता के अन्य आरटीआई आवेदनों के संबंध में इसी तरह की जानकारी पहले भी प्रदान की जा चुकी है और वह जानकारी आर्थिक मामलों के विभाग, वित्त मंत्रालय द्वारा दी गई थी.

आयोग ने कहा कि इसलिए एसपीएमसीआईएल (सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) के सीपीआईओ (केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी) द्वारा इनकार किया जाना स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इस तरह की जानकारी मंत्रालय द्वारा पहले ही आरटीआई कानून के तहत किसी छूट का जिक्र किए बिना दी जा चुकी है.

इसके साथ ही आयोग ने सीपीआईओ को मांगी गई जानकारी प्रदान करने का निर्देश दिया.

चुनाव आयोग स्पष्ट करे कि चुनावी बॉन्ड के सभी जानकारी मुहैया कराई गई: सीआईसी

इसके अलावा केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने निर्वाचन आयोग को एक हलफनामा दाखिल करके यह बताने का निर्देश दिया है कि उसने एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) आवेदक को चुनावी बॉन्ड तथा वित्त अधिनियम में संशोधन के बारे में सभी जानकारियां उपलब्ध करा दी है.

सीआईसी ने कहा है कि निर्वाचन आयोग एक ‘नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर’ पर यह भी स्पष्ट करे कि उसने ऐसी कोई अन्य जानकारी नहीं छिपाई है, जिसे आरटीआई अधिनियम के तहत मुहैया कराया जा सकता है.

आरटीआई कार्यकर्ता कमोडोर (अवकाश प्राप्त) लोकेश बत्रा ने वित्त अधिनियम में 2017 के संशोधन के बाद चुनावी बॉन्ड की शुरुआत से संबंधित पूरा रिकॉर्ड निर्वाचन आयोग से मांगा था.

निर्वाचन आयोग ने इसके जवाब में कहा था कि उसके पास अभी तक मौजूद सभी जानकारी मुहैया कराई थी.

केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष सुनवाई के दौरान बत्रा ने दावा किया कि चुनाव आयोग द्वारा मुहैया कराए गए रिकॉर्ड से पता चलता है कि प्रदान की गई फाइल से जुड़ी कोई अन्य फाइल (लिंक फाइल) भी है.

निर्वाचन आयोग ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि बत्रा द्वारा मांगी गई जानकारी के संबंध में उपलब्ध सभी रिकॉर्ड उन्हें पहले ही मुहैया करा दिए गए हैं.

मुख्य सूचना आयुक्त वाईके सिन्हा ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि ‘नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर’ पर वह एक हलफनामा दाखिल करे कि संबंधित विषय पर कोई और जानकारी जैसे लिंक फाइल/पार्ट फाइल या न्यू फाइल उनके पास आधिकारिक रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है, जिसे आरटीआई अधिनियम के तहत प्रदान किया जा सकता है.

आदेश में कहा गया है, ‘इस आदेश की प्राप्ति के तीन सप्ताह के भीतर प्रतिवादी द्वारा हलफनामा प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिसकी एक प्रति आयोग को 15 जुलाई, 2020 तक मुहैया कराई जाए. यह स्पष्ट किया जाता है कि इन निर्देशों का पालन न करने पर कानून के तहत उचित कार्रवाई की जाएगी.’

चुनावी बॉन्ड को लेकर क्यों है विवाद

चुनाव नियमों के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति या संस्थान 2,000 रुपये या इससे अधिक का चंदा किसी पार्टी को देता है तो राजनीतिक दल को दानकर्ता के बारे में पूरी जानकारी देनी पड़ती है.

हालांकि चुनावी बॉन्ड ने इस बाधा को समाप्त कर दिया है. अब कोई भी एक हजार से लेकर एक करोड़ रुपये तक के चुनावी बॉन्ड के जरिये पार्टियों को चंदा दे सकता है और उसकी पहचान बिल्कुल गोपनीय रहेगी.

इस माध्यम से चंदा लेने पर राजनीतिक दलों को सिर्फ ये बताना होता है कि चुनावी बॉन्ड के जरिये उन्हें कितना चंदा प्राप्त हुआ.

इसलिए चुनावी बॉन्ड को पारदर्शिता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना जा रहा है. इस योजना के आने के बाद से बड़े राजनीतिक दलों को अन्य माध्यमों (जैसे चेक इत्यादि) से मिलने वाले चंदे में गिरावट आई है और चुनावी बॉन्ड के जरिये मिल रहे चंदे में बढ़ोतरी हो रही है.

चुनावी बॉन्ड योजना को लागू करने के लिए मोदी सरकार ने साल 2017 में विभिन्न कानूनों में संशोधन किया था.

चुनाव सुधार की दिशा में काम कर रही गैर-सरकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने इन्हीं संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. हालांकि कई बार से इस सुनवाई को लगातार टाला जाता रहा है.

याचिका में कहा गया है कि इन संशोधनों की वजह से विदेशी कंपनियों से असीमित राजनीतिक चंदे के दरवाजे खुल गए हैं और बड़े पैमाने पर चुनावी भ्रष्टाचार को वैधता प्राप्त हो गई है. साथ ही इस तरह के राजनीतिक चंदे में पूरी तरह अपारदर्शिता है.

साल 2019 में चुनावी बॉन्ड के संबंध में कई सारे खुलासे हुए थे, जिसमें ये पता चला कि आरबीआई, चुनाव आयोग, कानून मंत्रालय, आरबीआई गवर्नर, मुख्य चुनाव आयुक्त और कई राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस योजना पर आपत्ति जताई थी.

हालांकि वित्त मंत्रालय ने इन सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए चुनावी बॉन्ड योजना को पारित किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)