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हैदरपोरा एनकांउटर में मृत तीसरे नागरिक के शव निकालने की याचिका पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने बीते 27 मई को अधिकारियों से मोहम्मद लतीफ़ माग्रे की मौजूदगी में हैदरपोरा एनकाउंटर में मृत उनके बेटे आमिर के अवशेषों को निकालने का आदेश दिया था. हालांकि छह जून को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस पर रोक लगा दी थी. आमिर उन चार लोगों में से एक थे, जो नवंबर 2021 को श्रीनगर के हैदरपोरा में एनकाउंटर में मारे गए थे. इनमें से दो लोगों के शव विरोध के बाद उनके परिजनों को उसी समय सौंप दिए गए थे.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ‘हैदरपोरा पुलिस एनकांडटर’ में मारे गए एक युवक के पिता की उस याचिका पर 27 जून को सुनवाई करने पर शुक्रवार को सहमति जता दी, जिसमें उसने अपने बेटे का शव (कब्र से) निकालकर अंतिम संस्कार के लिए परिवार को सौंपने का अनुरोध किया है.

जम्मू कश्मीर में श्रीनगर के हैदरपोरा इलाके में पिछले साल नवंबर में आमिर लतीफ माग्रे एवं तीन अन्य युवक को आतंकवादी बताकर कथित मुठभेड़ में मार गिराया गया था.

मृतक आमिर के पिता मोहम्मद लतीफ माग्रे की याचिका में जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की खंडपीठ के तीन जून के आदेश को चुनौती दी गई है.

मोहम्मद लतीफ माग्रे की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने जस्टिस सीटी रवि कुमार और जस्टिस सुधांशु धूलिया की अवकाशकालीन पीठ को बताया कि जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने माग्रे के बेटे का शव कब्र से निकालने की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में खंडपीठ ने इस पर रोक लगा दी थी.

ग्रोवर ने कहा कि उनके मुवक्किल ने जीवन भर सेना का समर्थन किया है और बेटे आमिर माग्रे का शव निकालने का एकमात्र मकसद अंतिम संस्कार करना है.

ग्रोवर ने याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध करते हुए कहा कि हर गुजरते दिन के साथ, शव को निकालना और मुश्किल होता जाएगा और शीर्ष अदालत के कई फैसले उनके पक्ष में हैं.

पीठ ने याचिका की सुनवाई के लिए 27 जून की तारीख मुकर्रर की.

हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश ने बीते 27 मई को जम्मू कश्मीर के अधिकारियों से मोहम्मद लतीफ माग्रे की मौजूदगी में शव के अवशेषों को निकालने का आदेश दिया था.

हालांकि जस्टिस संजीव कुमार ने 13 पृष्ठों के अपने आदेश में कहा था कि अगर शव ‘पूरी तरह सड़ गया है’ और इसे कब्र से निकालने से सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता को खतरा पहुंचता है तो याचिकाकर्ता और उसके करीबी रिश्तेदारों को वद्देर पायीन कब्रिस्तान (हंडवाड़ा) में ही उनकी परंपरा और धार्मिक मान्यता के अनुसार अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी जाएगी.

उस स्थिति में एकल न्यायाधीश की पीठ ने कहा था कि सरकार याचिकाकर्ता को अपनी परंपराओं के अनुसार गरिमापूर्ण तरीके से उनके बेटे का अंतिम संस्कार करने से वंचित रखने के लिए मुआवजे के तौर पर परिवार को पांच लाख रुपये पांच लाख रुपये का भुगतान करेगी और पारिवारिक परंपराओं, धार्मिक दायित्वों और विश्वास के अनुसार एक उचित अंतिम संस्कार कराएगी.

मालूम हो कि 15 नवंबर 2021 की शाम श्रीनगर के हैदरपोरा इलाके में गोलीबारी हुई थी. इस दौरान पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बलों की एक संयुक्त टीम ने आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना मिलने पर एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की घेराबंदी की थी.

इस मुठभेड़ में एक पाकिस्तानी आतंकवादी और तीन अन्य व्यक्ति मारे गए थे और पुलिस ने दावा किया था कि मारे गए सभी लोगों के आतंकवाद से संबंध थे. तीनों के परिवारों ने उनके निर्दोष होने का दावा किया था, जिसके बाद पुलिस को जांच के आदेश देने पड़े थे.

मुठभेड़ के दौरान तीन व्यक्तियों- व्यापारी मोहम्मद अल्ताफ़ भट (शॉपिंग कॉम्प्लेक्स मालिक), दंत चिकित्सक डॉ. मुदसिर गुल (इमारत से कॉल सेंटर चलाने वाले व्यक्ति) और आमिर माग्रे (गुल के साथ कथित तौर पर काम करने वाला लड़का) की मौत हो गई थी.

एनकाउंटर में इन चार लोगों के मारे जाने के बाद श्रीनगर से 70 किलोमीटर दूर हंदवाड़ा में जम्मू कश्मीर पुलिस ने जल्दबाजी में उन्हें दफना दिया था.

मारे गए तीन लोगों के परिवार के सदस्यों (चौथा कथित तौर पर पाकिस्तान का एक आतंकवादी था) ने पुलिस के दावे का विरोध किया था कि वे या तो आतंकवादी थे या उनके आतंकवादियों के साथ संबंध थे.

जम्मू कश्मीर पुलिस ने 2020 में फैसला किया था कि वह ‘आतंकवादियों’ के शव उनके परिवार के सदस्यों को नहीं सौंपेगी और कानून एवं व्यवस्था की स्थिति से बचने के लिए अलग स्थानों पर उनका शव दफनाएगी.

एनकाउंटर की प्रमाणिकता को लेकर जन आक्रोश और विरोध के तीन दिन बाद जम्मू कश्मीर प्रशासन दबाव में आया और उसने दो मृतकों- अल्ताफ अहमद भट (जिस इमारत में एनकाउंटर हुआ, उसके मालिक) और डॉ. मुदासिर गुल (इमारत से कॉल सेंटर चलाने वाले व्यक्ति) के शवों को उनके परिवारों को सौंप दिया. हालांकि माग्रे का शव उनके परिजनों के सुपुर्द नहीं किया गया था.

इसके बाद उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 18 नवंबर को इस मामले में मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए थे. इसके अलावा इस एनकाउंटर के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस ने इसे लेकर एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन भी किया था.

दिसंबर 2021 में एसआईटी ने हैदरपोरा एनकाउंटर में सुरक्षाबलों की किसी साजिश से इनकार कर दिया था. एसआईटी के प्रमुख उपमहानिरीक्षक सुजीत के. सिंह ने एक प्रकार से सुरक्षाबलों को क्लीनचिट दे दी थी, लेकिन यह भी कहा था कि यदि कोई अन्य सबूत सामने आता है तो यह दल अपने निष्कर्ष पर पुनर्विचार करने को तैयार है.

इतना ही नहीं एनकाउंटर पर सवाल उठाने को लेकर इस साल जनवरी में जम्मू कश्मीर के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिलबाग सिंह ने कहा था कि कुछ लोग आतंकवाद का चतुराई से समर्थन करके ‘नरम अलगाववाद’ में लिप्त हैं.

सिंह ने हैदरपोरा एनकाउंटर को ‘साफ-सुथरा’ करार दिया और सुरक्षा बलों को दी गई ‘क्लीनचिट’ पर सवाल उठाने वाले नेताओं को जांच दल के समक्ष सबूत पेश करने के लिए कहा था. सिंह ने कहा था कि वह कश्मीर में नेताओं के एक वर्ग के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से आहत हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)