भारत

देश में मौजूदा हालात डर की वजह बन गए हैं: अमर्त्य सेन

कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान नोबेल सम्मानित अर्थशास्त्री ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका अक्सर विखंडन के ख़तरों की अनदेखी करती है, जो डराने वाला है. एक सुरक्षित भविष्य के लिए न्यायपालिका, विधायिका और नौकरशाही के बीच संतुलन होना ज़रूरी है, जो भारत में नदारद है. यह असामान्य है कि लोगों को सलाखों के पीछे डालने के लिए औपनिवेशिक क़ानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

अमर्त्य सेन. (फोटो: रॉयटर्स)

कोलकाता: नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने भारत में मौजूदा हालात पर चिंता जताई और कहा कि लोगों को एकता बनाए रखने की दिशा में काम करना चाहिए.

नोबेल पुरस्कार विजेता ने कहा कि देश के हालात ने उन्हें भयभीत कर दिया है, यह देखते हुए कि- विभाजनों से निपटने में न्यायपालिका की भूमिका सीमित है और यह ‘असाधारण’ है कि औपनिवेशिक काल के कानूनों का इस्तेमाल आज के समय में लोगों को जेल में डालने के लिए किया जा रहा है.

प्रख्यात अर्थशास्त्री ने गुरुवार को सॉल्ट लेक इलाके में अमर्त्य अनुसंधान केंद्र के उद्घाटन पर कहा, ‘मुझे लगता है कि अगर कोई मुझसे पूछता है कि मैं किसी चीज से भयभीत हूं तो मैं कहूंगा ‘हां’. अब भयभीत होने की वजह है. देश में मौजूदा हालात डर की वजह बन गए हैं.’

उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आधार पर विभाजन नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि देश एकजुट रहे. मैं ऐसे देश में विभाजन नहीं चाहता, जो ऐतिहासिक रूप से उदार था. हमें एक साथ मिलकर काम करना होगा.’

उन्होंने कहा कि भारत केवल हिंदुओं या मुसलमानों का नहीं हो सकता. उन्होंने देश की परंपराओं के आधार पर एकजुट रहने की आवश्यकता पर जोर दिया.

सेन ने कहा, ‘भारत केवल हिंदुओं का देश नहीं हो सकता. साथ ही अकेले मुसलमान भारत का निर्माण नहीं कर सकते. हर किसी को एक साथ मिलकर काम करना होगा.’

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, उन्होंने कहा कि इस समय केवल सहिष्णुता से काम नहीं चलेगा.

उन्होंने कहा, ‘भारत में सहिष्णुता की एक अंतर्निहित संस्कृति है लेकिन वक्त की जरूरत है कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ काम करें.’

सेन ने भारत की सहिष्णुता की संस्कृति के उदाहरण के रूप में इस तथ्य का हवाला दिया कि यहूदी, ईसाई और पारसी युगों से भारत में सह-अस्तित्व में हैं.

उन्होंने उपासना स्थलों को लेकर हुए हालिया विवादों पर कहा कि उन्होंने सोचा भी नहीं था कि हिंदू एक समूह के रूप में ‘ताजमहल का श्रेय लेने में सक्षम होंगे.’

सेन ने सामंजस्यपूर्ण संस्कृति का जिक्र करते हुए दारा शिकोह, रविशंकर और अली अकबर खान की बात की.

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह ने 50 उपनिषदों का मूल संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया और इससे दुनिया को हिंदू धर्मग्रंथों, हिंदू संस्कृति और हिंदू परंपराओं के बारे में जानने में मदद मिली. रविशंकर और अली अकबर खान के राग और संगीत विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ आने का प्रमाण हैं. आज के भारत में ऐसे सहयोग की जरूरत है, यहां (केवल) सहिष्णुता की बात करने से समाज के बंटने के खतरों का समाधान नहीं होगा.’

उन्होंने जोड़ा कि भारत में सहिष्णुता की संस्कृति रही है, जिसके कारण ही यहूदी, ईसाई और पारसी यहां बरसों से साथ रहते आए हैं.

कानून और न्यायपालिका

अपने संबोधन में सेन ने न्यायपालिका और उसकी निष्क्रिय भूमिका की भी आलोचना की.

उन्होंने कहा, ‘भारतीय न्यायपालिका अक्सर विखंडन के खतरों की अनदेखी करती है, जो डराने वाला है. एक सुरक्षित भविष्य के लिए न्यायपालिका, विधायिका और नौकरशाही के बीच संतुलन होना जरूरी है, जो भारत में नदारद है. यह असामान्य है कि लोगों को सलाखों के पीछे डालने के लिए औपनिवेशिक कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.’

सेन पहले भी उन कानूनों के खिलाफ मुखर रहे हैं जो असहमति जताने वालों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाते हैं.

इस साल की शुरुआत में द वायर  से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए बेहद खराब है क्योंकि यह लोगों को गिरफ्तार करने की अनुमति देता है जहां कोई अपराध नहीं है या जो उन्हें अदालत में उन्हें दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन उन्हें इस आधार पर जेल में रखा जाता है कि वे कुछ गलत कर सकते हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)