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जीएसटी के पांच साल: इस जटिल कर व्यवस्था को और आसान बनाने की ज़रूरत है

पिछले पांच वर्षों में जीएसटी क़ानून निश्चित रूप से बदलाव हुए हैं और समय-समय पर संशोधनों के ज़रिये करदाताओं के सामने आने वाले कई मुद्दे स्पष्ट हुए हैं. लेकिन अब भी कई ऐसे मसले बाक़ी हैं जो जीएसटी व्यवस्था के अमल को प्रभावित करते हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

भारत में वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था अब पांच साल पुरानी है. 1 जुलाई 2017 को शुरू की गई जीएसटी व्यवस्था का उद्देश्य देश में अप्रत्यक्ष कर एकत्र करने के तरीके में सुधार करना था. जीएसटी के पीछे का आदर्श वाक्य था ‘एक राष्ट्र, एक बाजार, एक कर. इसके  कार्यान्वयन के पीछे का विचार यह था कि यह सभी हितधारकों के लिए एक आदर्श समाधान पेश कर सकता है, चाहे वह केंद्र या राज्यों की सरकारें हों, करदाता या कर प्रशासक हों.

इस व्यवस्था के तहत देश अप्रत्यक्ष कर पर अधिक निर्भर है, जो उन सभी पर लागू होता है जो खरीदारी करते हैं या किसी सेवा का उपयोग करते हैं. इन पांच वर्षों में कर ढांचे में बड़े बदलाव हुए हैं. 33 सदस्यीय जीएसटी परिषद 2017 के बाद से लगभग 50 बार मिल चुकी है. प्रत्येक बैठक में या तो कर दर स्लैब, जीएसटी नियमों और विनियमों, या जीएसटी व्यवस्था के किसी अन्य पहलू में बदलाव लागू किया जाता है.

हाल ही में जीएसटी परिषद की 28-29 जून की बैठक में दही, छाछ, पनीर से लेकर बर्तन, स्टेशनरी, एलईडी लैंप, सोलर वॉटर हीटर तक दो दर्जन से अधिक वस्तुओं और सेवाओं पर कर बढ़ाने का निर्णय लिया गया था. चेक जारी करने के लिए बैंकों द्वारा लिए गए शुल्क पर 18% जीएसटी लगाया जाएगा. मौजूदा टैक्स छूट के मुकाबले, 1,000 रुपये से कम के होटल के कमरों पर अब 12% टैक्स लगेगा.

जीएसटी के कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं. राजस्व में उछाल आने लगा है. मार्च 2022 के बाद से लगातार तीसरे महीने में संग्रह लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर गया.

अप्रैल 2022 में संग्रह 20% बढ़कर लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये के नए उच्च स्तर पर पहुंचा. यह वृद्धि राज्यों में भी देखी गई. यह लगातार ग्यारहवां महीना था जब कुल जीएसटी संग्रह 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर आया, जो जीएसटी व्यवस्था के एक निश्चित स्थिरीकरण को दर्शाता है. बड़ी कंपनियों का दावा है कि वे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ का अनुभव कर रही हैं.

‘डेलॉइट जीएसटी@5 सर्वेक्षण 2022’ के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत भारतीय उद्योग जगत के नेताओं का मानना है कि जीएसटी ने देश भर में बाधाओं को कम करके व्यापार करना आसान बना दिया है.

सर्वेक्षण में पाया गया कि जीएसटी व्यवस्था ने उपभोक्ताओं के लिए वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है, साथ ही कंपनियों को उनकी आपूर्ति श्रृंखला को अनुकूलित करने में मदद की है.

पिछले पांच वर्षों में जीएसटी कानून निश्चित रूप से विकसित हुआ है और समय पर स्पष्टीकरण और संशोधन के माध्यम से करदाताओं के सामने आने वाले कई मुद्दे स्पष्ट हुए हैं. लेकिन कई विवादास्पद मुद्दे हैं जो जीएसटी व्यवस्था के अमल को प्रभावित करते हैं.

सबसे पहले इसने बड़ी संख्या में आम लोगों को कर के दायरे में लाकर अधिक असमानता की संभावना को जन्म दिया है. अप्रत्यक्ष कर प्रतिगामी प्रकृति के होते हैं और यह गरीबों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है.

2017-18 में इसकी शुरुआत के बाद से, सकल कर राजस्व के प्रतिशत के रूप में प्रत्यक्ष और कॉरपोरेट करों से राजस्व का हिस्सा घट गया था. वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान प्रत्यक्ष कर धीरे-धीरे 52% से घटकर 47% हो गया और इन पांच वर्षों में कॉरपोरेट टैक्स 32% से घटकर 24% हो गया.

यह अभी भी एक सीमित कर मॉडल है जिसका विस्तार नहीं किया गया है और इसके बाहर की वस्तुएं केंद्र की अप्रत्यक्ष कर का लगभग 40% हिस्सा बनती हैं.

‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की हकीकत धुंधली नजर आती है. गुजरात में राज्य के वाणिज्यिक कर विभाग के अनुसार, 2.75 लाख व्यवसायों ने अपना जीएसटी पंजीकरण सरेंडर कर दुकानें बंद कर दी हैं. यह संख्या गुजरात में मौजूदा 11.1 लाख करदाताओं में से एक-चौथाई है. इनमें से लगभग 1.24 लाख व्यवसाय पिछले दो वर्षों में महामारी के बाद से बंद हो गए हैं.

आमतौर पर दिए जाने वाले एक स्पष्टीकरण के अनुसार, समग्र आर्थिक मंदी की स्थिति, अतिरिक्त अनुपालन बोझ और महामारी से उपजे व्यवधान, व्यवसायों के बंद होने के लिए जिम्मेदार हैं.

लेकिन राज्य के वाणिज्यिक कर विभाग के सूत्र कुछ और ही तस्वीर पेश करते हैं. उनके मुताबिक, ‘बहुत से लोग व्यापार की उम्मीद में स्वेच्छा से जीएसटी पंजीकरण प्राप्त करते हैं लेकिन जब उन्हें रिटर्न दाखिल न करने के लिए पेनल्टी नोटिस मिलने लगते हैं, तो वे अक्सर अपना पंजीकरण सरेंडर कर देते हैं, जो व्यवसाय बंद होने का एक कारण है.’

गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के वरिष्ठ उपाध्यक्ष पथिक पटवारी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘नई कर व्यवस्था मासिक रिटर्न फाइलिंग और कर भुगतान के साथ बहुत सारी अनुपालन आवश्यकताओं को साथ लेकर आई है. इसके कारण, कई छोटे व्यवसाय जिनके पास एक बड़ा कोष नहीं है या जो लंबे भुगतान चक्र (पेमेंट साइकिल) के साथ काम करते हैं, उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा.’

मुआवजा बढ़ाने की राज्यों की मांग को अभी तक संबोधित नहीं किया गया है. जब जुलाई, 2017 से राष्ट्रव्यापी जीएसटी में 17 केंद्रीय और राज्य शुल्क शामिल हो गए, तो यह निर्णय लिया गया कि राज्यों को नए कर से राजस्व के किसी भी नुकसान के लिए पांच साल के लिए मुआवजा दिया जाएगा. वह समय सीमा 30 जून को समाप्त हो गई.

अगस्त के पहले सप्ताह में जीएसटी परिषद की अगली बैठक में अंतिम निर्णय लिए जाने की संभावना है.

रसीदें नहीं देने की प्रथा अभी भी अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों में प्रचलित है और राष्ट्रीय मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकरण (National Anti-profiteering Authority- एनएए) के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं.

जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण का गठन अभी तक नहीं किया गया है. तकनीकी दिक्कतें अभी पूरी तरह से दूर नहीं हुई हैं. गुड्स एंड सर्विस टैक्स नेटवर्क (या जीएसटीएन) द्वारा प्रबंधित आईटी प्रणाली को बार-बार गड़बड़ियों का सामना करना पड़ता है, और फिर रिटर्न के लिए समय सीमा को कई बार बढ़ाना पड़ता है.

टैक्स फाइल करने वालों के लिए कई अनुपालन समस्याएं मौजूद हैं. उदाहरण के लिए, आयकर अधिनियम और पूर्ववर्ती वैट के विपरीत, जिसने संशोधित रिटर्न दाखिल करने की अनुमति है, जीएसटी रिटर्न दाखिल करते समय कोई गलती होने से  इसकी अनुमति नहीं है.

जीएसटी कानून में, चालान की तारीख से 180 दिनों के भीतर विक्रेता को भुगतान करने के विफल रहने की स्थिति में करदाता को आउटपुट कर देयता में इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) जोड़ना आवश्यक है. लेकिन इससे एमएसएमई के हितों को ठेस पहुंची है क्योंकि अधिकांश 180 दिनों के भीतर अपने आपूर्तिकर्ता को भुगतान करने में सक्षम नहीं हैं.

भुगतान में देरी के मामले में, जिस ब्याज दर ( 24% से 18% तक) की मांग की गई है, वह बहुत अधिक है, जो करदाताओं के लिए तनाव का एक कारण है.

2019 में वित्त मंत्री ने संसद में अपने भाषण में स्पष्ट रूप से कहा कि, ई-चालान पेश होने के बाद, अलग ई-वे बिल की कोई आवश्यकता नहीं होगी. लेकिन फिर भी एक ही जानकारी वाले ई-चालान और ई-वे बिल दोनों दस्तावेजों की आवश्यकता होती है, जिससे अनुपालन संबंधी बोझिल समस्याएं पैदा होती हैं.

पांच साल बाद, जीएसटी व्यवस्था, जिसमें राजस्व में उछाल, व्यापार करने में आसानी और छिपे हुए करों को समाप्त करने की उम्मीद थी, एक मिश्रित अनुभव रहा है.

अर्थव्यवस्था ठीक होने की ओर अग्रसर है, और कई विदेशी कंपनियां भारत को एक गंतव्य के रूप में देख रही हैं, सरकार के लिए जीएसटी यात्रा में इस महत्वपूर्ण मोड़ पर गड़बड़ियों को हल करने के लिए सकारात्मक कदम उठाना समझदारी होगी.

(वैशाली बसु शर्मा रणनीतिक और आर्थिक मसलों की विश्लेषक हैं. उन्होंने नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटरिएट के साथ लगभग एक दशक तक काम किया है.)