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आज न कोई कबीर नज़र आता है, न किसी नए पीटर ब्रुक की आहट सुनाई देती है…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पीटर ब्रुक ने पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विश्व रंगमंच पर महाकाव्यात्मक दृष्टि का एक तरह से पुनर्वास किया. शेक्सपियर, अत्तार, महाभारत आदि सभी नाटक उनके लिए मनुष्य के संघर्ष, व्यथा-यंत्रणा, हर्ष-विषाद, उल्लास और उदासी, सार्थकता और व्यर्थता, उत्कर्ष और पराजय आदि की कथा कहने जैसे थे.

पीटर ब्रुक. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

1982 के शुरुआती दिन थे और भोपाल में हम ‘भारत भवन’ के फरवरी में प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन की तैयारियों में जुटे हुए थे. हमने बहुत उत्साह से उस अवसर पर संसार के मूर्धन्य लोगों को आमंत्रित करने का उपक्रम किया. उनमें आक्तावियो पाज़, ईव बोनफुआ, क्लोद लेवी-स्त्रास, हैरोल्ड रोजे़नबर्ग आदि शामिल थे. हमारा न्योता स्वीकार किया उस समय संसार के श्रेष्ठ रंगनिर्देशकों में गिने जाने वाले ब्रिटिश मूल के पेरिस में बसे पीटर ब्रुक ने.

वे आए और उन्होंने एक रंगकार्यशाला भी की जिसमें दर्शक की तरह शंभू मित्र, हबीब तनवीर, विजय मेहता, बीवी कारंत, नेमिचंद्र जैन आदि शामिल थे. उनसे अनौपचारिक गपशप भी होती रही और पता चला कि उनके मन में ‘महाभारत’ जैसे विशाल महाकाव्य को एक लंबे-बड़े नाटक के रूप में प्रस्तुत करने की आकांक्षा है.

भोपाल के बाद वे भारत के कुछ हिस्सों में भी गए- मुझे केरल की याद है. उसके बाद वे कई बार भारत आए. उनके ‘महाभारत’ का आलेख तैयार किया था फ्रेंच नाटकों और फिल्मों के आलेखक ज़्यों क्लो कारिये ने जिनकी भी, लगभग एक बरस पहले, मृत्यु हो गई. अब पीटर ब्रुक भी अपने इस मित्र का साथ देने देवलोक चले गए.

मेरा जब पेरिस जाना शुरू हुआ तो ख़याल आया कि उनसे संपर्क करूं. एक बार उनके सौजन्य से चेख़व का एक नाटक उनकी अपनी रंगशाला में देखने का सुयोग भी जुटा. इस बीच वे लगातार अपने ‘महाभारत’ पर काम करते रहे थे.

1984 में एक दिन मुझे पीटर ब्रुक का फ़ोन आया कि वे अगले आविन्यों महोत्सव में ‘महाभारत’ प्रस्तुत करने जा रहे हैं और वे चाहते हैं कि मैं उस अवसर पर उपस्थित रहूं. उन्होंने इस आशय का एक पत्र प्रधानमंत्री की संस्कृति सलाहकार पुपुल जयकर को भी लिखा. मुझे मध्य प्रदेश सरकार से आविन्यों जाने की अनुमति मिल गई. वहां उस समय श्रीमती जयकर के अलावा विजय मेहता, सोनल मानसिंह, सुनील कोठारी, मधु जैन आदि कई और जमा थे.

‘महाभारत’ की रंगप्रस्तुति पत्थर की एक खदान में हुई जो एक प्रागैतिहासिक पृष्ठभूमि में आसानी से परिणत हो गया था. शुभारंभ को देखने यूरोप की नामचीन सांस्कृतिक हस्तियां दर्शक दीर्घा में मौजूद थीं. मैं ही अभिनेत्री वेनिसा रेडग्रेव के बगल में बैठा था. अपने इस महाकाव्य मनुष्य की एक अनंत गाथा के रूप में देखना रोमांचक अनुभव था.

‘अंधा युग’, पंडवानी यक्षगान आदि रंग प्रस्तुतियां पहले देखी थीं. पर नौ घंटों की लंबी अवधि में फैले समूचे ‘महाभारत’ को देख माना मेरे कला-जीवन के बेहद दुर्लभ अवसरों में से एक है.

पीटर ब्रुक के ‘महाभारत’ में द्रौपदी को दांव पर लगाने का दृश्य. (स्क्रीनग्रैब साभार: यूट्यूब)

सारे अनुभव में प्रागैतिहासिकता, आधुनिकता, निरंतरता सब घुल-मिल गए थे: एक महान मिथक हमारे सामने यूं सजीव था मानो वह हमारी अभी की कथा है- हिंसा, हत्या, छलकपट, विश्वासघात, धर्म युद्ध, युद्ध की अंततः विफलता, आचरण और आस्था को लेकर संवादों की कई जगहें आदि मिलकर एक ऐसा जटिल पर तात्कालिक, गहरा पर उच्छल, मार्मिक पर सहज, मानवीय पर सार्वकालिक रंग-अनुभव रच पाये कि मुझे एक भारतीय के रूप में अपने महाकाव्य पर सच्चा गर्व होने लगा.

यह अलक्षित नहीं जा सकता था कि कुल नौ घंटों में संपूर्ण ‘महाभारत’ की रंग प्रस्तुति स्वयं ‘महाभारत’ के अपने इतिहास में अभूतपूर्व थी. यह भी दिलचस्प था कि उस प्रस्तुति में 16 देशों के 21 अभिनेता थे और जिनमें भारत के कुल एक. एक तरह से यह फिर एक रंग-सत्यापन था कि ‘महाभारत’ की गाथा सिर्फ़ एक देश की नहीं समूचे संसार की गाथा है.

कई बरसों बाद जब हमने ‘भारत भवन में महाभारत’ की योजना बनाई थी, जिसमें महाभारत की गाथा कुल अठारह दिनों में, भारत के विभिन्न कलारूपों जैसे नाटकों, शास्त्रीय और लोक नृत्य-शैलियों, फिल्मों, पाठों, बहसों आदि के माध्यम से करने का उपक्रम था तो उसके पीछे पीटर ब्रुक की महान प्रस्तुति से मिली प्रेरणा और उत्तेजना ही थीं.

वह आयोजन नहीं हो पाया, न भोपाल में, न दिल्ली में, सारी कोशिशों के बावजूद. मन में यह था कि वह पीटर ब्रुक को प्रणति के रूप में होगा, अगर होगा. अपनी आविन्यों प्रस्तुति के बाद पीटर ब्रुक से एक बार फिर दिल्ली में मुलाक़ात हुई. उस समय वे अपने ‘महाभारत’ के भारत-भ्रमण की योजना बना रहे थे और चाहते थे मैं उसके प्रबंधक के रूप में उसे संभालूं. मेरे लिए यह संभव नहीं था. उस भ्रमण के लिए आवश्यक राशि भी नहीं जुट पाई.

पीटर ब्रुक ने पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विश्व रंगमंच पर महाकाव्यात्मक दृष्टि का एक तरह से पुनर्वास किया. शेक्सपियर, अत्तार, महाभारत आदि सभी नाटक उनके लिए मनुष्य के संघर्ष, व्यथा-यंत्रणा, हर्ष-विषाद, उल्लास और उदासी, सार्थकता और व्यर्थता, उत्कर्ष और पराजय आदि की कथा कहने जैसे थे.

उनकी दृष्टि मनुष्यता की विडंबनाओं, अंतर्विरोधों और संकटों के बीच उत्तरजीवता की कथा को मार्मिकता से पहचानती थी. उन्होंने नाटक की जगहों को लेकर भी अनेक निर्भीक प्रयोग किए जिनका आशय यही था कि मनुष्य की व्यथा-आनंद की कथा कहीं भी, किसी जगह, किसी भी समय कही जा सकती है.

मुझे पता नहीं है कि उनके अभिनेताओं ने, उनसे अलग, कितनी कीर्ति अर्जित की. पर उनके जीवन और कला-कौशल पर पीटर ब्रुक की छाप कभी धूमिल नहीं हुई होगी. वे निश्चय ही एक रंगगुरु भी थे: उनके घनिष्ठ संपर्क में आए व्यक्ति की दृष्टि और जीवनधारा निश्चय ही अपने आप बदल जाती रही होगी.

पीटर ब्रुक ने अपने जीवनकाल में दो महायुद्धों की विभीषिका, मनुष्यता का मोहभंग, सकल संसार में पसरता विनाश और क्षति आदि सब देखे थे और उनका रंगमंच मनुष्यता के ताने-बाने को रफू कर राहत देकर, फिर से सजग-सक्रिय करने का प्रयत्न था. उनके संसार से विदा लेते समय मनुष्यता फिर विनाश और छिन्न-भिन्नता के कगार पर है.

जो फाट हर दिन चौड़ी हो रही है, उसे समझने, सहने और उससे मुक्त हो सकने के लिए हमें कई पीटर ब्रुक चाहिए. आज और अभी. पर न कोई कबीर नज़र आता है, न किसी नए ब्रुक की आहट सुनाई देती है. ब्रुक के जाने से अंधेरा और गहरा हो गया लगता है. वे जगह खाली छोड़ गए हैं.

पेरिस में चीनी कवि

जिस पेरिस में पीटर ब्रुक बरसों रंग-सक्रिय रहे और जहां उन्होंने अपनी आख़िरी सांस ली और जहां पिछली सदी में दशकों पहले चीनी महाकवि आई छिंग चित्रकला सीखने कई बरस रहे थे और पिकासो वगैरह से मिले थे, उसी पेरिस में एक दुकान में इस चीनी कवि की अंग्रेज़ी अनुवाद में विंटेज द्वारा प्रकाशित ‘सलेक्टेड पोएम्स’ पुस्तक मिली. हाल ही में प्रकाशित इस पुस्तक में कवि की कुछ उक्तियां गद्य में उद्धृत हैं.

उनमें से एक है: ‘अगर भविष्य में ऐसा दिन आए जब शासक गुलदानों में हथकड़ियां फेंक दें/विधायक और भिखारी टहलें सहज बतियाते हुए/खानबदोशों को घर मिल जाए,/लोग साथ आ जाएं,/हथियार निर्माता युद्ध न उकसाएं,/ताबूत बनाने वाले न चाहें कि महामारी व्यापक हो/और यह कहा जाए कि हर चीज़ अच्छाई पर वापस आती है- स्वतंत्रता, कला, प्रेम, कठोर कार्य: तब हरेक कवि होगा.’

इस कवि को सांस्कृतिक क्रांति के दौरान भयानक यंत्रणा और प्रवास सहने पड़े थे. वे क्षत-विक्षत हुए पर झुके नहीं. बोनसाई वृक्षों के बारे में उनकी एक कविता का समापन यूं होता है:

अब वे अंदर से बाहर हैं
युवा, वे बूढ़े हैं, और बूढ़े, युवा
किसी की उत्सुकता को रिझाने के लिए,
किसी ग्रीनस्कीपर के नवाचार को बढ़ाने-चढ़ाने के लिए,
कोमल, लचीले, आसानी से मोड़े जानेवाले,
मूक वनस्पति, वे छुरे के नीचे झुकते हैं,
आप कह सकते हैं कि यह एक तरह की कला है:
एक पैरोडी जो
स्वतंत्रता का अंत लिखती है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)