कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज की भारतीय सत्ता को कविता की कोई ख़बर ही नहीं है. शायद उसे पता है कि आज की अधिकांश कविता इस सत्ता द्वारा फैलाए जा रहे झूठों-घृणा-हिंसा आदि से सहमत नहीं और ज़्यादातर उसके विरोध में है. कवि अल्पसंख्यक भी हैं. इसलिए उनकी उपेक्षा इस सत्ता के अल्पसंख्यक विरोधी रुख़ का भी नतीजा है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विचारधारा से प्रेरित आलोचक अक्सर कृति या लेखक पर धारा का ऐसा आच्छादन तान देते हैं कि हमें धारा का पता तो चलता है, कृति या लेखक की विशिष्टता या अद्वितीयता का बहुत कम. नंदकिशोर नवल इसका अपवाद हैं. हमारा समय धर्माक्रांत समय हो गया है. उसमें मुक्तिबोध की नवल-व्याख्या में यह जानना-समझना सम्यकता की ओर बढ़ने जैसा है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: भारत में सार्वजनिक बुद्धिजीवी बहुत कम हैं. जो हैं उन्हें भी अक्सर दूसरे बद्धिजीवियों का समर्थन कम ही मिलता है. इस बीच शिक्षा-व्यवस्था में मुक्त विचार-विनिमय, असहमति, संवाद को बाधित किया जा रहा है. स्वयं शिक्षक-समुदाय में हिंदुत्ववादियों की इतनी विस्तृत और भयावह घुसपैठ हो चुकी है कि आगे जाकर ये आज्ञापलक शिक्षक और आज्ञापालक समाज बनाने में जी-जान और अपार उत्साह से लग जाएंगे.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज के दुर्व्याख्या और विस्मृति के दौर में भी कुछ बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो प्रमाणित तथ्यों और संदर्भों के साथ दुर्व्याख्या को प्रश्नांकित कर रहे हैं. वे स्मृति का आग्रह कर रहे हैं. इसमें जोखिम है, देर-सबेर हो सकता है कि उन पर हमले हो जाएं. पर ये बुद्धिजीवी रक्तबीज हैं: उन्हें हटा या नष्ट या हाशिये पर भी डाल दिया जाए तो नए युवा बुद्धिजीवी पैदा होंगे जो उनके बौद्धिक सत्याग्रह को आगे ले जाएंगे.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: रघु राय ने शुरुआत तो फोटो-पत्रकार के रूप में की थी पर वे जल्दी ही फोटो-कलाकार हो गए. एक स्तर पर उन्होंने अपनी कला से भारतीय जीवन का गुणगान ही किया- उसका उत्सव मनाया, एक तरह की भारत-लीला रची. ऐसी लीला, जिसमें कोई नायक नहीं है- जीवन ही नायक है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हमारा समय और उसमें सक्रिय आक्रामक शक्तियां संविधान और लोकतंत्र विरोधी होने के साथ-साथ सृजन और ज्ञान विरोधी भी हैं. समय आ गया है जब सारे भारत से लेखक और कलाकार, संगीतकार-रंगकर्मी-नृत्यकार, विद्वान और बुद्धिजीवी अपने को सशक्त और मुखर रूप से इन मुद्दों पर व्यक्त करें.
कभी-कभार अशोक वाजपेयी: साहित्य राजनीति की अवहेलना या उपेक्षा नहीं कर सकता. अंततः साहित्य नागरिक कर्म भी है और उसकी नागरिकता का यह नैतिक और सर्जनात्मक तकाज़ा है कि वह ऐसे समय में राजनीति के विरोध में खड़ा, मुखर और सक्रिय हो. सब तरह की राजनीति के नहीं, पर विभाजक आतंककारी राजनीति के विरुद्ध.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आम तौर पर किसी थाने के दारोगा के साहित्यप्रेमी होने की न तो अपेक्षा होती है, न ही संदेह. अगर शिकायत करने वाला अपनी जाति/उपजाति का हो या फिर शिकायत मुस्लिम के विरुद्ध हो तो फ़ौरन दर्ज कर ली जाती है. इस नए मामले का एक दुष्परिणाम तो यह होने जा रहा है कि अब कई कवि अपनी कोई तीख़े प्रश्न पूछने वाली कविता सोशल मीडिया पर डालने से संकोच करेंगे कि कहीं थाने तलब न कर
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज के समय में सत्तारूढ़ राजनीतिक शक्तियां मूल्यभाषा का दम तो भरती हैं और उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सार्वजनिक उद्घोष तो करती हैं पर आचरण उससे बिल्कुल उलट करती हैं. कथनी-करनी में यह फांक, यह पाखंड हमारे लोकतंत्र के इतिहास में इससे पहले इतने व्यापक कभी नहीं हुए.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आम तौर पर सत्तारूढ़ शक्तियों और उनके अंधभक्त अनुयायियों को छोड़कर हर कहीं व्यापक समाज युद्ध के विरुद्ध ही होता है. सबसे अधिक जनधन हानि समाज को ही उठाना पड़ती है.
कभी कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी अंचल के शहरों में अभद्रता, आक्रामकता, असभ्यता, हिंसा, अपराधवृत्ति, दंगे आदि बढ़ते रहे हैं. इनमें वे शहर भी शामिल हैं जिन्हें ‘स्मार्ट सिटी’ का दर्ज़ा मिला हुआ है. इस पर गंभीरता और विस्तार से विचार करने की ज़रूरत है कि इन शहरों में अधिकांशतः सांस्कृतिक विपन्नता से भरे हुए हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: बीसवीं सदी में यूरोप में नाज़ियों के युद्ध और नरसंहार के समय जैसी चुप्पी यूरोप में छा गई थी, वर्तमान चुप्पी, उसका एक नया दुखद और शर्मनाक संस्करण है. स्वयं भारत ने इस बीच अपना जो नैतिक अवमूल्यन किया है वह समझना मुश्किल है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: ईरान में दशकों से एक आततायी धार्मिक तानाशाही थी जिससे निजात पाने की ज़िम्मेदारी ईरानी जनता की है. अमेरिका-इज़रायल उसके सर्वोच्च शासक की हत्या कर दें यह किसी भी तरह से उचित नहीं समझा जा सकता. कल को कोई और देश हमारे यहां सत्ता-परिवर्तन करने के लिए हमला कर दे तो क्या इसे हम स्वीकार कर लेंगे?
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: 'कविता क्या है?’ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा.’
विश्व सभ्यता में आज शक्तिशाली-बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है. पर इसी समय में कविता आज भी बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- बेघरबार हुओं का आख़िरी घर है. रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया जा रहा अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ इन्हीं कविताओं को बचाए रखने का प्रयास है.