साहित्य की स्वायत्तता तभी सुरक्षित रह सकती है जब वह प्रतिरोध कर सके

कभी-कभार अशोक वाजपेयी: साहित्य राजनीति की अवहेलना या उपेक्षा नहीं कर सकता. अंततः साहित्य नागरिक कर्म भी है और उसकी नागरिकता का यह नैतिक और सर्जनात्मक तकाज़ा है कि वह ऐसे समय में राजनीति के विरोध में खड़ा, मुखर और सक्रिय हो. सब तरह की राजनीति के नहीं, पर विभाजक आतंककारी राजनीति के विरुद्ध.

कविता के विरुद्ध एफआईआर: नए संदर्भ और अर्थ में ‘अभिव्यक्ति का ख़तरा’

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आम तौर पर किसी थाने के दारोगा के साहित्यप्रेमी होने की न तो अपेक्षा होती है, न ही संदेह. अगर शिकायत करने वाला अपनी जाति/उपजाति का हो या फिर शिकायत मुस्लिम के विरुद्ध हो तो फ़ौरन दर्ज कर ली जाती है. इस नए मामले का एक दुष्परिणाम तो यह होने जा रहा है कि अब कई कवि अपनी कोई तीख़े प्रश्न पूछने वाली कविता सोशल मीडिया पर डालने से संकोच करेंगे कि कहीं थाने तलब न कर

लोकतंत्र की आचरणभाषा व्यापक रूप से प्रदूषित और विकृत हो चली है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज के समय में सत्तारूढ़ राजनीतिक शक्तियां मूल्यभाषा का दम तो भरती हैं और उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सार्वजनिक उद्घोष तो करती हैं पर आचरण उससे बिल्कुल उलट करती हैं. कथनी-करनी में यह फांक, यह पाखंड हमारे लोकतंत्र के इतिहास में इससे पहले इतने व्यापक कभी नहीं हुए.

युद्ध के दौरान सत्ता ही समाज हो जाती है; समाज की स्वतंत्र सत्ता ग़ायब कर दी जाती है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आम तौर पर सत्तारूढ़ शक्तियों और उनके अंधभक्त अनुयायियों को छोड़कर हर कहीं व्यापक समाज युद्ध के विरुद्ध ही होता है. सबसे अधिक जनधन हानि समाज को ही उठाना पड़ती है.

साहित्य का शहरों से संबंध सीधा-सादा नहीं रहा है…

कभी कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी अंचल के शहरों में अभद्रता, आक्रामकता, असभ्यता, हिंसा, अपराधवृत्ति, दंगे आदि बढ़ते रहे हैं. इनमें वे शहर भी शामिल हैं जिन्हें ‘स्मार्ट सिटी’ का दर्ज़ा मिला हुआ है. इस पर गंभीरता और विस्तार से विचार करने की ज़रूरत है कि इन शहरों में अधिकांशतः सांस्कृतिक विपन्नता से भरे हुए हैं.

सारे संसार को नैतिक लकवा मार गया है!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: बीसवीं सदी में यूरोप में नाज़ियों के युद्ध और नरसंहार के समय जैसी चुप्पी यूरोप में छा गई थी, वर्तमान चुप्पी, उसका एक नया दुखद और शर्मनाक संस्करण है. स्वयं भारत ने इस बीच अपना जो नैतिक अवमूल्यन किया है वह समझना मुश्किल है.

ईरान पर हमला हमारे सभ्यतामूलक सहचर देश पर हमला है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: ईरान में दशकों से एक आततायी धार्मिक तानाशाही थी जिससे निजात पाने की ज़िम्मेदारी ईरानी जनता की है. अमेरिका-इज़रायल उसके सर्वोच्च शासक की हत्या कर दें यह किसी भी तरह से उचित नहीं समझा जा सकता. कल को कोई और देश हमारे यहां सत्ता-परिवर्तन करने के लिए हमला कर दे तो क्या इसे हम स्वीकार कर लेंगे?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल और कविता की ज़रूरत

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: 'कविता क्या है?’ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा.’

बीहड़, अटपटे, अबूझ होते जा रहे संसार में कविता ही आख़िरी मकान है

विश्व सभ्यता में आज शक्तिशाली-बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है. पर इसी समय में कविता आज भी बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- बेघरबार हुओं का आख़िरी घर है. रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया जा रहा अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ इन्हीं कविताओं को बचाए रखने का प्रयास है.

…जब प्रकाश बदलता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ्रेंच कला में प्रकाश को लेकर एक विशेष आग्रह दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि प्रकाश को जितना लक्ष्य किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ. इसे लेकर रज़ा कहते थे कि कि यहां प्राकृतिक रूप से जो प्रकाश है, उसमें भी लगातार फेरबदल होता रहता है, और कलाकारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की है.

अमूर्तन दृष्टि का स्वयंप्रतिष्ठ रूपायन होता है, उसे सिर्फ़ कौशल से समझाया नहीं जा सकता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’.

काशी की प्रतिसत्ता अब सत्ता की चपेट में है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: काशी, जैसा कि बहुत सारा भारत भी, अपनी प्रश्नवाचकता, अपनी बौद्धिक और सर्जनात्मक निर्भीकता और नवाचार से विरत-विपथ हो रहा है. प्रश्नाकुल पांडित्य, निर्भीक विद्वत्ता, उदग्र चिंतन की, सजग और विपथगामी सर्जनात्मकता की काशी अब दिखाई नहीं पड़ती- हो सकता है कि अंतःसलिल हो गई हो.

महात्मा गांधी बीते वक़्त के अवशेष हैं या भविष्य की संभावना?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई पुस्तक ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ हमें अपना समय और गांधी को बेहतर समझने में मदद तो करती है- वह गहरे स्तर पर हमें उस खो गई ‘विवेक की छन्नी’ खोजने की ओर उकसाती है जिसके साथ गांधी जी विचार और कर्म करते थे.

सच की जगह कहां बची हुई है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सच की जगह कम हो गई है और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई है. यह अहसास गहराता जाता है कि पूरे समाज में सच के लिए धीरज भी बाक़ी नहीं रहा. फिर भी ऐसे लोग हैं जो निडर सच पर अड़े हुए हैं.

श्रीकांत वर्मा की कविता एक अनवरत घमासान है, जिसे कवि निहत्था लड़ रहा है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: श्रीकांत वर्मा गहरे क्षोभ, बेबाक नाराज़ी, अदम्य असंतोष और आत्मप्रताड़न के भी कवि हैं. पर साथ-साथ वे जीवन में अब भी बच पाई कोमलता, लालित्य, सुंदरता, प्रेम और करुणा के भी कवि रहे हैं.

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