गांधी का सैंतालीस: उनकी ‘आख़िरी लड़ाई’ की गाथा

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पुष्यमित्र ने 'गांधी का सैंतालीस' में महात्मा गांधी के आख़िरी साल की कहानी अनेक मार्मिक ब्योरों के साथ लिखी है. गांधी-निंदा और अपमान के इस संघ-आयोजित समय में जो लोग गांधी-सचाई का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा जानना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ है.

कलाओं से क्या बदलता है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कलाओं को लेकर व्यापक समझ और मानसिकता ख़ासी तंगदिल और कुंद ज़ेहन है. कला के बारे में जो व्यापक चर्चा होती रहती है उसमें उसकी शक्ति को इस पैमाने पर अक्सर मापा जाता है कि उसका क्या व्यापक प्रभाव पड़ा. जिन कलाओं का ऐसा प्रभाव नहीं पड़ता या जिनमें व्यापक समाज अधिक रुचि नहीं लेता, उनकी उपेक्षा भी होती रहती है.

युवा प्रतिरोध: अब भयमुक्ति राजधर्म नहीं, प्रजाधर्म है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हर आततायी शासक या संगठन को यह आत्मविश्वास होता है कि क्रूरता-हिंसा-घृणा-झूठ से वे अपराजेय रहेंगे. इस युवा प्रतिरोध ने यह साबित कर दिया है कि वे वेध्य हैं. नागरिकों के और वर्ग देर-सबेर सत्ता से हिसाब मांगेंगे और जवाबदेही पर इसरार करेंगे.

लोकतंत्र के साथ सामंजस्य को भी प्रतिपल बचाना-बढ़ाना होता है

कभी-कभी | अशोक वाजपेयी: दक्षिण अफ्रीका के जननायक नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनकी पहल पर वहां की संसद ने एक ‘सच और सामंजस्य आयोग’ गठित किया था. यह सच को जानने, कुबूल करने, मानवीय अधिकारों के उल्लंघन को समझने, याद करने और क्षमा करने का अनूठा उपक्रम था. यह एक अफ्रीकी अवधारणा ‘उबन्तू’ से प्रेरित माना गया, जिसमें मानवीय अधिकार और सामंजस्य आदि के तत्व शामिल होते हैं.

चोरी का भूगोल: चोरी करने में अब किसी को शर्म नहीं आती

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हबीब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक ‘चरणदास चोर’ में एक उक्ति है ‘एक चोर ने रंग जमाया सच बोलके.’ हमारे समय में बहुत सारे बड़े चोर रंग जमा रहे हैं, झूठ बोलकर. वह समय जा चुका जिसमें चरणदास जैसा अकिंचन चोर सच बोलकर रंग जमा सकता था. अब तो असली रंग झूठ से ही आता है.

तीजन बाई: स्त्री की अदम्यता का लोक-रूपक

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: तीजन बाई की कला उस सर्जनात्मकता का साक्ष्य थी कि एक सजग स्त्री महाकाव्य के परिसर में और लोकव्यवहार के आयाम में कितना कुछ अप्रत्याशित तात्कालिकता और सुघर संयम से कर सकती थी. वे शास्त्र और लोक की लगभग रूढ़ हो गई दूरी और द्वैत को रौंद देती थीं.

मंदिर चढ़ावा चोरी: चिड़िया रामभक्त का नाम सार्थक करते हुए रामजी का खेत चुग रही है!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मोहन भागवत ने राम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा वाले दिन को भारत का असली स्वतंत्रता दिवस बताया था. तब समझ में नहीं आया, पर अब आ रहा है कि उनका आशय प्रबंधक-चौकीदार रामभक्तों को चोरी आदि करने की स्वतंत्रता से था. ज़ाहिर है यह स्वतंत्रता की अधिक समावेशी अवधारणा है: जिस स्वतंत्रता में चोरी करने की स्वतंत्रता शामिल न हो वह अधूरी स्वतंत्रता ही मानी जाएगी!

अलोकतांत्रिक वृत्तियां: हम एक अभद्र और विषाक्त लोकतंत्र बनाए जा रहे हैं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर आप संविधान सभा की याद करें, तो स्पष्ट है कि उसमें सबसे अधिक सदस्य हिंदू थे. हिंदू समाज ने ही मुख्यतः लोकतंत्र को स्वीकार और भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक-भाषायी बहुलता का एहतराम किया था. क्या अब उसका हिंदुत्व से प्रेरित-प्रभावित बड़ा हिस्सा लोकतंत्र को तजकर भारतीय राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाह रहा है?

‘मैं संसार से विरक्त होकर नहीं, उसमें अनुरक्त रहकर ही विदा लेना चाहता हूं’

कभी-कभार में इस सप्ताह वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी अपने 'उत्तरकाल' की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, 'मुझे किसी तरह की मुक्ति की तलाश नहीं है, न भवचक्र से, न जन्मचक्र से. संसार बहुत तेज़ी से बदल गया और रहा है- वह निरंतर क्रूर-निष्करुण-असह्य होता जाता है पर उसमें, फिर भी, सचाई और विवेक, ईमानदारी और सुंदरता, अर्थ और संभावनाएं बची हुई हैं. मैं इस बचे हुए को अलक्ष्य नहीं करना चाहता.'

तिलचट्टा प्रतिरोध: उम्मीद का एक धुंधला क्षितिज

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कॉकरोच जनता पार्टी को तरह-तरह से व्याख्यायित, संदेहास्पद बताने की कोशिशें हो रही हैं. यह होना ऐसे पिछले आंदोलन आदि के हश्र के अनुभव की रोशनी में, अस्वाभाविक और अतर्किक नहीं है. लेकिन भारत के युवाओं की निष्क्रियता और राजनीतिक दृष्टि के अभाव से क्षुब्ध-असंतुष्ट हम जैसे कुछ बूढ़ों को इस पहल से कुछ उम्मीद बंध रही है.

ज्ञान का विउपनिवेशीकरण: ज्ञान अपर्याप्त और शाश्वत होने को अभिशप्त है

कभी कभार | अशोक वाजपेयी: हमारे यहां हुए विउपनिवेशीकरण के अध्ययन में उपनिवेशवाद के भाषाई साम्राज्य का विश्लेषण बहुत कम है. सारी उत्तर-आधुनिकता के बावजूद पश्चिम अपने विचारों को सारे संसार में मनवाने में सफल हुआ है. विडंबना यह है कि हिंदुत्व के नाम पर जो राजनीतिक विचारधारा आज परंपरा के पुनर्वास और भारतीय आत्मबोध के नवजागरण का दावा कर रही है वह अपनी समझ में पूरी तरह औपनिवेशिक है.

कविता और सत्ता का सहकार

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज की भारतीय सत्ता को कविता की कोई ख़बर ही नहीं है. शायद उसे पता है कि आज की अधिकांश कविता इस सत्ता द्वारा फैलाए जा रहे झूठों-घृणा-हिंसा आदि से सहमत नहीं और ज़्यादातर उसके विरोध में है. कवि अल्पसंख्यक भी हैं. इसलिए उनकी उपेक्षा इस सत्ता के अल्पसंख्यक विरोधी रुख़ का भी नतीजा है.

नवल के मुक्तिबोध

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विचारधारा से प्रेरित आलोचक अक्सर कृति या लेखक पर धारा का ऐसा आच्छादन तान देते हैं कि हमें धारा का पता तो चलता है, कृति या लेखक की विशिष्टता या अद्वितीयता का बहुत कम. नंदकिशोर नवल इसका अपवाद हैं. हमारा समय धर्माक्रांत समय हो गया है. उसमें मुक्तिबोध की नवल-व्याख्या में यह जानना-समझना सम्यकता की ओर बढ़ने जैसा है.

सच्चे बुद्धिजीवी का धर्म सत्ता से सच बोलना है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: भारत में सार्वजनिक बुद्धिजीवी बहुत कम हैं. जो हैं उन्हें भी अक्सर दूसरे बद्धिजीवियों का समर्थन कम ही मिलता है. इस बीच शिक्षा-व्यवस्था में मुक्त विचार-विनिमय, असहमति, संवाद को बाधित किया जा रहा है. स्वयं शिक्षक-समुदाय में हिंदुत्ववादियों की इतनी विस्तृत और भयावह घुसपैठ हो चुकी है कि आगे जाकर ये आज्ञापलक शिक्षक और आज्ञापालक समाज बनाने में जी-जान और अपार उत्साह से लग जाएंगे.

क्षत-विक्षत लोकतंत्र में बुद्धिजीवियों की अप्रासंगिकता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज के दुर्व्‍याख्या और विस्मृति के दौर में भी कुछ बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो प्रमाणित तथ्यों और संदर्भों के साथ दुर्व्‍याख्या को प्रश्नांकित कर रहे हैं. वे स्मृति का आग्रह कर रहे हैं. इसमें जोखिम है, देर-सबेर हो सकता है कि उन पर हमले हो जाएं. पर ये बुद्धिजीवी रक्तबीज हैं: उन्हें हटा या नष्ट या हाशिये पर भी डाल दिया जाए तो नए युवा बुद्धिजीवी पैदा होंगे जो उनके बौद्धिक सत्याग्रह को आगे ले जाएंगे.

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