विचार

ईसाई बहुल श्वेत ब्रिटेन का नेता एक अश्वेत, ग़ैर-ईसाई और ग़ैर-ब्रिटिश मूल कैसे हो सकता है

किसी देश की आबादी का विविधतापूर्ण होना काफ़ी नहीं है. उसकी सभ्यता की पहचान यह है कि उसके प्रतिनिधियों में भी समानुपातिक रूप से वह विविधता है या नहीं. कोई देश सिर्फ़ दूसरी आबादियों को मताधिकार देता है या उन आबादियों को देश के नेतृत्व का अधिकार देने की क्षमता और साहस भी रखता है? इससे इस देश के आत्मविश्वास का पता चलता है.

ऋषि सुनाक. (फोटो: रॉयटर्स)

ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री के पद के लिए आवश्यक योग्यता यानी वहां की शासक टोरी पार्टी के नेता पद की दौड़ में पंजाबी और भारतीय मूल के ऋषि सुनाक तीसरे दौर में सबसे आगे रहने के बाद चौथे दौर में भी शीर्ष पर रहे हैं.

हर दौर में उनको मिलने वाले मत बढ़ते जा रहे हैं. इसका मतलब यह है कि जो उम्मीदवार दौड़ से बाहर हो रहा है, उसके समर्थक ऋषि सुनाक को अपना वोट दे रहे हैं.

टोरी पार्टी के नेतृत्व की इस प्रतियोगिता में, जो ब्रिटेन का नेतृत्व भी होगा, जो बहस हो रही है, उसमें अब तक यह नहीं पढ़ा कि विदेशी मूल का होने के कारण सुनाक ख़तरनाक होंगे.

पार्टी के भीतर और बाहर कहीं भी सुनाक पर उनके मूल को लेकर हमला या चिंता नहीं देखी. ईसाई बहुल प्रधानत: श्वेत ब्रिटेन का नेता एक अश्वेत, ग़ैर-ईसाई और ग़ैर-ब्रिटिश मूल कैसे हो सकता है, यह सवाल किसी ने नहीं उठाया है.

जो चार उम्मीदवार चौथे दौर में पहुंचे हैं, उनमें एक और ग़ैर-ब्रिटिश मूल की महिला केमी बैडनौक हैं. वे ख़ुद को पहली पीढ़ी की आप्रवासी कहती हैं. नाइजीरियाई और तंजानियाई मूल की बैडनौक के राजनीतिक और सामाजिक विचार ख़ासे प्रतिक्रियावादी हैं.

ब्रिटेन की मीडिया में इन टोरी नेताओं के मनुष्यद्वेषी राजनीतिक विचारों को लेकर चिंता अवश्य ज़ाहिर की जा रही है, लेकिन कोई इनके विदेशी मूल की वजह से ख़तरे की घंटी नहीं बजा रहा.

यहां तक कि घोर प्रतिक्रियावादी बोरिस जॉनसन ने यह रोना नहीं रोया कि उन्हें, एक ख़ालिस अंग्रेज़ को, गद्दी से हटाने के लिए एक भारतीय मूल के ऋषि सुनाक और पाकिस्तानी मूल के साजिद जावीद ने साज़िश की.

किसी ने बाहर भी यह सवाल नहीं उठाया. यह सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं था कि एक श्रेष्ठ नस्ल के नेतृत्व को एक हीन नस्ल के लोग कैसे चुनौती दे सकते हैं.

अपनी आप्रवासी विरोधी नीतियों के कारण ब्रिटेन में कुख्यात प्रीति पटेल निवर्तमान प्रधानमंत्री जॉनसन के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री थीं. उनका परिवार गुजरात से युगांडा होते हुए ब्रिटेन पहुंचा था. ब्रिटेन के एक प्रतिक्रियावादी दल ने उन्हें देश के सबसे संवेदनशील महकमे का मंत्री बनाने में हिचकिचाहट नहीं दिखलाई.

इस समय जब ब्रिटेन अपना नए प्रधानमंत्री की प्रतीक्षा कर रहा है, ब्रिटेन के सबसे महत्वपूर्ण शहर लंदन का नेतृत्व एक पाकिस्तानी मूल के सादिक़ ख़ान कर रहे हैं. वे 2016 से इस पद पर हैं.

2021 में 55 प्रतिशत से भी अधिक मत हासिल करके वे दुबारा चुने गए. न ऋषि, न साजिद, न प्रीति और न सादिक़ अपवाद हैं.

ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में पिछली बार 5 पंजाबी चुने गए. हिंदू और सिख, पुरुष और महिला. और दोनों दलों ने – टोरी और लेबर – इन्हें उम्मीदवार बनाया था. इनमें से एक तनमनजीत सिंह अल्पसंख्यकों के पक्ष में लगातार मुखर रहे हैं.

कनाडा में यह संभावना बनी हुई है कि अगर न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आए तो जगमीत सिंह नामक भारतीय मूल का सिख प्रधानमंत्री हो.

आयरलैंड में लियो एरिक वरडकर प्रधानमंत्री रह चुके हैं. मराठी, भारतीय मूल के राजनीतिज्ञ. अगर आप दक्षिण अफ्रीका, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद जैसे देशों को छोड़ भी दें, जहां भारतीयों को मज़दूरी करने ले जाया गया था और जो वहां के बाशिंदे हो गए तो स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, न्यूज़ीलैंड, हॉलैंड, सिंगापुर जैसे देशों में भी भारतीय मूल के राजनेता अलग अलग पदों पर हैं.

हम अमरीका को अपना गंतव्य मानते रहे हैं. वहां तो दूसरी सबसे ताकतवर नेता यानी उपराष्ट्रपति भारतीय मूल की कमला हैरिस हैं.

कमला हैरिस एक चुनाव पर जब भारत के तमिलों और उनमें भी ब्राह्मणों ने ख़ुशी मनाना शुरू किया तो उन्होंने खुद को काले समुदाय की दक्षिण एशियाई बतलाकर जैसे उनके उत्साह पर पानी डाल दिया. क्योंकि भारतीय, उनमें भी ब्राह्मण खुद को कभी काले लोगों में शामिल नहीं मानते.

इस सूची को लहराकर कहा जा सकता है कि भारतीय और उनमें भी हिंदू, होते ही इतने प्रतिभाशाली हैं कि हर जगह अपना झंडा ऊंचा कर देते हैं. तो यह भी देखना होगा कि जिन देशों में राजनीति में हमने भारतीयों की गणना की, वहीं पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, नाइजीरियाई , तंजानियाई, अन्य देशों से आए व्यक्ति भी विभिन्न राजनीतिक दलों की तरफ से जन प्रतिनिधि चुने जा रहे हैं.

दुनिया में जब स्थानीयतावादी राष्ट्रवाद आक्रामक होता जा रहा है, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में विविधता का यह तथ्य सामने रखा जाना ज़रूरी है. मैं आपके साथ रहता और कारोबार करता हूं, क्या मेरा-आपका यही रिश्ता है? या इससे आगे बढ़कर मैं आपको अपने हितों का रक्षक और प्रवक्ता भी मान सकता हूं?

इसी से मालूम होगा कि मेरे-आपके बीच यक़ीन का रिश्ता है या नहीं? क्या एक ईसाई श्वेत आबादी अपने वर्तमान और भविष्य का फ़ैसला किसी ग़ैर-ईसाई काले व्यक्ति के हाथ छोड़ सकती है? क्या वह उसे अपना प्रतिनिधि चुन सकती है?

ऐसा हो इसके लिए दूसरे पक्ष को ही अपनी योग्यता साबित नहीं करनी है. यानी वह प्रतिनिधि होने लायक है या नहीं? बल्कि ऐसा करके वह जनता भी साबित करती है कि उसका स्वभाव जनतांत्रिक है.

किसी देश की आबादी का विविधतापूर्ण होना काफ़ी नहीं है. उसकी सभ्यता की पहचान यह है कि उसके प्रतिनिधियों में भी समानुपातिक रूप से वह विविधता है या नहीं. कोई देश सिर्फ़ दूसरी आबादियों को मताधिकार देता है या उन आबादियों को देश के नेतृत्व का अधिकार देने की क्षमता और साहस भी रखता है? इससे इस देश के आत्मविश्वास का पता चलता है.

क्या वह सिर्फ़ यह कहता है कि चुन तो तुम सकते हो लेकिन मात्र बहुसंख्यकों में से ही? किसी का भी उसके देश के जीवन में अपनी भागीदारी का एहसास तब पक्का होता है, जब देश अपनी तिजोरी की कुंजी उसे सौंपने में संकोच न करे.

यह एकबारगी नहीं होता. और कभी भी आख़िरी तौर पर इसे हासिल कर लिया गया हो, यह भी नहीं. लेकिन जनतंत्र की यात्रा की आकांक्षाओं में एक यह है, इसे हमेशा याद रखना चाहिए.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)