भारत

जीवन के ज़रूरी मुद्दों को लेकर अप्रासंगिक होती बहसें

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: ग़रीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण, शिक्षा का लगातार गिरता स्तर, बढ़ती विषमता, रोज़-ब-रोज़ बढ़ाई जा रही हिंसा-घृणा, असह्य हो रही महंगाई आदि मुद्दों पर बहस ‘सबका साथ सबका विकास’ जैसे जुमले का खोखलापन उजागर कर देगी, इसलिए उन्हें बहस से बाहर रखना सत्ता की सुनियोजित रणनीति है.

(फोटो: द वायर)

ऐसे बहसिये होते हैं जो बहस तो करना शुरू कर देते हैं और फिर पूछते हैं कि ‘मुद्दा क्या है’. कई बार ऐसा भी होता है कि मुद्दा कुछ भी हो, कई वही कहते हैं जो वे सोच रहे होते हैं, भले उसका मुद्दे से कोई संबंध न हो. और ऐसा तो इन दिनों बहुत व्यापक रूप से हो रहा है कि बहस उन मुद्दों पर नहीं हो रही है जो हमारे जीवन के ज्वलंत मुद्दे हैं बल्कि उन पर जो बहस को प्रासंगिकता के अहाते से भटकाने, दूर ले जाने के लिए उठाए जा रहे हैं.

हिंदू-मुसलमान मतभेद ऐसा ही एक मुद्दा है जो सत्तारूढ़ शक्तियां बहुत तैयारी के साथ बिल्कुल प्रत्याशित ढंग से उठाए जा रही है, जबकि ग़रीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण, शिक्षा का लगातार गिरता स्तर, बढ़ती विषमता, रोज़-ब-रोज़ बढ़ाई जा रही हिंसा-हत्या-घृणा बढ़ते अपराध असह्य हो रही महंगाई आदि ज़ेरे बहस होने चाहिए.

इनमें से हरेक मुद्दा ऐसा है कि उस पर बहस ‘सबका साथ सबका विकास’ जैसे जुमले का खोखलापन उजागर कर देगी. इसलिए उन्हें बहस से बाहर रखना सत्ता की सुनियोजित रणनीति है: हमारी सत्ता तो इन दिनों नीति से नहीं रणनीति से चलती है और वह भी किसी तरह चुनाव जीतने की रणनीति से.

जब बहसों को इस तरह पथभ्रष्ट, तथ्यों और तर्कों से इस तरह मुक्त किया जा रहा हो, तो क्या किया जाए इस पर कुछ गंभीरता से विचार करना जरूरी है. ऐसी बहस चलाने के लिए स्वतंत्रचेता लोग चाहिए, मंच चाहिए और वैचारिक खुलापन और साहस चाहिए. इन सबका हमारे यहां टोटा है. स्वतंत्रचेता लोग तो हैं पर उनमें से कई डरते भी हैं कि उन पर कोई कार्रवाई न हो जाए. मंच तो लगातार घट या सिकुड़ रहे हैं.

मीडिया का एक बड़ा, व्यापक और प्रभावशाली हिस्सा, ख़ासकर हिन्दी में, पालतू-स्वामिभक्त-बाज़ारू गोदी मीडिया हो चुका है और वह ऐसी बहसों के लिए मंच नहीं रह गया है. विश्वविद्यालय लगातार बौद्धिक केंद्र होने से हटते जा रहे हैं. लाखों की संख्या में और अच्छी-ख़ासी तनख़्वाहें पाने वाला शिक्षक-वर्ग बुरी तरह से बुद्धि-ज्ञान-तर्क-तथ्य का रखवाला और प्रवक्ता होने के बजाय या तो कायरता से या स्वामिभक्ति में आंखें मूंदे और मुंह बंद किए हुए हैं. वह तो शिक्षा की स्वायत्तता और स्वतंत्रता में की जा रही कटौती के बारे में भी उदालीन और निश्चेष्ट है, व्यापक मुद्दों की बात का.

शायद युवाओं के बीच, लेखकों-कलाकारों-छात्रों के बीच, ऐसे छोटे-छोटे असंगठित और अनौपचारिक मंच हैं या उभर रहे हैं जहां सच्ची बहस हो रही या सकती है. ऐसे मंच स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के यहां भी हैं. उनका समेकन, उनके समेकित प्रभाव पड़ना अभी बाक़ी है.

पर राहत और उत्साह की बात यह है कि वे हैं, सजग-मुखर हैं, उनमें दृष्टि और विचार की बहुलता की प्रचुर संभावना है और उनमें अंततः एक व्यापक वृत्ति, लोकतांत्रिक स्वभाव की, आकार ले सकती है. यह होने में देर लगेगी, हमें इंतज़ार करना होगा. उम्मीद और इंतज़ार ही इस अंधेरे वक़्त में हमारा सहारा है.

रज़ा का मंडला

चित्रकार सैयद हैदर रज़ा को अपनी प्रिय और वरेण्य नदी नर्मदा जी के तट से कुछ दूर अपने पिता की कब्र के बग़ल की कब्र में सोए इस 24 जुलाई यानी आज छः बरस हो गए: उनकी मृत्यु 23 जुलाई 2016 को दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद हुई थी.

पिछले छः बरसों में रज़ा फाउंडेशन, मंडला को यह याद दिलाने की कोशिश करते हुए कि वहां एक बड़े आधुनिक चित्रकार का बचपन बीता था, अनेक आयोजन करता रहा है. अब वहां ज़िला प्रशासन द्वारा बनाई एक रज़ा कला वीथिका है और एक रास्ता जिसका नाम रज़ा मार्ग है.

इस बार रज़ा की पुण्यतिथि उनके 101वें वर्ष में पड़ रही है. मंडला का इलाका गोंड आदिवासियों का इलाका भी है और उन्नीसवीं शताब्दी में तो यहां गोंड राज्य ही था. पिछले तीन दशकों में गोंड चित्रकला एक सशक्त समकालीन कला-विधा के रूप में उभरी है. इस चित्रकार रज़ा वीथिका में 24 गोंड चित्रकारों की एक प्रदर्शनी आयोजित है, ‘प्राथमिक’ नाम से.

‘रज़ा स्मृति’ के दौरान मंडला के सामान्य नागरिकों में से कुछ, ख़ासकर कई घरेलू स्त्रियां, एक कार्यशाला में छाते रंगने और उन्हें अपने साथ ले जाने के उपक्रम में शामिल रहे हैं. इस बार भी ऐसी कार्यशाला आयोजित है, चित्रकला और माटी पर रंग दो कार्यशालाओं के अलावा, जो बच्चों के लिए हैं. साथ ही शास्त्रीय संगीत सभा और दो कविगोष्ठियां भी आयोजित हैं जिनमें लगभग 11 वरिष्ठ और युवा कवि-कवयित्रियां अपनी कविताएं सुनाएंगे.

अभी यह कहना कठिन है कि इन गतिविधियों का मंडला की नागरिकता पर कितना स्थायी प्रभाव पड़ता है. आधुनिक साहित्य और कलाओं के संस्पर्श से बहुत दूर शहर में इतना तो अलबत्ता हुआ है कि उसके कुछ नागरिकों के कैलेंडर में ‘रज़ा स्मृति’ ने जगह पा ली है और वे उसका इंतज़ार करते हैं. स्वयं फाउंडेशन के लिए यह बहुत रोमांचक अनुभव हो रहा है.

इस शहर में नए चिकने-चुपड़े महानगरों के सभी गुण-अवगुण धीरे-धीरे उसकी कस्बाई लय और गति को, उसके वस्तुजगत को घायल और अपदस्थ कर रहे हैं. फिर भी, मंडला में आत्मीयता, पारस्परिकता, धीरज आदि बचे हुए हैं. शायद रज़ा को लेकर जो आयोजन वहां हो रहे हैं वे मंडला को कुछ याद दिलाते हैं.

शायद इसकी पहचान भी मंद गति से गहरी हो रही है कि निपट मध्यवर्गीय कस्बाई परिवेश में पला-बढ़ा कोई, अपनी प्रतिभा और अथक परिश्रम से, संसार की सदियों से कला-राजधानी पेरिस में मान्यता और प्रतिष्ठा पा सकता है. रज़ा ने मंडला से अपने बचपन में जो पाया, जिसमें महात्मा गांधी का प्रत्यक्ष दर्शन शामिल था, उनकी स्मृति मंडला का वह ऋण चुकाने की कोशिश कर रही है.

लाठी नहीं लालटेन

हिन्दी में ऐसे आलोचक कम हैं जो आलोचना को शिक्षा, संस्कृति और राजनीति से अनिवार्यतः जोड़ते हुए अपनी भूमिका निभाते हैं; जिनकी आलोचना एक तरह से व्यापक मानवीय जीवन की ही आलोचना हो जाती है, साहित्य का महदूद हुए बिना.

लोकबुद्धिजीवी के रूप में बहुमान्य अपूर्वानंद ऐसे ही बिरले आलोचक हैं. मेरा सौभाग्य है कि उनके साथ पिछले लगभग तीस सालों से संबंध और संवाद रहा है. 2002 में गुजरात दंगों के समय मेरे खुलकर सामने आने के लिए उकसाने में उनकी भूमिका थी और तब वे एक विश्वविद्यालय में मेरे सहकर्मी थे.

अपूर्वानंद ने मुक्तिबोध पर एक बहुत रोचक, पठनीय और वैचारिक उत्तेजना से भरी पुस्तक लिखी है: ‘मुक्तिबोध की लालटेन’ (सेतु प्रकाशन). पुस्तक पर विस्तार से विचार करने की ज़रूरत है. पर यहां संक्षेप में उसमें शामिल एक अंश की ओर ध्यान दिलाना उचित होगा.

अपूर्वानंद लिखते हैं:

‘इसलिए मुक्तिबोध ‘भिन्न भाव, भिन्न मत के प्रति आदर और सहानुभूति पर बल देते हैं. जो भिन्न है, उसे प्रतिपक्षी या विपक्षी क्यों मानें? वह तो एक अन्य दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा है. इस प्रकार वह मुझे संपन्न कर रहा है.’

मुक्तिबोध यह साहित्य के संदर्भ में लिखते हैं (लेकिन अभिव्यक्ति का संघर्ष क्या मात्र साहित्य का मामला है?)- ‘समीक्षा एक प्रेम दर्शन है. ऐसा प्रेम दर्शन जो आवश्यकता पड़ने पर अति कठोर होता है, किंतु सामान्यतः उदार और कोमल होता है.’

एक दूसरी जगह वे लिखते हैं कि ‘आलोचना या समीक्षा में मनुष्य के प्रति भारी श्रद्धा होती है, उसकी संभावनाओं के प्रति. आलोचक की दिलचस्पी जीवन में है या नहीं? क्या अपने सिद्धांत और शास्त्र से आसक्त है या जीवन के प्रति उसमें अनुराग है? क्या वह जीवन में भींगने को, अपना विस्तार करने को तैयार है?’

आलोचना को जीवन से जोड़ने की बात तो बहुत की गई है पर उसे अनुराग से कम ही जोड़ा गया है. साहित्य जीवन से अनुराग से ही उपजता है और अपने आदर्श प्रभाव में इस अनुराग को गहरा, सजग और चारों ओर से खोलता है. उसकी लालटेन की रोशनी में, कई बार उसकी धुंधवाती नीम रोशनी आपसे अलग मत रखने वाले से भी आ सकती है. साहित्य में रोशनी का ठेका नहीं दिया जाता: वह तो यह मानकर चलता है. कि जहां भी जीवन है वहां या तो रोशनी है या उसकी संभावना है.

यह एक विडंबना ही है कि दशकों से कुछ लोग, जिनमें नामवर और साहित्यपगे आलोचक और विचारधारी शामिल हैं, मुक्तिबोध का इस्तेमाल अपने से भिन्न मत रखने वाले को उनकी लाठी से पीटने के लिए करते रहे हैं. यह वह मुक़ाम है जहां हमें मुक्तिबोध को लालटेन बनाना चाहिए, लाठी नहीं. सौभाग्य से, अपूर्वानंद वह बखूबी, तैयारी और लगन, आत्मविश्वास और अध्यवसाय से इस पुस्तक में कर रहे हैं.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)