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एल्गार परिषद मामला: चिकित्सकीय आधार पर वरवरा राव को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली

भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में आरोपी 83 वर्षीय वरवरा राव ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें स्थायी चिकित्सा ज़मानत के उनके आवेदन को ख़ारिज कर दिया गया था. राव अभी चिकित्सकीय आधार पर अंतरिम ज़मानत पर हैं.

तेलुगू कवि वरवरा राव. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी पी. वरवरा राव को चिकित्सकीय आधार पर बुधवार को जमानत दे दी.

जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने कवि एवं कार्यकर्ता राव (83) को जमानत देते हुए कहा कि वह किसी भी तरह से इसका दुरुपयोग न करें.

बिजनेस स्टैंडर्स के मुताबिक, पीठ ने कहा, ‘अपीलकर्ता (राव) की चिकित्सा स्थिति में इतने समय तक सुधार नहीं हुआ है कि जमानत की सुविधा जो पहले दी गई थी, वापस ले ली जाए. परिस्थितियों पर पूरी तरह गौर करने के बाद हमारा मानना है याचिकाकर्ता चिकित्सकीय आधार पर जमानत के हकदार हैं,’

राव को जमानत देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि वह निचली अदालत की अनुमति के बिना मुंबई नहीं छोड़ेंगे.

अदालत ने कहा, ‘अपीलकर्ता किसी भी तरह से अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगा, न ही वह किसी गवाह से संपर्क करेगा या जांच के दौरान प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा.’

राव अभी चिकित्सकीय आधार पर अंतरिम जमानत पर हैं.

शीर्ष अदालत ने कहा कि हालांकि मामले में आरोप पत्र दायर किया जा चुका है, लेकिन कुछ आरोपियों को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है और आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने के लिए मौजूदा मामला अदालत के समक्ष नहीं लाया गया है.

अदालत ने यह भी पाया कि आरोपमुक्त करने के अभियुक्तों की अर्जियां अब भी विचाराधीन हैं.

दलीलों के दौरान राव की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने अपनी चिकित्सा स्थिति का हवाला दिया और कहा कि मामले में आरोप भी तय नहीं किए गए हैं.

एनआईए की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने याचिका का जोरदार विरोध किया और तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री राव की गहरी साजिश में शामिल होने को दर्शाती है और वह जमानत की राहत के हकदार नहीं हैं.

उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी कथित रूप से गंभीर गतिविधियों में शामिल हैं जो राष्ट्र के खिलाफ हैं.

राव ने चिकित्सकीय आधार पर स्थायी जमानत संबंधी उनकी अपील को बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था.

वरवरा राव ने 13 अप्रैल के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अधिवक्ता नूपुर कुमार के माध्यम से दायर अपनी अपील में कहा था, ‘याचिकाकर्ता, 83 वर्षीय प्रसिद्ध तेलुगू कवि और वक्ता हैं, जो विचाराधीन कैदी के रूप में दो साल से अधिक समय तक जेल में रहे हैं. वर्तमान में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा चिकित्सा आधार पर दी गई जमानत पर हैं. कोई भी आगे की कैद उनके खराब होते स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र के चलते उनके लिए मौत की घंटी होगी.’

इसमें कहा गया था कि राव ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी, क्योंकि उनकी उम्र और खराब स्वास्थ्य की स्थिति के बावजूद उन्हें जमानत नहीं दी गई थी और हैदराबाद में स्थानांतरित करने की उनकी अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया गया था.

बता दें कि राव को 28 अगस्त, 2018 को उनके हैदराबाद स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया था और वे उस मामले में विचाराधीन कैदी है, जिसके लिए पुणे पुलिस ने 8 जनवरी, 2018 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी.

शुरुआत में राव ने कहा कि शीर्ष अदालत के आदेश के बाद उन्हें नजरबंद कर दिया गया है. 17 नवंबर, 2018 को उन्हें पुलिस हिरासत में ले लिया गया और बाद में नवी मुंबई की तलोजा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया.

22 फरवरी, 2021 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत दे दी और उन्हें 6 मार्च, 2021 को जेल से रिहा कर दिया गया.

गौरतलब है कि यह मामला 31 दिसंबर 2017 में पुणे में आयोजित एल्गार परिषद के कार्यक्रम में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने से जुड़ा है. पुणे पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन कोरेगांव-भीमा में हिंसा फैली और इस कार्यक्रम का आयोजन करने वाले लोगों के माओवादियों से संबंध हैं.

मामले की जांच बाद में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) को सौंप दी गई थी.

एनआईए ने भी आरोप लगाया है कि एल्गार परिषद का आयोजन राज्य भर में दलित और अन्य वर्गों की सांप्रदायिक भावना को भड़काने और उन्हें जाति के नाम पर उकसाकर भीमा-कोरेगांव सहित पुणे जिले के विभिन्न स्थानों और महाराष्ट्र राज्य में हिंसा, अस्थिरता और अराजकता पैदा करने के लिए आयोजित किया गया था.

मामले में केवल एक अन्य आरोपी वकील और अधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. 13 अन्य अभी भी महाराष्ट्र की जेलों में बंद हैं.

फादर स्टेन स्वामी की पिछले साल पांच जुलाई को अस्पताल में उस समय मौत हो गई थी, जब वह चिकित्सा के आधार पर जमानत का इंतजार कर रहे थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)