छत्तीसगढ़ मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय न्याय और बंधुत्व के सिद्धांत के उलट लगता है

छत्तीसगढ़ पुलिस ने ग्रामीणों की हत्या पर एफआईआर तब दर्ज की थी, जब उनके परिजनों ने याचिका दायर की, फिर उसने विसंगतियों से भरी जानकारियां दीं, याचिकाकर्ताओं को गवाही दर्ज होने से पहले हिरासत में लिया गया, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर विश्वास करते हुए न्याय के लिए उस तक पहुंचे लोगों को दंडित करने का फैसला दिया.

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छत्तीसगढ़ पुलिस ने ग्रामीणों की हत्या पर एफआईआर तब दर्ज की थी, जब उनके परिजनों ने याचिका दायर की, फिर उसने विसंगतियों से भरी जानकारियां दीं, याचिकाकर्ताओं को गवाही दर्ज होने से पहले हिरासत में लिया गया, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर विश्वास करते हुए न्याय के लिए उस तक पहुंचे लोगों को दंडित करने का फैसला दिया.

18 जून 2009 को छत्तीसगढ़ के लालगढ़ में गिरफ्तार किए जाने के बाद पुलिस से उन्हें बख़्शने की गुज़ारिश करता एक ग्रामीण. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

हिमांशु कुमार तथा अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला नागरिक स्वतंत्रता के मामलों में कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की हिम्मत करनेवाले याचिकाकर्ताओं को ही अपराधी ठहराने, खासतौर पर तब जब मामला गरीबों या अल्पसंख्यक समुदायों का हो,  के उभार ले रहे केस लॉ में एक उल्लेखनीय जुड़ाव है. डॉ. आंबेडकर ने संविधान के अनुच्छेद 32- मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ न्यायिक उपचार का अधिकार- को संविधान की आत्मा करार दिया था. लेकिन हमारे जजों के फैसलों से लगता है कि उन्हें यह समय की बर्बादी जैसा लगता है.

यह मामला पुलिस द्वारा 2009 में छत्तीसगढ़ के वर्तमान सुकमा जिले में शुरू किए गए माओवादी विरोधी अभियान ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा की गई ज्यादतियों को लेकर है. ज्यादा दो टूक तरीके से कहा जाए तो यह 17 सितंबर 2009 को गछनपल्ली और सिंगनमाडगू और 1 अक्टूबर, 2009 को गोमपाड और आसपास के गांवों- बेलपोचा, नुलकातोंग, चिंतागुफा- में अंजाम दी गई घटनाओं को लेकर है.

पुलिस ने पहले प्रेस में 17 सितंबर को 27 उग्रवादियों को मार गिराने और सिंगनमाडगू और गछनपल्ली में हुए एनकाउंटर में 6 सुरक्षा जवानों के शहीद होने का दावा किया. एनडीटीवी में पुलिस के हवाले से दिया गया आंकड़ा था- सात नक्सलियों के शव बरामद, 50 ढेर, जबकि द हिंदू में पुलिस के हवाले से 30 माओवादियों के मारे जाने की खबर दी गई. लेकिन 18 सितंबर को पुलिस की शुरुआती एफआईआर में सिर्फ एक मृतक माओवादी और छह सुरक्षा जवानों का जिक्र है. पुलिस ने 25 नवंबर, 2009 को भी एक एफआईआर दायर किया, जिसमें दो महीने पहले 1 अक्टूबर को गोमपाड में एक एनकाउंटर का जिक्र किया गया. लेकिन इसमें कोई मौत होने की बात नहीं की गई.

ग्रामीणों द्वारा पुलिस के दावों का प्रतिवाद किया गया- उस समय प्रेस में भी और सुप्रीम कोर्ट में दिए गए उनके बयानों में भी. उन्होंने कहा कि 17 सितंबर को गछनपल्ली में 5 निर्दोष ग्रामीणों की, 1 अक्टूबर को गोमपाड में नौ ग्रामीणों की और इन तारीखों के आसपास और 7 अन्यों की हत्या की गई थी. इसके अलावा गट्टापद और पलचलमा से छह अन्य ग्रामीणों की 17 सितंबर, 2009 की हत्या की गई थी, लेकिन जैसा कि द हिंदू की रिपोर्ट में लिखा था, इन्हें नक्सलियों के तौर पर दिखाया गया था. कुल मिलाकर 2009 के सितंबर और अक्टूबर महीने में इस इलाके में कम से कम 27 ग्रामीणों की हत्या की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका इनमें से 19 मौतों पर केंद्रित थी और इसे हिमांशु कुमार और मृतकों के 11 परिवार वालों द्वारा दायर किया गया था. 13वां याचिकाकर्ता, सोदी संभो वास्तव में 1 अक्टूबर को गोमपाड में फायरिंग में वास्तव में जख्मी हुआ था. हिमांशु कुमार दंतेवाड़ा में वनवासी चेतना आश्रम नामक एक एनजीओ चलाते थे और साथ ही जिला लीग एड कमेटी (न्यायिक सहायता समिति) से जुड़े थे. इस याचिका में मुख्य तौर पर इन मौतों की निष्पक्ष जांच (पहले सीबीआई द्वारा, जिसे संशोधित कर एसआईटी कर दिया गया था) और इन मौतों, घरों में आग लगाने और लूटपाट के लिए ग्रामीणों को मुआवजा देने पर केंद्रित थी.

27 अक्टूबर, 2009 को रिट याचिका दायर करने के बाद पुलिस ने दो और एफआईआर दायर कीं- 8 जनवरी, 2010 (गोमपाड के सोयम रामा के नाम से)  और 21 फरवरी, 2010 को (गछनपल्ली के माड़वी हड़मा के नाम से) जिसमें 1 अक्टूबर, 2009 को गोमपाड में 7 ग्रामीणों की मौत और 17 सितंबर, 2009 को गछनपल्ली में 5 ग्रामीणों की मौत को दर्ज किय गया था. दोनों ही एफआईआर में आरोपियों का उल्लेख ‘फरार आरोपित नक्सली’ के तौर पर किया गया और इसमें आगे बढ़कर उनमें से कइयों के नाम की सूची दी गई थी.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता संख्या, 13 सोदी संभो, जिनका याचिकाकर्ता संख्या 1 और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मदद से गोली लगने से पांव में हुए जख्म का इलाज चल रहा था, को (2 जनवरी, 2010 को) अधिकारियों द्वारा उठाकर कोंटा सलवा जुडूम कैंप में रख दिया गया. इसके बाद याचिकाकर्ता संख्या 1 ओर उनके वकीलों की संभो से मिलने की कोशिशों पर छत्तीसगढ़ पुलिस ने पानी फेर दिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें उनसे मिलने देने की इजाजत देने का आदेश दिया गया था. ये सारे तथ्य कोर्ट के समक्ष हलफनामों और साथ ही साथ कोर्ट के निर्देशों के विषय हैं.

संभो को कोंटा लाए जाने के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस 11 अन्य आदिवासी याचिकाकर्ताओं को भी उठा ले गई. 8 फरवरी, 2010 को, जब हिमांशु कुमार ने कोर्ट के इस बारे में बताया, तब जस्टिस सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर ने याचिकाकर्ताओं को तीस हजारी अदालत, दिल्ली के एक जिला न्यायाधीश के सामने अपना बयान दर्ज कराने की अनुमति दिए जाने का आदेश दिया.

15 फरवरी, 2010 को छह याचिकाकर्ता तीस हजारी अदालत में न्यायाधीश जीपी मित्तल के सामने हाजिर हुए. उनमें से एक ने बताया कि वह पांच दिनों से पुलिस हिरासत में था जबकि जज ने यह नोट किया कि संभो डरा हुआ और तनाव में लग रहा था. याचिकाकर्ताओं- जिन्हें नैसर्गिक  न्याय के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन करते हुए छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा पकड़कर रखा गया था- ने जज को सूचित किया कि उन्हें पुलिस द्वारा ‘बड़े साब’ के सामने बयान देने के लिए कहा गया था और उन सभी के बयान एक समान थे: उन्होंने कहा कि उनके संबंधियों की मृत्यु जंगल से आए वर्दीधारी हथियारबंद लोगों द्वारा की गई गोलीबारी के कारण हुई, लेकिन वे उनकी पहचान नहीं कर पाए.

इसी बची, पुलिस ने एफआईआर की जांच को राज्य सीआईडी को सौंप दिया था, जिसने 28 जनवरी, 2010 को इस मामले में आरोपपत्रों (चार्जशीट) को छत्तीसगढ़ की एक स्थानीय अदालत में दायर किया. इसमें भी ‘आरोपी’ ‘फरार नक्सली’. 12 रिश्तेदारों को एक-एक लाख रुपये का मुआवजा दिया गया.

हालांकि, छत्तीसगढ़ राज्य और केंद्र सरकार दोनों को ही तीस हजारी की गवाहियों की प्रतियां 2010 में ही  दे दी गई थीं और छत्तीसगढ़ ने 2017 में इनका जवाब दिया था, भारत सरकार ने 2022 में अचानक नींद से जागते हुए दावा किया कि उसके पास से इन गवाहियों की प्रति खो गई और एक और प्रति की मांग की.

हत्यारों की पहचान कर पाने में नाकाम याचिकाकर्ताओं की गवाहियों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने यह दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट की अपनी याचिका में उनके द्वारा किया गया दावा- कि सुरक्षा बल इन मौतों के लिए जिम्मेदार हैं- पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है. भारत सरकार की तरफ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दावे पर जोर दिया कि ‘याचिकाकर्ता 1, हिमांशु कुमार ने सुरक्षा बलों को बदनाम करने की एक बड़ी योजना के तहत झूठे तरीके से ये आरोप लगाए और ‘गंवार और निरक्षर’ आदिवासियों को बहलाया, फुसलाया.

14 जुलाई, 2022 के अपने फैसले में जस्टिर खानविलकर और परदीवाला ने पुलिस की दलील को और इस दावे को भी जस का तस स्वीकार कर लिया कि एफआईआर दायर करने में देरी पुलिस के कारण नहीं, बल्कि याचिकाकर्ताओं –2-13 के कारण हुई थी, जो जांच के दौरान लापता थे.

सुप्रीम कोर्ट ने परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपने मनमुताबिक जांच एजेंसी का -खासतौर पर सीबीआई का– चयन नहीं कर सकते हैं- क्योंकि काफी श्रमपूर्वक किए गए पुलिस की जांच के बाद और कुछ जांचने के लिए नहीं रह जाता है (पैरा 55-57). उन्होंने पुलिस के इस दावे को भी स्वीकार कर लिया कि 14 ग्रामीणों की हत्या नक्सलियों द्वारा की गई थी.

सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार. (फोटो: द वायर)

विसंगतियों पर चुप्पी

अदालत के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए था कि अगर ग्रामीणों ने हत्यारों की पहचान पुलिस के रूप में नहीं कर सके, तो उन्होंने उनकी पहचान नक्सलियों के तौर पर भी नहीं की. तो, प्राथमिकी और चार्जशीट में किस आधार पर कई नामजद नक्सलियों को फरार आरोपी कहा गया?

सुरक्षा एजेंसियों का कहना यह था ​कि वे इसे एक स्थापित तथ्य के रूप में नहीं बल्कि एक ‘संभावना’ के रूप में देख रहे हैं, जिसे ‘इनकार नहीं किया जा सकता’- कि हत्यारे पुलिस की वर्दी पहने हुए नक्सली थे जो आदिवासियों को डरा कर अपने आंदोलन में शामिल करना चाहते थे. (कोबरा का प्रतिनिधित्व करने वाले गृह मंत्रालय के दिलीप कुमार कोटिया द्वारा दायर हलफनामा, फैसले का पृष्ठ 221/22)

संयोग से, तीन स्वतंत्र पूछताछ में जहां पुलिस ने दावा किया कि लोग मारे गए या एक ‘मुठभेड़’ में घर जलाए गए, यह पाया गया कि उस समय गांव में कोई माओवादी मौजूद नहीं था और मारे गए लोग सामान्य ग्रामीण थे (सीबीआई का ताड़मेटला 2011 और सरकेगुडा और एडेसमेटा पर जस्टिस अग्रवाल जांच आयोग का बयान)

पाठक को आश्चर्य हो सकता है कि सरकार के बयान (जिसे जजों ने भी स्वीकार किया) के अनुसार अनुसार, वे ग्रामीण, जिन्होंने इस आरोप के साथ कि सुरक्षा बलों ने उनके रिश्तेदारों को मारा, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का असामान्य साहस दिखाया नक्सलियों के शिकार कैसे बन गए. जैसा कि मैंने अपनी किताब द बर्निंग फ़ॉरेस्ट में लिखा है कि पहचान में इस तरह के नाटकीय बदलाव छत्तीसगढ़ पुलिस के इतिहास में काफी आम हैं. शीर्ष अदालत के निर्देश कि अपराधियों की परवाह किए बिना संघर्ष के सभी पीड़ितों को मुआवजा दिया जाना चाहिए, के बावजूद केवल नक्सली हत्याओं के पीड़ितों को मुआवजा दिया गया है. यदि रिश्तेदार सुरक्षा बलों द्वारा हत्याओं के बारे में हंगामा करते हैं (जैसा कि गोमपाड और गचनपल्ली में हुआ) तो फरार आरोपी नक्सलियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाती है और रिश्तेदारों को मुआवजा दिया जाता है. कथित तौर पर नक्सलियों के निशाने पर रहने वाले ग्रामीण ऐसा घुमावदार रास्ता क्यों अपनाएंगे, जब वे पहले ही नक्सलियों को दोष देकर आसानी से मुआवजा पा सकते हैं, यह एक ऐसा सवाल है जो न्यायाधीशों ने नहीं पूछा.

खानविलकर पीठ ने यह पूछने की भी जहमत भीनहीं की कि उसे यह सुनिश्चित करने के लिए एक जनहित याचिका की आवश्यकता क्यों है कि पुलिस गचनपल्ली और गोमपाड में हुई मौतों के संबंध में एफआईआर दर्ज करे. खासकर जब सुप्रीम कोर्ट की पिछली पीठों ने- 2007 के बाद से- मामले दर्ज न करने या सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए निर्दोष ग्रामीणों की मौत की जांच नहीं करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार की आलोचना की थी (WP 250/2007 में 16.12.2008, 18.02.2010, 6.5.2010 और 5.7.2011 को सुप्रीम कोर्ट का निर्देश)

अपने शुरुआती जवाब में पुलिस ने पहले प्राथमिकी दर्ज नहीं करने का कारण यह बताया कि सभी शिकायतें एसपी के पास ‘एक निश्चित प्रारूप में और उसी तरह टाइप की गई’ थीं, जिससे संदेह पैदा हुआ कि वे माओवादियों द्वारा तैयार किए गए थे. यह एकरूपता वास्तव में रहस्यपूर्ण नहीं है क्योंकि याचिकाकर्ता 1, हिमांशु कुमार ने बताया है कि उन्होंने एफआईआर दर्ज कराने के लिए शिकायतें एकत्र करके एसपी को भेजीं.

पुलिस का कहना यह था कि यदि ग्रामीण एफआईआर दर्ज करने से मना किए जाने को लेकर असंतुष्ट थे, तो वे सीआरपीसी 156 (3) के तहत स्थानीय अदालतों में जा सकते थे. हैरानी होती है कि पुलिस और सरकार जैसा सॉलिसिटर जनरल ने बताया ‘ग्रामीण आदिवासियों’ से कैसे उम्मीद करते हैं कि उनके पास खुद मजिस्ट्रेट से संपर्क करने और एफआईआर दर्ज करवाने की मांग उठाने का जरिया होगा.

पुलिस के संस्करण में और भी कई विसंगतियां हैं. सिंगनमडगु के माडवी देवा का मामला लें, जो परिजनों के अनुसार 17 सितंबर, 2009 को सल्फी (स्थानीय शराब) लेकर घर लौट रहे थे. उसने खुद को सुरक्षा बलों के रास्ते में पाया और घबराया हुआ खड़ा रहा और फिर मारा गया. 4 फरवरी, 2010 का छत्तीसगढ़ सरकार का हलफनामा उन्हें गोलीबारी में मारा गया एक नागरिक और नक्सली बताने के बीच झूल-सा रहा था. पैरा 1, पृष्ठ 12 में वे कहते हैं: ‘एक शव की पहचान माड़वी देवा के तौर पर की गई थी, जिसकी नक्सलियों और पुलिस के बीच हुई गोलीबारी के दौरान मौत हुई.’ दो पृष्ठ नीचे पेज 14, पैरा 7 वे दावा करते हैं: ‘यह पहले ही कहा जा चुका है कि माड़वी  देवा वर्दीधारी नक्सली थी जिसका शव  घटनास्थल से मिला था जब 17.09.09 को सिंगमपाली में यह घटना हुई थी.’

नरसंहार कहना गलत?

17 सितंबर, 2009 को गछनपल्ली में जो हुआ उसका आंखोंदेखा हाल मार्च 2010 में द हिंदू में प्रकाशित हुआ था.

‘गछनपल्ली के एक चश्मदीद ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया, ‘मैंने देखा कि ऑपरेशन के दिन सुबह-सुबह वर्दीधारी आदमियों और हथियारबंद सलवा जुडूम सदस्यों के एक बड़े समूह ने हमला किया. सब लोग जंगलों में भाग गए और जब हम लौटे तो हमने शवों को देखा. 70 वर्षीय अपंग दुधि मुए अपने घर के दरवाजे पर मृत पड़ी थीं. उनके दोनों स्तनों को कुल्हाड़ी से काट दिया गया था. 65 वर्षीय माड़वी जोगा की चाकू मारकर हत्या की गई थी. 30 से 35 वर्ष की उम्र वाली मड़कम सुल्ला और माड़वी हड़मा मड़कम के घर के बाहर मृत पाए गए.’ गछनपल्ली के एक कोवासी मुया ने कहा, ‘जब मैंने खबर सुनी, मैं पलाचलम में था. जब मैं घर आया तो मैंने देखा कि मेरे दादा कोवासी गंगा हमारे घर के बाहर मृत पड़े हैं.’ मुया ने कहा कि कोवासी गंगा को कई बार चाकू मारा गया था. गंगा सत्तर वर्ष के थे.’

उस समय गोमपाड़ की घटना को लेकर व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई थी, जिसमें यूके के चैनल IV और फाइनेंशियल टाइम्स, अल जज़ीरा और द हिंदू शामिल थे. मेरी किताब द बर्निंग फ़ॉरेस्ट में एक सर्वाइवर ने बताया है कि कैसे सुरक्षा बल 1 अक्टूबर, 2009 की सुबह गांव पहुंचे:

‘उन्हें एक महिला मिली, जो नित्यकर्म के लिए खेत में गई थी और उन्होंने उसकी साड़ी पकड़ी थी, लेकिन वह गांव की ओर भागी और दूसरों को चेतावनी दी. बहुत से लोग भागने में सफल रहे लेकिन जो मिले, उन्हें सुरक्षा बलों ने मार गिराया. पुलिस फायरिंग में एक महिला सोदी सांभो घायल हो गई. गोमपाड में उस सुबह नौ लोगों की मौत हुई थी, जिनमें से चार अकेले एक परिवार के थे. 40 वर्षीय माडवी बाजारे बीमार थे इसलिए जब वो आए, तब वो और उनकी पत्नी सुब्बी भागे नहीं. उनकी बड़ी बेटी कट्टम कन्नी अपने दो साल के बेटे सुरेश के साथ उनके वहां रहने आई हुई थी. उस समय घर में दो अन्य सदस्य- बाजारे की दस साल की बेटी भूमि और उसकी आठ साल की बहन मुट्टी थीं. सभी को घसीटकर घर से बाहर कर दिया गया. बाजारे, सुब्बी और मुट्टी को चाकू से मारा गया और महुआ के पेड़ के पास छोड़ दिया गया. कन्नी घर पर बच्चे के साथ बैठी थी. उसे घसीटा गया, उसके कपडे उतारे गए, बलात्कार किया गया और फिर मार डाला गया. इस दौरान उन्होंने उसके बच्चे सुरेश का अंगूठा भी काट दिया और रोते हुए बच्चे को उसकी मृत मां के सीने पर छोड़ दिया. उसकी दस वर्षीय मौसी भूमि उसे उठाकर जंगल को भागने में सफल रही, जहां अन्य लोग छिपे हुए थे. एक नवविवाहित जोड़ा- सोयम सुब्बा और सोयम जोगी भी मारे गए थे, साथ ही माडवी एनका भी थे, जिनका घर मकई के ऊंचे पौधों से घिरा हुआ था, जिसके चलते उन्होंने फोर्स को आते नहीं देखा और भाग नहीं सके. मारे गए दो अन्य लोग भंडारपदार के मुरिया आगंतुक, मुचाकी हांडा और मड़कम देवा थे. गोमपाड़ में काम पूरा करके वो एसपीओ चिंतागुफा गए, जहां उन्होंने 35 साल के कोमाराम मुट्टा को मारा. उसकी पीठ में गोली मारी गई थी और शव को वहीं छोड़ दिया गया था.’

यह समझने के लिए कि सुप्रीम कोर्ट क्यों पुलिस का संस्करण मानने को तैयार हुआ, क्यों याचिकाकर्ताओं के वर्ज़न को स्वीकारने से इनकार कर दिया, कई स्पष्टीकरण हैं. इनमें से एक है, जिसे गौतम भाटिया ने उठाया है: अदालत के कार्यकारी कोर्ट में बदल जाने, जहां पुलिस/या सरकार की बात को ही प्रथमदृष्टया सच मान लिया जाता है और जमानत नामुमकिन हो जाती है.

लेकिन इसके साथ ही हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि यह आदेश शुरू किस तरह हो रहा है, उसी भाषा में जैसी ज़किया जाफरी के फैसले में इस्तेमाल हुई थी जहां इतने सालों तक केस लड़ते रहने के लिए अदालत याचिकाकर्ताओं के ‘साहस’ की बात कहती है.

हिमांशु कुमार या गोमपाड़ मामले के निर्णय में अदालत अपनी बात इन हत्याओं को ‘कथित नरसंहार’ या ‘कथित क्रूर नरसंहार’ कहकर शुरू करती है. अगर किसी दिन में एक गांव में नौ लोग (जिसमें एक ही परिवार के चार लोग शामिल हैं) मारे जाते हैं और दो साल के बच्चे की कुछ उंगलियां काट दी जाती हैं, तो यह नरसंहार जैसा है. अगर यही लुटियंस दिल्ली में होता, जहां अमीर और ताकतवर लोग रहते हैं, तो इसे निश्चित रूप से  नरसंहार ही कहा जाता.

छत्तीसगढ़ सरकार के लिए ‘माननीय न्यायालय को गुमराह करने के लिए ‘नरसंहार’ का आरोप लगाया गया’ और ‘नरसंहार एक गलत नाम है’ (28.4.2010 के राज्य सरकार के हलफनामे का 28.5 और 28.8) उन्होंने पुलिस पर आरोप लगाने वाले याचिकाकर्ता-रिश्तेदारों के बयानों को ‘अवास्तविक’ बताया है.

चलिए मान लेते हैं कि ग्रामीणों को माओवादियों ने ही मारा, जैसे पुलिस दावा कर रही है. तब क्या है एक भयानक नरसंहार नहीं होगा? छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार के कर्मचारियों, सुप्रीम कोर्ट के जजों को सरकार से तनख्वाह इसीलिए मिलती है कि वे नागरिकों की जिंदगी और मौलिक अधिकारों की रक्षा करें. क्या उन्हें इस तरह मुटों को कमतर आंकने की बजाय चिंतित नहीं होना चाहिए. या बात ये है कि ये मौतें उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती हैं?

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

याचिकाकर्ताओं का अपराधीकरण 

याचिका ख़ारिज करने के अपने आदेश में न केवल हिमांशु कुमार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, बल्कि सरकार को अनुमति या असल में कहें तो प्रोत्साहन भी दिया है है कि वो उनके खिलाफ आईपीसी के अनुच्छेद 211 के तहत झूठे आरोप लगाने के लिए मामला दर्ज करे. इतना ही नहीं, उन्होंने केंद्र सरकार की बात मानते हुए इसके पीछे एक व्यापक ‘आपराधिक षड्यंत्र या किसी अन्य अपराध’ के होने का भी शिगूफा छोड़ दिया.

‘… एक एफआईआर दर्ज करें और उन व्यक्तियों/संगठनों की पहचान करने के लिए गहन जांच करें, जो झूठे और मनगढ़ंत सबूतों के आधार पर इस माननीय न्यायालय के साथ-साथ माननीय उच्च न्यायालयों के सामने याचिका दायर करने की साजिश, उकसावा और साधन मुहैया करवा रहे हैं, जिनका मकसद या तो सुरक्षा एजेंसियों को वामपंथी (नक्सल) मिलिशिया के खिलाफ झूठे आरोप लगाकर कार्रवाई करने से रोकना या वामपंथी (नक्सल) मिलिशिया के पीड़ित होने की झूठी कहानी बनाकर माननीय न्यायालयों के समक्ष न्याय के दायरे में लाने से रोकना है. (सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पैरा 95, 67बी से)

संक्षेप में कहें तो देश की किसी भी अदालत में माओवादी विरोधी अभियानों के दौरान सुरक्षा बलों की ज्यादतियों और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने वाला कोई भी व्यक्ति संदिग्ध है. जबकि सुकमा में नक्सली होने के आरोप में 121 आदिवासियों को बरी कर दिया गया है, सुप्रीम कोर्ट हमसे कह रहा है कि अपनी बेगुनाही के लिए लड़ना संभावित तौर पर एक अपराध है. जिस समय देश के सर्वोच्च पद पर एक आदिवासी मूल की महिला आसीन हैं, ऐसा लगता है कि आदिवासियों (जिनमें से अधिकांश माओवादी विरोधी अभियानों से प्रभावित लोगों में से हैं) के लिए अदालतों में जाकर उनके मौलिक अधिकारों का दावा करना अब अपराध है.

जकिया जाफरी और हिमांशु कुमार मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले न केवल शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत पर आधारित कानून के शासन को नष्ट करता है, बल्कि हमारे संविधान की प्रमुख आधारशिलाओं में से एक, बंधुत्व के सिद्धांत जिसके तहत कोई भी नागरिक अपने या किसी दूसरे के वास्ते सरकार से जवाब मांग सकता है, को भी ध्वस्त करते हैं.

(लेखक समाजशास्त्री हैं और उन्होंने बर्निंग फॉरेस्ट: इंडियाज़ वॉर इन बस्तर किताब लिखी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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