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कर्नाटक: हाईकोर्ट ने एंटी-करप्शन ब्यूरो भंग किया, कहा- भ्रष्ट नेताओं को बचाने के लिए गठित हुआ

कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कहा कि एसीबी का गठन लोकायुक्त को कमज़ोर करने के लिए किया गया था. अदालत का यह आदेश उस घटनाक्रम के बाद आया है जब इसी हाईकोर्ट के एक जज एचपी संदेश ने कहा था कि एसीबी से जुड़े एक भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई के लिए उन्हें तबादले की धमकी मिली थी.

कर्नाटक हाईकोर्ट. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 11 अगस्त को एक कड़े फैसले में राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) को समाप्त कर दिया. अदालत में कहा कि इस निकाय को लोकायुक्त को कमजोर करने और भ्रष्ट मंत्रियों और नेताओं की ढाल बनने के लिए गठित किया गया था.

रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस बी. वीरप्पा और जस्टिस केएस हेमलेखा ने एसीबी के गठन को चुनौती देने वाली एक याचिका और 16 मार्च 2016 को जारी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोकायुक्त पुलिस के केस दर्ज करने और जांच करने की शक्ति को वापस लेने के सरकारी आदेश पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया.

सरकार की 2016 की दो अधिसूचनाओं को अधिवक्ता संघ, बेंगलुरु, चिदानंद उर्स और समाज परिवर्तन समुदाय सहित विभिन्न याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी थी.

बार एंड बेंच के अनुसार, कोर्ट ने फैसले में कहा, ‘सरकार द्वारा एसीबी का गठन भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों को लोकायुक्त की सतर्क निगाहों से बचाने के लिए किया गया है और सरकार अन्य बातों के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत इन व्यक्तियों को अभियोजन से बचाने के लिए लोकायुक्त की संस्था को कमजोर कर रही है.’

उस समय कर्नाटक में सिद्धारमैया की अगुवाई में कांग्रेस की सरकार थी.

सरकार ने एसीबी के गठन के लिए दिए गए सरकार के 14 मार्च 2016 के आदेश को ख़ारिज करते हुए इसके समक्ष लंबित मामले लोकायुक्त को ट्रांसफर कर दिए हैं, साथ ही निर्देश दिया है कि एसीबी के स्टाफ को लोकायुक्त में जगह दी जाए.

साथ ही अदालत ने सक्षम व्यक्तियों को लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त के पद पर नियुक्त करने को कहा है.

आदेश में कहा गया, ‘राज्य सरकार द्वारा रद्द किए गए कार्यकारी आदेश को पारित करने में स्वतंत्र रूप से समझदारी का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया गया और यह केवल डीजी और आईजी की सिफारिश पर आधारित था, इसलिए इसे कायम नहीं रखा जा सकता.’

फैसले में कहा गया, ‘कार्यकारी आदेश के माध्यम से एसीबी का गठन न्यायोचित और संवैधानिक नहीं है.

बार और बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने जोड़ा कि एसीबी द्वारा अब तक की गई कार्रवाई में उसने मंत्रियों, सांसदों, विधायकों या एमएलसी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया और केवल कुछ मामले दर्ज कुछ अधिकारियों के खिलाफ दर्ज किए गए.

अदालत का यह आदेश उस घटनाक्रम के बाद आया है जब इसी हाईकोर्ट के एक जज एचपी संदेश ने कहा था कि एसीबी से जुड़े एक भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई के लिए उन्हें तबादले की धमकी दी गई थी. जस्टिस संदेश ने एसीबी के वकील से कहा था कि ‘आपके अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) बहुत ताकतवर हैं’ कि हाईकोर्ट के एक अन्य जज ने भी उनसे तबादले की धमकी मिलने की बात कही है.

11 जुलाई को जस्टिस संदेश ने यही बात लिखा एक लिखित आदेश दिया था. उन्होंने एसीबी को इसके गठन से लेकर उस तामय तक की सभी क्लोज़र रिपोर्ट पेश करने के निर्देश भी दिए थे. हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उनके कुछ आदेशों पर स्टे लगा दिया था.