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बार काउंसिल ने प्रशांत भूषण की निंदा की, कहा- न्यायपालिका का उपहास करने का अधिकार किसी को नहीं

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने बीते 10 अगस्त को इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल द्वारा आयोजित वेबिनार को संबोधित करते हुए ज़किया जाफ़री और मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम जैसे मामलों में शीर्ष अदालत के हालिया फैसलों की आलोचना की थी.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने न्यायपालिका के खिलाफ टिप्पणी को लेकर अधिवक्ता प्रशांत भूषण की आलोचना की है और कहा है कि किसी को भी सुप्रीम कोर्ट एवं इसके न्यायाधीशों का उपहास बनाने का अधिकार नहीं है. इसने यह भी कहा कि वकीलों को लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए.

बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने एक प्रेस विज्ञप्ति में आरोप लगाया कि भूषण जैसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं और भारत विरोधी अभियान में शामिल हैं.

भूषण ने 10 अगस्त को इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी) द्वारा आयोजित वेबिनार को संबोधित करते हुए गुजरात दंगा मामलों से संबंधित जकिया जाफरी और मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) जैसे मामलों में शीर्ष अदालत के हालिया फैसलों की आलोचना की थी.

बीसीआई ने कहा, ‘अधिवक्ता ने इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल द्वारा आयोजित एक वेबिनार में बोलते हुए सारी हदें पार कर दीं.’

वरिष्ठ अधिवक्ता मिश्रा ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा, ‘उन्होंने न केवल सुप्रीम कोर्ट के हमारे न्यायाधीशों की आलोचना की और उनके लिए अनुचित व अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, बल्कि ऐसा बोलकर खुद को बेनकाब भी कर दिया. ऐसा करके उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ न्यायाधीशों को डराना चाहा.’

शीर्ष अधिवक्ताओं के निकाय प्रमुख ने कहा कि किसी को भी भारत के सुप्रीम कोर्ट, इसके न्यायाधीशों या न्यायपालिका का उपहास करने का अधिकार नहीं है.

बयान में कहा गया, ‘आप व्यवस्था का मजाक नहीं बना सकते. आप किसी की भी आलोचना कर सकते हैं, लेकिन आप लक्ष्मण रेखा पार नहीं कर सकते, हमेशा अपनी भाषा का ध्यान रखें. प्रैक्टिस करने का लाइसेंस आपको वकील के रूप में अपनी स्थिति का दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं देता है.’

बीसीआई ने भूषण के बयान को हास्यास्पद, निंदनीय और राष्ट्र के खिलाफ करार दिया.

इसने कहा, ‘भूषण जैसे व्यक्ति कभी भी नागरिक स्वतंत्रता के नायक नहीं रहे हैं, बल्कि इस तरह के अनुचित कार्य करके वे दुनिया को यह संदेश देने में सफल होते हैं कि वे भारत विरोधी हैं. वास्तव में ऐसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं. हम चीन और रूस जैसे देशों में प्रशांत (भूषण) जैसे लोगों के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते.’

बीसीआई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने में किसी एक या अन्य कारणों से संकोच कर सकता है, लेकिन बार काउंसिल इस तरह की चीजों को बर्दाश्त नहीं करेगी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, न्यायाधीशों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरियों के मुद्दे पर दिए भूषण के बयान की आलोचना करते हुए बीसीआई ने कहा कि विभिन्न कानूनों के तहत कुछ पद ऐसे हैं, जो केवल सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को ही सौंपे जा सकते हैं.

बीसीआई की ओर से आगे कहा गया, ‘इसलिए, इस तरह की नियुक्तियों की इतनी अभद्र तरीके से आलोचना नहीं की जा सकती है. बार काउंसिल भी इन मुद्दों को उचित मंचों के समक्ष सम्मानजनक तरीके से उठाता रहा है. इन मामलों के लिए हमारे न्यायाधीशों या संस्थान की छवि खराब करना काफी अनुचित और गलत है.’

सोशल और डिजिटल मीडिया की पहुंच और गति का उल्लेख करते हुए बीसीआई अध्यक्ष ने कहा कि बयान देने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ऐसे संदेश पूरी दुनिया में जल्दी जाते हैं.

उन्होंने कहा, ‘वकीलों के आचरण और शिष्टाचार के लिए, बीसीआई और राज्य परिषदों ने नियम और दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं.’

मालूम हो कि बीते 13 अगस्त को इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल ने प्रशांत भूषण के हवाले से कुछ ट्वीट भी किए हैं.

एक ट्वीट के अनुसार, ‘भारत में नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर मोदी सरकार के चौतरफा हमलों में सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है. सुप्रीम कोर्ट ने नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के संरक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है.’

काउंसिल ने प्रशांत भूषण के हवाले से ट्वीट किया, ‘मोदी शासन के आठ सालों में अल्पसंख्यकों पर आक्रामक हमलों के साथ नागरिक अधिकारों को बड़े पैमाने पर रौंदा गया. मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने के लिए कानून बनाए गए और उन्हें ‘फर्जी मुठभेड़ों’ में मारा गया. विरोध प्रदर्शन पर उनके घरों को बुलडोज किया गया.’

इसके मुताबिक भूषण ने कहा, ‘गुजरात में 2002 में हुई हिंसा में मोदी के शामिल होने से जुड़े सबूतों की सुप्रीम कोर्ट ने अनदेखी की. हिंसा में मोदी की भूमिका को 20 साल से उजागर करने में जुटीं तीस्ता सीतलवाड को जेल भिजवाने वाला फैसला करने में सुप्रीम कोर्ट ‘अलग स्तर’ पर चला गया.’

भूषण की तरफ से कहा गया, ‘भीमा कोरेगांव केस में दर्जनों मानवाधिकारवादी लगभग चार साल से जेल में हैं, जबकि तमाम फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने साबित कर दिया है कि उनके कंप्यूटर में वे ‘सबूत’ डाले गए जिनकी वजह से वे जेल में डाले गए. सुप्रीम कोर्ट ने फिर भी उन्हें जमानत नहीं दी.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)