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तमिलनाडु: बीएसएनएल बकाया बिल मामले में ईशा फाउंडेशन के ख़िलाफ़ जांच के आदेश

जग्गी वासुदेव की ईशा फाउंडेशन द्वारा ढाई करोड़ रुपये से अधिक के टेलीफोन बिल का भुगतान नहीं किया गया है. फाउंडेशन का कहना है कि आश्रम से इतनी बड़ी संख्या में कॉल्स नहीं हुई है और वहां स्थित निजी एक्सचेंज को नींव से हैक करने से इतना बिल आया है. बीएसएनएल इसके ख़िलाफ़ मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा है.

जग्गी वासुदेव. (स्क्रीनग्रैब साभार: यूट्यूब)

नई दिल्ली: मद्रास हाईकोर्ट ने जग्गी वासुदेव की ईशा फाउंडेशन को बीएसएनएल के टेलीफोन बिल के बकाया भुगतान के मामले में मिली हुई राहत वापस लेते हुए मामले की फिर से जांच किए जाने का आदेश दिया है.

द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के अनुसार, यह आदेश जस्टिस सेंथिल कुमार राममूर्ति की पीठ ने पारित किया.

बीएसएनएल ने द्वारा ईशा फाउंडेशन को 1 दिसंबर, 2018 से 31 दिसंबर, 2018 के बीच की अवधि के लिए 20,18,198 रुपये और 1 जनवरी 2019 से 1 फरवरी 2019 की अवधि के लिए 2 फरवरी, 2019 को 2,30,29,264 रुपये के बिल जारी किए गए थे.

2.5 करोड़ रुपये से अधिक के इन बिलों को ईशा फाउंडेशन ने एक मध्यस्थ- जस्टिस ई. पद्मनाभन के समक्ष चुनौती दी, जिन्होंने दो बिलों को रद्द कर दिया. बीएसएनएल ने उनके इस फैसले को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी.

बीएसएनएल की ओर से पेश अधिवक्ता पी. विल्सन ने तर्क दिया कि कॉल्स करने और ईशा फाउंडेशन के अंदर स्थित एक्सचेंज बिल बनने के बाद संस्थान इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं मुकर सकता कि उसने कॉल नहीं किया है.

उन्होंने कहा कि मध्यस्थ ने कई दस्तावेजी सबूतों को ध्यान में नहीं रखा और इसके बजाय एक योगी की बातों पर भरोसा करते हुए दोनों बिलों को रद्द करने का निर्णय दिया मानो उन (योगी) की कही बात ही अंतिम सच है.

उन्होंने यह कहते हुए कि ‘इंसान झूठ बोल सकते हैं, लेकिन मशीन नहीं’ आगे जोड़ा कि आश्रम से लाखों फोन कॉल किए गए थे और आश्रम के अंदर स्थित बीएसएनएल टेलीफोन एक्सचेंज ने इन सभी कॉल को दर्ज किया था.

उन्होंने कहा कि आश्रम के भीतर एक्सचेंज द्वारा दर्ज कॉल्स को आश्रम अस्वीकार नहीं कर सकता है और इसलिए इन कॉल्स के लिए जो बिल बनाए गए हैं, वे प्रामाणिक हैं. उन्होंने कहा कि आश्रम द्वारा बीएसएनएल के प्रति उसकी जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता.

विल्सन ने यह भी कहा कि मध्यस्थ के निष्कर्ष काफी त्रुटिपूर्ण थे और फैसले में दिए गए कारण तर्कहीन और मनमाने. उन्होंने कहा कि निर्णय में निकाले गए विभिन्न निष्कर्ष गलत थे और कोई भी समझदार ऐसे तथ्यों के आधार पर इस तरह के निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता.

उल्लेखनीय है कि आश्रम ने यह कहते हुए कि आश्रम द्वारा इतनी बड़ी संख्या में कॉल करने की कोई संभावना नहीं है, तर्क दिया था कि आश्रम में स्थित निजी एक्सचेंज को नींव के अंदर से हैक कर लिया गया था.

मध्यस्थ ने इस बात को पूरी तरह से स्वीकार करते हुए बीएसएनएल की याचिका को खारिज कर दिया था.

बीते हफ्ते की सुनवाई में मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस सेंथिल ने बीएसएनएल को जिरह की अनुमति दी है और मध्यस्थ को पहले लगाए गए आरोपों पर बीएसएनएल द्वारा उठाए गए बिंदुओं की जांच करने को कहा है.