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साहित्य हमारे समय में हो रहे अन्यायों की शिनाख़्त करता है और उनसे संघर्ष की प्रेरणा देता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अच्छा साहित्य हमें हमेशा वहां ले जाता है जहां भाषा पहले न गई हो: वह हमारी अनुभूति और अभिव्यक्ति के भूगोल को विस्तृत करता है. साहित्य हमें अधिकार और शक्ति के सभी प्रतिष्ठानों से, फिर वे राज्यपरक हों या धर्म, प्रश्न पूछने की हिम्मत देता है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नागपुर स्थित विदर्भ साहित्य अंक अपनी स्थापना की एक शताब्दी पूरी कर चुका है और उस सिलसिले में वहां एक शाम को दो-ढाई घंटे चले सार्वजनिक संवाद के लिए जाना हुआ. मैंने शुरुआत में कहा कि नागपुर एक ऐसा शहर है जहां मराठी और हिन्दी के बीच लगातार स्वाभाविक आवाजाही होती है: पहले वह मुक्तिबोध का शहर था और अब मराठी नाटककार महेश एलकुंचवार का शहर है.

वह ऐसा शहर भी है जहां खाकी के प्रकोप और कुछ किलोमीटर दूर पर बसे सेवाग्राम में खादी के प्रकल्प के बीच एक लगभग महाकाव्यात्मक द्वंद्व होता और हो रहा है. इस बहाने साहित्य से मिलने वाले कुछ सबकों का ज़िक्र करना उचित होगा.

साहित्य हमें संसार से ब्योरों में, अंतर्विरोधों-विडंबनाओं आदि से घिरे संसार से अनुराग करना सिखाता है: हम संसार को उसके सहारे बेहतर समझते-सराहते-सहते हैं. साहित्य हममें यह एहसास भी गहरा और तीव्र करता है कि हमारा काम दूसरों के बिना संसार में चल नहीं सकता.

वह हमें बताता है कि ‘हम’ और ‘वे’ का युग्म अवास्तविक है: हम ही वे हैं और वे ही हम हैं. साहित्य हमारे समय और समाज में हो रहे अन्यायों और अत्याचारों की शिनाख़्त करता है और उनसे संघर्ष करने की प्रेरणा देता है. वह हर समय और समाज में वैकल्पिक सचाई और संसार की कल्पना करता और विकल्पों की खोज में हमें शामिल करता है.

साहित्य, जब-तब, हमें यह भी जताता है कि संसार बनाने-बिगाड़ने में हमारी भी भूमिका है और हम अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते. वह हमें समय के साथ समयातीत में और संसार के साथ ब्रह्मांड में भी अवस्थित करता है. साहित्य हमें सिखाता है कि हम निरे यथार्थ में महदूद नहीं है और कल्पना और स्वप्न भी रचते-गढ़ते हैं.

अच्छा साहित्य हमें हमेशा वहां ले जाता है जहां भाषा पहले न गई हो: वह हमारी अनुभूति और अभिव्यक्ति के भूगोल को विस्तृत करता है. साहित्य हमें अधिकार और शक्ति के सभी प्रतिष्ठानों से, फिर वे राज्यपरक हों या धर्म और धनपरक, प्रश्न पूछने की हिम्मत देता है.

हर समय संसार में सत्य की परमता और बहुलता में द्वंद्व होता आया है. इस संदर्भ में साहित्य की एक ज़रूरी शिक्षा यह है कि संसार में कोई एक परम सत्य नहीं है, सत्य की बहुलता है और कोई भी सत्य परम नहीं है: यह भी कि सत्य पहले से दिए हुए नहीं हैं- हम ही अपने व्यवहार और चिंतन अपनी कल्पना और स्वप्नशीलता से, अपने विचार और संघर्ष से उन्‍हें रचते-पाते हैं.

साहित्य से हमें यह भी पता चलता है कि सत्य पर किसी व्यक्ति, समूह या सत्ता का एकाधिकार न होता है, न होना चाहिए. साहित्य हमारी मानवीयता को अधिक खुली, अधिक ग्रहणशील, अधिक साझेदार बनाता है. एक ऐसे समय में जब समाज में अधिनायकतावाद का वर्चस्व हो रहा है, साहित्य हमें आगाह करता है और साधारण की महिमा और गरिमा को केंद्रीय करता है.

घटती सामुदायिकता

एक समय था जब हिन्दी में कुछ लोकप्रिय पत्रिकाएं थीं जैसे ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘दिनमान’, ‘सारिका’ आदि. इनमें से कुछ शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाएं नहीं थीं पर उनके माध्यम से सामान्य पाठक साहित्य और कलाओं का कुछ संस्पर्श पा लेते थे. इन बड़ी पत्रिकाओं के बरक़्स समानान्तर ढंग से छोटी पत्रिकाएं निकलती थीं, जिनसे नई प्रतिभाएं सामने आती रहती हैं. पहले क़िस्म की पत्रिकाएं अधिकांशतः बड़े औद्योगिक या मीडिया घरानों से निकलती थीं और धीरे-धीरे बंद हो गई.ं. लेकिन यह ग़ौरतलब है कि छोटी पत्रिकाएँ निकलती रही हैं और उनमें से कई सार्थक ढंग से दीर्घजीवी भी रहीं जैसे ‘पहल’. साहित्य के नये विमर्श, नई प्रतिभाएँ, नये प्रश्न, नई बहसें, नये पाठक सभी इन पत्रिकाओं से ही आये. इनकी इस तरह साहित्य को, साहित्य-बोध को सजीव और सजग रखने की भूमिका की क़तई अनदेखी नहीं होना चाहिये. यह भी नोट करने की बात है कि पिछले पचास वर्षों में महत्वपूर्ण हिन्दी लेखकों में से अधिकांश छोटी पत्रिकाओं से ही सामने आये हैं. बड़ी लोकप्रिय पत्रिकाओं का होना एक बड़ी कमी है पर उस कारण साहित्य या लेखक पिछड़ नहीं गये हैं.

सामुदायिकता का एक रूप शहरों-कस्बों में होने वाली साहित्यिक गोष्ठियां भी हैं. ये गोष्ठियां सृजन और विचार दोनों के लिए बहुत उपयुक्त और आत्मीय जगहें रही हैं जिनमें अच्छे-बुरे हर तरह के साहित्य के लिए अवसर होता था. वहां लेखकों के बीच ईर्ष्या, मोह-मत्सर, मित्रता और शत्रुता, समझ और संवेदना आदि विकसित होते, बढ़ते-झरते रहते थे.

उनके लिए बहुत तामझाम की ज़रूरत नहीं होती थी. अक्सर तो एक प्याला चाय सबके लिए काफ़ी होती थी. मुझे सागर में हुई एक गोष्ठी याद है: मेरी उभरते जीवन की थी. उसमें हम दस-पंद्रह कवि ही थे. अध्यक्षता एक बुजुर्ग कवि कर रहे थे. एक कवि जब बहुत भाव प्रवण होकर कविता पढ़ रहा था तभी चाय आ गई. उसके प्यालों की खनक की ओर अध्यक्ष का ध्यान चला गया. तो वह कवि बहुत नाराज़ हुआ और बोला कि मैं कविता सुना रहा हूं और आप चाय की तरफ़ ध्यान दे रहे हैं. इस पर अध्यक्ष ने कहा कि कविता अच्छी है पर चाय बेहतर है.

दुनिया में कविता से बेहतर बहुत सी चीजें मानी-समझी-बताई जाएंगी यह पाठ मैंने उस कच्ची उमर में उस गोष्ठी से ही सीखा था और लगभग सत्तर बरस साहित्य में बिताने के बाद भी मुझे वह याद है- बीच-बीच में याद आता रहा है. ऐसी गोष्ठियों में आलोचनात्मक दृष्टियां बहुत कम सक्रिय होती थीं. पर पुस्तकों और साहित्य से मुंह फेरे हिन्दी समाज में लेखकों का मनोबल बनाए या बढ़ाने में मददगार होती थीं.

इधर सोशल मीडिया पर कई नए समूह बने हैं जो ज़्यादातर परस्पर प्रशंसा पर आधारित हैं. उनमें रचना और प्रस्तुति और प्रशंसा तभी तात्कालिक, तुरंता हैं. उनमें जो हड़बड़ी है वह सार्थक कम ही है. रचना के लिए आवश्यक श्रम और धैर्य की भी कभी दीख पड़ती है. पर सामुदायिकता का, फिर भी, यह एक नया रूप है. उसमें शायद आत्मीयता कम, आत्मरति अधिक है.

पड़ोसी चित्त

भारत में सक्रिय एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र के अंतर्गत एक समिति में इस बात पर एक अंतरंग चर्चा हो रही थी कि जापानी सौंदर्यशास्त्र, जापानी दर्शन, जापानी साहित्य और कलाओं की विशेषज्ञता रखने वाले कौन से विद्वान हमारे यहां हैं. बहुत मुश्किल से और ख़ासी माथापच्ची करने के बाद बहुत कम नाम सूझे और जो सूझे उनकी विशेषज्ञता कितनी गहरी है इस बारे में आश्वस्ति नहीं थी.

यह हालत तब है जब जापान से धार्मिक स्तर पर, पारंपरिक तत्व-चिंतन आदि कई स्तरों पर हमारे घनिष्ठ संबंध रहे हैं. जापान तो थोड़ा दूर है. पर चीन तो हमारा पड़ोसी है जो हमें दशकों से सामरिक स्तर पर, हमारी सरहदों पर हमें तंग करता, हमारी ज़मीन पर कब्ज़ा करता, उसे हड़पता रहा है. उसके बारे में हमारी क्या विशेषज्ञता है?

चीनी चित्त के बारे में हमारी समझ किस स्तर की है. वहां जो साम्यवाद है वह कैसे पूंजीवादी प्रक्रियाओं का उपयोग कर विकसित हुआ है और उसकी साम्राज्यवादी आकांक्षा का वैचारिक आधार क्या है इसके बारे में हम भारतीय कितना कम जानते हैं. लगता तो यह है कि एक अर्थ में हम इतने आत्मकेंद्रित रहे है कि हमने गंभीरता और ज़िम्मेदारी से पड़ोसी चित्तों को समझने की बहुत कम कोशिश की है. हमसे मिलते-जुलते बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि के बारे में हमारी जिज्ञासा बहुत सीमित और विशेषज्ञता बहुत क्षीण है.

मुझे याद आता है कि दशकों पहले जापान से दो विशेषज्ञ भारत भवन अपने एक पारंपरिक कलाओं के अंतरराष्ट्रीय समारोह में मध्य प्रदेश से कोई संभावित समूह खोजने आए थे. उन्हें हमने कुछ जानकारी, कुछ दस्तावेज़, कुछ प्रस्‍ताव दिए. कुल एक महीने बाद एक विशेषज्ञ दल फिर जापान से आया. नए लोग थे. उनसे जब चर्चा होने लगी तो मैंने पाया कि वे कुछ लोककलाओं की शैलियों के पक्षों के नाम ले रहे हैं.

मैं चकित हुआ तो पता चला कि कुल एक महीने में उन्होंने हमारे हिन्दी में दिए गए प्रकाशनों के जापानी अनुवाद कर लिए थे और उन अनुवादों को साथ लेकर आए थे. हमारे कई विश्वविद्यालयों में कुछ देशों पर केंद्रित विभाग हैं पर उनमें कोई ऐसी प्रभावशाली विशेषज्ञता विकसित हुई है इसका मुझे पता नहीं. मुझे यह भी नहीं पता कि, उदाहरण के लिए, हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषाओं में जापानी कला-परंपरा, जापानी सौंदर्यशास्त्र, जापानी काव्य-परंपरा, चीनी काव्यशास्त्र, चीनी सौंदर्यदर्शन आदि पर कोई प्रामाणिक पुस्तकें हैं.

चीनी-जापानी राजनय, शस्त्र-सुरक्षा आदि पर कुछ अच्छी सामाग्री जुटाई गई होगी पर जापानी और चीनी सभ्यता की सभ्यता-समीक्षा हमने बहुत कम की है जबकि इन सभ्यताओं में भारतीय सभ्यता की कुछ भूमिका रही है. हमारी पारंपरिक स्मृति अपने बारे में और दूसरी सभ्यताओं के बारे में लगातार छीज रही है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)