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बिहार: महागठबंधन नेताओं की सीबीआई से सामान्य सहमति वापस लेने की मांग

बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन के नेताओं ने सीबीआई से सामान्य सहमति वापस लेने का आह्वान करते हुए आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा नीत सरकार राजनीतिक उद्देश्यों के लिए जांच एजेंसी का इस्तेमाल कर रही है. साल 2015 से नौ राज्यों द्वारा सीबीआई से आम सहमति वापस ली गई है.

बिहार महागठबंधन के नेता. (फोटो: पीटीआई)

पटना: बिहार में सत्तारूढ़ ‘महागठबंधन’ के नेताओं ने रविवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से सामान्य सहमति वापस लेने का आह्वान करते हुए आरोप लगाया कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत सरकार राजनीतिक उद्देश्यों के लिए जांच एजेंसी का इस्तेमाल कर रही है.

दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 की धारा 6 के अनुसार, सीबीआई को राज्यों के अधिकार क्षेत्र में जांच करने के लिए संबंधित राज्य सरकारों से सहमति लेने की आवश्यकता होती है.

2015 से नौ राज्यों – महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, केरल, मिजोरम और मेघालय – ने अपने अधिकार क्षेत्र में मामलों की जांच के लिए सीबीआई से आम सहमति वापस ले ली है. विपक्ष शासित इन राज्यों ने आरोप लगाया है कि सीबीआई उसके मालिक (केंद्र सरकार) की आवाज बन गई है और वह विपक्षी नेताओं को गलत तरीके से निशाना बना रही है.

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने कहा कि भाजपा के राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए जिस तरह केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है, ऐसे में बिहार में महागठबंधन सरकार को सीबीआई को दी गई सहमति वापस ले लेनी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा, राज्य सरकार को केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायपालिका के पास जाने का विकल्प भी तलाशना चाहिए.’

तिवारी ने दावा किया, ‘मुझे कहना होगा कि केंद्रीय जांच एजेंसियों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) के शासन के दौरान अपनी विश्वसनीयता खो दी है.’

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने कहा है कि सीबीआई से सामान्य सहमति वापस लेने का यह सही समय है.

मंत्री और जद(यू) नेता मदन सहनी ने कहा, ‘जिस तरह से सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का विपक्षी नेताओं की छवि खराब करने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है, उसे बिहार के लोग देख रहे हैं और वे उचित समय पर करारा जवाब देंगे.’

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी लेनिनवादी (लिबरेशन) के विधायक महबूब आलम ने दावा किया कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्यों में गैर-भाजपा सरकारों को अस्थिर करने के लिए केंद्र द्वारा केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ‘सभी केंद्रीय जांच एजेंसियां राजनीतिक उद्देश्यों से काम कर रही हैं और वे कभी भी भाजपा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती हैं. बिहार में हमारी महागठबंधन सरकार को राज्य में एजेंसी की शक्तियों को कम करते हुए सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति को तुरंत वापस लेना चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) नीत सरकार तानाशाह है और वे केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर विपक्ष की आवाज को दबाने की कोशिश करते हैं. यह अब रुकना चाहिए और बिहार सरकार को सीबीआई से अपनी सहमति वापस लेनी चाहिए.’

पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर राजद के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि बिहार सरकार ने सीबीआई को दी गई सहमति को वापस लेने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है.

बिहार में महागठबंधन में सात दल शामिल हैं – जद (यू), राजद, कांग्रेस, सीपीआईएमएल (एल), भाकपा, माकपा और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम), जिनके 243 सदस्यीय विधानसभा में 160 से अधिक सदस्य हैं.

सीबीआई ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहने के दौरान कथित ‘नौकरी के बदले जमीन’ घोटाला के संबंध में बुधवार (24 अगस्त) को बिहार में पार्टी के कई नेताओं के परिसरों की तलाशी ली. यह छापेमारी ऐसे दिन हुई जब भाजपा से नाता तोड़ राजद से गठबंधन के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्य विधानसभा में विश्वास मत का सामना करना था.

उल्लेखनीय है कि सीबीआई ‘दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946’ द्वारा शासित है. सीबीआई इस अधिनियम की धारा छह के तहत काम करती है. सीबीआई और राज्यों के बीच सामान्य सहमति होती है, जिसके तहत सीबीआई अपना काम विभिन्न राज्यों में करती है, लेकिन अगर राज्य सरकार सामान्य सहमति को रद्द कर दे, तो सीबीआई को उस राज्य में जांच या छापेमारी करने से पहले राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी.

चूंकि सीबीआई के पास केवल केंद्र सरकार के विभागों और कर्मचारियों पर अधिकार क्षेत्र है, यह राज्य सरकार के कर्मचारियों या किसी राज्य में हिंसक अपराध से संबंधित मामले की जांच तभी कर सकती है जब संबंधित सरकार इसकी सहमति देती है.

मिजोरम, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, केरल, झारखंड, पंजाब और मेघालय ने मामलों की जांच के लिए सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है.

जिन राज्यों में सामान्य सहमति नहीं दी गई है या जहां सामान्य सहमति विशेष मामले को कवर नहीं करती है, वहां डीएसपीई अधिनियम, 1946 की धारा 6 के तहत राज्य सरकार की विशिष्ट सहमति की आवश्यकता है.

राज्य सरकार की सहमति प्राप्त होने पर ही डीएसपीई अधिनियम, 1946 की धारा 5 के प्रावधानों के तहत सीबीआई के अधिकार क्षेत्र के विस्तार पर विचार किया जा सकता है.

महागठबंधन नेता बोले- केंद्रीय एजेंसियों के बढ़ते दुरुपयोग के मद्देनजर नीतीश कदम उठाएं

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री तारिक अनवर ने बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन के कई नेताओं द्वारा राज्य के अधिकार क्षेत्र में मामलों की जांच के लिए केंद्रीय अन्वेष्ण ब्यूरों (सीबीआई) को दी गई सामान्य सहमति वापस लिए जाने की मांग का समर्थन किया है.

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव ने सोमवार को कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अब केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के बढ़ते आरोपों के मद्देनजर यह कदम उठाना चाहिए.

अनवर ने कहा, ‘नीतीश कुमार को अन्य राज्यों से सबक लेते हुए इस तरह के कदम के लिए पहल करनी चाहिए. जांच एजेंसियों का दुरुपयोग हकीकत है. हो सकता है कि वह पहले ऐसा फैसला नहीं ले पा रहे थे क्योंकि भाजपा के साथ थे, लेकिन अब उन्हें इस दिशा में कदम उठाना चाहिए.’

राजद के एक वरिष्ठ नेता और बिहार विधानसभा के दो बार अध्यक्ष रहे उदय नारायण चौधरी ने नाराजगी जताते हुए कहा, ‘ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) और सीबीआई के अधिकारियों को राज्य सरकार से उचित अनुमति प्राप्त किए बिना बिहार में प्रवेश करने से मना किया जाना चाहिए. इन एजेंसियों ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है.’

इसी बीच, भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद ने आरोप लगाया कि सीबीआई से सामान्य सहमति वापस लेना ‘संघवाद के सिद्धांतों’ के खिलाफ होगा.

हालांकि भाकपा के राष्ट्रीय सचिव अतुल अंजान ने इस विवाद का उपहास उड़ाया और कहा कि यह भाजपा थी जो ‘कोआपरेटिव फेडरलिज़म के उल्लंघन’ की दोषी है.

उन्होंने कहा, ‘बिहार सहित सभी राज्यों को इस तरह की सामान्य सहमति वापस लेनी चाहिए क्योंकि भाजपा राजनीतिक प्रतिशोध के उद्देश्य से एजेंसियों का उपयोग कर रही है और सहकारी संघवाद की अवधारणा को हवा में उड़ा दिया है. इसलिए इन एजेंसियों को केवल उन मामलों की जांच करने की अनुमति दी जानी चाहिए जिनमें संबंधित राज्य सरकारों ने सहमति दी हो.’

अंजान जिनकी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) बिहार में नवगठित महागठबंधन सरकार का बाहर से समर्थन कर रही है, ने कहा, ‘कई राज्यों ने इस तरह की सहमति वापस ले ली है और कोई कारण नहीं है कि नीतीश कुमार को इसका पालन नहीं करना चाहिए.’

बिहार में नवगठित महागठबंधन सरकार का बाहर से समर्थन कर रहे सबसे बड़े वामदल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी-लेनिनवादी (भाकपा- माले) ने भी इस भावना से सहमति जताई.

भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा, ‘सीबीआई और एनआईए जैसी एजेंसियां वास्तव में उत्पीड़न का उपकरण बन गई हैं. इनका मनमाने ढंग से उपयोग किया जा रहा है, जो अस्वीकार्य है. महागठबंधन को आम सहमति बनानी चाहिए ताकि सरकार उचित कार्रवाई कर सके.’

महागठबंधन नेताओं की मांग असंवैधानिक: भाजपा

भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार सिन्हा ने महागठबंधन के नेताओं द्वारा राज्य में सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति को वापस लेने की मांग को सोमवार को असंवैधानिक करार दिया.

सिन्हा ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘राज्य में सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति को वापस लेने की मांग दुर्भावनापूर्ण इरादे से की जा रही है. यदि राज्य सरकार ऐसा कोई निर्णय लेती है तो वह केवल भ्रष्टाचार और भ्रष्ट नेताओं के कृत्यों की रक्षा के लिए किया जाएगा. वे (सत्तारूढ़ दल के नेता) सीबीआई से इतने डरे हुए क्यों हैं. यदि वे ईमानदार हैं तो सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति को वापस लेने की कोई आवश्यकता नहीं है.’

उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं. मुख्यमंत्री केवल भ्रष्टाचारियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और भ्रष्टाचार और आपराधिक कृत्यों में शामिल लोगों, नेताओं को राजनीतिक संरक्षण प्रदान कर रहे हैं. राज्य सरकार का ऐसा कोई भी कदम असंवैधानिक और देश के संघीय ढांचे के खिलाफ होगा.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)