भारत

क्या अब अभद्रता पद और सत्ता के लिए ज़रूरी हो चली है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हमारा समय दुर्भाग्य से ऐसा हो गया है कि राजनेता किसी को कुछ भी कह सकते हैं, अभद्रता और अज्ञान से. उनके अनुयायियों की भावनाएं इस अभद्रता से आहत नहीं होतीं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

हम साधारण लोग, नागरिक हैं और अपने रोज़मर्रा के जीवन बिताने में इतने व्यस्त रहते हैं कि कभी थोड़ा रुक-थमकर, ठिठककर यह नहीं सोच पाते कि हमारा साझा भविष्य क्या होने जा रहा है और हम अपनी वर्तमान सचाई के शिकंजे से छूटकर किस तरह का सपना देख सकते हैं.

साधारण नागरिक और लेखक होने के कारण, मुझे लगा कि मैं अपने प्रण आदि आपको बताऊं: यह एक तरह का आत्मोपदेश है. यह अपने लिए है.

पहले पांच प्रण: हम जो हमारा सच है उस पर अडिग रहें और कोई झूठ हमें उस सच से अलग और विचलित न करे. हम हर तरह की घृणा, जो इन दिनों बहुत तेज़ी से धर्मों-संप्रदायों-जातियों आदि के बीच फैलाई-बढ़ाई जा रही है, से अपने को मुक्त करें. जो हमारा विरोधी है, उसका विरोध करें, उससे असहमति व्यक्त करें पर घृणा न करें. किसी भी हालत में हम भौतिक, मानसिक, भाषिक हिंसा का सहारा न लें, अहिंसक रहें. हमें अपने समाज में मौजूद धार्मिक बहुलता को सहज स्वीकार करना चाहिए और किसी भी धर्म का कोई अनादर या अपमान नहीं करना चाहिए.

अब पांच सकार: वो लोग अभाग्यवश वंचित और पीड़ित हैं हमें हर तरह से उनकी मदद करना चाहिए. हमें बच्चों-बूढ़ों-विकलांगों-स्त्रियों-दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों को समानता की दृष्टि से देखना, उनकी हर मुमकिन मदद करना चाहिए. हमें अपनी मातृभाषा और संस्कृति का सम्मान करना और उसे लगाव रखना चाहिए. हमें हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए और किसी भी तरह के सीधे या परोक्ष अन्याय से अपने को अलग रखना चाहिए. हमें अपने परिवार, पड़ोस और शहर में लगातार सद्भाव बनाए रखने और फैलाने के लिए कोशिश करना चाहिए.

अंततः पांच नकार: झूठ कितना ही चमकीला-भड़कीला-सड़कीला और बहुसंख्यक क्यों न हो, हमें उसका निषेध करना चाहिए. भाषा में, संवाद या विवाद में, निजी स्तर पर या किसी सार्वजनिक आयोजन में भाषा में अभद्रता, झगड़ालूपन, गाली-गलौज से सख़्त परहेज करते हुए, इनको कभी जगह नहीं देना चाहिए. नागरिक आचरण में चूक नहीं करनी चाहिए. अन्याय और अत्याचार में किसी अभियान में हमें शामिल या हिस्सेदार नहीं होना चाहिए. मत-मतातंर से कभी आपसी सद्भाव और नेकनीयती को नष्ट नहीं होने देना चाहिए.

इन पर अमल करने के लिए अपनी बुनियादी मानवीयता और नागरिकता को सजग करना काफ़ी है: वे जानेंगी तो सब कुछ मुमकिन है. ग़ालिब का एक शेर याद करें: हूं गर्मी-ए-निशात-ए-तसव्वुर से नग़्मः संज़/मैं अंदलीब-ए-गुलशन-ए-ना आफ़रीदा हूं. आशय यह है कि मैं कल्पना के हर्ष की गर्मी से, अतिरेक से गा रहा हूं, मैं एक ऐसे बागीचे का बुलबुल हूं जो अभी बना ही नहीं है.

समता की कहानी

समता की विश्व-गाथा शांत कहानी नहीं है: उसमें विद्रोह और क्रांतियों, सामाजिक संघर्षों और हर तरह के संकटों ने भूमिका निभाई है. विश्वविख्यात फ्रेंच विद्वान तोमस पिकेती ने अपनी नई पुस्तक ‘एक ब्रीफ हिस्ट्री आफ इक्वलिटी’ (समता का एक संक्षिप्त इतिहास) में समता की आज की स्थिति और भविष्यत संभावनाओं की कथा प्रमाणपूर्वक कही है.

उनके अनुसार अठारहवीं शताब्दी के अंत से समता के लिए एक ऐतिहासिक अभियान चल रहा है. आज दुनिया कितनी भी अन्यायपूर्ण क्यों न लगती हो, सचाई यह है कि वह 1900 या 1950 के मुक़ाबले वह अधिक समतामूलक है जो कि अपने मुक़ाम पर 1780 या 1850 की तुलना में अधिक समतामूलक थे.

यह समता, 1780 और 2020 के बीच, हैसियत, जायदाद, आमदनी, शिक्षा, अवसर आदि में समता विश्व भर में बढ़ी है. हम भारत में बढ़ते सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-धार्मिक अत्याचारों से इतना आक्रांत रहते हैं कि हम यह नज़रअंदाज़ करते हैं कि दरअसल समता बढ़ती जा रही है.

सही है कि समता की जो स्थिति है उसमें विश्व के उत्तर भाग के देश दक्षिण भाग के देशों से कहीं आगे हैं जिसका अर्थ यह है कि समता के साथ-साथ कुछ महत्वपूर्ण पक्षों में विषमता भी बढ़ती रही है. तथाकथित विकास की एक बड़ी विडंबना यह है और यह हमारे अपने देश में बहुत उजागर है कि समता अैर विषमता साथ-साथ चल रही है.

यह भी ग़ौर करने की बात है कि पूंजीवादी नई व्यवस्थाओं में भी समता की बात न करना या उसकी उपेक्षा करना संभव नहीं है. समता के अपने को एक लगभग कालजयी मूल्य के रूप में, एक अनिवार्य मूल्य के रूप में स्थापित कर लिया है. किसी भी सामूहिक मानवीय स्वप्न का वह एक अनिवार्य अंग है.

अपनी कहानी में पिकेती इस आशंका को भी दर्ज़ करते हैं कि नवउदारतावाद के बदले एक तरह का नवराष्ट्रवाद कई रूपों में आ सकता है: ट्रंपवाद, ब्रेएग्ज़िट, तुर्की-ब्राजीलियन और भारतीय राष्ट्रवाद के रूप में, जो वैसे अलग-अलग राजनीतिक आंदोलन हैं, पर जो समान रूप से राष्ट्रीय दुर्भाग्य के लिए विदेशियों और अपने अल्पसंख्यकों को दोषी मानते हैं.

उनका मत है कि भविष्य में वैचारिक द्वंद्व पूंजीवाद के विभिन्न रूपों में युद्ध जैसे होने के बजाय समाजवाद के विभिन्न रूपों के बीच हुए द्वंद्वों की तरह होंगे. उनका इसरार है कि आर्थिक सवाल इतने महत्वपूर्ण हैं कि वे दूसरों पर नहीं छोड़े जा सकते. नागरिकों को अपने को इस ज्ञान से लैस करना होगा कि कैसे समता दांव पर लगी है और कैसे उसका सुनिश्चय किया जा सकता है.

अघम अभद्रता

हाल ही में केरल के राज्यपाल ने भारत के मध्यकाल के विश्व-मान्य इतिहासकार इरफ़ान हबीब को गुंडा कहने की अघम अभद्रता की है. ये राज्यपाल महोदय, कई और राज्यपालों की तुलना में, पढ़े-लिखे और विचारशील अब तक माने जाते थे. उनमें यह अभद्र परिवर्तन कैसे और क्यों हुआ यह हमारी चिंता या जिज्ञासा का विषय नहीं है.

जो भी भारत में बुद्धि और विचार के जगत में सक्रिय या उससे अवगत हैं वे जानते हैं कि इरफ़ान हबीब भारत के मध्यकाल के विशेषज्ञ हैं और यह इतिहास बिना उनके संदर्भ के प्रामाणिक रूप से पढ़ा और समझा नहीं जा सकता. उनसे असहमत हुआ जा सकता है, उनके विश्लेषण पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं: ऐसी असहमति हुई है, प्रश्नांकन हुआ है. पर दूसरी ओर राज्यपाल महोदय और उनके समर्थकों को यह याद दिलाना ज़रूरी है कि जब वे स्वयं भुला दिए गए होंगे और निश्चय ही इतिहास के कूड़ेदान में फिंक चुके होंगे तब भी इरफ़ान हबीब का ऐतिहासिक अवदान भारत में आदर और सहमति-असहमति के साथ पढ़ा जाता रहेगा.

हमारा समय दुर्भाग्य से ऐसा हो गया है कि राजनेता किसी को कुछ भी कह सकते हैं, अभद्रता और अज्ञान से. उनके अनुयायियों की भावनाएं इस अभद्रता से आहत नहीं होतीं: उल्टे उनका स्‍तुतिगान कर्कश और अक्सर बेसुरा हो जाता है. कौन जाने अब ऐसी अभद्रता पद और सत्ता के लिए ज़रूरी हो गई हो!

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)