भारत

आरएसएस आज चाहे जो भी कहे, सच यही है कि संघ देश की आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा नहीं था

स्वतंत्रता संग्राम के समय मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों ही कांग्रेस को अपने मुख्य दुश्मन के तौर पर देखते थे और अंग्रेज़ों के साथ दोस्ती करने के लिए तैयार थे- वे साथ ही साथ राष्ट्रवादी होने का दावा भी करते थे. हालांकि, एक मुस्लिम राष्ट्रवाद को आगे बढ़ा रहा था और दूसरा हिंदू राष्ट्रवाद को.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

लाजिमी है कि भारत की आजादी की 75वीं साल पूरे होने के समय हमारा ध्यान उपनिवेशवादी शासन से आजादी के लिए लड़ी गई जबरदस्त लड़ाई की ओर जाए.

हमारी आंखों के सामने जो मंजर खुलता है, उसमें शामिल हैं : 1857 का महान विद्रोह, दादाभाई नौरोजी और उनके समकालीनों-जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की आर्थिक नींव रखी- द्वारा धन के विदोहन का सिद्धांत; भारत की आजादी की लड़ाई के मुख्यालय के तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना; बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब में लोगों को सड़कों पर उतार देने वाला स्वदेशी आंदोलन; महात्मा गांधी के आगमन के साथ स्वतंत्रता संग्राम में आया नाटकीय मोड़, जालियांवाला बाग की दिल दहला देने वाली घटना, गुरु का बाग मोर्चा में अकाली जत्थों की अटल अहिंसा; बारदोली के किसानों की अडिग वीरता; नमक सत्याग्रह की नाफरमानी; दया की भीख मांगने से इनकार करनेवाले भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी पर पसरा मातम का सन्नाटा; भारत छोड़ो आंदोलन का ‘करो या मरो’ या नारा; आजाद हिंद फौज और लाल किले का मुकदमा; और 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को भारत का नियति के साथ साक्षात्कार.

तस्वीरों की इस बड़ी झांकी में उन लोगों का कोई नामोनिशान नहीं मिलता, जो आज पंचम स्वर में राष्ट्रवादी होने का दंभ भरते हैं. इस साफ दिखाई देने वाली अनुपस्थिति के बावजूद वे यह मानने के लिए रत्ती भर भी तैयार नहीं दिख रहे हैं कि जिस आजादी का उत्सव ‘घर-घर तिरंगा’ के तौर पर मनाया गया, वह उन लाखों-करोड़ों लोगों की उपलब्धि थी, जो वर्तमान निजाम के आदर्श से बिल्कुल अलग आदर्श से प्रेरित हुए थे.

न ही यह सब एक आत्ममंथन- आजादी की लड़ाई से अलग रहने की अतीत की गलतियों के स्वीकार, और एक सांप्रदायिक माहौल को बढ़ावा देने, जिसका नतीजा आखिरकार महात्मा गांधी की हत्या के तौर पर निकला, के पछतावे और/या उसकी भर्त्सना, या फिर आजादी के 52 सालों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा तिरंगा झंडा फहराने से इनकार (आरएसएस ने झंडा तब जाकर फहराया जब 1998 में भाजपा के केंद्र में सत्ता में आने के बाद उसका ऐसा करना बेहद शर्मिंदगी का कारण नहीं बन गया)- के नतीजे के तौर पर हो रहा है.

तथ्य ये हैं: भाजपा को सांगठनिक और वैचारिक आधार और शक्ति प्रदान करनेवाले आरएसएस का गठन 1925 में केबी हेडगेवार द्वारा किया गया था. 1925 से 1947 तक इसने कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी या समूह द्वारा चलाए गए किसी अभियान या आंदोलन में भागीदारी नहीं की. न ही अंग्रेजों के खिलाफ इसने खुद से ही कोई आंदोलन चलाया.

यह राष्ट्रवाद को अपना धर्म बताने वाले संगठन के लिए वास्तव में जिक्र करने लायक है. लेकिन यह पहेली आसानी से सुलझ जाती है, अगर हम यह समझ लेते हैं कि राष्ट्रवाद वास्तव में इसका पंथ है, लेकिन यह भारतीय राष्ट्रवाद नहीं. इसका पंथ हमेशा से हिंदू राष्ट्रवाद रहा है. इसलिए इसका प्राथमिक मकसद मुस्लिमों के वर्चस्व के काल्पनिक खतरे के खिलाफ हिंदू समाज को लामबंद करना था.

तथ्य यह है कि इसके संस्थापक हेडगेवार नागपुर में कांग्रेस के एक मझोले दर्जे के नेता थे और असहयोग आंदोलन के दौरान जेल भी गए थे. लेकिन वे इटली की यात्रा करने वाले और वहां मुसोलिनी से मिलने वाले, इटली के फासीवादी संस्थानों का अध्ययन करने वाले और उनसे जबरदस्त तरीके से प्रभावित हिंदू महासभा के एक नेता बीएस मूंजे के कट्टर अनुयायी थे.

यह भी माना जाता है कि वे वीडी सावरकर की किताब ‘हिंदुत्व’ से प्रभावित थे, जो प्रकाशित 1923 में हुई थी, लेकिन प्रसार में इससे पहले से थी, जिसमें सावरकर ने हिंदुत्व की विचारधारा का मूल विचार दिया था कि भारत हिंदुओं की भूमि है और उनकी जिनकी पुण्यभूमि और पितृभूमि भारत में है. यह विचार इस तरह से मुस्लिमों और ईसाइयों और इस परिभाषा की कसौटी पर खरा न उतरने वाले किसी भी अन्य को भारतीय राष्ट्र से बाहर कर देता है.

यह भी अनुमान लगाया जाता है कि हेडगेवार मुख्य तौर पर एक सांगठनिक व्यक्ति थे और बौद्धिक और वैचारिक इनपुट या निर्देश वास्तव में सावरकर से ही आता था, जो अंडमान जेल से रिहा होने के बाद भी रत्नागिरी तक ही सीमित थे, क्योंकि वो इस शर्त से बंधे थे कि वे राजनीति में भाग नहीं लेंगे और रत्नागिरी के बाहर कहीं यात्रा नहीं करेंगे.

इस अनुमान को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि सावरकर के बड़े भाई बाबूराव सावरकर 1925 में नागपुर में हुई उस बैठक में मौजूद पांच लोगों में से थे, जिसमें आरएसएस की स्थापना हुई थी. और बाद में उन्होंने अपने संगठन तरुण भारत संघ का विलय आरएसएस में कर दिया था.

आरएसएस के गठन के दो साल बाद देशभर में साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन हो रहे थे, लेकिन इनमें आरएसएस कहीं नहीं था. कुछ समय बाद दिसंबर, 1929 में जवाहर लाल नेहरू ने लाहौर में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष के तौर पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज को फहराया और पूर्ण स्वराज को पार्टी का मकसद घोषित किया. कांग्रेस ने 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाने का भी फैसला लिया, जिसमें राष्ट्र ध्वज को हर शहर और गांव-गांव में फहराया जाना था और सभी उपस्थित लोगों को एक राष्ट्रीय शपथ लेनी थी.

हेडगेवार ने दावा किया कि चूंकि आरएसएस पूर्ण स्वराज में यकीन करता है, इसलिए यह स्वतंत्रता दिवस तो मनाएगा, लेकिन यह तिरंगे की जगह भगवा झंडा फहराएगा. यह आरएसस की राष्ट्रवादी जैसे दिखने मगर वास्तविक राष्ट्रीय आंदोलन से खुद को दूर रखनेवाली  कार्यपद्धति का एक सटीक उदाहरण था.

इसी तरह से जब उस साल बाद में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया गया, हेडगेवार ने फैसला किया कि वे निजी तौर पर इसमें शामिल होंगे, लेकिन एक संगठन के तौर पर आरएसएस इसमें शिरकत नहीं करेगा. इसलिए वे अपनी राष्ट्रवादी साख को बनाए रखने और साथ ही, बकौल उनके आधिकारिक जीवनीकार, जेल में बंद कांग्रेस के कैडर को आरएसएस की तरफ आकर्षित करने के लिए जेल गए.

पूरे 1930 के दशक के दौरान आरएसएस का ध्यान संगठन खड़ा करने की तरफ रहा. आरएएस और हिंदू महासभा के बीच कुछ तनाव हुआ था, खासकर सावरकर के खुलकर सामने आने के बाद, क्योंकि महासभा ज्यादा सक्रिय राजनीतिक भूमिका, खासकर चुनावी क्षेत्र में निभाना चाहती थी.

लेकिन ये संबंध वैचारिक स्तर पर सीमित रहे और हिंदू महासभा के नेता नियमित तौर पर आरएसएस की सभाएं संबोधित किया करते थे और कई लोग ऐसे थे जो दोनों संगठनों के सदस्य थे, जिसका खुलासा आजादी से पहले की इंटेलिजेंस रिपोर्टों और साथ ही साथ गांधी जी की हत्या के बाद की तफ्तीशों में हुआ था.

यह तथ्य कि अपनी नजरबंदी के दौरान सावरकर परदे के पीछे से राजनीतिक तौर पर सक्रिय रहे थे, इससे भी जाहिर होता है कि 1937 में पाबंदियों से छूट दिए जाने के ठीक बाद वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष बन गए और छह साल तक इस पद पर बने रहे, जब तक कि खराब स्वास्थ्य के चलते उन्हें इस जिम्मेदारी को छोड़ने पर विवश नहीं होना पड़ा.

यह जरूर याद किया जाना चाहिए कि सावरकर को अंडमान और फिर यरवदा जेल से उनकी दया याचिका के बाद इसी शर्त पर रिहा किया गया था कि वे किसी तरह की ब्रिटिश शासन विरोधी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे. और उन्होंने पूरी तत्परता से अपना वादा निभाया. यहां तक कि उन्हें उनके खर्चे के लिए एक भत्ता भी दिया गया था.

महासभा की कमान संभालने के बाद सावरकर ने सबसे पहला काम दो राष्ट्रों का सिद्धांत देने का किया. उन्होंने कहा, हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं और इस तरह से वे इस मामले में जिन्ना से आगे निकल गए, जिन्होंने जल्द ही इस बात को दोहराया. हिंदू महासभा में दिए गए उनके भाषण मुस्लिम विरोध, कांग्रेस विरोध और गांधी विरोध के जहर से भरे हुए थे.

दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत ने महासभा और आरएसएस के पक्ष को सबके सामने ला दिया. अंग्रेजों द्वारा भारत के राजनीतिक नेतृत्व से सलाह-मशविरा किए बगैर भारत को विश्वयुद्ध का एक पक्ष घोषित करने के विरोध में प्रांतों में कांग्रेस के मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया. इसके ठीक बाद सांप्रदायिक शक्तियां कांग्रेस द्वारा छोड़ी गई खाली जगह को भरने के लिए सामने आ गईं.

अंग्रेजों के प्रति वफादारी के अपने चरित्र का प्रदर्शन करते हुए मुस्लिम लीग ने सरकारों का गठन करने के लिए सहयोग का प्रस्ताव दिया. पीछे न रहते हुए हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष के तौर पर सावरकर ने अक्टूबर, 1939 में कहा कि हिंदुओं और अंग्रेजों को दोस्त रहना चाहिए और अगर कांग्रेस के मंत्री पद से इस्तीफा देते हैं, तो हिंदू महासभा कांग्रेस की जगह ले लेगी.

उन्होंने हिंदुओं को सेना में भर्ती होने की भी सलाह दी. यह ‘हिंदूधर्म का सैन्यीकरण’ के उनके नारे और सेना में मुस्लिमों के अनुपात को कम करने के उनके लक्ष्य के भी अनुकूल था. उनके हिसाब से सेना में मुस्लिमों की की ज्यादा संख्या अच्छी चीज नहीं थी. अपनी नीति को आगे बढ़ाते हुए, हिंदू महासभा सरकारों में शामिल होने के लिए आगे आई और ऐसा करने के लिए इसने कई जगहों पर मुस्लिम लीग से भी हाथ मिलाने से गुरेज नहीं किया.

वास्तव में हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस समय बंगाल सरकार में मंत्री थे, जब 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू करने के बाद अंग्रेजों ने बुरी तरह से कांग्रेस का दमन किया था. हिंदू महासभा को युद्ध के दौरान, जबकि लीग ने 1940 में ही पाकिस्तान को अपना मकसद घोषित कर दिया था, मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सिंध और उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रदेश (नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर) में सरकार बनाने में भी कोई नैतिक अपराध बोध महसूस नहीं हुआ.

दिचलस्प तरीके से लीग और महासभा दोनों ही कांग्रेस को अपने मुख्य दुश्मन के तौर पर देखते थे और अंग्रेजों के साथ दोस्ती करने के लिए तैयार थे- और साथ ही साथ राष्ट्रवादी होने का दावा भी करते थे. पहला मुस्लिम राष्ट्रवाद को आगे बढ़ा रहा था जबकि दूसरा हिंदू राष्ट्रवाद को. फिर भी तथ्य यह है कि उपनिवेशी भारत के विशेष संदर्भ में, जबकि सभी भारतीयों का अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष ही मुख्य राष्ट्रवादी आंदोलन था, इन्हें सिर्फ सांप्रदायिक और राजभक्त ही कहा जा सकता है.

आरएसएस भी 1930-32 के पिछले व्यापक जनांदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन के अपने रिकॉर्ड को बरकरार रखते हुए वास्तविक राष्ट्रवादी संग्राम- भारत छोड़ो आंदोलन- से अलग रहा. उसने अपने युवा उत्साही कैडर को, जिनमें से कई राष्ट्रवादी विचारधारा में यकीन करते थे, जो कि आरएसएस के प्रति उनके आकर्षित होने का कारण था, आने वाली बड़ी लड़ाई के लिए अपनी ऊर्जा बचा कर रखने की सलाह दी.

आरएसएस पर गृह मंत्रालय के एक नोट में लिखा गया, ‘कांग्रेसी अशांति के दौरान संघ की बैठकों में वक्ताओं ने अपने सदस्यों से कांग्रेस के संघर्ष से अलग रहने के लिए कहा और इन निर्देशों का सामान्य तौर पर पालन किया गया.’

इस तरह से अपने अंतिम विश्लेषण में हम यह निष्कर्ष निकालने पर विवश होते हैं कि एक संगठन के तौर पर आरएसएस ने 1925-47 यानी आजादी से पहले के अपने पूरे जीवनकाल में किसी भी अंग्रेज विरोधी आंदोलन में भाग नहीं लिया.

लेकिन 1946 में सांप्रदायिक हालातों के बेहद बिगड़ जाने पर वे अचानक हरकत में लौट आए. साफतौर पर यही वह असली लड़ाई थी, जिसका इंतजार वे कर रहे थे. जब सांप्रदायिक हिंसा फैलने लगी, तब हिंदुओं के ‘रक्षक’ के तौर पर सामने आना आसान था.

इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं कि बंटवारे और आजादी से पहले और इसके ठीक बाद हिंदू महासभा और आरएसएस नेताओं ने कई भड़काऊ भाषण दिए और उनके अनुयायियों द्वारा अखबारों में विद्वेषपूर्ण सामग्री लिखी गई. महात्मा गांधी उनका मुख्य निशाना थे और मुसलनमानों की तरफदारी करने का आरोप लगाकर उन्हें अपशब्द कहे गए. राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर तिरंगे को खारिज कर दिया गया.

मध्य अगस्त, 1947 के ऑर्गेनाइजर के अंक में श्यामा प्रसाद मुखर्जी समेत कई लोगों के लेखों में यह कहा गया कि सिर्फ भगवा ध्वज ही हिंदुओं द्वारा पूजे जाने के लायक है और तीन का अंक हिंदू परंपरा में खराब समझा जाता है और यह तथ्य कि इसमें तीन रंग हैं, देश के लिए अनिष्टकारी होगा. इस विचार का अनुसरण करते हुए आरएसएस ने 2002 तक तिरंगा झंडा नहीं फहराया. उसने अपना रुख तब बदला जब भाजपा के केंद्र की सत्ता में होने के दबाव के कारण इस प्रथा का पालन करना शर्मिंदगी का सबब बन गया.

गांधी जी की हत्या से पहले के महीनों में उत्तर भारत में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसमें सितंबर, 1947 में दिल्ली में हुई हिंसा भी शामिल है. आरएसएस और अन्य सांप्रदायिक ताकतों की इसमें भूमिका पर कइयों को संदेह था और इसकी ओर प्रांतीय सरकारों ने भी इशारा किया था.

सरकार विरोधी और गांधी विरोधी हिंसक भाषण आम थे, और हत्या से तीन दिन पहले महासभा के महंत दिग्विजयनाथ ने दिल्ली की एक सभा में वहां मौजूद सभी लोगों से महात्मा गांधी और सभी हिंदू विरोधी तत्वों को पाकिस्तान भेजने के लिए कहा. 18 दिसंबर, 1947 को दिल्ली में 50,000 स्वयंसेवकों की एक रैली में आरएसएस प्रमुख एमएस गोलवलकर ने सरकार के रवैये को ‘गैरभारतीय और शैतानी’ बताया और यह चेतावनी दी कि उनके पास ‘विरोधियों को तुरंत चुप करा देने का साधन हैं.’

30 जनवरी को इस धमकी को मूर्त रूप दे दिया गया और जैसा कि नेहरू ने कहा, हमारे जीवन की रोशनी बुझ गई. गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में सरकार पटेल के नेतृत्व में भारत सरकार ने आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया और इसके 25,000 सदस्यों को जेल भेज दिया.

प्रतिबंध लगाए जाने पर हिंदू महासभा ने खुद को भंग करने का फैसला किया. गांधी जी की हत्या का दाग लगने के बाद हिंदू महासभा ने एक रणनीति के तहत अपने कदम पीछे कर लिया और इसके प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की. इसके बाद से इसे हिंदू सांप्रदायिक विचारों का मुख्य राजनीतिक वाहन, इसकी सर्वप्रमुख राजनीतिक पार्टी होना था.

1977 में आपातकाल के बाद इसका जनता पार्टी में विलय हो गया और बाद में 1980 में इसने भाजपा के रूप में नया अवतार लिया.

जनवरी, 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद सावरकर को इस साजिश के पीछे का मास्टरमाइंड होने के शक में गिरफ्तार किया गया था. सरदार पटेल जो कि गृह मंत्री के तौर पर इस पूरे मामले को देख रहे थे, जो एक अच्छे एक क्रिमिनल लॉयर भी थे, को व्यक्तिगत तौर पर सावरकर के अपराध को लेकर कोई शंका नहीं थी.

अगर ऐसा नहीं होता, तो वे उन पर मुकदमा चलाने के लिए तैयार नहीं होते. प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उन्होंने बगैर किसी अगर-मगर के कहा था, ‘सावरकर के सीधे नेतृत्व में हिंदू महासभा के कट्टरपंथी धड़े ने यह साजिश (रची) और इसे अंजाम तक पहुंचाया.’ (दुर्गादास, सरदार पटेल कॉरेस्पोंडेंस, 1945-50, खंड 6, पृ. 56.)

हिंदू महासभा के खंडन के जवाब में पटेल ने हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 6 मई, 1948 को लिखा :

‘हम इस तथ्य से अपनी आंखें नहीं मूंद सकते हैं कि एक बड़ी संख्या में महासभा के सदस्यों ने इस त्रासदी पर खुशियां मनाई और मिठाइयां बांटीं…इसके अलावा महंत दिग्बिजॉय नाथ, प्रो. रामसिंह और देशपांडे जैसे महासभा के कई प्रवक्ता जिस उग्रपंथी सांप्रदायिकता, का उपदेश कुछ महीने पहले तक दे रहे थे, उसे नागरिक सुरक्षा के लिए खतरे के अलावा और कुछ नहीं माना जा सकता है. यही बात आरएसएस पर भी लागू होती है.’ (सरदार पटेल कॉरेस्पोंडेंस, खंड 6, पृ. 66)

एक गुप्त तरीके से सैन्य या अर्धसैन्य पद्धति पर संचालित किया जाने वाला संगठन होने के कारण पटेल ने इसके आगे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखा, ‘आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राजसत्ता के अस्तित्व के लिए एक स्पष्ट खतरा हैं. (जुलाई, 18, 1948, सरदार पटेल कॉरेस्पोंडेंस, खंड 6, पृ. 323)

हम आज बस यह कल्पना कर सकते हैं कि सरदार पटेल ने आज क्या कहा होता!

मृदुला मुखर्जी जेएनयू के इतिहास विभाग की पूर्व प्रोफेसर और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी की पूर्व निदेशक हैं.

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