राजनीति

बिखराव के बीज बोते हुए सद्भाव का खेल खेलते रहने में संघ को महारत हासिल है

संघ की स्वतंत्रतापूर्व भूमिकाओं की याद दिलाते रहना पर्याप्त नहीं है- उसके उन कृत्यों की पोल खोलना भी ज़रूरी है, जो उसने तथाकथित प्राचीन हिंदू गौरव के नाम पर आज़ादी के साझा संघर्ष से अर्जित और संविधान द्वारा अंगीकृत समता, बहुलता व बंधुत्व के मूल्यों को अपने कुटिल मंसूबे से बदलने के लिए बीते 75 वर्षों में किए हैं.

 

सितंबर महीने में ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख उमर अहमद इलियासी से दिल्ली की एक मस्जिद में मिलने पहुंचे सरसंघचालक मोहन भागवत. (फोटो: पीटीआई)

यूं भारत जोड़ो यात्रा पर निकले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गत शनिवार को कर्नाटक के तुमकुरु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके ‘स्वातंत्र्य वीर’ विनायक दामोदर सावरकर के बारे में इतना भर ही कहा, वह भी पहली बार नहीं, कि देश के स्वतंत्र होने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अंग्रेजों की मदद किया करता था, जिसके चलते स्वतंत्रता संघर्ष में उसकी या उसके आनुषंगिक संगठनों की कोई भूमिका नहीं है और सावरकर को अंग्रेजों से वजीफा मिला करता था.

लेकिन संघ परिवार सच को बर्दाश्त न कर पाने की अपनी पुरानी आदत के अनुसार सच के इस दोहराव को भी बर्दाश्त नहीं कर पाया. मुंबई में संघ की राजनीतिक फ्रंट भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता तो राहुल द्वारा सावरकर के अपमान का बदला लेने के लिए जूता मारो आंदोलन शुरू कर उनके पोस्टरों पर जूते बरसाने पर उतर आए!

इन कार्यकर्ताओं की बेचारगी यह कि इसके बावजूद यह सच बदलने वाला नहीं कि जब देश के दूसरे स्वतंत्रता-सेनानी मदांध गोरों द्वारा उन्हें दी जा रही क्रूरतम सजाओं के बावजूद कतई विचलित नहीं थे और अपनी कार्रवाइयों को डंके की चोट पर स्वीकार रहे थे, सावरकर स्वतंत्रता संघर्ष से पल्ला झाड़कर त्राहिमाम करते हुए बुरी तरह टूट गए थे. इसके चलते उन्होंने न सिर्फ गोरों को दया याचिकाएं दीं बल्कि उनकी शर्तों पर रिहाई भी स्वीकार की थी.

यह मानने के कारण हैं कि उक्त सच दोहराने के पीछे राहुल की यह समझदारी होगी कि आज जब संघ सावरकर की ही तर्ज पर सर्वथा अनुत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका अपनाकर सत्ता सुख भोगते हुए मुदित है, इस दोहराव की बहुत जरूरत है ताकि इतिहास को ‘फिर से लिखने’ या ‘बदलने’ की संघ परिवार की कोशिशें देश की वर्तमान व भावी पीढ़ियों को यह सब जानने से वंचित न कर पाएं.

लेकिन सच कहें तो आज संघ की स्वतंत्रतापूर्व की भूमिकाओं की याद दिलाते रहना ही पर्याप्त नहीं है- उसके उन कृत्यों की पोल खोलना भी जरूरी है, जो तथाकथित प्राचीन हिंदू गौरव के नाम पर आजादी के साझा संघर्ष से अर्जित और संविधान द्वारा अंगीकृत समता, बहुलता व बंधुत्व के मूल्यों को एकरूपता और पुनरुत्थान के अपने कुटिल मंसूबे से प्रतिस्थापित करने के लिए उसने आजादी के 75 वर्षों में किए हैं.

इस लिहाज से देखें तो राहुल का यह कथन भी संघ का हाजमा खराब ही करने वाला है कि अकेली हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाकर देश की दूसरी भाषाओं को उससे अपनी पहचान को खतरा महसूस कराने की कोई जरूरत उन्हें महसूस नहीं होती. ऐसा कहने से भले ही हिंदी पट्टी में राहुल के राजनीतिक जोखिम थोड़े बढ़ गए हों, वे ‘हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान’ की संघ की उस एकांगी अवधारणा के ट्रैप में फंसने से बच गए हैं, जिसका जरूरत से ज्यादा शोर भी नफरत व हिंसा के जरिये विभाजन के उन सारे खतरों का बड़ा कारण है, जिनसे निपटने के लिए उन्हें ‘भारत जोड़ो’ यात्रा करनी पड़ रही है.

वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के शब्दों में इसे यूं समझ सकते हैं कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है- उसे संविधान ने राजभाषा भर बनवाया है. वह भारत में सबसे अधिक बोली-बरती जाने वाली भाषा जरूर है, पर अगर वह राष्ट्रभाषा है तो बांग्ला, तमिल, मलयालम, मराठी, असमिया आदि सभी भाषाएं भी राष्ट्रभाषाएं ही हैं. एक राष्ट्र की कई राष्ट्रभाषाएं हों, यह भारत जैसे विविध व विशाल राष्ट्र के लिए उचित और स्वाभाविक है. भारतीयों का गौरव हिंदी को इकलौती राष्ट्रभाषा बनाने से ज्यादा देसी भाषाओं की विविधता और उनमें रचना, विचार, ज्ञान और अनुभव की जो विपुलता और सक्रियता है, उसे उजागर करने से बढ़ेगा. क्योंकि इससे वे एक बहुभाषी व बहुधर्मी राष्ट्र की अपनी नागरिकता की अद्धितीयता महसूस कर सकेंगे.

हम जानते हैं कि संघ अपने पूरे अस्तित्वकाल में हमारी इस बेमिसाल बहुलवादी अद्धितीयता के पीछे पड़ा रहा है. इस लिहाज से उसकी आजादी के बाद की भूमिका भी उतनी ही चिंतनीय है, जितनी उससे पहले की. सरदार वल्लभभाई पटेल ने यूं ही थोड़े कहा था कि आजादी के बाद संघ ने देश के माहौल को जिस तरह विषाक्त बनाया था, उसी के चलते हमें 30 जनवरी, 1948 को बापू को गंवाना पड़ा.

लेकिन खुद को हिंदूवादी कहने वाले संघ और उससे प्रेरित संगठन ‘शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ हिंदू’ की कायरतापूर्ण हत्या के बाद भी उसके प्रति अपने पोच-सोच से अलग नहीं हो पाए. जैसे-जैसे वे ताकतवर होते गए हैं, उसको आगे ही बढ़ाते जा रहे हैं.

इस ‘बढ़त’ का एक ओछा प्रदर्शन उन्होंने पिछले दिनों कोलकाता में किया, जहां अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने, जो खुद को सावरकर की वारिस तो बताती ही है, उसकी संघ से वैचारिक एकजुटता भी छिपी नहीें है, अपने दुर्गा पूजा पंडाल में देवी प्रतिमा के नीचे असुर की जगह बापू जैसी शक्ल-सूरत वाली मूर्ति प्रदर्शित की.

बापू के ऐसे मर्मांतक अपमान को लेकर बुरी तरह घिर जाने पर भी उसको यही लगता रहा कि वह हिंदुत्व की पताका ऊंची कर रही है. थोड़ी शर्म आई तो भी उसने इतना भर किया कि मूर्ति की आंखों से चश्मा हटाकर चेहरे पर मूंछ व सिर पर नकली बाल लगा दिए. दूसरी ओर हिंदुत्ववादियों को बापू के हत्यारे के महिमामंडन और उनकी हत्या का दृश्य दोहराने का आनंद लेने से भी परहेज नहीं है.

गौरतलब है कि बापू की हत्या के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगाया तो उसे हटवाने के लिए संघ ने उन्हें जो वचन दिया, उसे कभी नहीं निभाया और मौका पाते ही कई-कई ज़बानें बोलने लगा.

1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में अपनी ‘देशसेवा’ के लिए वह अरसे तक अपने मुंह मियां मिट्ठू बनता रहा, फिर देश को नाना प्रकार के आंतरिक उद्धेलनों के हवाले करने में लग गया. उसकी और जनता पार्टी की दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर उसके स्वयंसेवकों को देशवासियों का 1977 में देखा गया दूसरी आजादी का सपना तोड़ डालने में भी कोई हिचक नहीं ही हुई.

फिर अयोध्या में ‘वहीं’ राम मंदिर निर्माण के लिए आसमान सिर पर उठाकर 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में इन स्वयंसेवकों ने भीड़ जुड़ाकर संविधान व कानून के शासन को बेशर्मी भरी आंखें दिखाईं.

बिखराव के बीज बोते हुए सद्भाव के खेल खेलते रहने में संघ की महारत भी आजादी के बाद की ही है और उसके वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत इस खेल की इकलौती मिसाल नहीं हैं, जो इधर एक मस्जिद व मदरसे में जाकर ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के मुखिया उमर अहमद इलियासी के ‘राष्ट्रपिता’ बन गए हैं.

1971 में इसी तर्ज पर उसके वैचारिक शिखरपुरुष माधवराव सदाशिव गोलवलकर ने उन दिनों के चर्चित मुस्लिम विद्वान डॉ. सैफुद्दीन जिलानी से ‘मुस्लिम समस्या’ पर लंबी बातचीत की थी. इस बातचीत में जिलानी ने मुसलमानों के प्रति उनके दृष्टिकोण से खुद को विस्मयविमुग्ध बताया और उनसे पूछा था कि क्या वे अपने दृष्टिकोण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सहमना मुस्लिम बुद्धिजीवियों या नेताओं से भेंट करना पसंद करेंगे?

गोलवलकर का उत्तर था, ‘पसंद ही नहीं करूंगा, ऐसी भेंट का स्वागत भी करूंगा.’

लेकिन किसी को नहीं मालूम कि इस सिलसिले में 1971 से अब तक संघ के सरसंघचालकों से मुस्लिम बुद्धिजीवियों या नेताओं की कब या कितनी मुलाकातें हुईं और उनका नतीजा क्या रहा? पर वह जिस हिंदुत्व का पैरोकार है, उसके समर्थकों का अल्पसंख्यकों की देशभक्ति पर शक करते रहना, उन्हें देशद्रोही करार देना और उनकी मॉब लिंचिंग तक जा पहुंचना उन्हें छोड़ सबको पता है, जो जानबूझकर उसकी ओर से आंखें मूंदे रखना चाहते हैं.

प्रसंगवश, गोलवलकर मुसलमानों को देश का आंतरिक संकट मानते थे. यह भी कि ‘वास्तव में संपूर्ण देश में जहां भी एक मस्जिद या मुसलमानी मुहल्ला है, मुसलमान समझते हैं, वह उनका अपना स्वतंत्र देश है.’ वे मुस्लिम बस्तियों को अगणित ‘छोटे-छोटे पाकिस्तान’ की संज्ञा देते तथा कहते थे कि ‘इस प्रकार की बस्तियां निःसंशय रूप से पाकिस्तान समर्थक तत्वों के चारों ओर फैले हुए जाल के छोटे बड़े केंद्र हो गई हैं.’

क्या इसके बाद भी यह जताने के लिए किसी प्रमाण की जरूरत है कि जिन मूल्यों के साथ आजादी की लड़ाई लड़ी गई, उन्हें दरकिनार करने में संघ ने आजादी के बाद से अब तक कुछ भी उठा नहीं रखा है? हां, उसके सत्ताधीशों ने स्वाधीनता संग्राम के नायकों पर बेजा पर हक जताने का सिलसिला भी इस दौरान खूब चलाया है.

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित दैनिक देशबंधु ने पिछले दिनों सही लिखा कि संघ परिवार आज तक यह समझने से इनकार करता आ रहा है कि आजादी की लड़ाई के नायकों के निकट आजादी महज अंग्रेजी राज का खात्मा नहीं थी, उसका मकसद लोकतंत्र, समानता, बंधुत्व और उदारता के मूल्यों के साथ एक नए राष्ट्र का निर्माण भी था. हां, सर्वधर्म समभाव, धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव की महान भारतीय परंपरा को फिर से स्थापित करना और हर देशवासी को बराबरी और सम्मान के साथ रहने का अवसर सुनिश्चित करना भी.

ऐसे में संघ को इस सवाल के सामने भी खड़ा ही किया जाना चाहिए कि आजादी के इस मकसद को पूरा करने में उसने कितनी मदद की या बाधाएं डाली हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)