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चुनावी बॉन्ड संबंधी याचिकाओं को वृहद पीठ को भेजने पर छह दिसंबर को ग़ौर करेगा सुप्रीम कोर्ट

शीर्ष अदालत एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी तथा कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा चुनावी बॉन्ड के ज़रिये राजनीतिक दलों को चंदा मिलने के प्रावधान वाले क़ानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि वह छह दिसंबर को इस पर गौर करेगा कि चुनावी बॉन्ड के जरिये राजनीतिक दलों को चंदा मिलने के प्रावधान वाले कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुनवाई के लिए वृहद पीठ को भेजा जाए या नहीं.

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने यह भी कहा कि यह महत्वपूर्ण मामला है और उसने इस पर अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से सहयोग मांगा.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ के समक्ष कहा कि चुनावी बॉन्ड के जरिये चंदा हासिल करने का तौर-तरीका बहुत पारदर्शी है.

चुनावी बॉन्ड को राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने के प्रयास के तहत नकदी चंदे के विकल्प के तौर पर लाया गया है.

देश की शीर्ष अदालत एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी तथा कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘चुनावी बॉन्ड के जरिये पैसा प्राप्त करने की पद्धति इतनी पारदर्शी है कि अब काले या किसी भी तरह के बेहिसाब रूप में कोई पैसा प्राप्त करना असंभव है. यह सबसे पारदर्शी प्रणाली है.’

इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की एक बुनियादी विशेषता थी, लेकिन इस योजना के तहत यह नहीं पता है कि कौन पार्टियों को फंडिंग कर रहा है और यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए विनाशकारी है.

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिकाएं आपस में जुड़े हुए तीन महत्वपूर्ण मुद्दों को छूती हैं, जो लोकतंत्र की जड़ तक जाते हैं – चुनावी बांड का सवाल, क्या राजनीतिक दल आरटीआई के दायरे में आते हैं और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में पूर्वव्यापी संशोधन के बारे में, जो यह कहता है कि विदेशी कंपनियों की सहायक कंपनियों को विदेशी स्रोत के रूप में नहीं माना जाएगा, जिससे राजनीतिक दलों, लोक सेवकों आदि को चंदे की अनुमति मिल जाती है.

उन्होंने कहा, ‘और इन सभी मामलों में सवाल यह है कि क्या संशोधन धन विधेयक के जरिये किए जा सकते हैं, जो मंजूरी के लिए राज्यसभा भी नहीं जाते हैं.’

जस्टिस गवई ने कहा कि मामले की विस्तृत सुनवाई की जरूरत है.

सिब्बल ने कहा कि इस मामले में ऐसे प्रश्न शामिल हैं, जिनके लिए संविधान की व्याख्या की आवश्यकता होगी और इसलिए इसे एक बड़ी पीठ के पास भेजा जा सकता है.

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत को पहले मामले को देखना चाहिए और उसके बाद ही इस पर फैसला करना चाहिए कि इसे (बड़ी पीठ को) भेजा जाना चाहिए या नहीं.

इसके बाद दोनों पक्षों की सहमति से कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख छह दिसंबर तय की.

एडीआर की ओर से पैरवी कर रहे वकील प्रशांत भूषण ने बीते पांच अप्रैल को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना के समक्ष इस मामले को रखा था और कहा था कि यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है तथा इस पर तत्काल सुनवाई होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई थी, हालांकि यह मामला किसी अदालत के समक्ष नहीं आया.

इससे पहले भूषण ने 4 अक्टूबर 2021 को न्यायालय से आग्रह किया था कि इस मामले पर तत्काल सुनवाई की जाए और केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि मामले के लंबित रहने के दौरान चुनावी बॉन्ड की बिक्री न की जाए.

चुनावी बॉन्ड को लेकर क्यों है विवाद

चुनाव नियमों के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति या संस्थान 2,000 रुपये या इससे अधिक का चंदा किसी पार्टी को देता है तो राजनीतिक दल को दानकर्ता के बारे में पूरी जानकारी देनी पड़ती है.

हालांकि चुनावी बॉन्ड ने इस बाधा को समाप्त कर दिया है. अब कोई भी एक हजार से लेकर एक करोड़ रुपये तक के चुनावी बॉन्ड के जरिये पार्टियों को चंदा दे सकता है और उसकी पहचान बिल्कुल गोपनीय रहेगी.

इस माध्यम से चंदा लेने पर राजनीतिक दलों को सिर्फ ये बताना होता है कि चुनावी बॉन्ड के जरिये उन्हें कितना चंदा प्राप्त हुआ. इसलिए चुनावी बॉन्ड को पारदर्शिता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना जा रहा है.

इस योजना के आने के बाद से बड़े राजनीतिक दलों को अन्य माध्यमों (जैसे चेक इत्यादि) से मिलने वाले चंदे में गिरावट आई है और चुनावी बॉन्ड के जरिये मिल रहे चंदे में बढ़ोतरी हो रही है.

चुनावी बॉन्ड योजना को लागू करने के लिए मोदी सरकार ने साल 2017 में विभिन्न कानूनों में संशोधन किया था. चुनाव सुधार की दिशा में काम कर रहे गैर सरकारी संगठन एसोशिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स इन्हीं संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

याचिका में कहा गया है कि इन संशोधनों की वजह से विदेशी कंपनियों से असीमित राजनीतिक चंदे के दरवाजे खुल गए हैं और बड़े पैमाने पर चुनावी भ्रष्टाचार को वैधता प्राप्त हो गई है. साथ ही इस तरह के राजनीतिक चंदे में पूरी तरह अपारदर्शिता है.

साल 2019 में चुनावी बॉन्ड के संबंध में कई सारे खुलासे हुए थे, जिसमें ये पता चला था कि आरबीआई, चुनाव आयोग, कानून मंत्रालय, आरबीआई गवर्नर, मुख्य चुनाव आयुक्त और कई राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस योजना पर आपत्ति जताई थी.

हालांकि वित्त मंत्रालय ने इन सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए चुनावी बॉन्ड योजना को पारित किया.

आरबीआई ने कहा था कि चुनावी बॉन्ड और आरबीआई अधिनियम में संशोधन करने से एक गलत परंपरा शुरू हो जाएगी. इससे मनी लॉन्ड्रिंग को प्रोत्साहन मिलेगा और केंद्रीय बैंकिंग कानून के मूलभूत सिद्धांतों पर ही खतरा उत्पन्न हो जाएगा.

वहीं चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि चुनावी बॉन्ड से पार्टियों को मिलने वाला चंद पारदर्शिता के लिए खतरनाक है.

इसके अलावा आरटीआई के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि जब चुनावी बॉन्ड योजना का ड्राफ्ट तैयार किया गया था तो उसमें राजनीति दलों एवं आम जनता के साथ विचार-विमर्श का प्रावधान रखा गया था. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक के बाद इसे हटा दिया गया.

इसके अलावा चुनावी बॉन्ड योजना का ड्राफ्ट बनने से पहले ही भाजपा को इसके बारे में जानकारी थी, बल्कि मोदी के सामने प्रस्तुति देने से चार दिन पहले ही भाजपा महासचिव भूपेंद्र यादव ने तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखकर चुनावी बॉन्ड योजना पर उनकी पार्टी के सुझावों के बारे में बताया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)