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दिल्ली दंगा: हाईकोर्ट ने उमर ख़ालिद को ज़मानत देने से इनकार किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने ज़मानत से इनकार करते हुए कहा कि उमर ख़ालिद मामले के अन्य सह-आरोपियों के साथ लगातार संपर्क में थे और उनके ख़िलाफ़ आरोप प्रथमदृष्टया सही हैं. दिल्ली पुलिस द्वारा सितंबर 2020 में गिरफ़्तार ख़ालिद ने ज़मानत का अनुरोध करते हुए अपनी अर्ज़ी में कहा था कि उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुई हिंसा में उनकी कोई आपराधिक भूमिका नहीं थी.

उमर खालिद. (फोटो साभार: फेसबुक/@umar.khalid.984)

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगों की कथित साजिश को लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र उमर खालिद के खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामले में जमानत देने से मंगलवार को इनकार कर दिया.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने पाया कि वह (खालिद) अन्य सह-आरोपियों के साथ लगातार संपर्क में थे और उनके खिलाफ आरोप प्रथमदृष्टया सही हैं.

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी के कार्यों को प्रथमदृष्टया आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत ‘आतंकवादी कृत्य’ के रूप में योग्य माना जाता है.

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस रजनीश भटनागर की पीठ ने कहा, ‘जमानत अर्जी में कोई ठोस कारण नहीं दिया गया है. जमानत अर्जी खारिज की जाती है.’

दिल्ली पुलिस द्वारा सितंबर 2020 में गिरफ्तार खालिद ने जमानत का अनुरोध करते हुए अपनी अर्जी में कहा था कि उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में उसकी कोई ‘आपराधिक भूमिका’ नहीं थी और मामले के अन्य आरोपियों के साथ उसका किसी तरह का ‘षड्यंत्रकारी संपर्क’ भी नहीं था.

दिल्ली पुलिस ने खालिद की जमानत अर्जी का विरोध किया है.

खालिद, शरजील इमाम और कई अन्य के खिलाफ यूएपीए तथा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. इन सभी पर फरवरी 2020 के दंगों का कथित ‘षडयंत्रकारी’ होने का आरोप है. इन दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के समर्थन एवं विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान दंगे हुए थे.

दंगों को लेकर खालिद के अलावा, कार्यकर्ता खालिद सैफी, जेएनयू की छात्रा नताशा नरवाल और देवांगना कलीता, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की सदस्य सफूरा जरगर, आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और कई अन्य लोगों के खिलाफ कड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज किया गया है.

गौरतलब है कि 14 सितंबर 2020 को गिरफ्तार होने के बाद से खालिद को जेल में रहते हुए 764 दिन हो चुके हैं.

खालिद को निचली अदालत ने 23 मार्च को जमानत देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि इसे तीन बार टाल दिया गया था, और सुनवाई आठ महीने तक खिंच गई थी. खालिद ने जमानत खारिज होने को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

इसके बाद महीनों तक चली सुनवाई में हाईकोर्ट की टिप्पणियों ने सुर्खियां बटोरीं, जो कि खालिद द्वारा अमरावती में दिए गए उस भाषण पर थीं, जिसे दिल्ली पुलिस ने दंगों से जोड़ने की मांग की है, जिसके दौरान खालिद दिल्ली में नहीं थे.

खालिद द्वारा अपने भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और हिंदू महासभा पर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘ब्रिटिश एजेंट’ होने संबंधी की गई टिप्पणी का उल्लेख करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि ‘इससे यह धारणा दी जाती प्रतीत होती है कि केवल एक समुदाय अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहा था.’

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और रजनीश भटनागर की इस पीठ ने जोर देकर कहा कि ‘अप्रिय, घृणित, आक्रामक (बयान) प्रथम दृष्टया स्वीकार्य नहीं है.’

लगातार सुनवाई में भाषण की आलोचना करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने 30 मई को कहा था कि भाषण, हालांकि आक्रामक था, लेकिन ‘आतंकी कृत्य’ नहीं था.

बता दें कि खालिद की लंबे समय तक कैद की व्यापक तौर पर वैश्विक निकायों, अधिकार संगठनों और दुनिया भर के विचारकों द्वारा आलोचना की गई है.

खालिद ने जेल से द वायर के लिए लिखा था, ‘वे कहते हैं कि हम आजादी के अमृतकाल में दाखिल हो गए हैं. लेकिन आजादी के रखवालों की आजमाइश देखकर ऐसा लगता है कि हम अंग्रेजी राज के दौर में लौट रहे हैं. पिछले कुछ समय से गुलामी के उपनिवेशी प्रतीकों से छुटकारा पाने का काफी शोर है. लेकिन दूसरी तरफ उपनिवेशी काल की याद दिलाने वाले कई दमनकारी कानूनों को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रों, विरोधियों और राजनीतिक विपक्षियों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)