विचार

नेपाल के स्वाभिमान व स्वतंत्रता का एहतराम किए बिना हमारे संबंध सशक्त नहीं हो सकते

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: नेपाल में हमारी अपनी सभ्यता के कुछ सुंदर रूप अब भी बचे हैं और हमें इस जीवित संरक्षण के लिए उसका कृतज्ञ होना चाहिए.

(फोटो साभार: फेसबुक/@KalingaLiteraryFestival)

पिछले कुछ वर्षों से भारत में इतने सारे साहित्य-समारोह, इतने सारे शहरों में होने लगे हैं और उनमें विविधा के नाम पर इतना बिखराव होता है कि उनमें जाने का मन नहीं होता. अक्सर उनमें वही-वही लोग बुलाए भी जाते हैं जिनके पास कुछ नया या स्मरणीय कहने को नहीं होता.

आपसे बात करने के लिए अक्सर ऐसे लोग चुने जाते हैं जिन्होंने न आपको या साहित्य या कलाओं को किसी गहराई से पढ़ा-गुना होता है. वही सवाल आपसे पूछे जाते हैं जिनके उत्तर आप बीसियों बार सार्वजनिक रूप से दे चुके हैं. श्रोता-दर्शक लोग भी बेहद प्रत्याशित होते हैं: उनकी दिलचस्पी आपके लिखे-कहे से अधिक आपके साथ अपनी तस्वीर खिंचवाने-खींचने में होती है.

यह सब होते हुए भी काठमांडू में आयोजित कलिंग साहित्य समारोह में गया तो इसके पीछे का मुख्य कारण तीस से अधिक बरसों बाद इस हिमालय की गोद में बसे मनोरम शहर को फिर से देखने का था. यूं साहित्य-समारोह का कार्यक्रम इतना सख़्त था कि बाहर जाकर घूमने-देखने का अवसर कम ही मिला. फिर भी, पशुपतिनाथ मंदिर में संध्या आरती के समय हम जा पाए और एक शाम पाटन के दरबार चौक में चहलक़दमी हो पाई.

यह देखकर क्लेश हुआ कि यह शहर भी अपनी पुराने सुंदर और लगभग अद्वितीय स्थापत्य को तेज़ी से गंवा रहा है और नामहीन आधुनिक स्थापत्य उसकी जगह ले रहा है. पर काठमांडू में आकाश अब भी साफ़-नीला-निरभ्र नज़र आता है और खिली धूप में हिमालय की हिमाच्छादित गिरि मालाएं अपने समूचे वैभव और उत्तुंग सुषमा में दिखायी देती हैं.

कवि अरुण कमल के साथ अपनी उड़ान की प्रतीक्षा में बैठे हुए हम दोनों ने हिमालय पर जब हिन्दी कविताएं याद करने की कोशिश की तो बहुत याद नहीं आईं. ‘कामायनी’ की आरंभिक पंक्तियां, नागार्जुन की कविता ‘बादल को घिरते देखा है’, दिनकर की कविता ‘मेरे नगपति, मेरे विशाल’ आदि कुछ ही याद आईं.

अज्ञेय ने नंदा देवी पर कुछ सुंदर कविताएं लिखी हैं. हिमालय हिन्दी कविता में बहुत नहीं है, इतना ही है. कृष्णनाथ का बहुत-सा गद्य हिमालय पर एकाग्र है. धर्मवीर भारती की यात्रा-पुस्तक का नाम ही है ‘ठेले पर हिमालय’. यह जानने का अवसर नहीं मिला कि नेपाल की कविता में कितना हिमालय है. हिन्दी से तो अधिक निश्चय ही होगा.

बाग्मती आदि कई नदियां नेपाल से निकलकर भारत में जाती-बहती हैं. पशुपतिनाथ के मंदिर में भी बाग्मती की धारा है और उसमें शव प्रवाहित हो रहे थे. तट पर भव्य आरती भी थी मानो जीवन और मृत्यु का साथ-साथ उत्सव मना रही हो.

यह भी बातचीत से स्पष्ट हुआ कि नेपाल में भारत के प्रति सद्भाव में इधर काफ़ी कमी आई है. भारत ने अभी कुछ वर्षों पहले नेपाल भारत से जाने वाली सामग्री पर जो ब्लाकेड लगाई थी और जिसने नेपाल के जनजीवन पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव डाला था, उसे नेपाली भूले नहीं हैं.

भारत का व्यवहार नेपाल की स्वतंत्रता और इयत्ता के सहज स्वीकार का नहीं रहा है. वह सख़्ती से और अनर्जित सर्वज्ञता के स्तर से व्यवहार करता है जिसमें इस बात का सहज स्वीकार नहीं है कि नेपाल में हमारी अपनी सभ्यता के कुछ सुंदर रूप अब भी बचे हैं और हमें इस जीवित संरक्षण के लिए नेपाल का कृतज्ञ होना चाहिए.

भारत जब-तब नेपाल को अपना उपनिवेश बनाने की कोशिश करता लगता है जबकि उसकी नेपाल के बारे में जानकारी बहुत कम, सतही है. इधर चीन नेपाल में बहुत सक्रिय है और उसका मुक़ाबला भारत नहीं कर पा रहा है.

नेपाल के स्वाभिमान और स्वतंत्रता का हर स्तर पर एहतराम किए बिना उसके साथ हमारे सदियों के संबंध सशक्त और सजीव नहीं हो सकते. वहां विश्वनाथ मंदिर के ढहा दिए जाने के बाद नेपाल के राजा ने जो मंदिर बनाया था, वह भूकंप में क्षतिग्रस्त होने के बाद बरसों से पुनरुद्धार की प्रक्रिया में मंद गति से चल रहा है. भारत को इस संदर्भ में कुछ ठोस मदद करना चाहिए.

इस संबंध में एक दुखदाई पक्ष यह भी है कि सारी पहल राजनयिकों के हाथ में है. एक समय था जब नेपाल के राजनेताओं से भारत के राजनेताओं का गहरा संबंध और संवाद था. इस सिलसिले में राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव आदि के नाम याद आते हैं और साहित्य समारोह में दो पत्रकारों की चर्चा के दौरान इसका उल्लेख भी हुआ. दोनों ने यह भी बताया कि कैसे नेपाल की स्थिति पर ‘दिनमान’ में फणीश्वरनाथ रेणु ने संवेदनशील और समझ के साथ लिखा था.

इस समारोह में भारत से गए लेखकों आदि की संख्या तो एक दर्जन ही थी लेकिन बड़ी संख्या में नेपाल के लेखक, पत्रकार आदि शामिल थे. भारतीय दूतावास का एक अधिकारी उद्घाटन सत्र में तो आया, फिर दूतावास की दिलचस्पी इस आयोजन में समाप्त हो गई जबकि एक भूतपूर्व भारतीय राजदूत उसमें शिरक्‍त करते रहे. नेपाल भारत के बारे में अधिक जानता है, भारत नेपाल के बारे में कम जानता है: दुर्भाग्य यह है कि भारत को इसकी चिंता नहीं है.

साहित्य-समारोह में

कलिंग साहित्य समारोह में साहित्य में सब कुछ शामिल था: कविता, उपन्यास, आलोचना, मीडिया, अध्यात्म, सिनेमा, प्रकाशन, कलाएं, स्त्री-लेखन, आंचलिकता, अंग्रेज़ी-भोजपुरी कविता संस्कृति, नेपाल-भारत संबंध आदि. भारत से मेरे अलावा अरुण कमल, गगन गिल, व्योमेश शुक्ल, मनीष पुष्कले, विनीत कुमार, अशोक माहेश्वरी आदि थे और नेपाल से तुलसी दिवस, दिनेश अधिकारी, कनकमणि दीक्षित, युवराज घिमिरे, शंकर थापा, अभय श्रेष्ठ आदि.

मैंने अपने उद्घाटन वक्तव्य में यह कहने की कोशिश की कि यूं तो साहित्य हर समय में सरलीकरण, समग्रीकरण और सामान्यीकरण के विरुद्ध एक अथक सत्याग्रह होता है, लेकिन हमारे समय में वह विशेष रूप से सत्याग्रह है क्योंकि राजनीति-बाज़ार-धर्म-मीडिया आदि मिलकर तरह-तरह के झूठ फैला रहे हैं.

यह भी कि कितना ही असह्य और कठिन समय क्यों न हो, साहित्य हमें जताता है कि फिर भी मनुष्य होना और बने रहना संभव है. उसका आधार दृष्टियों-शैलियों की बहुलता होती है और वह अपने सच को दूसरों को न हड़पने देता है और न ही उनका उपनिवेश बनता है. साहित्य में उत्सव और प्रश्नांकन, प्रार्थना और प्रतिशोध साथ-साथ होते हैं. और यह भी कि जीवन हमेशा साहित्य से अधिक व्यापक, अधिक जटिल, अधिक बहुल होता है.

नेपाली लेखकों और बुद्धिजीवियों से कई औपचारिक और आत्मीय संवादों से यह स्पष्ट हुआ कि नेपाल साहित्य में बहुत विविधता है और उसमें अनेक शैलियां एक साथ सक्रिय हैं. उसमें आधुनिकता है तो गीत, ग़ज़ल आदि भी लिखे जा रहे हैं. जड़ों की खोज है और विस्थापन की यंत्रणा भी.

उनके यहां सामाजिक और निजी आचरण में सौम्यता है. उनमें अपनी स्वतंत्रता, स्वाभिमान और आत्मविश्वास है और वे यह अपेक्षा करते हैं कि इनका आदर किया जाए ओर संवेदनशीलता के साथ समझा भी.

नेपाली राजनीति में कट्टरता के तत्व भी सक्रिय हैं और ऐसा लगता है कि उन्हें, इस समय, भारत से समर्थन या प्रोत्साहन मिल रहा है. चीन का प्रभाव बढ़ रहा है और वह नेपाल की आर्थिकी में बड़े पैमाने पर विनिवेश कर रहा है. भारत से उलट, नेपाल के संबंध पाकिस्तान, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि पड़ोसियों से अच्छे हैं और भारत के अलावा इन देशों के नागरिकों को नेपाल आने के लिए वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं होती.

नेपाली एक भारतीय भाषा के रूप में मान्य है पर उसका उपयोग भारत नेपाल से अपने संबंध सुधारने के लिए करता नज़र नहीं आता. साहित्य के स्तर पर भी भारत में नेपाली साहित्य की बेहतर समझ और अनुवाद की ज़रूरत है.

नेपाली ललित कला इस समय बहुत सशक्त है: दक्षिण एशिया से वही देश था जिसे प्रतिष्ठादायी वेनिस बियेनाल में इस बार राष्ट्रीय पेवेलियन बनने का सौभाग्य मिला. नेपाल इस बार प्रसिद्ध ‘डॉक्यूमेंटा’ में भी आमंत्रित हुआ. याद आता है कि दशकों पहले जब हम कालिदास अकादमी के अंतर्गत एक प्रोजेक्ट में नाट्यशास्त्र का एक नया संपादित-शोधित नया संस्करण तैयार कर रहे थे तो काठमांडू में उसकी एक पांडुलिपि होने का पता चला था. पता नहीं कि अंततः उसका कुछ उपयोग हो पाया या नहीं.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)