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नोटबंदी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के सुनवाई स्थगित करने के आग्रह को ‘शर्मनाक’ बताया

मोदी सरकार के नोटबंदी के निर्णय को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ से केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल ने हलफ़नामा तैयार न होने की बात कहते हुए कार्रवाई स्थगित करने को कहा था. कोर्ट ने कहा कि संविधान पीठ ऐसे काम नहीं करती और यह बहुत असहज करने वाली स्थिति है.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने 500 रुपये और 1000 रुपये मूल्य के नोटों को चलन से बाहर करने के केंद्र सरकार के 2016 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई बुधवार को 24 नवंबर तक स्थगित कर दी.

जस्टिस एसए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सुनवाई स्थगित की. इससे पहले अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमानी ने मामले में समग्र हलफनामा दायर करने के लिए समय मांगा था.

पीठ में जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम और जस्टिस बीवी नागरत्ना भी शामिल रहे. वेंकटरमानी ने संपूर्ण हलफनामा तैयार नहीं कर पाने के लिए खेद जताया और एक सप्ताह का समय मांगा.

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सामान्य रूप से संविधान पीठ इस तरह काम नहीं करती और यह बहुत असहज करने वाला है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘आम तौर पर एक संविधान पीठ इस तरह कभी भी स्थगित नहीं होती है. एक बार शुरू करने के बाद हम इस तरह कभी नहीं उठते. यह इस कोर्ट के लिए बेहद शर्मनाक है.’

याचिकाकर्ता विवेक नारायण शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि संविधान पीठ से सुनवाई स्थगित करने के लिए कहना बहुत असामान्य बात है. एक पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने कहा कि यह असहज करने वाली स्थिति है.

इसके बाद शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को हलफनामा दायर करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया.

पीठ केंद्र के 8 नवंबर 2016 के नोटबंदी करने के फैसले को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.

गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2016 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार के फैसले की वैधता और अन्य संबंधित विषयों को आधिकारिक निर्णय के लिए पांच न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को भेजा था.

वहीं, सरकार के फैसले का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना रहा है कि इसमें संवैधानिक महत्व के मुद्दे शामिल हैं. उन्होंने तर्क दिया है यह सवाल अभी भी काफी हद तक जिंदा है कि क्या सरकार एक विशेष वर्ग की पूरी मुद्रा को विमुद्रीकृत करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 को लागू कर सकती है और अगर इसका जवाब नहीं दिया जाता है तो सरकार इसे भविष्य में भी दोहरा सकती है.

वहीं, कोर्ट पहले कह चुका है कि वह अपनाई गई प्रक्रिया और उस तरीके की जांच करेगा जिससे नोटबंदी लागू की गई थी.

12 अक्टूबर को पीठ ने कहा था, ‘सरकार की समझदारी मामले का एक पहलू है, और हम जानते हैं कि लक्ष्मण रेखा कहां है. लेकिन जिस तरीके से इसे किया गया है और जो प्रक्रिया अपनाई गई है, उसे जांचा जा सकता है. इसके लिए हमें सुनवाई करने की जरूरत है…’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)