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चुनावी बॉन्ड की कम पारदर्शी कही जाने वाली भौतिक बिक्री में चुनाव से पहले वृद्धि दिखी: रिपोर्ट

चुनावी बॉन्ड योजना, 2018 के तहत बॉन्ड डिजिटल और भौतिक, दो रूपों में बेचे जाते है. एक आरटीआई के जवाब में पता चला है कि मार्च 2018 से अब तक 22 में से 8 दौर में बेचे गए अधिकांश बॉन्ड भौतिक लेने-देन वाले थे. कई विधानसभा चुनावों से पहले भौतिक बॉन्ड का आंकड़ा डिजिटल से कहीं अधिक रहा.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: सूचना के अधिकार (आरटीआई) से पता लगा है कि अपारदर्शी माने जाने वाले भौतिक चुनावी बॉन्ड की बिक्री, 2018 के विधानसभा चुनावों, 2019 के लोकसभा चुनावों और आगामी गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले की अवधि में- इन बॉन्ड के डिजिटल लेनदेन को पार कर गई थी.

औसतन, मार्च 2018 में चुनावी बॉन्ड की बिक्री के पहले दौर से इस साल अक्टूबर में 22वें दौर तक हुए कुल 19,520 लेनदेन में से 54.18 फीसदी डिजिटल लेनदेन हुआ, जिसमें 10,791 करोड़ रुपये के बॉन्ड बेचे गए.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, मार्च 2018 में बिक्री के पहले दौर में केवल 11.92 फीसदी भौतिक लेन-देन हुए थे, भौतिक बॉन्ड को वरीयता देने में इन वर्षों के दौरान उतार-चढ़ाव देखा गया है.

इस साल बॉन्ड की बिक्री की 23वीं किश्त बुधवार (9 नवंबर) से शुरु हुई, जो 15 नवंबर को बंद होगी.

आरटीआई कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश बत्रा (सेवानिवृत) को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से मिले जवाब के मुताबिक, अब तक बॉन्ड बिक्री के 22 में से आठ दौर में बेचे गए अधिकांश बॉन्ड भौतिक लेनेदेन वाले थे. यह लेनदेन 2018 में हुए छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, राजस्थान और तेलंगाना चुनावों; 2019 में लोकसभा चुनाव; और इस साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव से पहले हुए.

मई, जुलाई, अक्टूबर और नवंबर 2018 की बॉन्ड बिक्री की किश्तों में क्रमश: 57.84, 87.40, 54.98 और 63.42 फीसदी भौतिक बिक्री देखी गई.

मार्च और अप्रैल 2019 की बॉन्ड बिक्री की किश्तों में क्रमश:56.60 और 52.51 फीसदी भौतिक बिक्री देखी गई.

वहीं, इस साल 2022 में जुलाई और अक्टूबर में हुई बॉन्ड बिक्री में क्रमश: 56.46 और 50.07 फीसदी भौतिक बिक्री हुई.

वर्ष 2017 में जब चुनावी बॉन्ड योजना-2018 तैयार की जा रही थी, तब वित्त मंत्रालय और आरबीआई ने बॉन्ड बेचने के तरीकों पर चर्चा की थी और डिजिटल या भौतिक (फिजिकल) रूप में इन्हें बेचा जाना तय हुआ था.

14 सितंबर 2017 को आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली को भौतिक मोड के संबंध में आरबीआई की चिंताओं से अवगत कराया था और साथ ही इसे डिजिटिलकरण के उद्देश्यों के खिलाफ बताया था. उन्होंने बॉन्ड इलेक्ट्रोनिक फॉर्म (डीमैट) में बेचे जाने की वकालत की थी.

जबकि वित्त मंत्रालय ने इसके जवाब में गवर्नर को कहा था कि चुनावी बॉन्ड का डीमैट फॉर्मेट दानदाता की पहचान सुरक्षित रखने के योजना के उद्देश्य के खिलाफ है.

यहां तक कि आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की चुनाव आयोग के साथ बैठक में भी यह मुद्दा उठा था. तत्कालीन चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने संदेह व्यक्ति किया था कि चुनावी बॉन्ड का दुरुपयोग शेल कंपनियों द्वारा किया जा सकता है.

2018 में अपने पद से सेवानिवृत हुए ओपी रावत ने इंडियन एक्सप्रेस को बुधवार को बताया, ‘पूरी योजना अपारदर्शी है. केवल एसबीआई के शाखा प्रबंधक को केवाईसी विवरण का पता होगा. कई दानदाता अपनी कंपनी के खातों से भुगतान नहीं करना चाहेंगे और इसके बजाय कुछ शेल कंपनियों का उपयोग करेंगे. सिस्टम अन्य लेनदेन में धोखाधड़ी को रोकने में सक्षम नहीं है और यहां लेनदेन अपारदर्शी हैं,’

बत्रा ने कहा कि दस्तावेजों से पता चलता है कि आरबीआई डिजिटल लेनदेन के पक्ष में है, जबकि सरकार दानदाताओं की पहचान सुरक्षित रखने पर जोर दे रही है, जबकि यही सरकार डिजिटलीकरण की भी बात करती है.