राजनीति

फडणवीस-बोम्मई के बीच वाकयुद्ध के बाद, उद्धव ठाकरे ने सीमा विवाद पर कर्नाटक सीएम पर निशाना साधा

कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद फिर से भड़का उठा है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने दावा किया था कि महाराष्ट्र के सांगली ज़िले के कुछ कन्नड़ भाषी ग्राम पंचायतों ने एक प्रस्ताव पारित कर कर्नाटक में विलय की मांग की थी. इसके बाद महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कर्नाटक के मराठी भाषी गांवों को महाराष्ट्र में शामिल करने के लिए संघर्ष करने की बात कही थी. दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है.

देवेंद्र फडणवीस, बसवराज बोम्मई और उद्धव ठाकरे. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

मुंबई/नागपुर: महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच चल रहे सीमा विवाद को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी बयान जारी कर दिया है.

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बृहस्पतिवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की दोनों राज्यों के बीच सीमा विवाद पर की गई टिप्पणी की आलोचना की.

ठाकरे ने कहा, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सीमा मुद्दों पर अपना बयान दे रहे हैं. ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र के 40 गांवों पर दावा करने के लिए उन पर अचानक भूत सवार हो गया है.

बसवराज बोम्मई ने मंगलवार (22 नवंबर) को दावा किया था कि महाराष्ट्र के सांगली जिले के जाट तालुका में कुछ कन्नड़ भाषी ग्राम पंचायतों ने पूर्व में एक प्रस्ताव पारित कर कर्नाटक में विलय की मांग की थी, जब वे गंभीर जल संकट का सामना कर रहे थे.

बोम्मई ने कहा था कि कर्नाटक सरकार ने पानी मुहैया कराकर उनकी मदद करने के लिए योजनाएं तैयार की हैं और उनकी सरकार इन गांवों के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है.

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राज्य सरकार इस मांग पर गंभीरता से विचार कर रही है, जिसके बाद महाराष्ट्र के कई राजनेताओं ने इसका विरोध जताते हुए बयान जारी किए हैं.

बोम्मई की टिप्पणी की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी राकांपा के नेता और महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता अजीत पवार की निंदा की है. उन्होंने मामले में केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की मांग की और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से बोम्मई को एक ‘मजबूत जवाब’ देने की अपील की है.

इस साल की शुरुआत में शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट के भारतीय जनता पार्टी भाजपा से हाथ मिलाने के बाद,दोनों राज्यों में भाजपा का शासन है. इस सीमा विवाद ने स्पष्ट रूप से पार्टी के भीतर एक संघर्ष को जन्म दे दिया है.

इस बीच महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुधवार (23 नवंबर) को कहा था कि हाल में महाराष्ट्र के किसी भी गांव ने कर्नाटक में विलय की मांग नहीं की है और किसी सीमावर्ती गांव के ‘कहीं जाने’ का सवाल ही नहीं उठता.

फडणवीस ने नागपुर में संवाददाताओं से कहा था, ‘इन गांवों ने 2012 में पानी की कमी के मुद्दे पर एक प्रस्ताव पेश किया था. वर्तमान में किसी भी गांव ने कोई प्रस्ताव पेश नहीं किया है.’

उप-मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र सरकार कर्नाटक में बेलगाम, करवार और निपानी जैसे मराठी भाषी गांवों को महाराष्ट्र में शामिल करने के लिए संघर्ष करेगी.

फडणवीस ने कहा था कि जब वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने तो उनकी सरकार ने पानी के मुद्दे को सुलझाने के लिए कर्नाटक के साथ एक समझौता किया. जब गिरीश महाजन उनके मंत्रिमंडल में जल संसाधन मंत्री थे, तब जाट गांवों के लिए जलापूर्ति योजना बनाई गई थी.

फडणवीस ने कहा था, ‘हम अब उस योजना को मंजूरी देने जा रहे हैं. शायद कोविड के कारण पिछली (उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली) सरकार इसे मंजूरी नहीं दे सकी.’

उन्होंने कहा, ‘वर्तमान में, किसी भी गांव ने ऐसी मांग (कर्नाटक के साथ विलय की) नहीं उठाई है. मांग 2012 की है.’ फडणवीस ने कहा, ‘महाराष्ट्र का एक भी गांव कहीं नहीं जाएगा.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मराठी भाषी गांवों पर राज्य सरकार के रुख पर समझौता न किए जाने की बात कहते हुए फडणवीस ने कहा था कि हम सुप्रीम कोर्ट में कानूनी ढांचे के भीतर अपने रुख के लिए लड़ेंगे.

फडणवीस की टिप्पणियों की बोम्मई की तीखी आलोचना की. उन्होंने उनकी टिप्पणियों को ‘भड़काऊ’ कहा और ट्विटर पर लिखा कि फडणवीस की मांग ‘कभी पूरी नहीं होगी’.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बोम्मई ने ट्वीट किया, ‘हमारी सरकार देश की भूमि, जल और सीमाओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.’

भाजपा नेता और महाराष्ट्र के मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने लंबित विवाद के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने बिना ब्योरा दिए कहा था, ‘महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच विवाद वास्तव में दिवंगत प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की देन है.’

उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि मामला अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है और ग्राम पंचायतों द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव का अदालत के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

मुनगंटीवार ने कहा, ‘अगर प्रस्तावों को इतनी गंभीरता से लिया जाएगा, तो कर्नाटक के उन गांवों का क्या, जिन्होंने महाराष्ट्र में शामिल होने के लिए प्रस्ताव पारित किए हैं.’

इससे पहले महाराष्ट्र के मंत्री शंभूराज देसाई ने कहा कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री के दावों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए.

1960 के दशक से महाराष्ट्र का दावा है कि कर्नाटक की सीमा के 800 से अधिक गांव उसका हिस्सा हैं. इसी तरह, कर्नाटक हमेशा चाहता था कि महाराष्ट्र के लगभग 260 गांव, जहां कन्नड़ बोली जाती है, को कर्नाटक का हिस्सा बनाया जाए.

2004 में महाराष्ट्र सरकार इस विवाद को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लेकर गई और तब से यह लंबित है. समाधान के रूप में बहुत कम प्रगति हुई है. हालांकि जैसा कि एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में कहा गया है, हाल ही में पार्टी लाइन से महाराष्ट्र के नेताओं के 19 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर फैसला करने का आग्रह किया है.

बेलगावी को लेकर दोनों राज्य सरकारें कानूनी लड़ाई के लिए तैयार 

इतना ही नहीं दोनों राज्य सरकारें बेलगावी को लेकर कानूनी लड़ाई के लिए तैयार हैं. बीते 21 नवंबर को महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले के संबंध में कानूनी टीम के साथ समन्वय करने के लिए दो मंत्रियों (चंद्रकांत पाटिल और शंभूराज देसाई) की तैनाती की.

वहीं, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा है कि राज्य ने भी अपना मामला लड़ने के लिए मुकुल रोहतगी और श्याम दीवान सहित कई वकीलों की सेवाएं ली हैं.

शंभूराज देसाई ने कहा, ‘मेरी जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार जाट तहसील के सूखे क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी की आपूर्ति के प्रस्ताव को पहले ही मंजूरी दे चुकी है. परियोजना की लागत लगभग 1,200 करोड़ रुपये है. परियोजना की तकनीकी जांच की जा रही है.’

भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह विवाद 1960 के दशक का है. महाराष्ट्र भाषाई आधार पर बेलगावी पर दावा करता है, जो स्वतंत्रता के समय ‘बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ का हिस्सा था. बेलगावी को पहले बेलगाम के नाम से जाना जाता था.

महाराष्ट्र की सीमा से लगे बेलगावी में मराठी भाषी लोगों की एक बड़ी आबादी है. दशकों से दोनों राज्यों के बीच बेलगावी विवाद का विषय रहा है. कर्नाटक कई बार कह चुका है कि सीमा मुद्दे पर महाजन आयोग की रिपोर्ट अंतिम है और ‘कर्नाटक की सीमा का एक इंच भी देने का कोई सवाल ही नहीं है.’

बोम्मई ने इस सप्ताह कहा था, ‘सीमा विवाद महाराष्ट्र में सभी दलों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक राजनीतिक हथियार है, लेकिन वे कभी सफल नहीं होंगे.’ उन्होंने कहा कि विगत वर्षों में महाराष्ट्र की याचिका को विचार योग्य नहीं माना गया.

शिंदे ने पिछले दिनों कहा था, ‘दिवंगत बालासाहेब ठाकरे हमेशा बेलगाम को महाराष्ट्र का हिस्सा बनाने की राज्य की मांग के समर्थक थे. हमने इस मुद्दे को सुलझाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. जरूरत पड़ी तो वकीलों की संख्या बढ़ाई जाएगी.’

कर्नाटक बेंगलुरु के बाद बेलगावी को दूसरा बड़ा मुख्य शहर बनाना चाहता है. सरकार ने महाराष्ट्र की सीमा से लगे इस शहर में ‘स्वर्ण विधान सौध’ का निर्माण किया और 2012 से राज्य विधानमंडल के शीतकालीन सत्र आयोजित किए.

महाराष्ट्र एकीकरण समिति (एमईएस) और मराठी समर्थक समूह दशकों से इस क्षेत्र के बेलगावी और मराठी भाषी गांवों को महाराष्ट्र में शामिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

शिवाजी मामले से ध्यान हटाने के लिए सीमा विवाद को तूल दिया गया: संजय राउत

शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने शुक्रवार को दावा किया कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज के ‘अपमान’ मामले से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद का मुद्दा उठाया गया है.

कोश्यारी ने औरंगाबाद में पिछले सप्ताह एक कार्यक्रम में कहा था कि छत्रपति शिवाजी महाराज ‘पुराने जमाने’ के आदर्श थे. राज्यपाल के इस बयान को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट समेत कई राजनीतिक दलों ने उनकी आलोचना की है.

राउत ने मुंबई में शुक्रवार को संवाददाताओं से कहा कि इससे पहले कोश्यारी ने अपनी टिप्पणी से मराठी भाषी लोगों का अपमान किया था कि अगर गुजरातियों और मारवाड़ियों ने शहर छोड़ दिया तो मुंबई देश की वित्तीय राजधानी नहीं रहेगी.

राउत ने कहा, ‘उस समय इस अपमान से ध्यान भटकाने के लिए मुझे गिरफ्तार कर लिया गया था.’

राउत पर पात्रा चॉल पुनर्विकास परियोजना से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया गया था. राउत को 100 दिनों तक जेल में रहने के बाद जमानत दी गई थी.

उन्होंने कहा कि इसी तरह अब सांगली में जाट तालुका पर कर्नाटक के दावे का इस्तेमाल लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है.

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता ने कहा, ‘उनके लिए यह पटकथा तैयार है. हालांकि, लोग छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान नहीं भूलेंगे चाहे आप कितनी भी कोशिश कर लें.’