विचार

अली सरदार जाफ़री: अवध का अलबेला शायर

अली सरदार जाफ़री को उनके अद्भुत साहित्य सृजन के साथ जीवट भरे स्वतंत्रता संघर्ष और अप्रतीम फिल्मी करिअर के लिए तो जाना ही जाता है. उर्दू व हिंदवी की नज़दीकियों, उर्दू में छंदमुक्त शायरी को बढ़ावा देने, सर्वहारा की दर्दबयानी और साम्यवाद के फलसफे के लिए भी याद किया जाता है.

अली सरदार जाफ़री (29 नवंबर 1913 – 01 अगस्त 2000). (फोटो साभार: फेसबुक)

भारतीय उपमहाद्वीप के नामचीन शायर अली सरदार जाफरी वर्ष 1913 में 29 नवंबर को यानी आज के ही दिन उत्तर प्रदेश में अवध के तत्कालीन गोंडा (अब बलरामपुर) जिले में जन्मे और 87 साल की उम्र पाई.

उन्हें उनके अद्भुत साहित्य सृजन के साथ जीवट भरे स्वतंत्रता संघर्ष और अप्रतीम फिल्मी करिअर के लिए तो जाना ही जाता है. उर्दू व हिंदवी की नजदीकियों, उर्दू में छंदमुक्त शायरी को बढ़ावा देने, सर्वहारा की दर्दबयानी और साम्यवाद के फलसफे के लिए भी याद किया जाता है.

उनके कई प्रशंसक तो यहां तक कहते हैं कि वे अपनी ‘कौन आजाद हुआ?/किस के माथे से गुलामी की सियाही छूटी/मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का/मादर-ए-हिंद के चेहरे पे उदासी है वही’ वाली नज्म के बाद कुछ न रचते तो भी उन्हें भुला दिए जाने को कोई अंदेशा कभी पैदा नहीं होता.

लेकिन वे वहीं इस नज्म पर ही नहीं ठहरे रहे. भारत विभाजन को लेकर सरहद पर अपने ‘सुब्ह-ए-फर्दा’ के लिए मुंतजिर होने की बात कहने वाली एक अमर नज्म भी रच गए हैं:

इसी सरहद पे कल डूबा था सूरज हो के दो टुकड़े
इसी सरहद पे कल जख्मी हुई थी सुब्हे-आजादी

ये सरहद खून की, अश्कों की, आहों की शरारों की
जहां बोयी थी नफरत और तलवारें उगायी थीं

यहां महबूब आंखों के सितारे तिलमिलाए थे
यहां माशूक चेहरे आंसुओं में झिलमिलाए थे
यहां बेटों से मां प्यारी बहन भाई से बिछड़ी थी

यह सरहद जो लहू पीती है और शोले उगलती है
हमारी खाक की सरहद पे नागिन बनके चलती है

सजाकर जंग के हथियार मैदां में निकलती है
मैं इस सरहद पे कब से मुन्तजिर हूं सुब्ह-ए-फर्दा का…!

लेकिन जिस सूबा-ए-अवध में उन्होंने जन्म लिया, उसकी बात करें तो वह उनकी ‘अवध की खाक-ए-हसीं’ शीर्षक नज्म पर ही सबसे ज्यादा झूमता आया है. उनके वक्त में उनसे सुन-सुनकर झूमता था और अब जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो भी गाहे-ब-गाहे गुनगुनाकर झूम लेता है.

बताते हैं कि उन्होंने यह नज्म अवध से दूर जेल की यातनाएं सहते हुए रची थी और उन्होंने इसमें अवध की मनभावन प्रकृति व गंगा-जमुनी तहजीब को बेहद इमोशनल होकर याद किया है.

उन्हीं के शब्दों में कहें तो इसमें उनकी यादों का कारवां अंधेरी रात के अंधेरे आसमान में चमकते व मुसकुराते तारों के हुजूम की तरह गुजरता है.

इस सिलसिले में कभी वे फूलों के नन्हे-नन्हे चिराग जलाए फैली ‘इश्के-पेचां’ की सब्ज बेलों व दिल-नवाज बांहों के साथ वह शाख-ए-संदल ढूंढ़ते हैं, जिस पर अंगड़ाइयों ने अपने हसीं नशेमन बना रखे हैं तो कभी मां के सफेद आंचल की छांव को याद करते हैं.

फिर लिखते हैं, मेरी बहन ने मुझे लिखा है, नदी के पानी में बेर की झाड़ियां अभी तक नहा रही हैं, पपीहे रुखसत नहीं हुए हैं, अभी वो अपनी सुरीली आवाज से दिलों को लुभा रहे हैं!

फिर वे ख्वाब-सा देखने लगते हैं, जिसमें उन्हें लगता है कि अवध की मिट्टी उन्हें बुला रही है. फिर तो उनका मन होता है कि अवध की प्यारी जमीन को बरबस अपनी गोद में उठा लें और उसकी शादाब लहलहाती हुई जबीं को हजारों बोसों से जगमगा दें!

वे इस मिट्टी के जर्रों को संबोधित करते हुए खुद को उसका मुजाहिद बताते हुए बेसाख्ता कहते हैं, जब भी लौटना, मेरे वतन की जमीं से मेरा सलाम कहते हुए उसे बताना कि मेरे होंठों पे संगो-आहन की सर्द मुहरें लगी हुई हैं… मैं आज मजबूर हूं… मगर उसके मुजाहिदों की सफों से बाहर नहीं गया हूं.

तभी उन्हें याद आता है कि इस वक्त अवध की हसीन झीलें कंवल के फूलों की चादरों में ढंकी हुई होंगी और फजाओं में मेघदूत परवाज कर रहे होंगे.

इतना ही नहीं: न जानें कितनी मुहब्बतों के पयाम लेकर घटाओं की अप्सराएं/अपनी घनेरी जुल्फों में आखिरी बार मुस्करा कर/खलीजे-बंगाल और बह्रे-अरब के मोती पिरो रही होंगी/हरे परों और नीले फूलों के मोर खुश हो के नाचते होंगे/कदीम गंगा का पाक पानी जमीं के दामन को धो रहा होगा/वो खेतियां धान से भरी होंगी/जहां हवाएं अजल के दिन से सितार अपने बजा रही हैं!

यहां एक और चीज काबिल-ए-गौर है. अपनी जन्मभूमि की उनकी इन निर्मल यादों के कारवां में न जामो-मीना हैं और न मयकदे. हैं तो बस उन अंधेरे गांवों व कस्बों की तड़पाने वाली यादें, जहां बच्चे पुराने कपड़ों की मैली गुड़ियों से खेलते हैं, किसानों के झोंपड़ों पर तरकारियों की बेलें चढ़ी हुई हैं, पुराने पीपल की जड़ में पत्थर के देवता बेखबर पड़े हैं और कदीम बरगद के पेड़ अपनी जटाएं खोले हुए खड़े हैं…

जमीं के सीने पे काश्तकारों की लाठियों के/हजारों जंगल उगे हुए हैं/कुदालें खेतों की पासबां हैं, दरातियां जगमगा रही हैं… जहां लोहार के घन के नीचे लोहे की शक्ल तब्दील हो रही है, कुम्हार का चाक चल रहा है, सुराहियां रकस कर रही हैं, सफेद आटा सियाह चक्की से राग बनकर निकल रहा है, सुनहरे चूल्हों में आग के फूल खिल रहे हैं, पतीलियां गुनगुना रही हैं, धुएं से काले तवे भी चिंगारियों के होंठों से हंस रहे हैं.

इस नज्म में अगले ही पल वे खुद को अवध की गंगा-जमुनी तहजीब का अप्रतीम वारिस सिद्ध करते हुए इन्हीं चिंगारियों के होठों से पूछने लगते हैं: गरीब सीता के घर पे कब तक रहेगी रावण की हुक्मरानी? द्रौपदी का लिबास उसके बदन से कब तक छिना करेगा? शकुंतला कब तक अंधी तकदीर के भंवर में फंसी रहेगी? यह लखनऊ की शगुफ्तगी मकबरों में कब तक दबी रहेगी?

इस मोड़ पर वे यह सोचकर थोड़े आश्वस्त होते हैं कि यह शगुफ्तगी अब दबी नहीं है और अवध ने एक बार फिर अपना सूरमाओं की सरजमीं होना प्रमाणित कर दिया है. उसकी नए सिरे से जवां बगावतें जुल्मोसितम के पैरोकार फिरंगियों के दिलों पे हैबत बिठा चुकी हैं.

तब वे स्वाभिमान से भर जाते और ऐलान करने लग जाते हैं: मैं उन पुरानी-नई अवामी बगावतों ही का तरजुमां हूं!

क्या आश्चर्य कि अवध अपने इस अलबेले शायर पर, वर्ष 2000 में एक अगस्त को मुंबई में उसके द्वारा इस संसार को अलविदा कह देने के 22 साल बाद भी, निहाल हो उठने का कोई मौका नहीं छोड़ता.

अवध में वह अभी भी मुहब्बत का पैगाम बांटता और यह कहता हुआ लगता है: मेरी दुनिया में मोहब्बत नहीं कहते हैं इसे, यूं तो हर संग के सीने में शरर मिलता है. सैकड़ों अश्क जब आंखों से बरस जाते हैं, तब कहीं एक मोहब्बत का गुहर मिलता है.

अवध को ऐसा लगे भी क्यों नहीं, अली सरदार जाफरी वादा कर गए हैं उससे कि भले ही:

फिर एक दिन ऐसा आएगा
आंखों के दिएं बुझ जाएंगे
हाथों के कंवल कुम्हलाएंगे
और बर्ग-ए-जबां से नुक्तो-सदा
की हर तितली उड़ जाएगी

इक काले समंदर की तह में
कलियों की तरह से खिलती हुई
फूलों की तरह से हंसती हुई
सारी शक्लें खो जाएंगी

खूं की गर्दिश, दिल की धड़कन
सब रागनियां सो जाएंगी…

लेकिन मैं यहां फिर आऊंगा
बच्चों के दहन से बोलूंगा
चिड़ियों की जबां से गाऊंगा!

मैं सोता हूं और जागता हूं
और जाग के फिर सो जाता हूं
सदियों का पुराना खेल हूं मैं
मैं मर के अमर हो जाता हूं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)